29-04-2026, 02:53 PM
तकरीबन आधी रात को पूजा की आँख खुली। उसे अपनी हिप्स के बीच में कुछ चुभ रहा था। उसने सलवार का नाडा खोला। हाथ हिप्स के बीच में ले गयी। तो पाया की लिंग उसकी हिप्स के बीच में फंसा हुआ था। लिंग का मूँह पूजा के छेद से चिपका हुआ था। पूजा को पीछे से यह चुभन अच्छी लग रही थी। उसने लिंग को अपनी गांड पर और प्रेस किया, उसे मज़ा आया, और प्रेस किया और मज़ा आया।
उसकी गांड में आग-सी लगी हुई थी। उसका दिल चाह रहा था कि पूरा लिंग गांड में दबा दे, तभी उसे फिर ख़याल आया की लिंग के साथ ऐसा करना पाप है, डर के कारण उसने लिंग को टाँगों के बीच में कर दिया। नाडा बाँधा, और सो गयी।
अगले दिन पूजा वही पिछले रास्ते से बाबा के पास सलवार कमीज़ पहन कर गयी।
बाबा: आओ पूजा, जाओ दूध से स्नान कर आओ, और वस्त्रा बदल लो।
पूजा दूध से नहा कर कपड़े पहन रही थी तो उसने देखा की आज जोगिया (केसरी) ब्लाउस और चनिया (पेटिकोट) के साथ जोगिया (केसरी) रंग की पेंटी भी पड़ी थी, उसने अपनी ब्लॅक पेंटी उतार के जोगिया पेंटी पहन ली। उसे लगा की यह पेंटी बस सिर्फ उसकी चूत को ढँक रही है। वह नहा के बाहर आई। मैत्री लिखित रचना.
बाबा पवित्र अग्नि जला कर बैठा था। और पूजा की राह देख रहा था।
पूजा भी उसके पास आ कर बैठ गयी।
बाबा: “पूजा, आज तो तुम्हारे सारे वस्त्र शुद्ध हैं ना?”
पूजा थोडा शरमा गयी।
पूजा: “जी बाबाजी।”
वह जानती थी की बाबा का मतलब कच्छी से है। शायद वह पुजारी की संगत के रंग में रंगे जा रही थी।
बाबा: “तुम चाहो तो वह लिंग फिलहाल निकाल सकती हो।”
पूजा खड़ी होकर लिंग खोलने लगी। लेकिन गाँठ काफ़ी टाइट लगी थी। बाबा ने यह देखा।
बाबा: “लाओ मैं खोल दू।“
बाबा भी खड़ा हुआ। पूजा के पीछे आ कर वह खोलने लगा।
बाबा: “लिंग ने तुम्हें परेशान तो नहीं किया। ख़ास कर रात में सोने में कोई दिक्कत तो नहीं हुई?”
पूजा कैसे कहती की रात को लिंग ने उसके साथ क्या किया है। गांड को कितने मजा आ सकती थी अगर वह लिंग ना होक एक बड़ा लंड होता। उसकी गांड कितनी निराशा का अनुभव किया था।
पूजा: “नहीं बाबाजी, ऐसी खास कोई परेशानी तो नहीं हुई।
पूजा ने लिंग पेटिकोट से निकाला तो पाया की मौलि उसके पेटिकोट के नाडे में उलझ गयी थी। पूजा कुछ देर कोशिश करती रही लेकिन मौलि नाडे से नहीं निकली।
बाबा: “पूजा, विलंभ हो रहा है। जल्दी करो, लाओ मैं निकालूं।”
बाबा पूजा के सामने आया और उसके चनिये के नाडे से निकालने लगा। कुछ समय प्रयत्न करने के बाद भी वह गाँठ नहीं खुली।
बाबा: “शायद यह ऐसे नहीं निकलेगा। तुम ज़रा लेट जाओ।“ पुजारी ने मौक़ा पाया,और मौके का सही उपयोग करने का सोचा।
पूजा: “प....र....बाबाजी....यह......”
बाबा: “अरे बेटी, लेट जाओ न, मैं सब ठीक कर तो रहा हूँ। चलो अब यहाँ आराम से लेट जाओ।” मैत्री की रचना.
पूजा लेट गयी। बाबा उसके नाडे पर लगा हुआ था।
******************************
बने रहिये दोस्तों...................
उसकी गांड में आग-सी लगी हुई थी। उसका दिल चाह रहा था कि पूरा लिंग गांड में दबा दे, तभी उसे फिर ख़याल आया की लिंग के साथ ऐसा करना पाप है, डर के कारण उसने लिंग को टाँगों के बीच में कर दिया। नाडा बाँधा, और सो गयी।
अगले दिन पूजा वही पिछले रास्ते से बाबा के पास सलवार कमीज़ पहन कर गयी।
बाबा: आओ पूजा, जाओ दूध से स्नान कर आओ, और वस्त्रा बदल लो।
पूजा दूध से नहा कर कपड़े पहन रही थी तो उसने देखा की आज जोगिया (केसरी) ब्लाउस और चनिया (पेटिकोट) के साथ जोगिया (केसरी) रंग की पेंटी भी पड़ी थी, उसने अपनी ब्लॅक पेंटी उतार के जोगिया पेंटी पहन ली। उसे लगा की यह पेंटी बस सिर्फ उसकी चूत को ढँक रही है। वह नहा के बाहर आई। मैत्री लिखित रचना.
बाबा पवित्र अग्नि जला कर बैठा था। और पूजा की राह देख रहा था।
पूजा भी उसके पास आ कर बैठ गयी।
बाबा: “पूजा, आज तो तुम्हारे सारे वस्त्र शुद्ध हैं ना?”
पूजा थोडा शरमा गयी।
पूजा: “जी बाबाजी।”
वह जानती थी की बाबा का मतलब कच्छी से है। शायद वह पुजारी की संगत के रंग में रंगे जा रही थी।
बाबा: “तुम चाहो तो वह लिंग फिलहाल निकाल सकती हो।”
पूजा खड़ी होकर लिंग खोलने लगी। लेकिन गाँठ काफ़ी टाइट लगी थी। बाबा ने यह देखा।
बाबा: “लाओ मैं खोल दू।“
बाबा भी खड़ा हुआ। पूजा के पीछे आ कर वह खोलने लगा।
बाबा: “लिंग ने तुम्हें परेशान तो नहीं किया। ख़ास कर रात में सोने में कोई दिक्कत तो नहीं हुई?”
पूजा कैसे कहती की रात को लिंग ने उसके साथ क्या किया है। गांड को कितने मजा आ सकती थी अगर वह लिंग ना होक एक बड़ा लंड होता। उसकी गांड कितनी निराशा का अनुभव किया था।
पूजा: “नहीं बाबाजी, ऐसी खास कोई परेशानी तो नहीं हुई।
पूजा ने लिंग पेटिकोट से निकाला तो पाया की मौलि उसके पेटिकोट के नाडे में उलझ गयी थी। पूजा कुछ देर कोशिश करती रही लेकिन मौलि नाडे से नहीं निकली।
बाबा: “पूजा, विलंभ हो रहा है। जल्दी करो, लाओ मैं निकालूं।”
बाबा पूजा के सामने आया और उसके चनिये के नाडे से निकालने लगा। कुछ समय प्रयत्न करने के बाद भी वह गाँठ नहीं खुली।
बाबा: “शायद यह ऐसे नहीं निकलेगा। तुम ज़रा लेट जाओ।“ पुजारी ने मौक़ा पाया,और मौके का सही उपयोग करने का सोचा।
पूजा: “प....र....बाबाजी....यह......”
बाबा: “अरे बेटी, लेट जाओ न, मैं सब ठीक कर तो रहा हूँ। चलो अब यहाँ आराम से लेट जाओ।” मैत्री की रचना.
पूजा लेट गयी। बाबा उसके नाडे पर लगा हुआ था।
******************************
बने रहिये दोस्तों...................



![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)