26-04-2026, 07:09 PM
बाबा: “तुम्हारी राशी क्या है?”
पूजा: “कन्या” ( कोई भी हो सकती है यहाँ मैंने ये लिखा है)
बाबा: “मैं टिक्के से तुम्हारी पीठ पर तुम्हारी राशी लिख रहा हूँ। जल से शुद्ध हुई तुम्हारी पीठ पर तुम्हारी राशी लिखने से तुम्हारे ग्रहों की दशा लाभदायक हो जाएगी।” बाबा ने पूजा की नंगी पीठ पर टिक्के से कन्या लिखा।
फिर बाबा पूजा के पैरों के पास आया।
बाबा: “अब तुम्हारे चरण सामने करो।” मैत्री रचित कहानी
पूजा ने पैर सामने कर दिए। बाबा ने उसका पेटीकोट थोडा ऊपर चड़ाया। । उसकी टाँगों पर जल छिड़का ,और उसकी टाँगें हाथों से रगड़ने लगा।
बाबा: “हमारे चरण बहुत-सी अपवित्र जगाहों पर पड़ते हैं। जल से धोने के पश्चात अपवित्र जगहों का हम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, तुम ध्यान धरो।”
पूजा: “जी बाबाजी।” लेकिन पूजा को पुजारी के हाथ उसके पैरो पर आराम से फिरते हुए अच्छा लग रहा था वह अपने आपको रिलेक्स फिल कर रही थी।
बाबा: “पूजा, यदि तुम्हें यह सब करने में लज्जा आ रही तो,यह तुम स्वयं कर लो। परंतु यह कार्य बाबा को ही करना होता है। यही पुराण शाश्त्रो में लिखा हुआ है।”
पूजा: “नहीं बाबाजी, धार्मिक कार्य में लज्जा कैसी? आप शाश्त्रो के हिसाब से हो भी हो सकता है कीजिये।”
पूजा अंधविश्वासी थी।
बाबा ने पूजा का घाघरा घुटनो के ऊपर चड़ा दिया। अब पूजा की टाँगें थाइस तक नंगी थी।
बाबा ने उसकी थाइस पर जल लगाया और उसकी थाइस हाथों से धोने लगा। पूजा ने शरम से टाँगें जोड़ रखी थी। उसने खुद की चूत को दबाके रख दी थी।
बाबा ने कहा।
बाबा: पूजा, अपनी टाँगें खोलो।” पूजा ने बड़े ना-मन से पैरो को थोडा सा खोला। लेकिन पुजारी ने उसके घुटनों को पकड़ के पूरी तरह फैला दिया। पूजा कोई विरोध ना कर सकी।
पूजा ने धीरे-धीरे अपनी टाँगें खोल दी। अब पूजा बाबा के सामने टाँगें खोल के बैठी थी। उसकी ब्लॅक कच्छी बाबा को साफ़ दिख रही थी। बाबा ने पूजा की इनर थाइस को छुआ और उन्हें जल से रगड़ने लगा। मैत्री की पेशकश.
इस वक़्त बाबा के हाथ पूजा के चूत के नज़दीक थे। कुछ देर पूजा के आउटर और इनर थाइस धोने के बाद अब वह उन्हें तौलिए से सुखाने लगा। फिर उसने उंगली में टिक्का लगाया और पूजा के इनर थाइस पर लगाने लगा।
पूजा: “बाबाजी, यहाँ भी टिक्का लगाना होता है! (पूजा शरमाते हुए बोली, वह अनकंफर्टबल फील कर रही थी।)
बाबा: हाँ, जहा-जहा ये सिन्दूर का टिक्का लगा होगा वह जगह शुद्ध होती चली जायेगी।”
पूजा टाँगें खोल के बैठी थी और बाबा उसकी इनर जांघों पर उंगलियों से टिक्का लगा रहा था।
बाबा: “पूजा, लज्जा ना करना। अब हम विधि में काफी आगे जा चुके है। पीछे जाना अब नुकशानदेह हो सकता है। ना सिर्फ तुम्हारे लिए पर यह विधि मैं कर रहा हूँ तो मुझे भी उसका परिणाम भुगतना पद सकता है। इसलिए अब जो हो रहा है वह बिना शर्म और डर के साथ होगा।”
पूजा: नहीं बाबाजी, आप सही कह रहे है अब हम पीछे नहीं जा सकते है। कार्य को सपूर्ण करना ही पड़ेगा। मैं तैयार हूँ।”
जैसे ही उसने अपनी उंगली से उसकी जांघ पर टीका लगाया, पुजारी ने पूजा की चूत पर भी टीका लगाना शुरू कर दिया — उसकी पैंटी के ऊपर से। पूजा शर्म से लाल हो रही थी। फिर भी, वह उत्तेजित भी होने लगी थी। टीका लगाने के बहाने, पुजारी पाँच-छह सेकंड तक पूजा की चूत को — उसकी पैंटी के ऊपर से ही — रगड़ता रहा। और अपनी उंगली से उसकी चूत की दरार को नापता रहा।
चूत से हाथ हटाने के बाद बाबा बोला। मैत्री लिखित.
बाबा: “विधि के अनुसार मुझे भी जल लगाना होगा। अब तुम इस जल को मेरी छाती पर लगाओ।”
बाबा लेट गया।
पूजा: “जी बाबाजी।”
बाबा ने चेस्ट शेव कर रखी थी और पेट भी। उसकी चेस्ट और पेट बिल्कुल हेयरलेस और स्मूथ थे। पूजा जल से बाबा की चेस्ट और पेट रगड़ने लगी। पूजा को अंदर ही अंदर बाबा का बदन अट्रॅक्ट कर रहा था। उसके मन में आया की कितना स्मूद और चिकना है बाबा का बदन। ऐसे ख़याल पूजा के मन में पहले कभी नहीं आए थे। यह सब सोच से पूजा की चूत ने अपना रंग अन्दर पेंटी में दिखाना शुरू कर दिया था। जिसका पुजारी को कुछ मालूम नहीं था। लेकिन एक प्रेमाल और स्मूथ हथेलिया उसके बदन पर फिर रही थी और उसका नतीजा उसकी धोती के अन्दर दिख रहा था।
कहानी जारी रहेगी
बने रहिये दोस्तों..........
पूजा: “कन्या” ( कोई भी हो सकती है यहाँ मैंने ये लिखा है)
बाबा: “मैं टिक्के से तुम्हारी पीठ पर तुम्हारी राशी लिख रहा हूँ। जल से शुद्ध हुई तुम्हारी पीठ पर तुम्हारी राशी लिखने से तुम्हारे ग्रहों की दशा लाभदायक हो जाएगी।” बाबा ने पूजा की नंगी पीठ पर टिक्के से कन्या लिखा।
फिर बाबा पूजा के पैरों के पास आया।
बाबा: “अब तुम्हारे चरण सामने करो।” मैत्री रचित कहानी
पूजा ने पैर सामने कर दिए। बाबा ने उसका पेटीकोट थोडा ऊपर चड़ाया। । उसकी टाँगों पर जल छिड़का ,और उसकी टाँगें हाथों से रगड़ने लगा।
बाबा: “हमारे चरण बहुत-सी अपवित्र जगाहों पर पड़ते हैं। जल से धोने के पश्चात अपवित्र जगहों का हम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, तुम ध्यान धरो।”
पूजा: “जी बाबाजी।” लेकिन पूजा को पुजारी के हाथ उसके पैरो पर आराम से फिरते हुए अच्छा लग रहा था वह अपने आपको रिलेक्स फिल कर रही थी।
बाबा: “पूजा, यदि तुम्हें यह सब करने में लज्जा आ रही तो,यह तुम स्वयं कर लो। परंतु यह कार्य बाबा को ही करना होता है। यही पुराण शाश्त्रो में लिखा हुआ है।”
पूजा: “नहीं बाबाजी, धार्मिक कार्य में लज्जा कैसी? आप शाश्त्रो के हिसाब से हो भी हो सकता है कीजिये।”
पूजा अंधविश्वासी थी।
बाबा ने पूजा का घाघरा घुटनो के ऊपर चड़ा दिया। अब पूजा की टाँगें थाइस तक नंगी थी।
बाबा ने उसकी थाइस पर जल लगाया और उसकी थाइस हाथों से धोने लगा। पूजा ने शरम से टाँगें जोड़ रखी थी। उसने खुद की चूत को दबाके रख दी थी।
बाबा ने कहा।
बाबा: पूजा, अपनी टाँगें खोलो।” पूजा ने बड़े ना-मन से पैरो को थोडा सा खोला। लेकिन पुजारी ने उसके घुटनों को पकड़ के पूरी तरह फैला दिया। पूजा कोई विरोध ना कर सकी।
पूजा ने धीरे-धीरे अपनी टाँगें खोल दी। अब पूजा बाबा के सामने टाँगें खोल के बैठी थी। उसकी ब्लॅक कच्छी बाबा को साफ़ दिख रही थी। बाबा ने पूजा की इनर थाइस को छुआ और उन्हें जल से रगड़ने लगा। मैत्री की पेशकश.
इस वक़्त बाबा के हाथ पूजा के चूत के नज़दीक थे। कुछ देर पूजा के आउटर और इनर थाइस धोने के बाद अब वह उन्हें तौलिए से सुखाने लगा। फिर उसने उंगली में टिक्का लगाया और पूजा के इनर थाइस पर लगाने लगा।
पूजा: “बाबाजी, यहाँ भी टिक्का लगाना होता है! (पूजा शरमाते हुए बोली, वह अनकंफर्टबल फील कर रही थी।)
बाबा: हाँ, जहा-जहा ये सिन्दूर का टिक्का लगा होगा वह जगह शुद्ध होती चली जायेगी।”
पूजा टाँगें खोल के बैठी थी और बाबा उसकी इनर जांघों पर उंगलियों से टिक्का लगा रहा था।
बाबा: “पूजा, लज्जा ना करना। अब हम विधि में काफी आगे जा चुके है। पीछे जाना अब नुकशानदेह हो सकता है। ना सिर्फ तुम्हारे लिए पर यह विधि मैं कर रहा हूँ तो मुझे भी उसका परिणाम भुगतना पद सकता है। इसलिए अब जो हो रहा है वह बिना शर्म और डर के साथ होगा।”
पूजा: नहीं बाबाजी, आप सही कह रहे है अब हम पीछे नहीं जा सकते है। कार्य को सपूर्ण करना ही पड़ेगा। मैं तैयार हूँ।”
जैसे ही उसने अपनी उंगली से उसकी जांघ पर टीका लगाया, पुजारी ने पूजा की चूत पर भी टीका लगाना शुरू कर दिया — उसकी पैंटी के ऊपर से। पूजा शर्म से लाल हो रही थी। फिर भी, वह उत्तेजित भी होने लगी थी। टीका लगाने के बहाने, पुजारी पाँच-छह सेकंड तक पूजा की चूत को — उसकी पैंटी के ऊपर से ही — रगड़ता रहा। और अपनी उंगली से उसकी चूत की दरार को नापता रहा।
चूत से हाथ हटाने के बाद बाबा बोला। मैत्री लिखित.
बाबा: “विधि के अनुसार मुझे भी जल लगाना होगा। अब तुम इस जल को मेरी छाती पर लगाओ।”
बाबा लेट गया।
पूजा: “जी बाबाजी।”
बाबा ने चेस्ट शेव कर रखी थी और पेट भी। उसकी चेस्ट और पेट बिल्कुल हेयरलेस और स्मूथ थे। पूजा जल से बाबा की चेस्ट और पेट रगड़ने लगी। पूजा को अंदर ही अंदर बाबा का बदन अट्रॅक्ट कर रहा था। उसके मन में आया की कितना स्मूद और चिकना है बाबा का बदन। ऐसे ख़याल पूजा के मन में पहले कभी नहीं आए थे। यह सब सोच से पूजा की चूत ने अपना रंग अन्दर पेंटी में दिखाना शुरू कर दिया था। जिसका पुजारी को कुछ मालूम नहीं था। लेकिन एक प्रेमाल और स्मूथ हथेलिया उसके बदन पर फिर रही थी और उसका नतीजा उसकी धोती के अन्दर दिख रहा था।
कहानी जारी रहेगी
बने रहिये दोस्तों..........



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