25-04-2026, 11:43 AM
अध्याय 6
सुबह की ताजी धूप जब ट्रेन की खिड़कियों से छनकर आई, तो रात का वह खौफनाक मंज़र किसी डरावने सपने जैसा लगने लगा। शुक्र है कि बाकी का सफर बिना किसी और हादसे के गुज़र गया। स्टेशन पर उतरते ही हमने एक ऑटो लिया और सायमा के घर की ओर चल पड़े।
ऑटो के शोर के बीच, अम्मी मेरे बिल्कुल बगल में बैठी थीं। नानी दूसरी तरफ खिड़की से बाहर शहर के नज़ारे देख रही थीं। तभी अम्मी ने धीरे से अपना मखमली और गोरा हाथ आगे बढ़ाया और मेरी कलाई को बड़ी मज़बूती से पकड़ लिया। उनके इस स्पर्श में एक चेतावनी थी और उस 'समझौते' की याद, जो रात को हमारे बीच तय हुआ था।
उन्होंने नानी से नज़र बचाकर मेरी आँखों में गहराई से देखा।
अम्मी: (फुसफुसाते हुए) "साहिल... याद है न? जो कुछ हुआ, न नानी को पता चले, न तेरे अब्बू को... और सायमा के घर में तो किसी को कानो-कान खबर न हो।"
मैं अम्मी को देख रहा था। उनका वह नूरानी चेहरा नकाब के पीछे आधा छिपा था, पर उनकी आवाज़ में एक अजीब सी तड़प थी। वह उस हादसे को पूरी तरह भुला देना चाहती थीं। लेकिन उससे भी ज़्यादा, वह अपनी आज़ादी को बचाना चाहती थीं।
अम्मी की पूरी ज़िंदगी बेड़ियों में गुज़री है—पहले अपने सख्त अब्बा के साये में और फिर शादी के बाद अब्बू के कड़े अनुशासन में। वह जानती थीं कि अगर ज़रा सी भी भनक लगी कि ट्रेन में उन रऊडी लड़कों ने उनके बेपनाह हुस्न को सरेआम बेपर्दा किया था या उनके मखमली जिस्म को छुआ था, तो घर वाले उनकी सुरक्षा के नाम पर उन्हें फिर से चारदीवारी में कैद कर देंगे।
अम्मी: "मैं नहीं चाहती कि वह वाकया मेरी पैरों की बेड़ी बन जाए। मैं पहली बार इस तरह बाहर निकली हूँ, और मैं इसे खोना नहीं चाहती। वादा कर... किसी से कुछ नहीं कहेगा।"
उनका वह सफेद हाथ अभी भी मेरी कलाई पर था। मैंने धीरे से अपना सिर हिलाया, जिससे उनके चेहरे पर एक इत्मीनान भरी मुस्कान आई।
जैसे ही ऑटो सायमा खाला के घर के सामने रुका, अम्मी ने अपना दुपट्टा ठीक किया।
सायमा खाला की वह पुरानी हवेली किसी ख्वाबगाह से कम नहीं थी। नक्काशीदार खंभों और चमेली की भीनी खुशबू उस हवेली की रौनक को चार चाँद लगा रहा था।
सायमा खाला, जो अम्मी का ही एक कम उम्र और छरहरा रूप थी, उनसे लिपट गई तो ऐसा लगा जैसे एक ही सांचे से बनी दो मूरतें—एक पूरी तरह खिली हुई और दूसरी अभी खिलती हुई—एक साथ खड़ी हों।
पूरी हवेली शादी के लिए सजाई गई थी।
रंग-बिरंगी लाइट्स रात में दिवाली के दीयों की तरह जगमगातीं और दिन में सूरज की रोशनी में हल्की चमक देतीं।
दरवाजों पर ताज़े फूलों की मालाएँ लटक रही थीं, जिन्हें छूने पर सुबह की ओस जैसी ताज़गी महसूस होती।
बैकग्राउंड में तबला और शहनाई का हल्का संगीत शादी का माहौल बना रहा था।
हमारा कमरा बड़ा था, जिसमें एंटीक फर्नीचर और एक बड़ा सा बेड था, उसपे नरम गद्दे बिछे हुए थे।
अम्मी ने कमरे में आकर अपना अबाया उतारा, और एक पल के लिए मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। कोई इतना खूबसूरत कैसे हो सकता है!
उनकी रंगत दूध जैसी गोरी थी और अबाया के नीचे जो बदन था, वह किसी तराशी हुई मूरत की तरह निखर कर सामने आया। उनकी सादगी में भी एक ऐसी कशिश थी कि मैं एकटक उन्हें देखता रह गया, जैसे पलक झपकाना ही भूल गया होऊं।
उसके नीचे उन्होंने एक गहरे नीले रंग का एलीगेंट लहंगा सूट पहना हुआ था।सिल्क का कपड़ा उनकी स्किन पर नीले आसमान की तरह चमक रहा था।
उनकी चोली इतनी टाइट-फिटिंग थी कि अम्मी के भरे हुए सीने की गोलाई और उनके बीच की वह गहरी ढलान रेशम के नीचे से अपना वजूद ज़ाहिर कर रही थी।
लहंगा उनके कूल्हों से होता हुआ नीचे की तरफ इस कदर गिर रहा था कि चलते वक्त उनके पैरों की दूधिया सफेदी का बस एक हल्का सा इशारा मिलता, जो किसी को भी बेचैन करने के लिए काफी था।
मेहंदी लगे हाथों में सोने के गहने—कानों में झुमके, कलाइयों में चूड़ियाँ, और गले में हार—उनकी शान बढ़ा रहे थे।
शादी के फंक्शन्स शुरू हुए। मेहंदी, संगीत, हल्दी।
हर दिन एक नया रंग, एक नया जोश।
मेहंदी की रस्म के दिन अम्मी ने तोते के पंख जैसे हरे रंग का अनारकली सूट पहना। वह कपड़ा इतना बारीक और पारदर्शी था कि सूरज की रोशनी जब उसके आर-पार होती, तो अम्मी के सुडौल जिस्म साफ नज़र आता।
ढोलक की थाप पर जब वह धीरे-धीरे कदम बढ़ातीं, तो उनकी पायल की 'छन-छन' महफिल के शोर को चीर कर सीधे दिल पर दस्तक देती। उस बारीक हरे कपड़े के नीचे उनकी कमर का वह जादुई कर्व और उनके भरे हुए अंगों की थिरकन किसी कयामत से कम नहीं थी।
मैंने गौर किया कि हवेली में आए हुए हर मर्द की नज़रें, चाहे वह सायमा का कोई रिश्तेदार हो या पड़ोसी, अम्मी पर आकर ठहर जाती थीं। वे अम्मी को उस तरह नहीं देख रहे थे जैसे कोई आम मेहमान को देखता है, बल्कि उनकी नज़रों में वही भूख और आकर्षण था जो उस रात ट्रेन के उन लड़कों की आँखों में था—बस यहाँ वह नकाबपोश और शालीन था।
मेरे अंदर एक अजीब सी कशमकश चल रही थी: गर्व: कि इतनी बेपनाह खूबसूरत और सेक्सी औरत मेरी अम्मी है, जिनका हुस्न पूरी महफिल को अपनी गिरफ्त में लिए हुए है और जलन: कि उनकी इस नूरानी सफेदी और कातिलाना बनावट पर मेरा ही नहीं, बल्कि दुनिया भर की हवस भरी नज़रों का भी पहरा है।
अम्मी इन सब नज़रों से बेखबर, सायमा के साथ हँस-हँस कर बातें कर रही थीं, पर मुझे पता था कि उस नीली नाइटगाउन वाले हादसे के बाद अम्मी को भी अपनी इस खूबसूरती के असर का अंदाज़ा हो चुका है। वह अब अपनी हर अदा, हर मुस्कुराहट और हर चाल को एक नई नज़ाकत के साथ पेश कर रही थीं, जैसे वह अपनी उस 'बेड़ी' को तोड़कर अपनी मर्ज़ी से खिलना चाहती हों।
हवेली की सीढ़ियों पर चढ़ते वक्त जब अम्मी ने अपना लहंगा थोड़ा ऊपर उठाया, तो उनके गोरे टखनों की चमक देखकर पास खड़े एक नौजवान ने अपनी साँसें रोक लीं, और मेरा खून एक बार फिर खौल उठा।
हवेली की रौनक और ढोलक की थाप के बीच सायमा और अम्मी की हंसी गूंज तो रही थी, पर मेरी नज़रें सायमा खाला के चेहरे पर ठहर गईं। वह अम्मी से लिपट रही थी, उनके मखमली कंधों पर सिर रखकर खिलखिला रही थी, लेकिन उसकी आँखों में वह चमक नहीं थी जो एक होने वाली दुल्हन की आँखों में होनी चाहिए।
सायमा खाला का चेहरा कभी-कभी बिल्कुल सफेद पड़ जाता है। वह अम्मी का हाथ इतना ज़ोर से पकड़ लेती जैसे डूबता हुआ इंसान किसी तिनके को पकड़ता है।
जब भी घर के बड़े या होने वाले ससुराल वाले पास आते, सायमा की मुस्कुराहट एक 'नकाब' जैसी लगने लगती।
सायमा खाला बिल्कुल अम्मी का छोटा और स्लिम वर्जन थी—वही सुराहीदार गर्दन, वही कातिलाना नज़रें, पर उसकी खूबसूरती में अभी वह 'दबंगई' नहीं आई थी जो अम्मी में थी। वह एक ऐसे फूल जैसी थी जो खिलने से पहले ही मुरझाने के डर में हो।
मैंने सोचा कि शायद यह महज़ 'वेडिंग जिटर्स' हैं। आखिर एक लड़की के लिए अपना घर छोड़ना और एक नए मर्द के साथ ज़िंदगी शुरू करना कोई मामूली बात नहीं होती।
मैं (मन में): "शायद यह घबराहट सिर्फ विदाई के गम की है। आखिर अम्मी की तरह उसे भी तो अपनी आज़ादी किसी और के हाथ में सौंपनी है।"
अम्मी :
हवेली के उस झिलमिलाते कमरे में, जहाँ चमेली की महक और रेशमी कपड़ों की सरसराहट थी, वहाँ खुशी का साया था। साहिल बाहर मेहमानों में मशगूल था, पर मेरी आँखें सायमा के उस छरहरे मगर कांपते हुए बदन को देख रही थीं। मैंने उसे अपने करीब खींचा और उसके नर्म गालों को सहलाते हुए उसके कान में फुसफुसाया।
मैं (अम्मी): "सायमा... ये जो तेरे चेहरे पर पीलापन है, ये शादी की घबराहट नहीं है। तेरी ये आँखें किसी बड़े राज़ का बोझ ढो रही हैं। मुझसे मत छुपा, बता क्या बात है?"
मेरी बात सुनते ही सायमा का सब्र टूट गया। वह मेरे मखमली सीने से लगकर बुरी तरह सिसकने लगी। उसके आँसू मेरे अनारकली सूट को भिगो रहे थे।
सायमा: (सुबकते हुए) "खाला... मैं बर्बाद हो गई हूँ। आप नहीं जानतीं कि इस मुस्कुराहट के पीछे मैं कितनी बड़ी आग में जल रही हूँ।"
मैं: "साफ़-साफ़ कह, बेटा, अल्लाह सब ठीक करेगा। क्या बात है?"
सायमा: (कांपती आवाज़ में) "खाला, मैं एक लड़के से मोहब्बत करती थी... पर वह इंसान नहीं, भेड़िया निकला। मैंने उससे रिश्ता तोड़ लिया है, पर उसके पास मेरे कुछ मैसेज और कुछ ऐसी तस्वीरें हैं जो मेरा वजूद राख कर सकती हैं। वह अब मुझे ब्लैकमेल कर रहा है।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मुझे अपना वह नीली नाइटगाउन वाला वाकया याद आ गया। हवस की ये आग कितनी पुरानी और कितनी भयानक है।
सायमा: "वह ज़ालिम कहता है कि शादी के बाद भी मुझे उसके साथ रिश्ता रखना होगा, वरना वह मेरी वे तस्वीरें मेरे ससुराल वालों और पूरी दुनिया को भेज देगा। वह चाहता है कि मैं शादी के बाद भी उसकी हवस का खिलौना बनी रहूँ। खाला, मैं क्या करूँ? मैं तो मर जाऊँगी!"
मैंने सायमा को अपने भरे हुए आगोश में और भी कस लिया। उसकी वह नूरानी और नाजुक काया डर के मारे मेरे हाथों में थिरक रही थी।
मैं: (हमदर्दी के साथ) "चुप हो जा सायमा। रो मत। ये दुनिया औरतों के इस बदन और उनकी कमज़ोरी का फायदा उठाना बखूबी जानती है। पर याद रख, तू अकेली नहीं है। मैं तुझे भी इस नरक में गिरने नहीं दूँगी।"
हवेली के उस आलीशान कमरे में, जहाँ बाहर शहनाई की धुन गूँज रही थी। सायमा मेरे मखमली आगोश में बुरी तरह कांप रही थी। उसके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे
सायमा: (सिसकते हुए, आवाज़ बिल्कुल मरी हुई) "खाला... सबसे भयानक बात तो अभी आपने सुनी ही नहीं। वह विशाल... वह अकरम (दूल्हा) का सबसे करीबी दोस्त है। वह कोई अजनबी नहीं है जो दूर से वार करेगा, वह तो इस शादी के हर फंक्शन में हमारे बीच मौजूद रहेगा।"
मेरी पकड़ सायमा के नाजुक कंधों पर और भी मज़बूत हो गई।
सायमा: "वह शैतान कहता है कि जिस तरह अकरम के साथ मेरी शादी की रस्में होंगी, उसे भी बिल्कुल वैसी ही 'प्राइवेट सेरेमनी' चाहिए। वह चाहता है कि अकरम से पहले वह मेरे इस बदन का दीदार करे और अपनी हवस मिटाए… तभी वह खामोश रहेगा। खाला, वह मुझे अपनी हवस का खिलौना बनाना चाहता है, ताकि मेरी उन तस्वीरों और मैसेज का राज़ दफन रहे।"
सायमा की आँखों में जो खौफ था, वह किसी मरे हुए इंसान जैसा था। उसकी सुराहीदार गर्दन झुकी हुई थी और उसके हाथ बेजान होकर लटक रहे थे।
सायमा: "मुझे समझ नहीं आता मैं क्या करूँ। अकरम एक नेक इंसान है, पर अगर उसे ज़रा भी भनक लगी, तो वह मुझसे नफरत करने लगेगा। मेरा पूरा खानदान नीलाम हो जाएगा। कभी-कभी जी चाहता है कि बस ज़हर खा लूँ और इस तमाशे को खत्म कर दूँ… सुसाइड ही एकमात्र रास्ता नज़र आता है।"
मेरा (अम्मी का) संकल्प
यह सुनकर मेरे खून में एक उबाल सा आ गया। मुझे याद आया वह रात जब सरताज सिंह ने मुझे उस नीली नाइटगाउन में देखा था, पर उसकी नज़रों ने मुझे ढंका था, जबकि ये विशाल जैसे भेड़िये हमारे वजूद को नोचना चाहते थे।
मैं (अम्मी): (सायमा का चेहरा अपने गोरे हाथों में ऊपर उठाते हुए, आवाज़ में फौलादी सख्ती) "खबरदार! जो आइंदा कभी मौत का नाम भी लिया। सायमा, सुन मेरी बात... ये दुनिया कमज़ोर औरतों को कुचल देती है। तू मर जाएगी तो उस दरिंदे का क्या बिगड़ेगा? वह किसी और मासूम शिकार को ढूंढेगा।"
मैंने सायमा की खूबसूरत और सहमी हुई आँखों में आँखें डालीं। मेरा पुष्ट सीना गुस्से से ऊपर-नीचे हो रहा था।
मैं: "तू अकेली नहीं है। तू बस खुद को संभाल, अपनी इस खूबसूरती को अपनी कमज़ोरी नहीं, अपनी ताक़त बना। मैं वादा करती हूँ, तेरी विदाई अकरम के साथ ही होगी, और वह विशाल अपनी औकात देखेगा। जब तक तेरी ये खाला ज़िंदा है, कोई तेरी रूह को भी नहीं छू सकता।"
सायमा: (बेबसी भरी आवाज़ में) "पर कैसे खाला? आप उसे कैसे मनाएंगी? वह कोई मामूली लड़का नहीं है। वह अकरम का परछाई जैसा दोस्त है, और वह जानता है कि इस शादी के टूटने का मतलब मेरे खानदान की बर्बादी है। वह अपनी ज़िद का पक्का है।"
मैंने सायमा की सुराहीदार गर्दन को प्यार से सहलाया और उसकी आँखों के आँसू पोंछे। मेरा अपना सीना गुस्से और फिक्र से ऊपर-नीचे हो रहा था।
मैं (अम्मी): "तू फिक्र मत कर बेटा, मुझे थोड़ा सोचने दे। मैं उससे बात करूँगी, उसे समझाने की कोशिश करूँगी कि किसी की इज़्ज़त से खेलना कितना बड़ा गुनाह है। मैं अपनी ममता और तजुर्बे से उसकी ज़मीर जगाने की कोशिश करूँगी।"
सायमा: (कड़वाहट के साथ हँसते हुए) "ज़मीर? खाला, आप उसे नहीं जानतीं। वह देखने में बहुत हैंडसम है, उसकी शख्सियत ऐसी है कि कोई भी औरत पहली नज़र में धोखा खा जाए। पर अंदर से वह उतना ही कमीना और ज़हरीला है। वह जानता है कि उसके पास जो तस्वीरें और मैसेज हैं, वो मेरे इस वजूद को नीलाम करने के लिए काफी हैं। वह कभी नहीं मानेगा, उसे बस अपनी हवस की भूख मिटानी है।"
मैंने सायमा के नर्म गालों को थपथपाया और अपनी आवाज़ में एक ऐसी सख्ती पैदा की जो मैंने आज तक कभी इस्तेमाल नहीं की थी। मेरे हाथ अब उसकी कलाइयों पर मज़बूत थे।
मैं: "कितना भी चालाक क्यों न हो, है तो वह एक मर्द ही न? और मर्द की कमज़ोरी क्या होती है, यह मैं अब धीरे-धीरे समझने लगी हूँ। तू बस मुझ पर भरोसा रख। वह विशाल चाहे कितना भी बड़ा शिकारी हो, उसे नहीं पता कि अब उसका पाला एक ऐसी माँ से पड़ा है जो अपनी बेटी जैसी सायमा के लिए अपनी जान और अपनी इज़्ज़त, दोनों दांव पर लगा सकती है।"
मैंने सायमा की आँखों में आँखें डालकर उसे आखिरी बार चेताया।
मैं: "पर एक बात गाँठ बाँध ले... तू कोई गलत कदम नहीं उठाएगी। सुसाइड का ख्याल भी अपने इस मासूम दिमाग में मत लाना। अगर तू हार गई, तो उस दरिंदे की जीत हो जाएगी। तू अपनी इस खूबसूरती को ढाल बना, तलवार नहीं। ये वादा कर मुझसे।"
सायमा ने धीरे से अपना सिर हिलाया। बाहर शहनाई की धुन अब तेज़ हो गई थी, मानो कोई युद्ध का बिगुल बज रहा हो।
साहिल शायद दरवाज़े के बाहर इंतज़ार कर रहा था, पर उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि उसकी अम्मी, जो कल तक सिर्फ एक घरेलू बेगम थी, आज अपनी इज़्ज़त बचाने वाले इंसान सरताज से परबत होकर, एक दरिंदे को मात देने की तैयारी कर रही थी।
अब मुझे उस विशाल का दीदार करना था, जो इस हवेली की खुशियों में हवस का ज़हर घोलने की फिराक में था।
मुझे नहीं पता था कि मैं विशाल नामी शख्स को कैसे मनाऊँगी। मैंने सायमा को हौसला देने के लिए कह तो दिया कि मैं देख लूँगी, पर कैसे? क्या मैं सही कर रही हूँ? क्या मैं इस राज़ को किसी और को बताऊँ? क्या मुझे अपने बेटे से सलाह लेनी चाहिए?
क्या मैं विशाल के सामने खुद को एक ढाल की तरह खड़ा कर पाऊँगी, या फिर यह फैसला मुझे किसी अंधेरी खाई में ले जाएगा?
मेरे जेहन में सवालों का एक सैलाब उमड़ रहा था।
Deepak Kapoor
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