28-04-2026, 03:35 PM
पूजा ने लिंग को अपने पेटिकोट के अंदर कर लिया। लिंग पूजा की टाँगों के बीच में आ रहा था।
पूजा: “पुजारीजी, यह दिव्य लिंग मेरे अन्दर सेट नहीं हो रहा। मतलब शायद मैं ठीक से चल नहीं पाऊ।” मैत्री रचित कहानी
पुजारी: “पुत्री, अब कुछ पाने के लिए कुछ सहन भी तो करना है। मैं समज सकता हूँ की यह तुम्हारी योनी को छुएगा। और लिंग तो आखिर लिंग है बेटी। थोड़े समय की ही तो बात है। सहन कर लेना फिर तुम्हे इसकी आदत हो जाएगी तो खुद ही इस दिव्य लिंग को उतारने से मना कर दोगी।”
पूजा: “जी पुजारीजी, आप मेरे गुरूजी है और आप मेरे लिए कुछ अच्छा ही सोचेंगे। मैं कुछ उपाय करुँगी ताकि मेरी माँ को पता ना चले।”
बाबा: “बस, अब तुम वस्त्रा बदल कर घर जा सकती हो। जो टिका मैने लगाया है उसे ना हटाना। चाहे तो घर जा कर साडी उतार के सलवार कामीज़ पहन लेना, जिससे की तुम्हारे देह पर लगा टिका किसी को दिखे ना।
पूजा: “परंतु स्नान करते समय तो टिका हट जाएगा।”
बाबा: “स्नान कल सुबह करना है। उसकी कोई बात नहीं।” मैत्री की रचना.
पूजा कपड़े बदल कर कधंगी और लडखडाती चाल से, जैसे तैसे अपने घर आ गयी, उसने टाँगों के बीच लिंग पहन रखा था। पूरे दिन वह टाँगों के बीच लिंग लेके चलती फिरती रही। लिंग उसकी टाँगों के बीच हिलता रहा। उसकी स्किन को टच करता रहा।
रात को सोतेः वक़्त पूजा कच्छी नहीं पहनती थी, जब रात को पूजा सोने के लिए लेटी हुई थी तो लिंग पूजा की चूत के डाइरेक्ट कॉंटॅक्ट में था। पूजा लिंग को दोनों टाँगें जोड़ के दबाने लगी। उसे अच्छा लग रहा था। उसे अपने पति के लिंग (पेनिस) की भी याद आ रही थी। उसने सलवार का नाडा खोला। लिंग को हाथ में लिया और लिंग को हल्के-हल्के अपनी चूत पर दबाने लगी। फिर लिंग को अपनी चूत पर रगड़ने लगी। वह गरम हो रही थी। उसने पाया की यह लिंग उसके पति के लिंग से सामान्यतः लम्बाई में ज्यादा था। और मोटाई भी अच्छी खासी थी।
तभी उसे ख़याल आया "पूजा, यह तू क्या कर रही है, पूजनीय लिंग के साथ ऐसा करना बहुत पाप है।" यह सोच कर पूजा ने लिंग से हाथ हटा लिया, सलवार का नाडा बाँधा और सोने की कोशिश कारने लगी। निर्मात्री मैत्री.
****** ****************
बस दोस्तों आज के लिए यही तक. फिर लिलेंगे एक नए एपिसोड के साथ.
तब तक के लिए मैत्री की ओर से जय भारत.
पूजा: “पुजारीजी, यह दिव्य लिंग मेरे अन्दर सेट नहीं हो रहा। मतलब शायद मैं ठीक से चल नहीं पाऊ।” मैत्री रचित कहानी
पुजारी: “पुत्री, अब कुछ पाने के लिए कुछ सहन भी तो करना है। मैं समज सकता हूँ की यह तुम्हारी योनी को छुएगा। और लिंग तो आखिर लिंग है बेटी। थोड़े समय की ही तो बात है। सहन कर लेना फिर तुम्हे इसकी आदत हो जाएगी तो खुद ही इस दिव्य लिंग को उतारने से मना कर दोगी।”
पूजा: “जी पुजारीजी, आप मेरे गुरूजी है और आप मेरे लिए कुछ अच्छा ही सोचेंगे। मैं कुछ उपाय करुँगी ताकि मेरी माँ को पता ना चले।”
बाबा: “बस, अब तुम वस्त्रा बदल कर घर जा सकती हो। जो टिका मैने लगाया है उसे ना हटाना। चाहे तो घर जा कर साडी उतार के सलवार कामीज़ पहन लेना, जिससे की तुम्हारे देह पर लगा टिका किसी को दिखे ना।
पूजा: “परंतु स्नान करते समय तो टिका हट जाएगा।”
बाबा: “स्नान कल सुबह करना है। उसकी कोई बात नहीं।” मैत्री की रचना.
पूजा कपड़े बदल कर कधंगी और लडखडाती चाल से, जैसे तैसे अपने घर आ गयी, उसने टाँगों के बीच लिंग पहन रखा था। पूरे दिन वह टाँगों के बीच लिंग लेके चलती फिरती रही। लिंग उसकी टाँगों के बीच हिलता रहा। उसकी स्किन को टच करता रहा।
रात को सोतेः वक़्त पूजा कच्छी नहीं पहनती थी, जब रात को पूजा सोने के लिए लेटी हुई थी तो लिंग पूजा की चूत के डाइरेक्ट कॉंटॅक्ट में था। पूजा लिंग को दोनों टाँगें जोड़ के दबाने लगी। उसे अच्छा लग रहा था। उसे अपने पति के लिंग (पेनिस) की भी याद आ रही थी। उसने सलवार का नाडा खोला। लिंग को हाथ में लिया और लिंग को हल्के-हल्के अपनी चूत पर दबाने लगी। फिर लिंग को अपनी चूत पर रगड़ने लगी। वह गरम हो रही थी। उसने पाया की यह लिंग उसके पति के लिंग से सामान्यतः लम्बाई में ज्यादा था। और मोटाई भी अच्छी खासी थी।
तभी उसे ख़याल आया "पूजा, यह तू क्या कर रही है, पूजनीय लिंग के साथ ऐसा करना बहुत पाप है।" यह सोच कर पूजा ने लिंग से हाथ हटा लिया, सलवार का नाडा बाँधा और सोने की कोशिश कारने लगी। निर्मात्री मैत्री.
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बस दोस्तों आज के लिए यही तक. फिर लिलेंगे एक नए एपिसोड के साथ.
तब तक के लिए मैत्री की ओर से जय भारत.



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