20-04-2026, 03:24 PM
थोड़ी गर्मी हो गयी थी इसलिए बाबा ने अपना कुर्ता उतार दिया। । उसने पूजा को अट्रॅक्ट करने के लिए अपनी चेस्ट पूरी शेव कर ली थी। उसकी बॉडी मस्क्युलर थी तो थी ही। अब वह केवल लूँगी में था।
पूजा थोडा और शरमाने लगी।
दोनो पलाथी मार के बैठे थे। मैत्री की रचना.
बाबा: “पुत्री, यह नारियल अपनी झोली में रखलो। तुम दोनों हाथ सिर के ऊपर से जोड़ के ध्यान करो।”
पूजा सिर के ऊपर से हाथ जोड़ के बैठ गयी थी। बाबा उसकी झोली में फल (फ्रूट्स) डालता रहा। और कुछ संस्कृत में मंत्रोच्चार करता रहा।
पूजा की इस पोज़िशन में उसके बूब्स और नंगा पेट बाबा के लंड को सख्त कर रहे थे। वह बार बार उसके नंगे पेट से निचे देखने की कोशिश करता रहा। लेकिन असफल रहा।
पूजा की नेवेल भी बाबा को साफ़ दिख रही थी।
बाबा: “पूजा पुत्री, यह धागा तुम्हें पेट पर बांधना है। इसे पुजारी को बाँधना चाहिए। लेकिन यदि तुम्हें इसमें लज्जा की वज़ह से कोई आपत्ति हो तो तुम ख़ुद बाँध लो। परंतु विधि तो यही है कि इसे पुजारी बाँधे। क्यूंकी बाबा के हाथ शुद्ध होते हैं। बाकी आगे, जैसे तुम्हारी इच्छा।”
पूजा: “बाबाजी, जैसा लिखा है आप वैसा ही कीजिए। हम शाशत्रोक्त विधिओ को तोड़ नहीं सकते। आप जैसा कहे वैसा ही होगा।”
बाबा: “बाँधने से पहले वह जगह पानी से साफ़ करनी होती है।”
बाबा ने पूजा के पेट पर पानी छिड़का। और उसका नंगा पेट पानी से धोने लगा। पूजा की पेट की स्किन बहुत स्मूथ थी। बाबा उसके पेट को रगड़ रहा था। फिर उसने तौलिए से पूजा का पेट सुखाया।
पूजा के हाथ सिर के ऊपर थे । बाबा पूजा के सामने बैठ कर उसके पेट पर धागा बाँधने लगा। पहली बार बाबा ने पूजा के नंगे पेट को छुआ।
नॉट बाँधते समय बाबा ने अपनी उंगली पूजा के नेवेल पर रखी। अब बाबा ने उंगली पर टिक्का लगाया।
बाबा: “पूजा, पुराने ज़माने में औरतें अपने शरीर पर डिज़ाइन बनाया करती थीं। असल में, यह एक तरह का श्रृंगार था। और उस समय यह ज़रूरी भी था; पुरुषों को आकर्षित करने के लिए शरीर पर चित्रकारी की जाती थी। और उसी प्रथा के अनुसार, तुम्हारे शरीर पर भी वह सब कुछ करना होगा जो ज़रूरी है।” यह कहते हुए, पुजारी ने पूजा के पेट पर टीका लगाना शुरू कर दिया।
पूजा की नेवेल पर आ कर बाबा रुक गया। अब अपनी उंगली उसकी नेवेल में घुमाने लगा। वह पूजा की नेवेल में टिक्का लगा रहा था। पूजा के दोनों हाथ ऊपर थे और नमश्कार की मुद्रा में थे। वह भोली थी....वह इन सब चीज़ों को सामान्य समझ रही थी। । लेकिन यह सब उसे भी कुछ-कुछ अच्छा लग रहा था। प्रस्तुतकर्ता मैत्री.
फिर बाबा घूम कर पूजा के पीछे आया। उसने पूजा की पीठ पर जल छिड़का और हाथ से उसकी पीठ पर जल लगाने लगा।
बाबा: “जल से तुम्हारी देह और शुद्ध हो जाएगी। जितना शुद्ध तुम होगी उतना हमें फायदा रहेगा।”
पूजा के ब्लाउस के हुक्स तो थे नहीं। बाबा ने खुले हुए हुक्स को और साइड में कर दिया। पूजा की ऑलमोस्ट सारी पीठ नंगी हो कर उजागर हो गई। बाबा उसकी नंगी पीठ पर जल डाल के रगड़ रहा था। वह उसकी नंगी पीठ अपने हाथों से धो रहा र्था। पूजा की नंगी पीठ को छूकर बाबा का लौड़ा टाइट हो गया था। मैत्री की लिखनी.
********************************
आजे के लिए बस यही तक. फिर मिलेंगे.
तब तक केलिए मैत्री की तरफ से जय भारत.
पूजा थोडा और शरमाने लगी।
दोनो पलाथी मार के बैठे थे। मैत्री की रचना.
बाबा: “पुत्री, यह नारियल अपनी झोली में रखलो। तुम दोनों हाथ सिर के ऊपर से जोड़ के ध्यान करो।”
पूजा सिर के ऊपर से हाथ जोड़ के बैठ गयी थी। बाबा उसकी झोली में फल (फ्रूट्स) डालता रहा। और कुछ संस्कृत में मंत्रोच्चार करता रहा।
पूजा की इस पोज़िशन में उसके बूब्स और नंगा पेट बाबा के लंड को सख्त कर रहे थे। वह बार बार उसके नंगे पेट से निचे देखने की कोशिश करता रहा। लेकिन असफल रहा।
पूजा की नेवेल भी बाबा को साफ़ दिख रही थी।
बाबा: “पूजा पुत्री, यह धागा तुम्हें पेट पर बांधना है। इसे पुजारी को बाँधना चाहिए। लेकिन यदि तुम्हें इसमें लज्जा की वज़ह से कोई आपत्ति हो तो तुम ख़ुद बाँध लो। परंतु विधि तो यही है कि इसे पुजारी बाँधे। क्यूंकी बाबा के हाथ शुद्ध होते हैं। बाकी आगे, जैसे तुम्हारी इच्छा।”
पूजा: “बाबाजी, जैसा लिखा है आप वैसा ही कीजिए। हम शाशत्रोक्त विधिओ को तोड़ नहीं सकते। आप जैसा कहे वैसा ही होगा।”
बाबा: “बाँधने से पहले वह जगह पानी से साफ़ करनी होती है।”
बाबा ने पूजा के पेट पर पानी छिड़का। और उसका नंगा पेट पानी से धोने लगा। पूजा की पेट की स्किन बहुत स्मूथ थी। बाबा उसके पेट को रगड़ रहा था। फिर उसने तौलिए से पूजा का पेट सुखाया।
पूजा के हाथ सिर के ऊपर थे । बाबा पूजा के सामने बैठ कर उसके पेट पर धागा बाँधने लगा। पहली बार बाबा ने पूजा के नंगे पेट को छुआ।
नॉट बाँधते समय बाबा ने अपनी उंगली पूजा के नेवेल पर रखी। अब बाबा ने उंगली पर टिक्का लगाया।
बाबा: “पूजा, पुराने ज़माने में औरतें अपने शरीर पर डिज़ाइन बनाया करती थीं। असल में, यह एक तरह का श्रृंगार था। और उस समय यह ज़रूरी भी था; पुरुषों को आकर्षित करने के लिए शरीर पर चित्रकारी की जाती थी। और उसी प्रथा के अनुसार, तुम्हारे शरीर पर भी वह सब कुछ करना होगा जो ज़रूरी है।” यह कहते हुए, पुजारी ने पूजा के पेट पर टीका लगाना शुरू कर दिया।
पूजा की नेवेल पर आ कर बाबा रुक गया। अब अपनी उंगली उसकी नेवेल में घुमाने लगा। वह पूजा की नेवेल में टिक्का लगा रहा था। पूजा के दोनों हाथ ऊपर थे और नमश्कार की मुद्रा में थे। वह भोली थी....वह इन सब चीज़ों को सामान्य समझ रही थी। । लेकिन यह सब उसे भी कुछ-कुछ अच्छा लग रहा था। प्रस्तुतकर्ता मैत्री.
फिर बाबा घूम कर पूजा के पीछे आया। उसने पूजा की पीठ पर जल छिड़का और हाथ से उसकी पीठ पर जल लगाने लगा।
बाबा: “जल से तुम्हारी देह और शुद्ध हो जाएगी। जितना शुद्ध तुम होगी उतना हमें फायदा रहेगा।”
पूजा के ब्लाउस के हुक्स तो थे नहीं। बाबा ने खुले हुए हुक्स को और साइड में कर दिया। पूजा की ऑलमोस्ट सारी पीठ नंगी हो कर उजागर हो गई। बाबा उसकी नंगी पीठ पर जल डाल के रगड़ रहा था। वह उसकी नंगी पीठ अपने हाथों से धो रहा र्था। पूजा की नंगी पीठ को छूकर बाबा का लौड़ा टाइट हो गया था। मैत्री की लिखनी.
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आजे के लिए बस यही तक. फिर मिलेंगे.
तब तक केलिए मैत्री की तरफ से जय भारत.



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