22-04-2026, 10:52 AM
किताब पढ़ते हुए... हमारा लंड खड़ा हो गया।
हमने एक-दूसरे की तरफ़ नहीं देखा... बस... किताब पर नजर।
लेकिन दोनों के हाथ नीचे जा रहे थे... धीरे-धीरे...
अविनाश ने धीरे से कहा —
“देख... कितना अच्छा लग रहा है...
सिमरन आंटी गार्गी को चोद रही है...
तुझे कैसा लग रहा है?”
मैंने कुछ नहीं कहा।
बस... अपना लंड हिलाने लगा।
नेहा ने मेरी बात सुनकर मेरे लंड को कसकर पकड़ लिया।
उसकी साँसें तेज़ हो गईं।
“तो... तुमने फिर से... दीदी का नाम सुनकर... उत्तेजित हो गए?
नेहा गार्गी को दीदी कहकर बुलाती थी ।
मैंने आगे कहा —
“अविनाश अक्सर गार्गी का नाम लेने लगा था।
मेरी कज़िन का नाम... मेरे सामने... गंदी-गंदी स्टोरियों के बीच में।
शुरू में बुरा लगता था... लेकिन धीरे-धीरे... बुरा नहीं लगता था।
वो स्टोरी पढ़ता और बोलता — ‘हिला... तेज़ हिला... मे गार्गी की चूत चाट रहा हूँ ...’
और मैं... वही करता।
हमने हर रात वही किया।
धीरे-धीरे... मुझे इसकी आदत पड़ गई।
अब मज़ा आने लगा था।
सिमरन आंटी की बातें कहीं दूर हो चुकी थीं।
अब जो नई उत्तेजना मिलती थी... वो गार्गी के नाम में मिलती थी।
मगर मैंने कभी स्टोरी में खुद को इमेजिन नहीं किया।
कभी नहीं सोचा कि मैं कुछ कर रहा हूँ... या मैं किस कर रहा हूँ।
मैं हमेशा किसी और को इमेजिन करता — गार्गी के साथ।
जैसे... कोई अनजान लड़का... या कोई दोस्त... या कोई अनजान आदमी... गार्गी को चोद रहा हो।
मैं बस देखता... और हिलाता।
बस... दर्शक।
और वो... बहुत मज़ेदार लगने लगा।”
नेहा मेरी तरफ़ लगातार देख रही थी।
उसकी आँखें मेरी आँखों में गड़ी हुई थीं।
उसके चेहरे पर कोई जजमेंट नहीं था — न गुस्सा, न घृणा, न शर्म।
बस... एक गहरी, शांत नजर।
जैसे वो मेरे अंदर कुछ ढूँढ रही हो।
मैं जानता था वो क्या सोच रही होगी।
"ये कितना परवर्ट है...
अपनी खुद की बहन को... किसी और के साथ... कल्पना में चुदते हुए देखकर मुठ मारता था?"
"कैसे सोच सकता है वो अपने परिवार की लड़की के बारे में ऐसा?"
लेकिन मैं चाहता था कि वो सब जान ले।
खासकर इसलिए... क्योंकि वो खुद मुझे अपना पूरा पास्ट बता चुकी थी।
अब मेरी बारी थी।
मैंने गहरी साँस ली और बोला —
“नेहा...
मैं जानता हूँ तुम क्या सोच रही हो।
कि मैं कितना गंदा हूँ...
अपनी कज़िन के बारे में... ऐसे सोचना...न कभी उसे छूने की सोची... न कभी उसे अपनी फैंटसी में खुद के साथ रखा।
हमेशा... किसी और के साथ।
मैं बस... देखता था।
जैसे कोई फिल्म देख रहा हो।
दर्शक।
और... वो दृश्य... मुझे उत्तेजित कर देता था।
मुझे नहीं पता क्यों... लेकिन वो आदत पड़ गई।
हर रात... गार्गी का नाम सुनकर... मेरा लंड खड़ा हो जाता।
और मैं... हिलाता रहता।”
हमने एक-दूसरे की तरफ़ नहीं देखा... बस... किताब पर नजर।
लेकिन दोनों के हाथ नीचे जा रहे थे... धीरे-धीरे...
अविनाश ने धीरे से कहा —
“देख... कितना अच्छा लग रहा है...
सिमरन आंटी गार्गी को चोद रही है...
तुझे कैसा लग रहा है?”
मैंने कुछ नहीं कहा।
बस... अपना लंड हिलाने लगा।
नेहा ने मेरी बात सुनकर मेरे लंड को कसकर पकड़ लिया।
उसकी साँसें तेज़ हो गईं।
“तो... तुमने फिर से... दीदी का नाम सुनकर... उत्तेजित हो गए?
नेहा गार्गी को दीदी कहकर बुलाती थी ।
मैंने आगे कहा —
“अविनाश अक्सर गार्गी का नाम लेने लगा था।
मेरी कज़िन का नाम... मेरे सामने... गंदी-गंदी स्टोरियों के बीच में।
शुरू में बुरा लगता था... लेकिन धीरे-धीरे... बुरा नहीं लगता था।
वो स्टोरी पढ़ता और बोलता — ‘हिला... तेज़ हिला... मे गार्गी की चूत चाट रहा हूँ ...’
और मैं... वही करता।
हमने हर रात वही किया।
धीरे-धीरे... मुझे इसकी आदत पड़ गई।
अब मज़ा आने लगा था।
सिमरन आंटी की बातें कहीं दूर हो चुकी थीं।
अब जो नई उत्तेजना मिलती थी... वो गार्गी के नाम में मिलती थी।
मगर मैंने कभी स्टोरी में खुद को इमेजिन नहीं किया।
कभी नहीं सोचा कि मैं कुछ कर रहा हूँ... या मैं किस कर रहा हूँ।
मैं हमेशा किसी और को इमेजिन करता — गार्गी के साथ।
जैसे... कोई अनजान लड़का... या कोई दोस्त... या कोई अनजान आदमी... गार्गी को चोद रहा हो।
मैं बस देखता... और हिलाता।
बस... दर्शक।
और वो... बहुत मज़ेदार लगने लगा।”
नेहा मेरी तरफ़ लगातार देख रही थी।
उसकी आँखें मेरी आँखों में गड़ी हुई थीं।
उसके चेहरे पर कोई जजमेंट नहीं था — न गुस्सा, न घृणा, न शर्म।
बस... एक गहरी, शांत नजर।
जैसे वो मेरे अंदर कुछ ढूँढ रही हो।
मैं जानता था वो क्या सोच रही होगी।
"ये कितना परवर्ट है...
अपनी खुद की बहन को... किसी और के साथ... कल्पना में चुदते हुए देखकर मुठ मारता था?"
"कैसे सोच सकता है वो अपने परिवार की लड़की के बारे में ऐसा?"
लेकिन मैं चाहता था कि वो सब जान ले।
खासकर इसलिए... क्योंकि वो खुद मुझे अपना पूरा पास्ट बता चुकी थी।
अब मेरी बारी थी।
मैंने गहरी साँस ली और बोला —
“नेहा...
मैं जानता हूँ तुम क्या सोच रही हो।
कि मैं कितना गंदा हूँ...
अपनी कज़िन के बारे में... ऐसे सोचना...न कभी उसे छूने की सोची... न कभी उसे अपनी फैंटसी में खुद के साथ रखा।
हमेशा... किसी और के साथ।
मैं बस... देखता था।
जैसे कोई फिल्म देख रहा हो।
दर्शक।
और... वो दृश्य... मुझे उत्तेजित कर देता था।
मुझे नहीं पता क्यों... लेकिन वो आदत पड़ गई।
हर रात... गार्गी का नाम सुनकर... मेरा लंड खड़ा हो जाता।
और मैं... हिलाता रहता।”


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