28-04-2026, 07:10 AM
रात का सन्नाटा और अंधेरे की जुर्रत—4
सरताज की आँखों में शेर के लिए इस वक्त अथाह सम्मान था। उसे लग रहा था कि अगर आज यह वफादार नौकर न होता, तो पता नहीं उस 'चोरनी/औरत' ने उसकी मीरा के साथ क्या किया होता।
वह अभी आगे की कार्रवाई के बारे में सोच रहा था।
(तभी सरताज का फोन बजता है)
सरताज (फोन पर): "हाँ, बोलो... क्या? सब तैयार हैं? ठीक है, बस दस मिनट में पहुँच रहा हूँ। तुम लोग पोजीशन लो, कोई भी चूक नहीं होनी चाहिए।"
(फोन काटकर मीरा की तरफ मुड़ते हुए)
सरताज: "मीरा, मुझे अभी निकलना होगा। जूनियर बार-बार फोन कर रहे हैं, रेड के लिए सब तैयार हैं और मेरा इंतज़ार हो रहा है।"
सरताज ने मीरा का हाथ पकड़ा और उसे शेर के करीब ले गया, जो अभी भी फर्श पर लेटा हुआ दर्द का नाटक कर रहा था।
सरताज: "मीरा, देखो शेर की हालत। इस बेचारे ने तुम्हें और इस घर को बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी। अभी शेर को तुम्हारी ज़रूरत है। तुम इसकी चोट पर बर्फ की सिकाई करो और इसे कुछ दवा दे दो।"
मीरा का दिल धक से रह गया। वह अभी-अभी उस वहशी अहसास से निकलकर आई थी, और अब सरताज उसे उसी मर्द के पास भेज रहा था जिसने कुछ देर पहले उसके जिस्म को झकझोर दिया था। लेकिन सरताज की नज़रों में शेर एक 'हीरो' था, और मीरा के पास मना करने का कोई बहाना नहीं था।
मीरा (सहमते हुए): "जी... आप फिक्र मत कीजिए, आप अपना काम देखिए। मैं संभाल लूँगी।"
मीरा (मन ही मन): 'सरताज, तुम्हें कैसे बताऊँ कि वह चोरनी मैं ही थी। शेर मेरे शरीर के साथ खेल रहा था। मुझे नहीं पता कि वह मुझे चोरनी समझकर खेल रहा था या उसे पता था कि वह मैं ही हूँ।'
मीरा (मन ही मन): 'और तुम मुझे उसी इंसान को बाम लगाने को बोल रहे हो, वो ज़ख्म मैंने ही दिया था।'
मीरा (मन ही मन): "हे वाहेगुरु! तुम मेरी कैसी परीक्षा ले रहे हो? शायद यह सरताज से पहली बार झूठ बोलने का नतीजा है। अगर मैं सरताज को सच बता देती, तो आज मुझे यह सब नहीं सहना पड़ता।"
सरताज ने एक आखिरी बार शेर की तरफ देखा और तेज़ी से कमरे से बाहर निकल गया।
मीरा: (हिचकिचाते हुए) "मैं... मैं बर्फ लेकर आती हूँ।"
किचन में जाते हुए, मीरा (मन ही मन): "कभी-कभी तो शक होता है कि शेर को सब पता था कि वो चोरनी मैं ही हूँ, पर वो जानबूझकर अनजान बना फिरता है। लेकिन जिस तरह वह सरताज के सामने कहानियाँ बना रहा था, उसे देखकर लगता है कि उसे वाकई नहीं पता कि वह मैं थी। हे वाहेगुरु, मुझे कैसी उलझन में डाल दिया है!"
जैसे ही मीरा किचन की तरफ मुड़ी, शेर के चेहरे पर एक शैतानी चमक कौंध गई। उसने देख लिया था कि पासा पूरी तरह उसके पक्ष में पलट चुका है।
शेर [आंतरिक संवाद]: 'खेल अब शुरू हुआ है मेमसाब! साहब ने खुद आपको मेरे हवाले कर दिया है। अब इस चोट का ऐसा ड्रामा करूँगा कि आप दिन-रात मेरे बिस्तर के पास बैठने पर मजबूर हो जाएँगी। अभी तो सिर्फ अंधेरे में चखा था, अब तो उजाले में आपकी सेवा का मज़ा लूँगा।'
अपनी चोट को और भी गंभीर दिखाने के लिए, शेर ने ज़ोर-ज़ोर से कराहना शुरू किया और जानबूझकर अपने माथे को फर्श पर रगड़ लिया ताकि वहाँ भी लाल निशान पड़ जाए।
किचन की मद्धिम रोशनी में मीरा के हाथ कांप रहे थे। उसने फ्रिज से बर्फ निकालने के लिए हाथ बढ़ाया, पर उसका ध्यान उन एहसासों पर था जो अभी कुछ देर पहले उसने महसूस किए थे जब शेर ने उसे चोरनी समझकर पकड़ रखा था।
वह खुद से सवाल कर रही थी कि क्या शेर की वो वहशियत सिर्फ एक इत्तेफाक थी या उसके पीछे कोई गहरा राज छुपा था। अगर उसे पता है कि चोरनी मैं ही थी, तो इसका साफ़ मतलब है कि उसकी मेरी तरफ गंदी नीयत है? और अगर नहीं पता, तो एक नौकर की उस 'चोरनी' के प्रति ऐसी हरकतें दर्शाती हैं कि वह कितना डेस्परेट हो रखा है। और वह चोरनी को क्या कह रहा था? कि मैं अपनी मालकिन को पाना चाहता हूँ, पर चूँकि वह सती-सावित्री है, इसलिए तेरे साथ कर रहा हूँ?
मीरा का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। शेर के वे शब्द उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहे थे। वह सोचकर ही कांप उठी कि शेर के मन में उसे लेकर इतनी गहरी और वहशी हवस पली हुई है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह शेर की वफादारी पर यकीन करे या उस छिपे हुए दरिंदे से डरे, जो उसे पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता था।
पर सबसे ज्यादा डर तो उसे अपने शरीर के रिस्पॉन्स से हो रहा था। मैं तब क्यों गीली हुई? क्यों मेरे शरीर को उसका स्पर्श अच्छा लगा? मैं तो शेर को चाहती भी नहीं! हे वाहेगुरु, यह कैसी परीक्षा ले रहे हो मेरी?
मीरा ने ठंडे पानी से अपने चेहरे पर छीटें मारे, पर अंदर की वह तपिश कम होने का नाम नहीं ले रही थी। उसे खुद पर घिन आ रही थी कि एक तरफ वह शेर की वहशियत से खौफजदा थी और दूसरी तरफ उसका अपना बदन उस छुअन पर गद्दारी कर रहा था।
क्या यह प्रेग्नेंसी से डील करने वाली दवा का असर था? या उसके भीतर दबी कोई ऐसी प्यास जिसे शेर के उस खुरदरे और मर्दाना स्पर्श ने अनजाने में जगा दिया था? वह इसी कशमकश में उलझी हुई थी कि वह खुद से नफरत करे या अपनी इस शारीरिक कमजोरी से।
वह बर्फ का थैला तैयार करते हुए बस यही दुआ कर रही थी कि यह रात जल्दी बीत जाए।
मीरा बर्फ का थैला और डिटॉल लेकर वापस आई।
शेर: (एकदम डूबती हुई आवाज़ में) "मेमसाब... बहुत जलन हो रही है। ऐसा लग रहा है जैसे उस औरत ने... उफ़... मुझे अंदर तक खत्म कर दिया है। मुझे डर है कि कहीं मैं... मैं फिर से खड़ा हो पाऊँगा या नहीं।"
मीरा: (परेशान होकर) "घबरा मत शेर! कुछ नहीं होगा तुझे।"
अब उस कमरे में सिर्फ मीरा थी और फर्श पर पड़ा वह 'शेर'। मीरा जैसे ही बर्फ लगाने के लिए शेर के करीब झुकी, शेर ने अपनी आँखें खोलीं।
मीरा ने जल्दबाज़ी में अपना पीला रेशमी नाइटगाउन पहना था और ऊपर से एक रोब डाल लिया था। पीले नाइटगाउन और महीन रोब के नीचे वह उसके चूचों के साथ चिपका हुआ था, जो उनकी पूरी गोलाई को दर्शा रहा था। उसके नीचे से निप्पल साफ नज़र आ रहे थे।
शेर की आँखें कुछ पल के लिए वहीं रुकी रह गईं, फिर न चाहते हुए भी वह मीरा के चेहरे की तरफ मुड़ा। शेर ने देखा कि मीरा बर्फ का थैला थामे हिचकिचा रही है। उसने अपनी कराहट को और भी दर्दनाक बना दिया ताकि मीरा के मन में बचा-खुचा शक भी 'दया' में बदल जाए।
शेर: (बेहद कमज़ोर आवाज़ में, जैसे दम निकल रहा हो) "मेमसाब... यहाँ फर्श पर बहुत ठंड लग रही है। उस चोरनी ने मुझे ऐसी जगह मारा है कि मेरा पूरा शरीर सुन्न पड़ रहा है।"
मीरा: (हिचकिचाते हुए, बर्फ का थैला बढ़ाते हुए) "शेर, मैं... मैं यहाँ बाम लगा देती हूँ। तुम बस थोड़े संयम से काम लो।"
शेर: (कराहते हुए) "नहीं मेमसाब... यहाँ नहीं। मुझे शर्म आती है कि आप मुझे इस बेबसी में देखें। क्या... क्या आप मुझे सहारा देकर पीछे मेरे कमरे तक ले चलेंगी? वहाँ आप इत्मीनान से मेरे ज़ख्म देख पाएँगी।"
मीरा: (मन ही मन द्वंद्व में फंसी हुई) "सरताज ने कहा था इसका ख्याल रखना... इसने अपनी जान पर खेलकर मुझे बचाया है।"
(शेर से ऊँची आवाज़ में) "ठीक है शेर... तुम कोशिश करो खड़े होने की। मैं तुम्हें सहारा देती हूँ।"
(जैसे ही मीरा शेर को उठाने के लिए झुकी, शेर ने अपना भारी हाथ उसके मखमली कंधे पर जमा दिया और अपनी गिरफ्त उसकी पतली कमर पर कस ली। मीरा के बदन की गर्मी और उसके रेशमी कपड़ों का अहसास शेर की नस-नस में बिजली दौड़ाने लगा।)
शेर: "उफ़... मेमसाब... ज़रा और ज़ोर से थामिए... मैं गिर जाऊँगा। मेरा संतुलन बिगड़ रहा है।"
(मीरा ने अपनी पूरी ताकत लगाकर उसे संभाला, पर शेर ने जानबूझकर अपना पूरा वज़न उसके नाज़ुक बदन पर डाल दिया। मीरा की जाँघें शेर की सख्त जाँघों से रगड़ खा रही थीं।)
शेर [आंतरिक संवाद]: 'उफ़ मेमसाब! ये रेशम तो आग का दरिया है। आप अपनी ही गर्दन उस कसाई के हाथ में दे रही हैं जिसे आपने पाल रखा है। आपका ये गरम जिस्म मेरे सोए हुए शैतान को जगा रहा है। अब बस एक बार उस कमरे की कुंडी लग जाए…'
(मीरा उसे लेकर धीरे-धीरे कमरे की तरफ बढ़ने लगी। शेर हर कदम पर लंगड़ाने का ढोंग करता और अपना चेहरा मीरा की गर्दन के पास ले जाकर अपनी गरम साँसें उसकी त्वचा पर छोड़ता।)
शेर: (फुसफुसाते हुए, आवाज़ में एक अजीब सी वहशियत छिपाते हुए) "मेमसाब... आपकी बड़ी मेहरबानी है। वरना आज तो मैं मर ही गया होता। बस थोड़ा और... क्वार्टर पहुँचते ही आप ज़रा ठीक से देख लीजिएगा कि कहाँ-कहाँ नीले निशान पड़े हैं… और कहाँ-कहाँ मुझे 'सहलाने' की ज़रूरत है।"
मीरा: (असहज होते हुए) "शेर... तुम चुप रहो और चलने पर ध्यान दो। तुम्हारी साँसें बहुत तेज़ चल रही हैं।"
शेर: (एक शैतानी मुस्कान दबाते हुए) "ये दर्द है मेमसाब... बस ये दर्द अब आप ही दूर कर सकती हैं।"
दवा की सुलगती गर्मी और शेर के जिस्म का भारीपन मीरा के होश फाख्ता कर रहा था। हर कदम के साथ शेर का जिस्म उसके रेशमी रोब और नाइटगाउन के ऊपर से रगड़ खा रहा था। मीरा को समझ नहीं आ रहा था कि उसे नफरत महसूस होनी चाहिए, पर उसका बदन इस खुरदरे स्पर्श पर पागलों की तरह प्रतिक्रिया दे रहा था।
शेर ने अपना पूरा वजन मीरा पर डाल दिया था। उसका एक हाथ मीरा के कंधे से होता हुआ उसके स्तन के किनारे को बार-बार रगड़ रहा था, और दूसरी तरफ से शेर का चौड़ा सीना मीरा के दूसरे स्तन पर दबाव बना रहा था।
मीरा [मन ही मन]: 'हे भगवान, मुझे क्या हो रहा है? शेर का स्पर्श इतना गरम क्यों लग रहा है? मुझे उसे दूर हटाना चाहिए, पर मेरी टांगें जवाब दे रही हैं। हर रगड़... उफ़, ये जलन कितनी तीखी है!'
शेर: (भारी और दबी हुई आवाज़ में, मीरा के कान के बिल्कुल करीब) "आह... मेमसाब... धीरे... मेरा पैर ज़मीन पर टिक नहीं रहा। ज़रा और कस के पकड़िए मुझे... वरना मैं गिर जाऊँगा।"
कहते हुए शेर ने अपनी पकड़ मीरा की कमर पर और मज़बूत कर ली, जिससे मीरा का नितम्ब शेर की जांघ से पूरी तरह सट गया।
मीरा: (हाँफते हुए, आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट के साथ) "कोशिश... कोशिश कर रही हूँ शेर। बस थोड़ा और... तुम्हारा कमरा पास ही है। तुम... तुम ठीक तो हो न? तुम्हारी साँसें बहुत तेज़ चल रही हैं।"
शेर: "क्या बताऊँ मेमसाब... उस चोरनी ने वार ही ऐसी जगह किया है कि मेरा पूरा बदन आग की तरह तप रहा है।"
शेर ने जानबूझकर अपना चेहरा मीरा की गर्दन की ढलान में थोड़ा और झुका दिया। उसकी गरम और भारी साँसें सीधे मीरा की संवेदनशील त्वचा पर पड़ रही थीं, जिससे मीरा के बदन में बिजली सी दौड़ गई।
शेर [आंतरिक संवाद]: 'तड़पिए मेमसाब! आपके इस रेशमी रोब के नीचे आपके ये कड़क होते चूचे मेरी छाती पर जिस तरह पिस रहे हैं, वो मुझे सब बता रहे हैं। आपकी चाल लड़खड़ा रही है… ये दवा का असर नहीं, ये आपकी जागी हुई हवस है। क्वार्टर पहुँचने दीजिए... फिर इस बाम की आड़ में मैं आपकी रूह तक को जला दूँगा।'
मीरा: "शेर... तुम... तुम अपना हाथ थोड़ा... (सिसकते हुए) थोड़ा संभल कर रखो... मुझे... मुझे चलने में मुश्किल हो रही है।"
शेर: "माफ़ करना मेमसाब... दर्द इतना है कि मुझे होश ही नहीं रह रहा कि मेरा हाथ कहाँ जा रहा है। बस आप थामे रखिए... हम पहुँच ही गए।"
(शेर ने अपनी कोहनी से मीरा के स्तन को एक बार फिर ज़ोर से दबाया। मीरा की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा—वह नफरत करना चाहती थी, पर उसका बदन इस वहशी स्पर्श के नशे में डूबता जा रहा था।)
(जैसे ही वे शेर के कमरे के भीतर पहुँचे, शेर अचानक लड़खड़ाया। अपना संतुलन बचाने के बहाने उसने अपना भारी हाथ मीरा के रेशमी नाइटगाउन के ऊपर से उसके उभरे हुए स्तन पर जमा दिया और उसे ज़ोर से भींच लिया।)
मीरा: (मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकालते हुए) "आह... शेर! ये... ये तुम क्या कर रहे हो?"
शेर: (साँसें छोड़ते हुए) "ओह... मेमसाब... माफ़ करना... मेरा सर चकरा गया था।"
शेर: "आह! मेमसाब... मैं... मैं गिर रहा हूँ!"
(अगले ही पल शेर फर्श पर ढह गया, लेकिन उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि मीरा भी सीधे उसके चौड़े और नंगे सीने पर जा गिरी।)
शेर: (दर्द में दहाड़ते हुए) "उफ़! आआआह! मर गया... साहब... मेमसाब... बहुत ज़ोर से लगा है!"
(मीरा पूरी तरह शेर के ऊपर बिछी हुई थी। रेशमी रोब के पार उसे शेर के जिस्म की तपिश और उसके 7 इंच के सख्त अंग का दबाव अपनी भीगी हुई योनि पर महसूस हो रहा था।)
मीरा: (हाँफते हुए, घबराहट और दवा की उत्तेजना में) "शेर! छोड़ो... आह... मुझे हटने दो... तुम ठीक तो हो? तुम्हें और चोट लग गई!"
शेर: (मीरा को और भी करीब खींचते हुए) "नहीं मेमसाब... मुझे चक्कर आ रहे हैं। देखिए... उस चोरनी ने क्या हाल कर दिया है मेरा... मेरा पूरा निचला हिस्सा सुन्न पड़ गया है।"
(मीरा ने उठने की कोशिश की, पर हर छटपटाहट के साथ उसका बदन शेर के सख्त उभार पर और भी ज़ोर से रगड़ खाने लगा।)
मीरा: "शेर... तुम मुझे बहुत ज़ोर से भींच रहे हो... छोड़ो... मुझे सांस लेने में दिक्कत हो रही है।"
शेर: "माफ करना मेमसाब… मुझे होश नहीं है। बस लग रहा है कि कोई सहारा मिल जाए… आह!"
शेर ने अपना चेहरा मीरा के बालों में छुपा लिया और उसकी गर्दन के पास एक लंबी, गर्म साँस छोड़ी।
दवा के नशे में डूबी मीरा को महसूस हुआ कि उसकी योनि से एक और गर्म सैलाब छूट गया है, जिसने उसके पीले नाइटगाउन को अंदर से पूरी तरह भिगो दिया।
शेर की लुंगी गिरने की वजह से खुल चुकी थी और मीरा का वह पीला रेशमी नाइटगाउन भी कशमकश में ऊपर की तरफ सरक गया था।
शेर ने अपनी नंगी जाँघों को मीरा की मखमली जाँघों के बीच फँसा दिया और उन्हें ऊपर-नीचे रगड़ने लगा। जैसे ही उन दोनों के नग्न जिस्मों का स्पर्श हुआ, दवा के असर में डूबी मीरा के बदन में एक सिहरन दौड़ गई।
शेर [आंतरिक संवाद]: 'तड़पिए मेमसाब! आप मेरी बाहों में कैद हैं। आपका ये रेशमी जिस्म और ये पिसते हुए चूचे... अब तो साहब भी आपको यहाँ बचाने नहीं आएँगे।'
मीरा (मन ही मन): 'ये क्या हो रहा है... मेरा बदन जवाब क्यों दे रहा है? ये जलन... उफ़!'
मीरा बदहवास थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह विरोध करे या इस अनचाहे सुख में डूब जाए। तभी शेर ने एक और शातिर चाल चली। उसने मीरा का कोमल और काँपता हुआ हाथ पकड़ा और उसे सीधे अपनी लुंगी के उस खुले हिस्से के नीचे, अपने उस 7 इंच के सख्त और फड़कते हुए लंड पर रख दिया।
मीरा: (झटके से हाथ हटाने की कोशिश करते हुए) "शेर! ये... ये तुम क्या कर रहे हो? छोड़ो... मुझे जाने दो!"
शेर: (मीरा के हाथ को अपनी मर्दानगी पर और भी ज़ोर से दबाते हुए) "नहीं मेमसाब... भागिए मत। देखिए तो सही... यहाँ... इसी जगह उस चोरनी ने वार किया था। देखिए कितनी सूजन आ गई है… ये लोहा जैसा सख्त हो गया है दर्द के मारे। ज़रा... ज़रा अपनी इन मखमली उंगलियों से सहला दीजिए, वरना मेरा दम निकल जाएगा।"
मीरा का हाथ उस तपते हुए अंग पर जम गया। उसे अपनी हथेलियों के नीचे उस अंग की धड़कन और उसकी मोटाई साफ़ महसूस हो रही थी। दवा के ज़हर ने मीरा के दिमाग को सुन्न कर दिया था; उसे नफरत तो हो रही थी, पर उस सख्त स्पर्श से उसकी योनि से एक और गर्म सैलाब छूट गया, जिसने उसके पीले नाइटगाउन को पूरी तरह भिगो दिया।
मीरा [आंतरिक संवाद]: 'हे भगवान! ये क्या हो रहा है? मेरा हाथ... मैं इसे क्यों नहीं हटा पा रही? ये कितना गरम और सख्त है… उफ़, ये जलन! और इसकी जाँघें... मेरी जाँघों के बीच जिस तरह रगड़ खा रही हैं, मुझे लग रहा है कि मैं अभी यहीं ढेर हो जाऊँगी। सरताज... मुझे बचा लो!'
शेर: "आह... मेमसाब... आपकी उंगलियाँ कितनी नरम हैं। ज़रा और... ज़रा और ज़ोर से दबाइए यहाँ... तभी ये सूजन कम होगी। देखिए न, ये कैसे तड़प रहा है।"
शेर ने अपनी कमर को एक हल्का सा झटका दिया, जिससे उसका वह सख्त अंग मीरा की हथेली में और भी गहराई से समा गया। मीरा का सिर पीछे की तरफ लटक गया और उसके मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकली। उसे अहसास ही नहीं हुआ कि कब उसकी अपनी जाँघें शेर की नंगी टाँगों के इर्द-गिर्द और भी कस गई थीं।
शेर ने देख लिया था कि मीरा का दिमाग दवा के नशे और इस अचानक हुए हमले के बीच बुरी तरह उलझ चुका है। वह न तो पूरी तरह विरोध कर पा रही थी और न ही इस सुख को स्वीकार कर पा रही थी। इसी कशमकश का फायदा उठाकर शेर ने अपनी अगली और सबसे घातक चाल चली।
शेर ने अपनी एक नंगी टाँग को मीरा की जाँघों के बीच और ऊपर सरकाया। मीरा का पीला नाइटगाउन पहले ही ऊपर चढ़ चुका था, जिससे उसकी नीली थोंग में लिपटी हुई योनि अब शेर की नंगी त्वचा के बिल्कुल सामने थी। शेर ने अपना घुटना सीधे मीरा के उस भीगे हुए मखमली हिस्से पर टिका दिया और उसे गोल-गोल रगड़ना शुरू किया।
मीरा: (एक तीखी और दबी हुई सिसकी के साथ) "आह... शेर! नहीं... ये... ये तुम क्या कर रहे हो? हटाओ... अपना पैर हटाओ वहाँ से!"
लेकिन शेर ने अपनी पकड़ और मज़बूत कर ली। उसका 7 इंच का सख्त अंग अभी भी मीरा की कोमल हथेली में कैद था, और वह उसे अपनी उंगलियों से महसूस कर पा रही थी।
शेर: (मीरा की गर्दन की ढलान पर अपनी जीभ फिराते हुए और उसे चाटते हुए) "उफ़... मेमसाब! क्या महक है आपकी... ये गर्दन नहीं, जन्नत का रास्ता है। कितनी नरम और मखमली खाल है आपकी... उस चोरनी की स्किन भी इतनी नरम थी।"
मीरा का हाथ शेर की उस मर्दानगी पर और भी ज़ोर से दब गया। उसे अपनी हथेलियों के नीचे उस अंग की रगों का फड़कना और उसकी भीषण गर्मी साफ़ महसूस हो रही थी।
दवा के ज़हर ने उसके अंगों को इतना संवेदनशील बना दिया था कि शेर के घुटने की वह रगड़ उसकी योनि के भीतर बिजली की लहरें पैदा कर रही थी।
शेर: "आह... देखिए न मेमसाब! आपकी ये सिकाई तो जादू कर रही है। मेरा ये अंग... ये लोहा जैसा सख्त जो हो गया था, आपकी इन मखमली उंगलियों के स्पर्श से अब धीरे-धीरे शांत हो रहा है। ज़रा... ज़रा और सहला दीजिए यहाँ… और ये पैर... ये तो बस सहारा ले रहा है आपकी इन गोरी जाँघों का।"
शेर ने अपने घुटने का दबाव मीरा की उस गुलाबी दरार पर और बढ़ा दिया। वह उसे ज़ोर-ज़ोर से मसल रहा था, जिससे मीरा की थोंग अब पूरी तरह से उसके रस से भीगकर पारदर्शी होने लगी थी
।
मीरा [आंतरिक संवाद - दवा का वहशी असर]: 'हे भगवान! मैं क्या कर रही हूँ? मेरा हाथ... ये खुद-ब-खुद इसे सहला क्यों रहा है? और ये पैर... उफ़! ये रगड़... ये मुझे पागल कर देगी। मुझे सरताज की याद आनी चाहिए, पर मुझे सिर्फ शेर की ये गर्म साँसें और ये सख्त अहसास याद हैं। आह... ये जलन... कितनी अच्छी है!'
शेर ने अपनी नाक मीरा के कान के पास गड़ा दी और एक गहरी साँस ली।
शेर [आंतरिक संवाद]: 'तड़पिए मेमसाब! आपकी ये नीली कच्ची अब मेरे थूक और आपके रस से तर हो चुकी है। अब तो उजाला है, पर आपकी आँखें बंद हैं… आज ये 'सेवा' आपको उस मुकाम पर ले जाएगी जहाँ से आप कभी वापस नहीं लौट पाएंगी।'
मीरा का पूरा वजूद इस वक्त अंतर्विरोधों की आग में जल रहा था। दवा के असर और शेर की वहशी रगड़ ने उसके जिस्म को अंदर से पिघला दिया था, लेकिन उसके दिमाग का एक कोना अभी भी चीख रहा था।
किसी तरह अपनी पूरी ताकत बटोरकर उसने खुद को शेर की गिरफ्त से छुड़ाया। उसका चेहरा लाल सुर्ख हो चुका था और सांसें किसी दौड़ते हुए घोड़े की तरह तेज़ चल रही थीं।
मीरा ने अपने बिखरे हुए बालों और ऊपर चढ़े नाइटगाउन को ठीक करने की कोशिश की, पर उसकी उंगलियां अभी भी कांप रही थीं। वह भाग जाना चाहती थी, पर शेर का वह कराहता हुआ चेहरा और सरताज की कही बात उसे ज़ंजीर की तरह जकड़े हुए थी।
शेर: (बेहद लाचार और बुझी हुई आवाज़ में, फर्श पर पड़े-पड़े ही हाथ फैलाते हुए) "मेमसाब... प्लीज... मुझे बस बिस्तर तक पहुँचा दीजिए। मैं... मैं खुद उठने के काबिल नहीं बचा हूँ। उस चोरनी ने मेरा पूरा निचला हिस्सा बेकार कर दिया है।"
मीरा ने एक गहरी सांस ली। उसे लगा कि अगर वह इसे यहीं फर्श पर छोड़ देगी, तो सुबह सरताज को क्या जवाब देगी? उसने एक बार फिर झुककर शेर की भारी और चौड़ी बाहों को अपने कंधों पर लिया।
मीरा ने उसे ऊपर उठाया, शेर ने एक शातिर शिकारी की तरह अपना पूरा वज़न फिर से मीरा के नाज़ुक और रेशमी जिस्म पर डाल दिया। इस बार, शेर के हाथ कंधे पर रहने के बजाय नीचे फिसल गए और सीधे मीरा के सुडौल और गोल कूल्हों पर जम गए।
मीरा: (झटके से सिहर उठी) "आह... शेर! हाथ... हाथ ऊपर रखो... तुम मुझे बहुत नीचे से पकड़ रहे हो।"
शेर: (मीरा के कूल्हों को अपनी मुट्ठी में हल्का सा भींचते हुए, कराहने के बहाने) "माफ़ करना मेमसाब... मेरा संतुलन बिगड़ रहा है। मुझे कहीं तो पकड़ बनानी होगी वरना हम दोनों गिर जाएँगे। उफ़... मेरा पैर... मेरा पैर ज़मीन नहीं पकड़ रहा।"
मीरा का रेशमी पीला नाइटगाउन और रोब शेर के हाथों के नीचे बिल्कुल झीना महसूस हो रहा था। शेर की उंगलियाँ मीरा की उन सुडौल जाँघों और कूल्हों की गोलाई को महसूस कर रही थीं, जो दवा की गर्मी से तप रही थीं। हर कदम के साथ शेर अपनी जाँघों को मीरा की नंगी जाँघों से सटा रहा था।
शेर [आंतरिक संवाद]: 'बस मेमसाब... बस दो कदम और। आपके ये गोल कूल्हे मेरे हाथों में जिस तरह मचल रहे हैं, वो मुझे सब बता रहे हैं। आप भागना चाहती हैं, पर आपका ये बदन... ये तो मेरे स्पर्श का गुलाम हो चुका है। बिस्तर तक पहुँचने दीजिए… फिर इस 'मदद' का असली सिला मैं वसूलूँगा।'
मीरा का सिर चकरा रहा था। शेर का सीना उसके स्तनों को दबा रहा था और उसके हाथ उसके कूल्हों को सहला रहे थे। उसे नफरत महसूस होनी चाहिए थी, पर हर रगड़ के साथ उसकी योनि से निकलता रसीला सैलाब उसके पीले नाइटगाउन को अंदर से और भी गीला कर रहा था।
मीरा: "बस... बस पहुँच गए... चलो... बिस्तर पर बैठो..."
मीरा ने उसे बिस्तर के किनारे तक पहुँचाया, पर वह नहीं जानती थी कि शेर उसे इतनी आसानी से नहीं छोड़ने वाला।
Deepak Kapoor
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