29-04-2026, 02:59 PM
बाबा: “पूजा, नाडे की गाँठ खोलनी पड़ेगी। विलंब हो रहा है।”
पूजा: “जी, अब!” मैत्री की पेशकश.
कुछ समय उस नाडे पर महेनत करने के बाद,बाबा ने पेटिकोट के नाडे की गाँठ खोल दी। गाँठ खोलने से पेटीकोट ढीला हो गया और पूजा की पेंटी से थोडा नीचे आ गया।
पूजा शर्म से लाल हो रही थी। बाबा ने पूजा का पेटिकोट थोडा नीचे सरका दिया। पूजा बाबा के सामने लेटी हुई थी। उसका पेटिकोट उसकी पेंटी से नीचे था। निकालते वक़्त बाबा की कोनी (एल्बो) पूजा की चूत के पास लग रही थी। कुछ देर बाद नाडे से अलग हो गयी।
बाबा: “यह लो, निकल गयी। इस गाँठ ने बहोत हैरान किया यार।”
बाबा पेटिकोट का नाडा बाँधने लगा। उसने नाडे की गाँठ बहुत टाइट बाँधी। पूजा बोली...
पूजा: “आह... बाबाजी, बहुत टाइट है।” मैत्री की रचना.
बाबा ने फिर नाडा खोला और इस बार गाँठ लूज बाँधी।
फिर दोनों पलाथी मार के बैठ गये।
जब पूजा ने सब कर लिया तो बाबा ने कहा।
बाबा: “मैने कल अपनी किताबे फिर से पढ़ी। तो उसमें लिखा था कि स्त्री जितनी आकर्षक दिखे उतना ही अच्छा है। इस के लिए स्त्री जितना चाहेः शृंगार कर सकती है, लेकिन सच कहूँ......”
पूजा: “कहिए बाबाजी, रुक क्यों गए!”
बाबा: “तुम पहले से ही इतनी आकर्षक दिखती हो की शायद तुम्हे शृंगार की आवश्यकता ही ना पड़े।” पुजारी ने एक मस्के के तौर पर दांव लगाया।
पूजा अपनी तारीफ़ सुन कर शरमाने लगी।
बाबा: “मैं सोचता हूँ की तुम बिना शृंगार के इतनी सुंदर लगती हो, तो शृंगार के पश्चात तो तुम बिल्कुल अप्सरा लगोगी।”
पूजा: “कैसी बातें करतें हैं बाबाजी, मैं इतनी सुंदर कहाँ हूँ!”
बाबा: “तुम नहीं जानती तुम कितनी सुंदर हो, तुम्हारा व्यवहार भी बहुत चंचल है, तुम्हारी चाल भी आकर्षित करती है। और पीछे से तो तुम बहोत ही सुन्दर लगती हो।”
पूजा यह सब सुन कर शर्मा रही थी। मुस्कुरा रही थी। और उसे अच्छा भी लग रहा था।
बाबा: “तुम्हारा शृंगार पवित्र हाथों से होना चाहिए। इसलिए तुम्हारा शृंगार मैं ही करूँगा। इसमें तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं!”
पूजा: “नहीं बाबाजी, इस में आपत्ति की कोई बात नहीं।” अब शायद पूजा भी यह सब चाह रही थी की एक मर्द उसका मर्दन करे।
बाबा: “पूजा, मुझे याद नहीं रहा था। लेकिन जो लिंग मैने तुम्हें दिया था उस पर बाबा का चित्र होना चाहिए था, इसलिए इस लिंग पर मैं अपनी एक छोटी-सी फोटो चिपका रहा हूँ।“
पूजा: “ठीक है बाबाजी।“ निर्मात्री मैत्री.
बाबा: “और हाँ, रात को दो बार उठ कर इस लिंग को प्रणाम करना। एक बार सोने से पहले, और दूसरी बार बीच रात मैं।“
पूजा: “जी बाबाजी, जैसा आप कहे।“
बाबा ने लिंग पर अपनी एक छोटी-सी फोटो चिपका दी। और पूजा को बाँधने के लिए दे दिया।
पूजा ने पहले की तरह ही लिंग को अपने पैरों के बीच बांध लिया। और उसे अपनी चनिया के अंदर डाल लिया। उसे थोड़ा पीछे खिसकाकर, उसने लिंग को ठीक अपनी चूत की दरार पर टिका दिया।
*****************
बने रहिये दोस्तों........... मैत्री.
पूजा: “जी, अब!” मैत्री की पेशकश.
कुछ समय उस नाडे पर महेनत करने के बाद,बाबा ने पेटिकोट के नाडे की गाँठ खोल दी। गाँठ खोलने से पेटीकोट ढीला हो गया और पूजा की पेंटी से थोडा नीचे आ गया।
पूजा शर्म से लाल हो रही थी। बाबा ने पूजा का पेटिकोट थोडा नीचे सरका दिया। पूजा बाबा के सामने लेटी हुई थी। उसका पेटिकोट उसकी पेंटी से नीचे था। निकालते वक़्त बाबा की कोनी (एल्बो) पूजा की चूत के पास लग रही थी। कुछ देर बाद नाडे से अलग हो गयी।
बाबा: “यह लो, निकल गयी। इस गाँठ ने बहोत हैरान किया यार।”
बाबा पेटिकोट का नाडा बाँधने लगा। उसने नाडे की गाँठ बहुत टाइट बाँधी। पूजा बोली...
पूजा: “आह... बाबाजी, बहुत टाइट है।” मैत्री की रचना.
बाबा ने फिर नाडा खोला और इस बार गाँठ लूज बाँधी।
फिर दोनों पलाथी मार के बैठ गये।
जब पूजा ने सब कर लिया तो बाबा ने कहा।
बाबा: “मैने कल अपनी किताबे फिर से पढ़ी। तो उसमें लिखा था कि स्त्री जितनी आकर्षक दिखे उतना ही अच्छा है। इस के लिए स्त्री जितना चाहेः शृंगार कर सकती है, लेकिन सच कहूँ......”
पूजा: “कहिए बाबाजी, रुक क्यों गए!”
बाबा: “तुम पहले से ही इतनी आकर्षक दिखती हो की शायद तुम्हे शृंगार की आवश्यकता ही ना पड़े।” पुजारी ने एक मस्के के तौर पर दांव लगाया।
पूजा अपनी तारीफ़ सुन कर शरमाने लगी।
बाबा: “मैं सोचता हूँ की तुम बिना शृंगार के इतनी सुंदर लगती हो, तो शृंगार के पश्चात तो तुम बिल्कुल अप्सरा लगोगी।”
पूजा: “कैसी बातें करतें हैं बाबाजी, मैं इतनी सुंदर कहाँ हूँ!”
बाबा: “तुम नहीं जानती तुम कितनी सुंदर हो, तुम्हारा व्यवहार भी बहुत चंचल है, तुम्हारी चाल भी आकर्षित करती है। और पीछे से तो तुम बहोत ही सुन्दर लगती हो।”
पूजा यह सब सुन कर शर्मा रही थी। मुस्कुरा रही थी। और उसे अच्छा भी लग रहा था।
बाबा: “तुम्हारा शृंगार पवित्र हाथों से होना चाहिए। इसलिए तुम्हारा शृंगार मैं ही करूँगा। इसमें तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं!”
पूजा: “नहीं बाबाजी, इस में आपत्ति की कोई बात नहीं।” अब शायद पूजा भी यह सब चाह रही थी की एक मर्द उसका मर्दन करे।
बाबा: “पूजा, मुझे याद नहीं रहा था। लेकिन जो लिंग मैने तुम्हें दिया था उस पर बाबा का चित्र होना चाहिए था, इसलिए इस लिंग पर मैं अपनी एक छोटी-सी फोटो चिपका रहा हूँ।“
पूजा: “ठीक है बाबाजी।“ निर्मात्री मैत्री.
बाबा: “और हाँ, रात को दो बार उठ कर इस लिंग को प्रणाम करना। एक बार सोने से पहले, और दूसरी बार बीच रात मैं।“
पूजा: “जी बाबाजी, जैसा आप कहे।“
बाबा ने लिंग पर अपनी एक छोटी-सी फोटो चिपका दी। और पूजा को बाँधने के लिए दे दिया।
पूजा ने पहले की तरह ही लिंग को अपने पैरों के बीच बांध लिया। और उसे अपनी चनिया के अंदर डाल लिया। उसे थोड़ा पीछे खिसकाकर, उसने लिंग को ठीक अपनी चूत की दरार पर टिका दिया।
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बने रहिये दोस्तों........... मैत्री.




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