30-04-2026, 06:54 PM
अपडेट २
लेकिन जल्द ही बृजमोहन समझ गया कि जो कुछ भी हो रहा है वो सब गलत है ।
रात को बृजमोहन ने एक सपना देखा ।
वो रात को बिस्तर से उठा । सरला गायब थी । वो बिस्तर से उतरा और दूसरे कमरों में सरला को ढूंढने लगा । उसे सरला कहीं नहीं मिली । तभी एक कमरे से उसे बंद दरवाजे से कुछ आवाजें आती सुनाई दी । वो खिड़की के पास गया तो उसने देखा कि उसकी बीवी एक काले कलूटे गैर मर्द के साथ हमबिस्तर है । वो उसके ऊपर चढ़ा हुआ है और ताबड़तोड़ धक्के लगा रहा है ।
सरला की टांगे हवा में उठी हुई थीं । और वो जोर जोर से – आह ... आह ... कर रही थी ।
उसने देखा कि अभी दरवाजे पर 6 – 7 मुल्ले खड़े थे जो हंस हंस के बात कर रहे थे । शायद वो अपनी बारी का इन्तजार कर रहे थे ।
तभी अंदर मौजूद शख्स बोलता है,
– सरला जी , आवाजें जरा धीमे करिए, कहीं आपके पति जाग गए तो ।
सरला – जाग गए तो क्या, पैसे क्या उसे नहीं चाहिए ।फ्री में कुछ नहीं मिलता । वो आ भी तो क्या, वही तो मेरा दलाल है । भगा दूंगी उसे ।
यह कह कर दोनों हसने लगते हैं ।
आदमी – मीना और रेखा भी अब जवान तैयार माल हो गई हैं ।
सरला – तो आखिर नज़र पड़ ही गई तुम्हारी उन पर । आदमी – लड़की की छाती उभरी नहीं की उस पर नजर पड़ ही जाती है, तो कब दिला रही हो उनकी । बहुत डिमांड आ रही है ।
राकेश से ये सब देखा नहीं जाता । वो अपने कमरे में आता है और आइने पर नजर डालता है । उसमें सरला की नंगी छाती, मीना की गीली चूत, रेखा की लचकती कमर और पिंकी की छोटी-सी फुद्दी का अक्स दिख रहा था।
वो दुबारा उस कमरे की ओर जाता है , जहां उसकी बीवी सरला का ऑपरेशन चल रहा था। वो चौंकता है। बाहर खड़े लोग गायब थे । और खिड़की बंद थी ।
वो दरवाजे के पास जाता है, जो बंद था । अंदर से उसे सरला की चीखें सुनाई देती हैं । वो दरवाजे को हल्के से धकेलता है । और अंदर का नजारा देखकर स्तब्ध रह जाता है। सभी चार छह मर्द नग्न हो के सरला को चोद रहे थे। और उसकी आँखें बंद थी। वो दर्द से चीख रही थी, जैसे उसका बलात्कार हो रहा हो । सब ने उसे बीच में दबोच रखा था।
ये देख कर राकेश के मुंह से चीख निकल जाती है ।
सब रुक जाते हैं । और राकेश की ओर देखने लगते हैं ।
सरला की आंख खुलती है ।
सरला है रुक क्यों गए, वो कुछ नहीं करेगा, वो नामर्द है ।
उसके बाद सभी फिर से सरला को चोदने लगे । सैंडविच बना के । दो ने उसका एक एक बोबा मुंह में ले रखा था , और उसे आइस्क्रीम की तरह चूस रहे थे । एक को कुछ नहीं मिला तो वो सरला की जांघ चाट रहा था, और एक उसकी नाभि को जीभ से सहला रहा था ।
सरला राकेश को देख कर मुस्कुरा रही थी , और अपने बालों को दोनो हाथों से लहरा रही थी । तभी राकेश के नीचे हलचल होने लगी । और उसकी नींद खुल गई ।
उसने देखा सरला बगल में लेती है । उसका लिंग तन रखा था । वो सपना बुरा लगने के बजाय उसकी उत्तेजना बढ़ा रहा था ।
राकेश ने अपने कपड़े उतार फेंके और वो सोई हुई सरला के ऊपर चढ़ गया । और उसके स्तनों को दबाने लगा और उसे चूमने लगा । थोड़ी देर बाद सरला भी उठ गई और पति की इच्छा को समझते हुए राकेश का साथ देने लगी ।
सरला है क्या हुआ, कोई सपना देखा क्या ?
राकेश चुप रहा और सरला को मसलने लगा । सरला की सिसकियां छुटने लगीं ।
राकेश सरला का व्यवहार देख हैरान था , उसने पहले भी ऐसा किया था । तब सरला ने उसे झिड़क दिया था । लेकिन आज वो अलग ही नजर आ रही थी उसे । जैसे पहले से तैयार बैठी हो । वो भी ऐसे वाइल्ड होके सेक्स कर रही थी जैसे वो सोने से पहले और कई दिनों के बाद सेक्स करती थी ।
बृजमोहन सरला की फुद्दि चोदने लगा । उसे सरला की फुद्दि बहुत ढीली लगी । तेज झटके लगने पर उसके चेहरे पर उसे दर्द के नहीं , बल्कि उत्तेजना के भाव दिख रहे थे। वो एक वैश्या की तरह बृजमोहन को देख रही थी और मुस्कुरा रही थी ।
सरला – आह ,, धीरे करो राजा, ऐसा क्या देख लिया सपने में
बृजमोहन – तुझे,
सरला – अच्छा जी ! क्या कर रही थी मैं
बृजमोहन – छीनाल, ...
सरला – क्या.... क्या कहा आपने मुझे ... छीनाल
सरला – हां हां , छिनाल, छिनाल बनके चुदवा रही थी तू लोगो से
बृजमोहन ने पहली बार अपनी बीवी को रण्डी कहा था ।
सरला एक नजर उसे देखती है और फिर बेशर्मी के साथ मुस्कुरा कर कहती है ।
सरला - आह ... तो पति देव , किस किस के साथ देख आए तुम मुझे सपने में
सरला भी बुरा मानने के बजाय उस से वैसी ही भाषा में बात कर रही ।
सरला बृजमोहन के निप्पलों को उंगली से छेड़ने लगती है।
सरला – बताओ न ,
बृजमोहन का झड़ जाता है । और वो बिस्तर पे गिर जाता है ।
सरला – अरे ये क्या, इतने जल्दी, बताने से पहले ही, चलो अब तो बता दो
बृजमोहन – कुछ नहीं, जाने दो
सरला - जाने क्यों दूं
थोड़ी देर चुप रहने के बाद सरला करवट बदल के कहती है, " लगता है, जो तुमने सपने में देखा है, मुझे वही करना पड़ेगा ”
बृजमोहन - क्या बकवास कर रही हो ।
वो उसकी बाँह पकड़ के अपनी ओर पलटता है ।
सरला – और नहीं तो क्या, पहले तो करते नही हो, और करते हो तो यूं गरम करके छोड़ देते हो ।
( शरारती नजरों से देखते हुए बृजमोहन का गाल पकड़ती है ) अब मुझे ठंडी नहीं करोगे तो ... मुझे छिनाल तो बनाना ही पड़ेगा न पतिदेव
बृजमोहन – मै तो ऐसे ही कह रहा था । मैंने कोई सपना नहीं देखा था ।
सरला – मैं भी तो मजाक कर रही हूं राजा । ... और सपना तो तुमने देखा है मेरा । ही ही
बृजमोहन – तुमने कभी ऐसे बात नहीं की
सरला – तुमने भी तो मुझे कभी रण्डी नहीं कहा
ब्रजमोहन – गलती हुई मुझसे
सरला – गलती क्यों, तुम कहो मुझे रण्डी । लेकिन मैं तुम्हारी randi हूं औरों की नहीं ठीक है
ब्रज – ठीक है
सरला – अब सो जाओ ।
ब्रिज – अगर तुम्हारी प्यास नहीं बुझी तो फिर करते हैं ।
सरला – नहीं , जरूरत नहीं
बृजमोहन सोने लगता है, लेकिन उसे नींद नहीं आती ।
थोड़ी देर बाद एक झपकी लगने के बाद वो खड़ा उठता है तो देखता है कि सरला अपने बिस्तर पे नहीं है, वो दूसरे कमरे में जाता है । दरवाजे को हल्का खोलकर देखता है कि सरला वहां रखे आइने के आगे निर्वस्त्र हो रखी थी और एक हाथ से अपनी चूत में तेजी से उंगली कर रही थी और दूसरे हाथ से अपनी चूचि को दबा रही थी । उसकी आँखें मजे से बंद थी ।
समय बीतता गया, और बदलाव अब छिपा नहीं रह सका।
पहले तो सिर्फ चाल-ढाल में फर्क था — सरला की साड़ी का पल्लू थोड़ा और नीचे सरकने लगा, रेखा की गर्दन अब पहले जितनी झुकी नहीं रहती थी। लेकिन धीरे-धीरे यह बदलाव घर की चार दीवारों से बाहर निकलने लगा।
एक दिन पड़ोस की औरतें सरला से मिलने आईं। चाय की प्यालियों में बातें शुरू हुईं तो रेखा भी कमरे में आ गई। उसने साधारण साड़ी पहनी थी, लेकिन ब्लाउज की कटिंग थोड़ी अलग थी — कंधे थोड़े खुला, गर्दन गहरी। जब रेखा झुककर चाय का कप रख रही थी, तो एक पड़ोसिन की नजर उसके उभार पर अटक गई। वह मुस्कुराई और बोली, “रेखा बेटी, तुम तो दिन-प्रतिदिन और निखरती जा रही हो। लगता है कोई जादू हो गया है।”
रेखा ने आईने वाली मुस्कान दी — वह मुस्कान जो अब उसे सिंगारदान से सीखी लगती थी। उसने कहा, “जादू तो सबके पास होता है आंटी, बस इस्तेमाल कौन करता है।”
सरला चुप रही, लेकिन उसके होंठों पर एक हल्की रेखा उभर आई।
फिर शुरू हुआ बाजार का सिलसिला।
रेखा अब कॉलेज के बाद सीधे घर नहीं आती थी। कभी-कभी देर हो जाती। एक शाम वह लौटी तो उसके हाथ में नए कपड़े थे — एक हल्की रंग की साड़ी, जिसका ब्लाउज काफी संकीर्ण था। जब उसने वह साड़ी पहनकर सिंगारदान के सामने खड़ी होकर खुद को देखा, तो मीना ने पीछे से कहा, “दीदी, इस साड़ी में तुम बहुत... अलग लग रही हो।”
रेखा ने बिना पलटे जवाब दिया, “अलग अच्छा है या बुरा?”
मीना कुछ नहीं बोली। लेकिन अगले हफ्ते वह खुद बाजार गई और एक नाइट ड्रेस लाई, जो घर में पहनने लायक थी, लेकिन इतनी पतली कि उसकी युवा देह की रेखाएँ साफ झलकती थीं।
छोटी पिंकी अभी कॉलेज जाती थी, लेकिन उसकी बातें बदल गई थीं। वह अब दोस्तों से पूछती, “तुम्हारे घर में कितने शीशे हैं?” या “क्या तुम भी कभी खुद को बहुत सुंदर लगते हो?”
बृजमोहन देखता रहता।
उसे अब अहसास हो रहा था कि सिंगारदान सिर्फ एक वस्तु नहीं था। वह एक बीज था, जो धीरे-धीरे घर की मिट्टी में उतर रहा था। और अब फसल उगने लगी थी।
एक रात घर में अकेले में सरला ने बृजमोहन से कहा, “तुम जानते हो, नसीम जान सिर्फ तवायफ नहीं थी। वह औरत थी जो जानती थी कि पुरुष क्या देखना चाहते हैं। अब हमारे घर की लड़कियाँ भी सीख रही हैं।”
बृजमोहन ने पूछा, “सीख रही हैं... क्या?”
सरला ने आईने की तरफ देखते हुए धीरे से कहा,
“अपनी कीमत।”
“कीमत?”
“हाँ। पहले हम सोचते थे कि औरत की कीमत उसकी इज्जत है। अब लगता है कि उसकी कीमत उसकी खूबसूरती और उसकी देह की चाहत में है। रेखा को अब लड़के ज्यादा घूरते हैं। वह शिकायत नहीं करती। वह मुस्कुराती है।”
बृजमोहन का गला सूख गया।
धीरे-धीरे शुरुआत हो चुकी थी।
रेखा अब कभी-कभी शाम को पड़ोस के एक लड़के के साथ देर तक बातें करती दिखती। मीना कॉलेज के टीचर के सामने अब पहले जितनी शर्मीली नहीं रहती थी — वह आँखों में आँखें डालकर बात करती। पिंकी भी अब अपने छोटे-छोटे कपड़ों में घर के आँगन में घूमती, और पड़ोस के लड़के चुपके से झाँकते।
सरला इन सबको देखती और चुप रहती। लेकिन उसके चेहरे पर संतोष था, जैसे कोई पुरानी तवायफ अपनी बेटियों को तैयार करते हुए देख रही हो।
बृजमोहन अब समझ रहा था कि लूट का असली नतीजा क्या होता है।
वह जिस चीज को जबरन ले आया था, वह अब उसके घर की औरतों को धीरे-धीरे बाजार की तरफ ले जा रही थी — पहले नजरों में, फिर चाहत में, और शायद एक दिन... कीमत तय होने लगेगी।
आईना अभी भी चुपचाप देख रहा था।
रात गहरी हो चुकी थी। बारिश की बूँदें छत पर टपक रही थीं, लेकिन घर के अंदर की हवा गर्म और भारी थी।
सरला अब पहले जैसी नहीं रही थी।
वह रात को बृजमोहन के बिस्तर पर आई, लेकिन इस बार उसकी चाल में एक जानबूझकर की गई मंदता थी। साड़ी का पल्लू उसके कंधे से सरककर कोहनी तक आ गया था। ब्लाउज के ऊपर के दो हुक पहले ही खुले हुए थे। उसकी भारी, गोरी छाती हर साँस के साथ उठ-गिर रही थी। कमरे में सिर्फ सिंगारदान के आईने पर रखी छोटी मोमबत्ती की रोशनी थी, जो सरला के शरीर पर नरम-नरम परछाइयाँ डाल रही थी।
बृजमोहन लेटा हुआ था। उसने आँखें खोलीं तो सरला उसके ऊपर झुक गई। उसकी साड़ी की चुन्नट अब कमर तक खुल चुकी थी। उसकी मोटी, मुलायम कमर और नाभि साफ दिख रही थी।
“आज तुम मुझे देखो,” सरला ने धीमी, भारी आवाज़ में कहा। “सचमुच देखो... जैसे पहले कभी नहीं देखा।”
बृजमोहन की साँस अटक गई। सरला ने खुद अपनी साड़ी का पल्लू पूरी तरह सरका दिया। ब्लाउज अब सिर्फ दो हुक पर टिकी हुई थी। उसने धीरे से दोनों हाथ पीछे ले जाकर बाकी हुक भी खोल दिए। भारी, लटकते हुए स्तन बाहर आ गए — बड़े, नरम, लेकिन अब भी काफी सख्त निप्पल्स वाले। मोमबत्ती की रोशनी में वे सुनहरे और गर्म लग रहे थे।
सरला ने एक स्तन को अपने हाथ में उठाया, हल्का दबाया और बृजमोहन की तरफ बढ़ाया।
“इन्हें छुओ... महसूस करो। ये अब पहले जैसे नहीं रहे। इनमें एक नई भूख है।”
बृजमोहन का हाथ काँपता हुआ आगे बढ़ा। जब उसकी उँगलियाँ सरला की गर्म, मुलायम छाती को छुईं, तो सरला ने आँखें बंद कर लीं और एक लंबी, गहरी सिसकारी भरी — “हmmm...”
उसकी आवाज़ में शर्म नहीं थी, बल्कि एक तरह की मुक्ति थी।
सरला अब पूरी तरह खुल चुकी थी। उसने बृजमोहन की पैंट की डोरी खींची और हाथ अंदर डाल दिया। उसके मोटे, सख्त लंड को पकड़कर धीरे-धीरे सहलाने लगी। उसकी उँगलियाँ अनुभवी थीं, जैसे नसीम जान की यादें अब उसके हाथों में आ गई हों।
“तुमने सोचा था कि सिर्फ सिंगारदान ला रहे हो?” सरला ने आँखें खोलकर बृजमोहन को देखते हुए कहा, “लेकिन वह औरत... नसीम जान... उसकी सारी भूख, उसकी सारी कला... अब मेरे अंदर है।”
वह बृजमोहन के ऊपर चढ़ गई। अपनी साड़ी को कमर तक उठाकर उसने अपनी गीली, गरम चूत को बृजमोहन के लंड पर रगड़ना शुरू कर दिया। उसकी चूत अब पहले से कहीं ज्यादा नरम और रसीली हो गई थी। हर रगड़ के साथ एक हल्की-सी चिकनी आवाज़ निकल रही थी।
सरला ने झुककर बृजमोहन के कान में फुसफुसाया,
“मुझे चोदो... लेकिन आज मैं तुम्हें नहीं, तुम मुझे चोदोगे। जोर से। जैसे कोई रंडी को चोदता है।”
बृजमोहन ने उसे पलटकर नीचे किया। सरला की टांगें अपने आप फैल गईं। उसकी मोटी जांघें और गीली फुद्दी मोमबत्ती की रोशनी में चमक रही थी। बृजमोहन जब उसमें घुसा, तो सरला ने जोर से कराहकर अपनी कमर उठाई — “आह्ह्ह... और गहरा... पूरी तरह भर दो मुझे।”
उस रात सरला ने पहली बार बिना किसी संकोच के अपनी पूरी देह दी। वह चीखी, सिसकारी, गालियाँ भी निकाली — “हाँ... फाड़ दो मेरी चूत... मुझे रंडी बना दो...”
जब दोनों थककर लेटे, सरला ने बृजमोहन की छाती पर सिर रखा और धीरे से कहा,
“अब मैं डर नहीं रही। मुझे अच्छा लग रहा है। खुद को खुला महसूस करना... अपनी भूख को स्वीकार करना।”
बाहर पड़ोस में अफवाहें और तेज़ हो रही थीं, लेकिन सरला अब उनसे दूर हो चुकी थी। सिंगारदान के आईने में उसकी छवि अब एक नई औरत की थी — जो अपनी देह को जान चुकी थी, और उसे जीना भी सीख रही थी।
मीना और पिंकी अपने कमरों में सो रही थीं, लेकिन सरला जानती थी कि जल्द ही उनकी बारी भी आएगी।
लेकिन जल्द ही बृजमोहन समझ गया कि जो कुछ भी हो रहा है वो सब गलत है ।
रात को बृजमोहन ने एक सपना देखा ।
वो रात को बिस्तर से उठा । सरला गायब थी । वो बिस्तर से उतरा और दूसरे कमरों में सरला को ढूंढने लगा । उसे सरला कहीं नहीं मिली । तभी एक कमरे से उसे बंद दरवाजे से कुछ आवाजें आती सुनाई दी । वो खिड़की के पास गया तो उसने देखा कि उसकी बीवी एक काले कलूटे गैर मर्द के साथ हमबिस्तर है । वो उसके ऊपर चढ़ा हुआ है और ताबड़तोड़ धक्के लगा रहा है ।
सरला की टांगे हवा में उठी हुई थीं । और वो जोर जोर से – आह ... आह ... कर रही थी ।
उसने देखा कि अभी दरवाजे पर 6 – 7 मुल्ले खड़े थे जो हंस हंस के बात कर रहे थे । शायद वो अपनी बारी का इन्तजार कर रहे थे ।
तभी अंदर मौजूद शख्स बोलता है,
– सरला जी , आवाजें जरा धीमे करिए, कहीं आपके पति जाग गए तो ।
सरला – जाग गए तो क्या, पैसे क्या उसे नहीं चाहिए ।फ्री में कुछ नहीं मिलता । वो आ भी तो क्या, वही तो मेरा दलाल है । भगा दूंगी उसे ।
यह कह कर दोनों हसने लगते हैं ।
आदमी – मीना और रेखा भी अब जवान तैयार माल हो गई हैं ।
सरला – तो आखिर नज़र पड़ ही गई तुम्हारी उन पर । आदमी – लड़की की छाती उभरी नहीं की उस पर नजर पड़ ही जाती है, तो कब दिला रही हो उनकी । बहुत डिमांड आ रही है ।
राकेश से ये सब देखा नहीं जाता । वो अपने कमरे में आता है और आइने पर नजर डालता है । उसमें सरला की नंगी छाती, मीना की गीली चूत, रेखा की लचकती कमर और पिंकी की छोटी-सी फुद्दी का अक्स दिख रहा था।
वो दुबारा उस कमरे की ओर जाता है , जहां उसकी बीवी सरला का ऑपरेशन चल रहा था। वो चौंकता है। बाहर खड़े लोग गायब थे । और खिड़की बंद थी ।
वो दरवाजे के पास जाता है, जो बंद था । अंदर से उसे सरला की चीखें सुनाई देती हैं । वो दरवाजे को हल्के से धकेलता है । और अंदर का नजारा देखकर स्तब्ध रह जाता है। सभी चार छह मर्द नग्न हो के सरला को चोद रहे थे। और उसकी आँखें बंद थी। वो दर्द से चीख रही थी, जैसे उसका बलात्कार हो रहा हो । सब ने उसे बीच में दबोच रखा था।
ये देख कर राकेश के मुंह से चीख निकल जाती है ।
सब रुक जाते हैं । और राकेश की ओर देखने लगते हैं ।
सरला की आंख खुलती है ।
सरला है रुक क्यों गए, वो कुछ नहीं करेगा, वो नामर्द है ।
उसके बाद सभी फिर से सरला को चोदने लगे । सैंडविच बना के । दो ने उसका एक एक बोबा मुंह में ले रखा था , और उसे आइस्क्रीम की तरह चूस रहे थे । एक को कुछ नहीं मिला तो वो सरला की जांघ चाट रहा था, और एक उसकी नाभि को जीभ से सहला रहा था ।
सरला राकेश को देख कर मुस्कुरा रही थी , और अपने बालों को दोनो हाथों से लहरा रही थी । तभी राकेश के नीचे हलचल होने लगी । और उसकी नींद खुल गई ।
उसने देखा सरला बगल में लेती है । उसका लिंग तन रखा था । वो सपना बुरा लगने के बजाय उसकी उत्तेजना बढ़ा रहा था ।
राकेश ने अपने कपड़े उतार फेंके और वो सोई हुई सरला के ऊपर चढ़ गया । और उसके स्तनों को दबाने लगा और उसे चूमने लगा । थोड़ी देर बाद सरला भी उठ गई और पति की इच्छा को समझते हुए राकेश का साथ देने लगी ।
सरला है क्या हुआ, कोई सपना देखा क्या ?
राकेश चुप रहा और सरला को मसलने लगा । सरला की सिसकियां छुटने लगीं ।
राकेश सरला का व्यवहार देख हैरान था , उसने पहले भी ऐसा किया था । तब सरला ने उसे झिड़क दिया था । लेकिन आज वो अलग ही नजर आ रही थी उसे । जैसे पहले से तैयार बैठी हो । वो भी ऐसे वाइल्ड होके सेक्स कर रही थी जैसे वो सोने से पहले और कई दिनों के बाद सेक्स करती थी ।
बृजमोहन सरला की फुद्दि चोदने लगा । उसे सरला की फुद्दि बहुत ढीली लगी । तेज झटके लगने पर उसके चेहरे पर उसे दर्द के नहीं , बल्कि उत्तेजना के भाव दिख रहे थे। वो एक वैश्या की तरह बृजमोहन को देख रही थी और मुस्कुरा रही थी ।
सरला – आह ,, धीरे करो राजा, ऐसा क्या देख लिया सपने में
बृजमोहन – तुझे,
सरला – अच्छा जी ! क्या कर रही थी मैं
बृजमोहन – छीनाल, ...
सरला – क्या.... क्या कहा आपने मुझे ... छीनाल
सरला – हां हां , छिनाल, छिनाल बनके चुदवा रही थी तू लोगो से
बृजमोहन ने पहली बार अपनी बीवी को रण्डी कहा था ।
सरला एक नजर उसे देखती है और फिर बेशर्मी के साथ मुस्कुरा कर कहती है ।
सरला - आह ... तो पति देव , किस किस के साथ देख आए तुम मुझे सपने में
सरला भी बुरा मानने के बजाय उस से वैसी ही भाषा में बात कर रही ।
सरला बृजमोहन के निप्पलों को उंगली से छेड़ने लगती है।
सरला – बताओ न ,
बृजमोहन का झड़ जाता है । और वो बिस्तर पे गिर जाता है ।
सरला – अरे ये क्या, इतने जल्दी, बताने से पहले ही, चलो अब तो बता दो
बृजमोहन – कुछ नहीं, जाने दो
सरला - जाने क्यों दूं
थोड़ी देर चुप रहने के बाद सरला करवट बदल के कहती है, " लगता है, जो तुमने सपने में देखा है, मुझे वही करना पड़ेगा ”
बृजमोहन - क्या बकवास कर रही हो ।
वो उसकी बाँह पकड़ के अपनी ओर पलटता है ।
सरला – और नहीं तो क्या, पहले तो करते नही हो, और करते हो तो यूं गरम करके छोड़ देते हो ।
( शरारती नजरों से देखते हुए बृजमोहन का गाल पकड़ती है ) अब मुझे ठंडी नहीं करोगे तो ... मुझे छिनाल तो बनाना ही पड़ेगा न पतिदेव
बृजमोहन – मै तो ऐसे ही कह रहा था । मैंने कोई सपना नहीं देखा था ।
सरला – मैं भी तो मजाक कर रही हूं राजा । ... और सपना तो तुमने देखा है मेरा । ही ही
बृजमोहन – तुमने कभी ऐसे बात नहीं की
सरला – तुमने भी तो मुझे कभी रण्डी नहीं कहा
ब्रजमोहन – गलती हुई मुझसे
सरला – गलती क्यों, तुम कहो मुझे रण्डी । लेकिन मैं तुम्हारी randi हूं औरों की नहीं ठीक है
ब्रज – ठीक है
सरला – अब सो जाओ ।
ब्रिज – अगर तुम्हारी प्यास नहीं बुझी तो फिर करते हैं ।
सरला – नहीं , जरूरत नहीं
बृजमोहन सोने लगता है, लेकिन उसे नींद नहीं आती ।
थोड़ी देर बाद एक झपकी लगने के बाद वो खड़ा उठता है तो देखता है कि सरला अपने बिस्तर पे नहीं है, वो दूसरे कमरे में जाता है । दरवाजे को हल्का खोलकर देखता है कि सरला वहां रखे आइने के आगे निर्वस्त्र हो रखी थी और एक हाथ से अपनी चूत में तेजी से उंगली कर रही थी और दूसरे हाथ से अपनी चूचि को दबा रही थी । उसकी आँखें मजे से बंद थी ।
समय बीतता गया, और बदलाव अब छिपा नहीं रह सका।
पहले तो सिर्फ चाल-ढाल में फर्क था — सरला की साड़ी का पल्लू थोड़ा और नीचे सरकने लगा, रेखा की गर्दन अब पहले जितनी झुकी नहीं रहती थी। लेकिन धीरे-धीरे यह बदलाव घर की चार दीवारों से बाहर निकलने लगा।
एक दिन पड़ोस की औरतें सरला से मिलने आईं। चाय की प्यालियों में बातें शुरू हुईं तो रेखा भी कमरे में आ गई। उसने साधारण साड़ी पहनी थी, लेकिन ब्लाउज की कटिंग थोड़ी अलग थी — कंधे थोड़े खुला, गर्दन गहरी। जब रेखा झुककर चाय का कप रख रही थी, तो एक पड़ोसिन की नजर उसके उभार पर अटक गई। वह मुस्कुराई और बोली, “रेखा बेटी, तुम तो दिन-प्रतिदिन और निखरती जा रही हो। लगता है कोई जादू हो गया है।”
रेखा ने आईने वाली मुस्कान दी — वह मुस्कान जो अब उसे सिंगारदान से सीखी लगती थी। उसने कहा, “जादू तो सबके पास होता है आंटी, बस इस्तेमाल कौन करता है।”
सरला चुप रही, लेकिन उसके होंठों पर एक हल्की रेखा उभर आई।
फिर शुरू हुआ बाजार का सिलसिला।
रेखा अब कॉलेज के बाद सीधे घर नहीं आती थी। कभी-कभी देर हो जाती। एक शाम वह लौटी तो उसके हाथ में नए कपड़े थे — एक हल्की रंग की साड़ी, जिसका ब्लाउज काफी संकीर्ण था। जब उसने वह साड़ी पहनकर सिंगारदान के सामने खड़ी होकर खुद को देखा, तो मीना ने पीछे से कहा, “दीदी, इस साड़ी में तुम बहुत... अलग लग रही हो।”
रेखा ने बिना पलटे जवाब दिया, “अलग अच्छा है या बुरा?”
मीना कुछ नहीं बोली। लेकिन अगले हफ्ते वह खुद बाजार गई और एक नाइट ड्रेस लाई, जो घर में पहनने लायक थी, लेकिन इतनी पतली कि उसकी युवा देह की रेखाएँ साफ झलकती थीं।
छोटी पिंकी अभी कॉलेज जाती थी, लेकिन उसकी बातें बदल गई थीं। वह अब दोस्तों से पूछती, “तुम्हारे घर में कितने शीशे हैं?” या “क्या तुम भी कभी खुद को बहुत सुंदर लगते हो?”
बृजमोहन देखता रहता।
उसे अब अहसास हो रहा था कि सिंगारदान सिर्फ एक वस्तु नहीं था। वह एक बीज था, जो धीरे-धीरे घर की मिट्टी में उतर रहा था। और अब फसल उगने लगी थी।
एक रात घर में अकेले में सरला ने बृजमोहन से कहा, “तुम जानते हो, नसीम जान सिर्फ तवायफ नहीं थी। वह औरत थी जो जानती थी कि पुरुष क्या देखना चाहते हैं। अब हमारे घर की लड़कियाँ भी सीख रही हैं।”
बृजमोहन ने पूछा, “सीख रही हैं... क्या?”
सरला ने आईने की तरफ देखते हुए धीरे से कहा,
“अपनी कीमत।”
“कीमत?”
“हाँ। पहले हम सोचते थे कि औरत की कीमत उसकी इज्जत है। अब लगता है कि उसकी कीमत उसकी खूबसूरती और उसकी देह की चाहत में है। रेखा को अब लड़के ज्यादा घूरते हैं। वह शिकायत नहीं करती। वह मुस्कुराती है।”
बृजमोहन का गला सूख गया।
धीरे-धीरे शुरुआत हो चुकी थी।
रेखा अब कभी-कभी शाम को पड़ोस के एक लड़के के साथ देर तक बातें करती दिखती। मीना कॉलेज के टीचर के सामने अब पहले जितनी शर्मीली नहीं रहती थी — वह आँखों में आँखें डालकर बात करती। पिंकी भी अब अपने छोटे-छोटे कपड़ों में घर के आँगन में घूमती, और पड़ोस के लड़के चुपके से झाँकते।
सरला इन सबको देखती और चुप रहती। लेकिन उसके चेहरे पर संतोष था, जैसे कोई पुरानी तवायफ अपनी बेटियों को तैयार करते हुए देख रही हो।
बृजमोहन अब समझ रहा था कि लूट का असली नतीजा क्या होता है।
वह जिस चीज को जबरन ले आया था, वह अब उसके घर की औरतों को धीरे-धीरे बाजार की तरफ ले जा रही थी — पहले नजरों में, फिर चाहत में, और शायद एक दिन... कीमत तय होने लगेगी।
आईना अभी भी चुपचाप देख रहा था।
रात गहरी हो चुकी थी। बारिश की बूँदें छत पर टपक रही थीं, लेकिन घर के अंदर की हवा गर्म और भारी थी।
सरला अब पहले जैसी नहीं रही थी।
वह रात को बृजमोहन के बिस्तर पर आई, लेकिन इस बार उसकी चाल में एक जानबूझकर की गई मंदता थी। साड़ी का पल्लू उसके कंधे से सरककर कोहनी तक आ गया था। ब्लाउज के ऊपर के दो हुक पहले ही खुले हुए थे। उसकी भारी, गोरी छाती हर साँस के साथ उठ-गिर रही थी। कमरे में सिर्फ सिंगारदान के आईने पर रखी छोटी मोमबत्ती की रोशनी थी, जो सरला के शरीर पर नरम-नरम परछाइयाँ डाल रही थी।
बृजमोहन लेटा हुआ था। उसने आँखें खोलीं तो सरला उसके ऊपर झुक गई। उसकी साड़ी की चुन्नट अब कमर तक खुल चुकी थी। उसकी मोटी, मुलायम कमर और नाभि साफ दिख रही थी।
“आज तुम मुझे देखो,” सरला ने धीमी, भारी आवाज़ में कहा। “सचमुच देखो... जैसे पहले कभी नहीं देखा।”
बृजमोहन की साँस अटक गई। सरला ने खुद अपनी साड़ी का पल्लू पूरी तरह सरका दिया। ब्लाउज अब सिर्फ दो हुक पर टिकी हुई थी। उसने धीरे से दोनों हाथ पीछे ले जाकर बाकी हुक भी खोल दिए। भारी, लटकते हुए स्तन बाहर आ गए — बड़े, नरम, लेकिन अब भी काफी सख्त निप्पल्स वाले। मोमबत्ती की रोशनी में वे सुनहरे और गर्म लग रहे थे।
सरला ने एक स्तन को अपने हाथ में उठाया, हल्का दबाया और बृजमोहन की तरफ बढ़ाया।
“इन्हें छुओ... महसूस करो। ये अब पहले जैसे नहीं रहे। इनमें एक नई भूख है।”
बृजमोहन का हाथ काँपता हुआ आगे बढ़ा। जब उसकी उँगलियाँ सरला की गर्म, मुलायम छाती को छुईं, तो सरला ने आँखें बंद कर लीं और एक लंबी, गहरी सिसकारी भरी — “हmmm...”
उसकी आवाज़ में शर्म नहीं थी, बल्कि एक तरह की मुक्ति थी।
सरला अब पूरी तरह खुल चुकी थी। उसने बृजमोहन की पैंट की डोरी खींची और हाथ अंदर डाल दिया। उसके मोटे, सख्त लंड को पकड़कर धीरे-धीरे सहलाने लगी। उसकी उँगलियाँ अनुभवी थीं, जैसे नसीम जान की यादें अब उसके हाथों में आ गई हों।
“तुमने सोचा था कि सिर्फ सिंगारदान ला रहे हो?” सरला ने आँखें खोलकर बृजमोहन को देखते हुए कहा, “लेकिन वह औरत... नसीम जान... उसकी सारी भूख, उसकी सारी कला... अब मेरे अंदर है।”
वह बृजमोहन के ऊपर चढ़ गई। अपनी साड़ी को कमर तक उठाकर उसने अपनी गीली, गरम चूत को बृजमोहन के लंड पर रगड़ना शुरू कर दिया। उसकी चूत अब पहले से कहीं ज्यादा नरम और रसीली हो गई थी। हर रगड़ के साथ एक हल्की-सी चिकनी आवाज़ निकल रही थी।
सरला ने झुककर बृजमोहन के कान में फुसफुसाया,
“मुझे चोदो... लेकिन आज मैं तुम्हें नहीं, तुम मुझे चोदोगे। जोर से। जैसे कोई रंडी को चोदता है।”
बृजमोहन ने उसे पलटकर नीचे किया। सरला की टांगें अपने आप फैल गईं। उसकी मोटी जांघें और गीली फुद्दी मोमबत्ती की रोशनी में चमक रही थी। बृजमोहन जब उसमें घुसा, तो सरला ने जोर से कराहकर अपनी कमर उठाई — “आह्ह्ह... और गहरा... पूरी तरह भर दो मुझे।”
उस रात सरला ने पहली बार बिना किसी संकोच के अपनी पूरी देह दी। वह चीखी, सिसकारी, गालियाँ भी निकाली — “हाँ... फाड़ दो मेरी चूत... मुझे रंडी बना दो...”
जब दोनों थककर लेटे, सरला ने बृजमोहन की छाती पर सिर रखा और धीरे से कहा,
“अब मैं डर नहीं रही। मुझे अच्छा लग रहा है। खुद को खुला महसूस करना... अपनी भूख को स्वीकार करना।”
बाहर पड़ोस में अफवाहें और तेज़ हो रही थीं, लेकिन सरला अब उनसे दूर हो चुकी थी। सिंगारदान के आईने में उसकी छवि अब एक नई औरत की थी — जो अपनी देह को जान चुकी थी, और उसे जीना भी सीख रही थी।
मीना और पिंकी अपने कमरों में सो रही थीं, लेकिन सरला जानती थी कि जल्द ही उनकी बारी भी आएगी।


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