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Adultery अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़
#61
अध्याय 5
 
जैसे ही हम अपनी बर्थ के पास पहुँचे, अम्मी के सब्र का बांध पूरी तरह टूट गया। अभी तक वह सरताज सिंह के सामने और उस खौफनाक माहौल में खुद को संभाले हुए थीं, पर सुरक्षित जगह पर पहुँचते ही उनकी सिसकियाँ फूट पड़ीं।
 
वह चुपचाप अपनी सीट पर बैठ गईं और अपने चेहरे को नकाब से ढककर धीरे-धीरे रोने लगीं। वह नहीं चाहती थीं कि नानी की नींद खराब हो और वह इस हादसे को जानकर परेशान हो जाएं। उनकी दूधिया सफेद हथेलियां उनके चेहरे को ढके हुए थीं और उनके भरे हुए कंधे रोने की वजह से बुरी तरह कांप रहे थे।
 
मैंने उनके करीब बैठकर उनके हाथ को थाम लिया। अम्मी ने अचानक अपना सिर उठाया, उनकी बड़ी-बड़ी काली आँखें आँसुओं से भीगी हुई थीं और पलकें आपस में उलझ गई थीं। उन्होंने पागलपन की हद तक मुझे अपने करीब खींच लिया और मेरे चेहरे को चूमने लगीं—माथा, गाल और सिर। यह वह ममता भरी चुंबन थी जो एक माँ तब देती है जब उसे अहसास होता है कि उसका बेटा मौत या किसी बड़ी मुसीबत के कितने करीब था।
 
"मेरा बच्चा... मेरा बेटा," वह फुसफुसायीं।
 
उनके मखमली लबों की गर्माहट और उनके नीले सिल्क के कपड़ों से आती चमेली की खुशबू मेरे वजूद में समा रही थी। अम्मी का वह उभरा हुआ सीना मेरे सीने से सटा हुआ था और उनकी तेज़ धड़कनें मुझे साफ़ महसूस हो रही थीं। उस पल, वह महज़ एक खूबसूरत औरत नहीं, बल्कि एक डरी हुई माँ थीं।
 
कुछ मिनटों तक सुबकने के बाद, अम्मी ने अपनी हिम्मत जुटाई। उन्होंने अपने दुपट्टे से आँसू पोंछे और अपनी लंबी सुराहीदार गर्दन को सीधा करते हुए मेरी आँखों में गहराई से देखा। उनकी आवाज़ में अब एक संजीदगी और थोड़ी फिक्र थी।
 
अम्मी: (धीमी और गंभीर आवाज़ में) "साहिल... सुन मेरी बात। आज जो कुछ भी हुआ, जो तमाशा उन लोगों ने किया और जिस हाल में हम फँसे थे... इसके बारे में नानी को ज़रा भी भनक नहीं लगनी चाहिए। और तेरे अब्बू... फहद को तो बिल्कुल मत बताना।"
 
मैं: "पर अम्मी, अब्बू को पता होना चाहिए कि सफर में क्या हुआ..."
 
अम्मी: (मेरा हाथ ज़ोर से भींचते हुए) "नहीं बेटा! तू अपने अब्बू का मिज़ाज जानता है। अगर उन्हें पता चला कि ट्रेन में हम पर हमला हुआ और उन लोगों ने... उन लोगों ने मुझे छुआ, तो वह डर के मारे हमारा घर से बाहर निकलना ही बंद कर देंगे। हमारा दिल्ली जाना, शादियों में शरीक होना, सब खत्म हो जाएगा। वह हमें फिर कभी अकेले कहीं नहीं भेजेंगे।"
 
अम्मी की आँखों में एक अजीब सी चमक थी—शायद वह अपनी आज़ादी और अपनी उस नूरानी खूबसूरती के साथ जीने के हक को खोना नहीं चाहती थीं। वह जानती थीं कि उनका यह कातिलाना हुस्न अक्सर मुसीबतें बुलाता है, पर वह उसे कैद में नहीं रखना चाहती थीं।
 
अम्मी: "वादा कर मुझसे, यह बात सिर्फ मेरे और तेरे बीच एक राज़ रहेगी। सरताज सिंह ने जो किया, वह अल्लाह का करिश्मा था, पर घर पर सब यही समझेंगे कि सफर बहुत सुकून से गुज़रा।"
 
मैंने उनकी बात मान ली और अपना सिर उनके कंधे पर टिका दिया। अबाया के कपड़े के नीचे उनके नर्म त्वचा की तपिश अभी भी वैसी ही थी। उस रात ट्रेन की पटरियों के साथ-साथ मेरे और अम्मी के बीच एक गहरा और गुप्त रिश्ता जुड़ गया था—एक ऐसा राज़ जो हमारे बीच की दूरियों को और कम करने वाला था।
 
अम्मी अपनी बर्थ पर सुन्न सी बैठी थीं, उनकी नज़रें ट्रेन की खिड़की से बाहर भागते अंधेरे पर टिकी थीं, पर उनका ज़हन कहीं और ही था। उनके दूधिया सफेद हाथ अभी भी कांप रहे थे और उनके भरे हुए सीने की धड़कनें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। अचानक, उन्होंने एक गहरी और बोझिल ठंडी साँस ली और मेरी तरफ मुड़ीं।
 
उनकी आँखों में एक अजीब सी कशिश और सवालों का सैलाब था। उन्होंने अपना नर्म हाथ  मेरी जांघ पर रखा।
 
अम्मी: (धीमी और दार्शनिक आवाज़ में) "साहिल... बेटा, तूने देखा आज क्या हुआ? आज जो कुछ गुज़रा, उसने मुझे अंदर तक हिला दिया है।"
 
मैं चुपचाप उन्हें सुन रहा था। उनकी लंबी सुराहीदार गर्दन पर अभी भी पसीने की चमक थी जो अबाया के काले कॉलर से उभरकर चमक रही थी।
 
अम्मी: "मैं उस वक्त पूरी तरह से इस ढीले-ढाले काले अबाया में ढकी हुई थी। मेरा पूरा जिस्म पर्दों में था, सिवाय इन आँखों के। फिर भी... उन लोगों ने मेरे साथ क्या किया? वे भेड़िये उस कपड़े के पार भी मेरे बदन की बनावट को ताक रहे थे। उन्होंने मुझे उस वक्त भी नहीं बख्शा जब मैं अल्लाह की इबादत की तरह ढकी हुई थी। उन्हें बस मेरे  अंगों और मेरी बेबसी का अंदाज़ा लगाना था और उन्होंने ज़बरदस्ती मुझे अपनी हवस का निशाना बनाया।"
 
अम्मी की आवाज़ में एक अजीब सी कड़वाहट और हकीकत थी।
अम्मी: "और दूसरी तरफ... वो सरताज। जब मैं उस तंग और पारदर्शी नीली नाइटगाउन में उसके बिल्कुल सामने खड़ी थी। मेरा सारा बदनऔर मेरे जिस्म का एक-एक उभार उसके सामने बेपर्दा था। मैं उस वक्त एक औरत की हैसियत से सबसे ज़्यादा कमज़ोर और सबसे ज़्यादा सेक्सी दिख रही थी… पर तूने देखा? उसकी नज़रों में रत्ती भर भी मैल नहीं था। उसने मेरे उस हुस्न को अपनी गंदी नज़रों से नहीं चाटा, बल्कि अपनी पाकीज़ा नज़रों से मेरी इज़्ज़त को ढांप दिया।"
 
अम्मी की आँखों में सरताज के लिए एक रूहानी इज़्ज़त चमक उठी। उन्होंने मेरी आँखों में आँखें डालकर फिर से फुसफुसाया।
 
अम्मी: "इसका मतलब है, बेटा, कि पर्दे कपड़ों में नहीं, बल्कि मर्द की नज़रों में होते हैं। जो भूखा है, उसे अबाया भी दावत लगता है, और जो सरताज जैसा नेक है, उसके लिए एक अर्धनग्न औरत भी सिर्फ एक बहन है जिसकी हिफाज़त ज़रूरी है।"
 
अम्मी की इस बात ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। मैं अपनी अम्मी को देख रहा था—वही अम्मी जिनका कातिलाना बदन आज सरेआम नुमाइश बन गया था, और वही अम्मी जो अब एक गहरी सच्चाई मेरे सामने रख रही थीं।
 
अम्मी की आँखों में सरताज के लिए जो आदर था, वह अब एक गहरी सोच में बदल गया था।
 
अम्मी: (एक ठंडी और गहरी साँस भरते हुए) "साहिल... सच कहूँ तो, कितनी खुशनसीब होगी इस सरताज की बीवी। जो आदमी एक अजनबी, पराई औरत की इज़्ज़त की इतनी हिफाज़त करता है, जो उसके बदन और नूरानी हुस्न को इतने करीब से देखने के बावजूद अपनी नज़रें पाकीज़ा रखता है... सोच, वह अपनी बीवी की कितनी देखभाल करता होगा। उसकी बीवी तो खुद को दुनिया की सबसे महफूज़ और लाड़ली औरत समझती होगी।"
 
अम्मी के चेहरे पर एक ऐसी चमक आई जैसे वह खुद उस सुरक्षा और इज़्ज़त की कल्पना कर रही हों। उनके भरे हुए सीने की धड़कनें अब धीरे-धीरे उस सिल्क के नीचे एक सुकून भरी लय में लौट रही थीं।
 
अम्मी: "बेटा, इस कौम में, इन सिखों में कुछ तो ऐसी बात है, जो इन्हें हर किसी की मदद के लिए सबसे आगे खड़ा कर देती है। इनका जज़्बा ही कुछ और है। तूने खुद देखा है न? जब देश पर मुसीबत आती है, तो ये सबसे पहले ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं।"
 
अम्मी की यादें अब तेज़ी से उन वाकयों की तरफ मुड़ने लगीं जिन्होंने दुनिया भर में इन लोगों की साख बनाई थी।
 
अम्मी: "याद कर, जब चारों तरफ कोविड  का कहर था और लोग अपनों को भी हाथ लगाने से डर रहे थे, तब यही लोग थे जो सड़कों पर निकलकर ऑक्सीजन सिलेंडर पहुँचा रहे थे। और वो लंगर... चाहे कितनी भी भूख हो, इनके यहाँ कोई खाली हाथ नहीं लौटता।
 
बॉम्बे  के बाढ़ के मंज़र याद हैं? जब पूरा शहर पानी में डूब रहा था, तब ये गुरुद्वारों के दरवाज़े खोलकर लोगों को पनाह और गरम खाना दे रहे थे। यहाँ तक कि सात समंदर पार सीरिया जैसी जगहों पर भी, जहाँ जंग ने सब कुछ तबाह कर दिया, वहाँ भी ये लोग मदद लेकर पहुँच जाते हैं।"
 
अम्मी ने मेरा हाथ थोड़ा और कसकर पकड़ा। उनके नर्म और गर्म पंजों की छुअन ने मुझे अहसास दिलाया कि वह सरताज के उस फौलादी और साफ़ चरित्र से कितनी प्रभावित हुई हैं।
 
अम्मी: "आज सरताज सिंह ने जो मेरे साथ किया, वह सिर्फ एक सिक्युरिटी वाले की ड्यूटी नहीं थी, बल्कि उनकी रगों में दौड़ने वाला वही सेवा का खून था। उन्होंने मेरे उस बेपर्दा और कामुक रूप को नहीं, बल्कि एक डरी हुई रूह को देखा। खुदा ऐसे नेक इंसानों को हमेशा सलामत रखे।"
 
रात का सन्नाटा गहरा हो गया था, और ट्रेन की लयबद्ध आवाज़ के बीच अम्मी की बातें किसी रूहानी अहसास की तरह गलियारे में तैर रही थीं। उनकी आँखों में अभी भी उन आँसुओं की नमी थी, जो सरताज के आने के बाद शुक्रगुज़ारी में बदल गए थे।
 
अम्मी: (धीमी और भावुक आवाज़ में) "साहिल... ज़रा सोच तो सही बेटा। मैं कितनी बेबस थी, उस गंदे टॉयलेट के पास उन भेड़ियों के बीच फंसी हुई। मेरा वह नीला रेशमी लिबास उन भूखी नज़रों के सामने बेपर्दा था, और मेरी रूह कांप रही थी। मैंने अपनी आँखें बंद कीं और सिर्फ अपने अल्लाह को पुकारा… मैंने गिड़गिड़ाकर कहा कि 'या अल्लाह, किसी फरिश्ते को भेज दे जो मेरी इज़्ज़त की हिफाज़त करे।"
 
अम्मी ने एक गहरी साँस ली, जिससे उनके पुष्ट सीने का उभार उस अबाया के नीचे एक बार फिर नुमाया हुआ।
 
अम्मी: "और देख... अल्लाह ने मेरी सुन ली। मगर उसने किसी फरिश्ते को आसमान से नहीं उतारा, बल्कि उसने सरताज को भेज दिया। एक ऐसा इंसान जो शायद हमारे अल्लाह को उस तरह नहीं मानता जैसे हम मानते हैं... वह तो अपने वाहेगुरु  का नाम जपता है। उसकी पगड़ी, उसकी दाढ़ी, उसकी वर्दी... सब कुछ अलग था।"
 
अम्मी के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान आई जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी—एक ऐसी समझदारी जो मजहब की दीवारों को तोड़ रही थी। उन्होंने अपनी लंबी सुराहीदार गर्दन को थोड़ा झुकाया और मेरे कान के पास फुसफुसायीं।
 
अम्मी: "इसका मतलब तो यही हुआ न साहिल... कि मेरा अल्लाह और उसका वाहेगुरु अलग नहीं हैं। अगर अलग होते, तो अल्लाह मेरी पुकार सुनकर किसी 'अपने' को भेजता। मगर उसने सरताज को भेजा, क्योंकि वह जानता था कि उस जिस्म के अंदर एक पाकीज़ा रूह है जो हर मज़हब से ऊपर उठकर एक औरत की नूरानी इज़्ज़त को पहचानती है।"
 
उनकी आवाज़ में शहद जैसी मिठास और एक गहरा यकीन था।
 
अम्मी: "आज उस सरदार ने जब मुझे उस काले अबाया से ढका, तो मुझे ऐसा लगा जैसे खुदा ने खुद अपने हाथों से मुझे अपनी पनाह में ले लिया हो। मजहब तो हम इंसानों ने बनाए हैं बेटा, ऊपर वाले के लिए तो सिर्फ नेक नीयत मायने रखती है। उसने आज साबित कर दिया कि जहाँ इंसानियत है, वहीं खुदा है… चाहे उसे अल्लाह कहो या वाहेगुरु।"
 
अम्मी की ये बातें मेरे ज़हन में एक नया तूफ़ान खड़ा कर रही थीं। मैं अपनी अम्मी को देख रहा था—वही अम्मी जो कुछ देर पहले उस नीली सिल्क की नाइटगाउन में अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए तड़प रही थीं, और अब वही अम्मी एक दार्शनिक की तरह ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच मुझे समझा रही थीं।
 
उनका वह मखमली बदन अब अबाया की तहों में शांत था, मगर उनके शब्दों ने मेरे अंदर के 'पाप' और 'पुण्य' की लकीर को और भी धुंधला कर दिया था। ट्रेन की वाइब्रेशन के साथ अम्मी का सुडौल काया मेरे कंधे से टकरा रही थी, और उस रात मुझे अहसास हुआ कि मेरी अम्मी सिर्फ खूबसूरत ही नहीं, बल्कि उनकी रूह भी उस दूधिया सफेदी की तरह ही पाक और बेदाग है।
 
अम्मी: "अब सो जा मेरे लाल... आज का दिन बहुत लंबा था। बस यह याद रखना कि इंसान की पहचान उसके लिबास या मज़हब से नहीं, उसकी नज़र की पाकीज़गी से होती है।"
 
मैंने उनकी गोद में अपना सिर रख दिया, और अम्मी के नर्म हाथों की थपकी ने मुझे एक ऐसी नींद में सुला दिया जहाँ सरताज, अल्लाह और अम्मी का वह कातिलाना हुस्न सब एक ही हकीकत का हिस्सा थे।
 
नोट : सरताज मेरी एक दूसरी कहानी का मुख्य पात्र है।
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Deepak Kapoor
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RE: अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़ - by Deepak.kapoor - 20-04-2026, 02:13 AM



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