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Adultery एक रंडी की दास्तान-The story of a corporate whore
#19
वाटिका रियल एस्टेट के विशाल, वातानुकूलित कार्यालय में, चैताली घोष अपने डेस्क पर झुकी हुई थी। उसकी उंगलियाँ कीबोर्ड पर तेजी से नाच रही थीं, एक्सेल शीट्स पर अंक उछल रहे थे। दोपहर के तीन बज रहे थे, और सूरज की तेज किरणें खिड़की से छनकर आ रही थीं, लेकिन चैताली का ध्यान सिर्फ़ मॉनिटर पर था। उसकी सांवली रंगत पसीने की हल्की-हल्की बूंदों से चमक रही थी, जो वातानुकूलन के बावजूद उसके माथे पर उभर आई थीं। आज का दिन विशेष रूप से व्यस्त था, एक नई परियोजना के लिए सीआरएम रिपोर्ट तैयार करनी थी।

अश्वेत रंग की साड़ी उसके शरीर पर कसकर लिपटी थी, जो उसकी 38-34-40 की सुडौल काया को स्पष्ट रूप से दर्शा रही थी। उसकी आँखें, जो आमतौर पर कुछ थकी हुई और बेजान लगती थीं, अब काम के बोझ से लाल थीं। उसने एक गहरी साँस ली, कुर्सी पर पीछे झुकते हुए अपनी कमर सीधी की।

"चैताली, रिपोर्ट तैयार है?" एक तेज आवाज कमरे में गूँजी। यह उसके बॉस, मिस्टर वर्मा थे, जो अपने चेहरे पर हमेशा एक सख्त भाव लिए रहते थे।

चैताली ने तुरंत सीधा होकर जवाब दिया, "बस पाँच मिनट सर, अंतिम आंकड़े दर्ज कर रही हूँ।"

मिस्टर वर्मा ने अपने चश्मे को ठीक किया। "हमें यह शाम तक बोर्ड को दिखानी है।"

"हो जाएगी सर," चैताली ने आत्मविश्वास से कहा, हालाँकि उसके अंदर एक अजीब सी घबराहट महसूस हो रही थी। यह घबराहट काम की नहीं थी, बल्कि उसके बाद की रात की थी।

शाम के छह बजे। चैताली ने कंप्यूटर बंद किया, अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और अपने पर्स में हाथ डाला। उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी, जो दिन भर की थकान के बावजूद चमकी। सहकर्मी एक-एक करके बाहर निकल रहे थे, कुछ हँसते-बोलते, कुछ अपने परिवार की कहानियाँ सुनाते हुए। चैताली ने किसी से कुछ नहीं कहा, बस एक सामान्य अलविदा कहकर लिफ्ट की ओर बढ़ गई।

लिफ्ट में नीचे उतरते हुए, उसने अपनी छवि शीशे में देखी। एक चालीस वर्षीया विधवा, जो समाज की नजरों में एक सम्मानित सीआरएम थी, लेकिन रात के अँधेरे में उसकी पहचान बदल जाती थी। उसके भीतर का द्वंद्व उसे हर पल कचोटता था, फिर भी एक अजीब सी भूख, एक अनकही प्यास उसे इस रास्ते पर खींच लाती थी।

कार्यालय से बाहर कदम रखते ही, गुरुग्राम की शाम की भीड़भाड़ और शोर ने उसे घेर लिया। ऑटो रिक्शा, बाइकें, कारें, सब एक साथ हॉर्न बजा रहे थे। हवा में धूल और पेट्रोल की मिली-जुली गंध थी। चैताली ने एक ऑटो रिक्शा पकड़ा और अपने किराए के छोटे से कमरे की ओर चल दी।

कमरे में पहुँचकर, उसने सबसे पहले अपनी साड़ी उतारी। फिर वह शीशे के सामने खड़ी हुई। उसने अपने बैग से एक छोटा सा मेकअप किट निकाला। पहले उसने अपने चेहरे पर फाउंडेशन लगाया, फिर आँखों में काजल और लाइनर खींचा। होंठों पर गहरा लाल रंग चढ़ाते हुए, उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं। यह सिर्फ़ मेकअप नहीं था, यह एक मुखौटा था जो उसे उसकी दूसरी दुनिया के लिए तैयार करता था।

उसने अपनी अलमारी से एक चमकीला टॉप और एक जींस निकाली। यह उसके काम का पोशाक था। कपड़े बदलते हुए, उसकी नजरें अपने शरीर पर ठहरीं। अभी भी कसा हुआ, अभी भी आकर्षक, लेकिन अब वह सिर्फ़ एक शरीर नहीं था, एक उत्पाद था।

रात के आठ बज चुके थे। चैताली ने अपने पर्स में कुछ पैसे और कंडोम के पैकेट रखे। बाहर निकलकर, उसने एक और ऑटो पकड़ा और अपने "कार्यस्थल" की ओर चल दी – गुरुग्राम के एक व्यस्त चौराहे का कोना।

चौराहे पर पहुँचते ही, चैताली ने अपने कंधे उचकाए। ठंडी हवा उसके खुले बालों से खेल रही थी। उसने अपनी जगह ली, एक पुरानी दीवार के पास जहाँ थोड़ी रोशनी थी, लेकिन इतनी नहीं कि हर कोई उसे स्पष्ट रूप से देख सके। लोग आते-जाते रहे, कुछ ने उसे देखा, कुछ ने अनदेखा कर दिया। उसकी निगाहें सड़कों पर दौड़ रही थीं, हर गुजरती गाड़ी को स्कैन कर रही थीं। उसके अंदर एक अजीब सी शांति थी, एक स्वीकार्यता कि यह उसकी नियति थी।

तभी, एक होंडा एक्टिवा उसके पास आकर धीमी हुई। उस पर दो लड़के बैठे थे, बीस साल के आसपास। उनके चेहरे पर अभी भी कॉलेज का भोलापन था, लेकिन उनकी आँखों में एक अलग तरह की चमक थी।
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RE: एक रंडी की दास्तान-The story of a corporate whore - by MohdIqbal - 19-04-2026, 04:17 PM



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