22-04-2026, 10:43 AM
मुझे पता था कि आज कुछ धमाका होने वाला है।
रात में अविनाश ने अपने बैग से कुछ नई किताबें निकालीं — जो वो छुपाकर होस्टल लाया था।
मैं बहुत उत्सुक था।
फिर अचानक उसने बैग से कुछ और निकाला...
एक पिंक कलर की ब्रा और पैंटी।
बहुत सुंदर, सॉफ्ट लेस वाली।
उसने मेरी तरफ़ देखा और आँख मारी।
मैं हैरान हो गया।
वो मेरी बातें ध्यान से सुन रही थी, लेकिन उसका हाथ अब भी मेरे लंड पर कसा हुआ था।
मैंने हाँफते हुए आगे बताया —
“जब अविनाश ने वो पिंक ब्रा और पैंटी निकाली... तो मैं एकदम कंफ्यूज हो गया।
मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि वो किसी औरत की असली अंडरगारमेंट लाकर होस्टल में रखेगा।
मैंने हैरानी से पूछा —
‘ये... किसकी है?’
अविनाश ने ब्रा को अपनी नाक पर रखकर गहरी साँस ली और मुस्कुराते हुए बोला —
‘क्या लगता है?’
मुझे अंदाज़ा तो हो गया था, लेकिन मैं कन्फर्म करना चाहता था।
मैंने फिर पूछा —
‘प्लीज बता ना... ये किसकी है?’
अविनाश ने ब्रा को अपनी नाक से हटाया नहीं।
वो पिंक पैंटी को अपने लंड पर रगड़ते हुए बोला —
‘पहले तू अपना हाथ मेरे लंड पर रख...
फिर मैं बताता हूँ।’
पहली बार मुझे लगा कि ये रिक्वेस्ट नहीं... बल्कि ऑर्डर था।
उसकी आवाज़ में एक अजीब सा अधिकार था।
वो खड़ा हो गया।
मैंने उसके पजामा का नाड़ा खोला और धीरे से नीचे सरका दिया।
उसका सात इंच का मोटा, कड़क लंड मेरे सामने था।
सिर पर पहले से ही चमकदार प्रीकम लगा हुआ था।
मैंने अपना हाथ बढ़ाया और उसे पकड़ लिया।
मेरा हाथ उसकी मोटाई पर मुश्किल से बंद हो पा रहा था।
फिर मैंने धीरे-धीरे उसे हिलाना शुरू कर दिया — ऊपर से नीचे, पूरी लंबाई तक।
अविनाश ने आँखें बंद कर लीं।
वो सिमरन आंटी की ब्रा को अपनी नाक पर रखकर बहुत जोर से सूँघ रहा था — जैसे कोई कुत्ता किसी औरत की खुशबू सूँघ रहा हो।
उसके मुँह से हल्की-हल्की सिसकारियाँ निकल रही थीं — ‘अ ahhh... सिमरन
मैं उसके लंड को लगातार हिला रहा था।
मेरे हाथ में उसकी गर्मी और मोटाई साफ़ महसूस हो रही थी।
और सबसे अजीब बात...
जब अविनाश ब्रा सूँघ रहा था, तो ब्रा की खुशबू मेरी नाक तक भी पहुँच रही थी।
वो बहुत तेज़, बहुत निजी खुशबू थी — औरत के शरीर की, पसीने की, और थोड़ी सी चिपचिपी गंध।
मुझे लग रहा था कि ये ब्रा शायद कई दिनों से नहीं धुली थी।
सिमरन आंटी की असली, इस्तेमाल की हुई ब्रा।”
हा मेरी बातें ध्यान से सुन रही थी।
उसका हाथ अभी भी मेरे लंड पर धीरे-धीरे चल रहा था — जैसे वो सहला रही हो, लेकिन सोच में डूबी हुई।
उसकी आँखें मेरी तरफ़ थीं, अचंभे से भरी हुईं।
जैसे वो कुछ पूछना चाहती हो, लेकिन शब्द नहीं निकल रहे हों।
मैंने उसकी आँखों में देखा और धीरे से बोला —
“पूछो... जो पूछना चाहती हो।
मुझे पता है ये सब सुनना तुम्हारे लिए आसान नहीं होगा।
इसलिए ही मैंने तुमसे छुपाया था।”
नेहा ने मेरी आँखों में देखा।
फिर धीरे से मुस्कुराई — वो मुस्कान जो थोड़ी राहत वाली थी।
“नहीं... ऐसा कुछ नहीं है।
आदमी का एक पास्ट होता है।
मैंने तुम्हें अपना पास्ट अच्छे से बताया था।
मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।
बल्कि... मुझे और अच्छा लगा कि तुमने खुलकर बताया।
मैं एक बात पूछना चाहती हूँ।”
मैंने सिर हिलाया — “पूछो।”
नेहा ने मेरे लंड को थोड़ा और कसकर पकड़ा और पूछा —
“तुम... बायसेक्शुअल हो?”
मैंने हल्का-सा हँसकर जवाब दिया —
“नहीं।
क्या तुम किसी आदमी को देखकर अट्रैक्टिव होते हो?”
नेहा ने सिर हिलाया — “नहीं।
और तुम?”
मैंने गहरी साँस ली और कहा —
“ऐसा नहीं है।
उस टाइम भी जो अट्रैक्टिव था... वो सिमरन आंटी के बारे में सोचकर था।
बस वो सिचुएशन — एक-दूसरे का लंड हिलाना, गंदी स्टोरी, सिमरन आंटी की ब्रा...
ये सब मुझे नया फील दे रहा था।
मज़ा आ रहा था।
लेकिन कभी भी किसी आदमी को सोचकर ऐसा नहीं किया।
हमेशा एक औरत इन्वॉल्व होती थी — सिमरन आंटी, या कोई स्टोरी की औरत।
वो ही मुझे उत्तेजित करती थी।”
नेहा ने मेरे लंड को धीरे से रगड़ते हुए बोला —
“तो... तुम्हें वो मज़ा इसलिए आया क्योंकि वो सब गंदा और नया था?
न कि क्योंकि तुम अविनाश के लंड को पसंद कर रहे थे?”
मैंने सिर हिलाया — “हाँ।
अगर सिमरन आंटी की जगह कोई और औरत होती... तो भी वैसा ही होता।
मुझे बस वो फीलिंग अच्छी लगी — गुप्त, गंदी, लेकिन सुरक्षित।”
नेहा ने मेरे लंड को एक बार कसकर दबाया और धीरे से बोली —
“अच्छा... तो अब बताओ... उस रात क्या हुआ?
अविनाश ने ब्रा सूँघी... तुमने उसका लंड हिलाया... फिर?”
मैंने आगे बढ़ाया —
“जब मैं अविनाश का लंड हिला रहा था... उसके दूसरे हाथ में सिमरन आंटी की पैंटी थी।
वो उसे अपनी उँगलियों से रगड़ रहा था, जैसे वो उसकी खुशबू में डूब रहा हो।
मुझे वो देखकर बहुत गर्मी हो रही थी।
मैंने सोचा... अरे यार, मुझे भी थोड़ा स्मेल करने दे।
कैसी खुशबू है, कितनी गंदी, कितनी गरम...
मैंने धीरे से कहा —
‘यार... मुझे भी थोड़ा स्मेल करने दे ना...’
अविनाश ने मुझे देखा।
उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
मैंने आगे कहा —
“जब मैंने अविनाश से कहा कि मुझे भी थोड़ा स्मेल करने दे... तो उसने ब्रा-पैंटी को अपनी तरफ़ खींच लिया और बोला —
‘ये मेरी मम्मी की है... ये सिर्फ़ मेरी।’
फिर वो मुस्कुराया और बोला —
‘तूने आज तक मेरे लिए कुछ भी नहीं किया।
हमेशा मम्मी के बारे में सोचा... सारी कहानियाँ, सारी फैंटसी...
कभी तूने अपनी घर की औरतो का यूज़ नहीं किया।’
मैंने कहा —
‘अरे भाई... मैं कैसे घर की औरतो को यूज़ कर सकता हूँ?
मेरी मम्मी तो बहुत बूढ़ी है... और दिखने में भी इतनी सुंदर नहीं जितनी सिमरन आंटी है।’
उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान फैल गई।
वो धीरे से बोला —
"मैं तुम्हारी मम्मी की बात नहीं कर रहा।
मैं गार्गी की बात कर रहा हूँ।’
जैसे ही गार्गी का नाम सुना... मेरे दिमाग में आग लग गई।
गार्गी — मेरी बहन ।
उसके नाम से... किसी गंदी फैंटसी में?
मुझे लगा सब कुछ गलत हो गया।
मैंने अपना हाथ उसके बॉल्स पर रखा... और जोर से दबा दिया।
वो जोर से चिल्लाया — ‘आह'
दर्द से उसका चेहरा लाल हो गया।
मैंने उसे छोड़ा... फिर उसके चेहरे पर दो-तीन थप्पड़ मारे।
‘ये क्या बोल रहा है तू?’
फिर मैं उठा और कमरा छोड़ दिया।
उस रात के बाद... मैंने अविनाश से महीने भर बात नहीं की।
होस्टल में हम एक ही रूम में थे, लेकिन जैसे कोई अदृश्य दीवार खड़ी हो गई हो।
सुबह उठता, चुपचाप तैयार होता, क्लास जाता।
रात को लौटता, बिस्तर पर लेट जाता — बिना एक शब्द।
अविनाश भी चुप रहता।
एक महीने बाद... वो रात आई।
अविनाश दूसरे बेड पर लेटा था, किताब पढ़ रहा था।
लाइट कम थी, सिर्फ़ टेबल लैंप की पीली रोशनी।
मैंने देखा — उसका हाथ धीरे-धीरे नीचे जा रहा था।
वो चुपके से अपना लंड हिला रहा था... किताब में नाम लेते हुए।
मुझे साफ़ दिख रहा था — उसकी साँसें तेज़, आँखें बंद।
फिर उसने ब्रा-पैंटी निकाली... और सूँघने लगा।
वो पैंटी अपनी नाक पर रखकर... धीरे-धीरे मुठ मार रहा था।
मेरा मन करता था... उसके पास जाऊँ।
उसकी पैंटी छू लूँ, सूँघ लूँ।
मुझे पता था वो मुझे रोकता नहीं।
लेकिन मेरा ईगो... वो मुझे रोक रहा था।
मैं सोचता — "अगर मैं गया... तो वो फिर से कंट्रोल ले लेगा।
फिर वो गार्गी का नाम लेगा... और मैं फिर गुस्सा करूँगा।"
रात के 2 बजे... अविनाश सो गया।
किताब उसके हाथ से गिर गई।
मैं चुपके से उठा... उसके बेड के पास गया।
किताब उठाई।
पन्ने पलटे... और देखा।
स्टोरी थी — एक जवान लड़का और लड़की, अंडर-कंस्ट्रक्शन बिल्डिंग में।
रंग-बिरंगी दीवारों के बीच... वो दोनों नंगे होकर खेल रहे थे।
मेरा दिल धड़कने लगा।
मैंने कल्पना की — गार्गी... बहन... उस लड़की के रूप में।
अविनाश उस लड़के के रूप में... उसकी कमर पकड़कर... उसे चोद रहा है।
गार्गी की साँसें तेज़... उसकी आँखें बंद... अविनाश का मोटा लंड अंदर-बाहर।
मैंने किताब बंद की... लेकिन मेरा लंड पहले ही खड़ा हो चुका था।
बहुत कड़क।
मुझे गुस्सा भी आया... लेकिन उत्तेजना ज़्यादा थी।
मैंने सोचा — "ये क्या हो रहा है?
मैं गार्गी को... ऐसे सोच रहा हूँ?"
मैंने किताब वापस रखी... और अपने बेड पर लेट गया।
अपना लंड निकाला... और धीरे-धीरे हिलाने लगा।
कल्पना में गार्गी थी... और अविनाश।
मैं झड़ गया... चुपचाप।
लेकिन अंदर से... अब वो गुस्सा नहीं... एक नई तरह की भूख थी।
अगले दिन सुबह... अविनाश मेरे सिरहाने पर रखी किताब देखकर समझ गया।
वो चुपके से मुस्कुराया — वो मुस्कान जो कह रही थी "मैं जानता हूँ तूने पढ़ी है"।
उसने धीरे से कहा —
“तुम चाहो तो ये किताब ले सकते हो।
मेरे पास और भी किताबें हैं... नई कहानियाँ, नए फोटोग्राफ्स... और भी सुंदर लड़कियाँ वाली।
सब तुम्हारा है।
मगर तुम्हें पता है... मुझे क्या चाहिए उसके अंदर।”
मैंने हल्का सा सिर झुकाया।
“नहीं... ये मुझसे नहीं हो पाएगा।
तुम समझ रहे हो... मैंने कभी इस तरीके से गार्गी को नहीं देखा।”
अविनाश ने बिस्तर पर बैठते हुए कहा —
“अरे... ये तो सिर्फ़ स्टोरी है।
ये सिर्फ़ कल्पना है।
और वैसे भी... अगर तुम चाहते हो तो तुम उस लड़की की जगह अपने आप को इमेजिन कभी मत करो।
सिर्फ़ लड़के की जगह किसी और को यूज़ करो।
तब तुम्हें ये थोड़ी सी कम होगी।
तुम हमेशा से थर्ड पार्टी की तरह इसे देखोगे... जैसे एक दर्शक।
तुम बस देखोगे कि गार्गी किसी और के साथ है।
फाइनली... कभी ना कभी उसकी शादी होगी।
तुम्हें पता है वो ये सब करेगी।
तुम्हें पता है कि वो अपनी सुहाग रात के दिन सब करेगी।
तब तो तुम सब करने दोगे... हो सकता है उस दिन तुम उसे इमेजिन भी करो।
मगर अभी इमेजिन करने में क्या बुराई है?
तुम मेरे साथ उसे इमेजिन कर सकते हो।
कहानी में बस नाम ही तो रिप्लेस करने हैं।”
रात जब मैं रूम में घुसा... तो अंदर से एक अजीब सी कश्मकश थी।
दिन भर दिमाग में घूम रही थी — आज रात क्या होगा?
क्या वो फिर वही खेल शुरू करेगा?
या... अब सब कुछ नॉर्मल रहेगा?
अविनाश बेड पर लेटा था।
उसके हाथ में एक नई किताब — कवर पर दो लड़कियाँ, बहुत सुंदर, एक-दूसरे को किस कर रही थीं।
वो मुस्कुराया और बोला —
“ये देख... नई किताब है।
बहुत अच्छी कहानी है।
मेरे साथ बैठ, पढ़... मजा आएगा तुझे।”
मैंने थोड़ा सोचा।
फिर उसके पास जाकर बैठ गया।
वो पढ़ने लगा — एक लेस्बियन स्टोरी।
एक शादीशुदा महिला... और एक जवान लड़की, जिसकी शादी होने वाली थी।
बड़ी वाला उसे सिखा रही थी — सुहाग रात क्या करना है, कैसे छूना है, कैसे चूमना है।
और इसी बहाने... वो उसे छू रही थी, सहला रही थी।
उसने पहले से ही शादीशुदा महिला का नाम सिमरन रख दिया।
लेकिन दूसरी लड़की का नाम... वो झिझक रहा था।
उसने मेरी तरफ़ देखा — जैसे कोई फेवर मांग रहा हो।
मैंने हल्का सा मुस्कुराया... और आह भरी।
मुझे पता था वो क्या चाहता है।
अगर वो कोई और नाम भी लेता... तो भी उसके दिमाग में वही चल रहा था।
जैसे ही मैंने हाँ में सिर हिलाया... वो मुस्कुराया।
फिर झट से बोला —
“और ये लड़की... गार्गी।”
मेरा दिल एक बार फिर धड़का।
लेकिन इस बार... गुस्सा नहीं आया।
बस... एक गर्मी।
स्टोरी में सिमरन गार्गी को सब सिखा रही थी —
“सुहाग रात में ऐसे चूमना... ऐसे छूना... ऐसे चाटना...”
दोनों नंगी हो गईं... एक-दूसरे के स्तन दबा रही थीं... चूत पर उँगलियाँ फेर रही थीं...
सिमरन गार्गी को चाट रही थी... और गार्गी सिसकारियाँ ले रही थी।
हम दोनों चुप थे।
रात में अविनाश ने अपने बैग से कुछ नई किताबें निकालीं — जो वो छुपाकर होस्टल लाया था।
मैं बहुत उत्सुक था।
फिर अचानक उसने बैग से कुछ और निकाला...
एक पिंक कलर की ब्रा और पैंटी।
बहुत सुंदर, सॉफ्ट लेस वाली।
उसने मेरी तरफ़ देखा और आँख मारी।
मैं हैरान हो गया।
वो मेरी बातें ध्यान से सुन रही थी, लेकिन उसका हाथ अब भी मेरे लंड पर कसा हुआ था।
मैंने हाँफते हुए आगे बताया —
“जब अविनाश ने वो पिंक ब्रा और पैंटी निकाली... तो मैं एकदम कंफ्यूज हो गया।
मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि वो किसी औरत की असली अंडरगारमेंट लाकर होस्टल में रखेगा।
मैंने हैरानी से पूछा —
‘ये... किसकी है?’
अविनाश ने ब्रा को अपनी नाक पर रखकर गहरी साँस ली और मुस्कुराते हुए बोला —
‘क्या लगता है?’
मुझे अंदाज़ा तो हो गया था, लेकिन मैं कन्फर्म करना चाहता था।
मैंने फिर पूछा —
‘प्लीज बता ना... ये किसकी है?’
अविनाश ने ब्रा को अपनी नाक से हटाया नहीं।
वो पिंक पैंटी को अपने लंड पर रगड़ते हुए बोला —
‘पहले तू अपना हाथ मेरे लंड पर रख...
फिर मैं बताता हूँ।’
पहली बार मुझे लगा कि ये रिक्वेस्ट नहीं... बल्कि ऑर्डर था।
उसकी आवाज़ में एक अजीब सा अधिकार था।
वो खड़ा हो गया।
मैंने उसके पजामा का नाड़ा खोला और धीरे से नीचे सरका दिया।
उसका सात इंच का मोटा, कड़क लंड मेरे सामने था।
सिर पर पहले से ही चमकदार प्रीकम लगा हुआ था।
मैंने अपना हाथ बढ़ाया और उसे पकड़ लिया।
मेरा हाथ उसकी मोटाई पर मुश्किल से बंद हो पा रहा था।
फिर मैंने धीरे-धीरे उसे हिलाना शुरू कर दिया — ऊपर से नीचे, पूरी लंबाई तक।
अविनाश ने आँखें बंद कर लीं।
वो सिमरन आंटी की ब्रा को अपनी नाक पर रखकर बहुत जोर से सूँघ रहा था — जैसे कोई कुत्ता किसी औरत की खुशबू सूँघ रहा हो।
उसके मुँह से हल्की-हल्की सिसकारियाँ निकल रही थीं — ‘अ ahhh... सिमरन
मैं उसके लंड को लगातार हिला रहा था।
मेरे हाथ में उसकी गर्मी और मोटाई साफ़ महसूस हो रही थी।
और सबसे अजीब बात...
जब अविनाश ब्रा सूँघ रहा था, तो ब्रा की खुशबू मेरी नाक तक भी पहुँच रही थी।
वो बहुत तेज़, बहुत निजी खुशबू थी — औरत के शरीर की, पसीने की, और थोड़ी सी चिपचिपी गंध।
मुझे लग रहा था कि ये ब्रा शायद कई दिनों से नहीं धुली थी।
सिमरन आंटी की असली, इस्तेमाल की हुई ब्रा।”
हा मेरी बातें ध्यान से सुन रही थी।
उसका हाथ अभी भी मेरे लंड पर धीरे-धीरे चल रहा था — जैसे वो सहला रही हो, लेकिन सोच में डूबी हुई।
उसकी आँखें मेरी तरफ़ थीं, अचंभे से भरी हुईं।
जैसे वो कुछ पूछना चाहती हो, लेकिन शब्द नहीं निकल रहे हों।
मैंने उसकी आँखों में देखा और धीरे से बोला —
“पूछो... जो पूछना चाहती हो।
मुझे पता है ये सब सुनना तुम्हारे लिए आसान नहीं होगा।
इसलिए ही मैंने तुमसे छुपाया था।”
नेहा ने मेरी आँखों में देखा।
फिर धीरे से मुस्कुराई — वो मुस्कान जो थोड़ी राहत वाली थी।
“नहीं... ऐसा कुछ नहीं है।
आदमी का एक पास्ट होता है।
मैंने तुम्हें अपना पास्ट अच्छे से बताया था।
मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।
बल्कि... मुझे और अच्छा लगा कि तुमने खुलकर बताया।
मैं एक बात पूछना चाहती हूँ।”
मैंने सिर हिलाया — “पूछो।”
नेहा ने मेरे लंड को थोड़ा और कसकर पकड़ा और पूछा —
“तुम... बायसेक्शुअल हो?”
मैंने हल्का-सा हँसकर जवाब दिया —
“नहीं।
क्या तुम किसी आदमी को देखकर अट्रैक्टिव होते हो?”
नेहा ने सिर हिलाया — “नहीं।
और तुम?”
मैंने गहरी साँस ली और कहा —
“ऐसा नहीं है।
उस टाइम भी जो अट्रैक्टिव था... वो सिमरन आंटी के बारे में सोचकर था।
बस वो सिचुएशन — एक-दूसरे का लंड हिलाना, गंदी स्टोरी, सिमरन आंटी की ब्रा...
ये सब मुझे नया फील दे रहा था।
मज़ा आ रहा था।
लेकिन कभी भी किसी आदमी को सोचकर ऐसा नहीं किया।
हमेशा एक औरत इन्वॉल्व होती थी — सिमरन आंटी, या कोई स्टोरी की औरत।
वो ही मुझे उत्तेजित करती थी।”
नेहा ने मेरे लंड को धीरे से रगड़ते हुए बोला —
“तो... तुम्हें वो मज़ा इसलिए आया क्योंकि वो सब गंदा और नया था?
न कि क्योंकि तुम अविनाश के लंड को पसंद कर रहे थे?”
मैंने सिर हिलाया — “हाँ।
अगर सिमरन आंटी की जगह कोई और औरत होती... तो भी वैसा ही होता।
मुझे बस वो फीलिंग अच्छी लगी — गुप्त, गंदी, लेकिन सुरक्षित।”
नेहा ने मेरे लंड को एक बार कसकर दबाया और धीरे से बोली —
“अच्छा... तो अब बताओ... उस रात क्या हुआ?
अविनाश ने ब्रा सूँघी... तुमने उसका लंड हिलाया... फिर?”
मैंने आगे बढ़ाया —
“जब मैं अविनाश का लंड हिला रहा था... उसके दूसरे हाथ में सिमरन आंटी की पैंटी थी।
वो उसे अपनी उँगलियों से रगड़ रहा था, जैसे वो उसकी खुशबू में डूब रहा हो।
मुझे वो देखकर बहुत गर्मी हो रही थी।
मैंने सोचा... अरे यार, मुझे भी थोड़ा स्मेल करने दे।
कैसी खुशबू है, कितनी गंदी, कितनी गरम...
मैंने धीरे से कहा —
‘यार... मुझे भी थोड़ा स्मेल करने दे ना...’
अविनाश ने मुझे देखा।
उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
मैंने आगे कहा —
“जब मैंने अविनाश से कहा कि मुझे भी थोड़ा स्मेल करने दे... तो उसने ब्रा-पैंटी को अपनी तरफ़ खींच लिया और बोला —
‘ये मेरी मम्मी की है... ये सिर्फ़ मेरी।’
फिर वो मुस्कुराया और बोला —
‘तूने आज तक मेरे लिए कुछ भी नहीं किया।
हमेशा मम्मी के बारे में सोचा... सारी कहानियाँ, सारी फैंटसी...
कभी तूने अपनी घर की औरतो का यूज़ नहीं किया।’
मैंने कहा —
‘अरे भाई... मैं कैसे घर की औरतो को यूज़ कर सकता हूँ?
मेरी मम्मी तो बहुत बूढ़ी है... और दिखने में भी इतनी सुंदर नहीं जितनी सिमरन आंटी है।’
उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान फैल गई।
वो धीरे से बोला —
"मैं तुम्हारी मम्मी की बात नहीं कर रहा।
मैं गार्गी की बात कर रहा हूँ।’
जैसे ही गार्गी का नाम सुना... मेरे दिमाग में आग लग गई।
गार्गी — मेरी बहन ।
उसके नाम से... किसी गंदी फैंटसी में?
मुझे लगा सब कुछ गलत हो गया।
मैंने अपना हाथ उसके बॉल्स पर रखा... और जोर से दबा दिया।
वो जोर से चिल्लाया — ‘आह'
दर्द से उसका चेहरा लाल हो गया।
मैंने उसे छोड़ा... फिर उसके चेहरे पर दो-तीन थप्पड़ मारे।
‘ये क्या बोल रहा है तू?’
फिर मैं उठा और कमरा छोड़ दिया।
उस रात के बाद... मैंने अविनाश से महीने भर बात नहीं की।
होस्टल में हम एक ही रूम में थे, लेकिन जैसे कोई अदृश्य दीवार खड़ी हो गई हो।
सुबह उठता, चुपचाप तैयार होता, क्लास जाता।
रात को लौटता, बिस्तर पर लेट जाता — बिना एक शब्द।
अविनाश भी चुप रहता।
एक महीने बाद... वो रात आई।
अविनाश दूसरे बेड पर लेटा था, किताब पढ़ रहा था।
लाइट कम थी, सिर्फ़ टेबल लैंप की पीली रोशनी।
मैंने देखा — उसका हाथ धीरे-धीरे नीचे जा रहा था।
वो चुपके से अपना लंड हिला रहा था... किताब में नाम लेते हुए।
मुझे साफ़ दिख रहा था — उसकी साँसें तेज़, आँखें बंद।
फिर उसने ब्रा-पैंटी निकाली... और सूँघने लगा।
वो पैंटी अपनी नाक पर रखकर... धीरे-धीरे मुठ मार रहा था।
मेरा मन करता था... उसके पास जाऊँ।
उसकी पैंटी छू लूँ, सूँघ लूँ।
मुझे पता था वो मुझे रोकता नहीं।
लेकिन मेरा ईगो... वो मुझे रोक रहा था।
मैं सोचता — "अगर मैं गया... तो वो फिर से कंट्रोल ले लेगा।
फिर वो गार्गी का नाम लेगा... और मैं फिर गुस्सा करूँगा।"
रात के 2 बजे... अविनाश सो गया।
किताब उसके हाथ से गिर गई।
मैं चुपके से उठा... उसके बेड के पास गया।
किताब उठाई।
पन्ने पलटे... और देखा।
स्टोरी थी — एक जवान लड़का और लड़की, अंडर-कंस्ट्रक्शन बिल्डिंग में।
रंग-बिरंगी दीवारों के बीच... वो दोनों नंगे होकर खेल रहे थे।
मेरा दिल धड़कने लगा।
मैंने कल्पना की — गार्गी... बहन... उस लड़की के रूप में।
अविनाश उस लड़के के रूप में... उसकी कमर पकड़कर... उसे चोद रहा है।
गार्गी की साँसें तेज़... उसकी आँखें बंद... अविनाश का मोटा लंड अंदर-बाहर।
मैंने किताब बंद की... लेकिन मेरा लंड पहले ही खड़ा हो चुका था।
बहुत कड़क।
मुझे गुस्सा भी आया... लेकिन उत्तेजना ज़्यादा थी।
मैंने सोचा — "ये क्या हो रहा है?
मैं गार्गी को... ऐसे सोच रहा हूँ?"
मैंने किताब वापस रखी... और अपने बेड पर लेट गया।
अपना लंड निकाला... और धीरे-धीरे हिलाने लगा।
कल्पना में गार्गी थी... और अविनाश।
मैं झड़ गया... चुपचाप।
लेकिन अंदर से... अब वो गुस्सा नहीं... एक नई तरह की भूख थी।
अगले दिन सुबह... अविनाश मेरे सिरहाने पर रखी किताब देखकर समझ गया।
वो चुपके से मुस्कुराया — वो मुस्कान जो कह रही थी "मैं जानता हूँ तूने पढ़ी है"।
उसने धीरे से कहा —
“तुम चाहो तो ये किताब ले सकते हो।
मेरे पास और भी किताबें हैं... नई कहानियाँ, नए फोटोग्राफ्स... और भी सुंदर लड़कियाँ वाली।
सब तुम्हारा है।
मगर तुम्हें पता है... मुझे क्या चाहिए उसके अंदर।”
मैंने हल्का सा सिर झुकाया।
“नहीं... ये मुझसे नहीं हो पाएगा।
तुम समझ रहे हो... मैंने कभी इस तरीके से गार्गी को नहीं देखा।”
अविनाश ने बिस्तर पर बैठते हुए कहा —
“अरे... ये तो सिर्फ़ स्टोरी है।
ये सिर्फ़ कल्पना है।
और वैसे भी... अगर तुम चाहते हो तो तुम उस लड़की की जगह अपने आप को इमेजिन कभी मत करो।
सिर्फ़ लड़के की जगह किसी और को यूज़ करो।
तब तुम्हें ये थोड़ी सी कम होगी।
तुम हमेशा से थर्ड पार्टी की तरह इसे देखोगे... जैसे एक दर्शक।
तुम बस देखोगे कि गार्गी किसी और के साथ है।
फाइनली... कभी ना कभी उसकी शादी होगी।
तुम्हें पता है वो ये सब करेगी।
तुम्हें पता है कि वो अपनी सुहाग रात के दिन सब करेगी।
तब तो तुम सब करने दोगे... हो सकता है उस दिन तुम उसे इमेजिन भी करो।
मगर अभी इमेजिन करने में क्या बुराई है?
तुम मेरे साथ उसे इमेजिन कर सकते हो।
कहानी में बस नाम ही तो रिप्लेस करने हैं।”
रात जब मैं रूम में घुसा... तो अंदर से एक अजीब सी कश्मकश थी।
दिन भर दिमाग में घूम रही थी — आज रात क्या होगा?
क्या वो फिर वही खेल शुरू करेगा?
या... अब सब कुछ नॉर्मल रहेगा?
अविनाश बेड पर लेटा था।
उसके हाथ में एक नई किताब — कवर पर दो लड़कियाँ, बहुत सुंदर, एक-दूसरे को किस कर रही थीं।
वो मुस्कुराया और बोला —
“ये देख... नई किताब है।
बहुत अच्छी कहानी है।
मेरे साथ बैठ, पढ़... मजा आएगा तुझे।”
मैंने थोड़ा सोचा।
फिर उसके पास जाकर बैठ गया।
वो पढ़ने लगा — एक लेस्बियन स्टोरी।
एक शादीशुदा महिला... और एक जवान लड़की, जिसकी शादी होने वाली थी।
बड़ी वाला उसे सिखा रही थी — सुहाग रात क्या करना है, कैसे छूना है, कैसे चूमना है।
और इसी बहाने... वो उसे छू रही थी, सहला रही थी।
उसने पहले से ही शादीशुदा महिला का नाम सिमरन रख दिया।
लेकिन दूसरी लड़की का नाम... वो झिझक रहा था।
उसने मेरी तरफ़ देखा — जैसे कोई फेवर मांग रहा हो।
मैंने हल्का सा मुस्कुराया... और आह भरी।
मुझे पता था वो क्या चाहता है।
अगर वो कोई और नाम भी लेता... तो भी उसके दिमाग में वही चल रहा था।
जैसे ही मैंने हाँ में सिर हिलाया... वो मुस्कुराया।
फिर झट से बोला —
“और ये लड़की... गार्गी।”
मेरा दिल एक बार फिर धड़का।
लेकिन इस बार... गुस्सा नहीं आया।
बस... एक गर्मी।
स्टोरी में सिमरन गार्गी को सब सिखा रही थी —
“सुहाग रात में ऐसे चूमना... ऐसे छूना... ऐसे चाटना...”
दोनों नंगी हो गईं... एक-दूसरे के स्तन दबा रही थीं... चूत पर उँगलियाँ फेर रही थीं...
सिमरन गार्गी को चाट रही थी... और गार्गी सिसकारियाँ ले रही थी।
हम दोनों चुप थे।


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