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Adultery है जवानी तो इश्क होना है: (हुस्न, जवानी और आशिकी)
#3
हवाई अड्डे से निकलने के बाद शहर की चकाचौंध के बीच हमारी गाड़ी एक पॉश सोसाइटी के सामने रुकी। ऊँची इमारतें, दूधिया रोशनी और ठंडी हवा का झोंका—सब कुछ वैसा नहीं था जैसा हमारा पुराना मोहल्ला था। भैया ने सामान उतारने के लिए गार्ड्स को निर्देश दिए।

गाड़ी से सारा सामान उतर चुका था। जैसे ही हम अपने नए फ्लैट के अंदर दाखिल हुए, वहां की आधुनिकता (modernity) ने सबको चकित कर दिया। मुनमुन भाभी सबसे पहले अंदर गईं। नई सोसाइटी के इस ऊंचे फ्लैट में सामान की पेटियां बिखरी पड़ी थीं। रात के 11 बज रहे थे और सफर की थकान सबकी आंखों में साफ दिख रही थी।

अविनाश भैया ने भारी मन से कहा, "आज बहुत रात हो गई है, सामान कल सुबह सेट करेंगे। अभी बस ज़रूरी चीज़ें निकाल लो और सब आराम करो।"

अनीता जी (माँ) सबसे ज़्यादा थकी हुई थीं। मुनमुन भाभी ने बड़ी कोमलता से उनका हाथ पकड़ा और उन्हें उनके कमरे तक ले गईं। "माँ जी, आप हाथ-मुँह धोकर लेट जाइए, मैं आपके लिए दूध गर्म कर देती हूँ," भाभी ने शांत स्वर में कहा। माँ ने बस थकी हुई मुस्कान दी और बेड पर बैठ गईं। भाभी का चेहरा भी थका हुआ था, उनकी आँखों के नीचे हल्के घेरे आ गए थे, पर उनकी ममता वैसी ही बनी हुई थी।

आयुषी दीदी अपने कमरे में जाकर बेड पर सीधे लेट गईं। उन्होंने अपना फोन साइड टेबल पर रख दिया था। विमान में उस अजनबी से हुई बातचीत और फोन के 'ट्रांसफर' वाले वाकये ने उन्हें थोड़ा सोच में डाल दिया था, पर अभी उनके पास सोचने की ताकत नहीं थी। उन्होंने बस अपनी आँखें मूंद लीं। कमरे की नई दीवारें और अजनबी गंध उन्हें थोड़ा असहज कर रही थी, पर नींद का गलबा ज़्यादा भारी था।

मौसी अपने कमरे की खिड़की से बाहर की पीली रोशनी देख रही थीं। वह जो कंबल वाला वाकया था, उसने उनके मन में एक अजीब सी झिझक पैदा कर दी थी। वह सोच रही थीं कि क्या उन्होंने उस अजनबी को कुछ ज़्यादा ही छूट दे दी थी? उन्होंने ठंडे पानी से अपना चेहरा धोया और आईने में खुद को देखा। उनकी सादगी अब भी वैसी ही थी, पर शहर की इस पहली रात ने उनके मन में एक अनजाना सा डर और कौतूहल भर दिया था।

मैं (आयुष) हॉल में खड़ा होकर इन सबको देख रहा था। भैया बाहर बालकनी में खड़े होकर शायद अगले दिन की प्लानिंग कर रहे थे। घर में सन्नाटा था, बस एसी की हल्की सी आवाज़ गूँज रही थी।

तभी मुनमुन भाभी रसोई से दूध का गिलास लेकर निकलीं। मुझे वहां खड़ा देखकर वे रुकीं और मेरे सिर पर हाथ रखकर बोलीं, "आयुष, तू अभी तक सोया नहीं? जा, अपने कमरे में जा। आज का दिन बहुत लंबा था।"

मैंने भाभी की ओर देखा। उनके चेहरे पर वही पुरानी सौम्यता थी। वह 'एयर होस्टेस' वाला वाकया मेरे दिमाग में अब भी एक धुंधली याद की तरह था, पर भाभी की मौजूदगी ने मुझे फिर से सुरक्षित महसूस कराया।

"जी भाभी, जा रहा हूँ," कहकर मैं अपने कमरे की ओर बढ़ा।

सब अपने-अपने कमरों में जा चुके थे। घर शांत था, पर इस शांति के पीछे एक नया अहसास था। यह शहर, यह सोसाइटी और यह नया फ्लैट—सब कुछ नया था। पुराने घर की यादें पीछे छूट गई थीं और एक नई सुबह का इंतज़ार था, जो शायद अपने साथ कुछ नए बदलाव लेकर आने वाली थी।

अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण खिड़की के पर्दों को चीरती हुई कमरे में आई, तो नींद और भारीपन का एक मिला-जुला अहसास था। नए शहर की सुबह पुराने घर जैसी नहीं थी—यहाँ पक्षियों की चहचहाहट की जगह गाड़ियों के हॉर्न और दूर से आती लिफ्ट की आवाज़ थी।

सबसे पहले मुनमुन भाभी की आँख खुली। सालों की आदत थी, सूरज ढलने से पहले जागना और घर को संभालना। उन्होंने उठकर अपनी साड़ी ठीक की और रसोई की ओर बढ़ीं। नया घर था, हर डिब्बा, हर बर्तन ढूँढना एक चुनौती थी।

अनीता जी (माँ) भी जल्दी उठ गई थीं। वे रसोई के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। भाभी ने उन्हें देखते ही मुस्कुराकर कहा— "माँ जी, सो तो ली थीं न आप? जगह बदलने पर अक्सर नींद देर से आती है।"

माँ ने एक ठंडी साँस भरी— "हाँ बहू, नींद तो आई पर बार-बार पुराने घर का आँगन याद आ जाता था। खैर, अब यही अपना बसेरा है।"
भाभी ने चाय का पतीला चढ़ाते हुए कहा— "धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा माँ जी। आप चाय पीजिये, मैं नाश्ते का कुछ प्रबंध करती हूँ।"

अविनाश भैया सुबह-सुबह ही फ़ोन पर लग गए थे। सामान के कुछ डब्बे अभी भी नीचे थे और बिजली वाले (इलेक्ट्रीशियन) को भी आना था। तभी डोरबेल बजी।

दरवाज़े पर सोसाइटी का सुपरवाइजर खड़ा था। भैया उससे बात करने लगे। तभी बगल वाले फ्लैट का दरवाज़ा खुला और एक महिला बाहर निकलीं। उन्होंने सभ्य तरीके से नमस्ते किया— "नमस्ते, मैं मिसेज खन्ना हूँ, आपकी पड़ोसन। अगर किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो बेझिझक कहियेगा।"

भैया ने शिष्टता से जवाब दिया— "जी शुक्रिया, बस अभी घर सेट कर रहे हैं।"

आयुषी दीदी और मौसी अभी भी अपने कमरों में थीं। सफर की थकान लड़कियों और बुजुर्गों पर ज़रा ज़्यादा असर करती है। मैंने (आयुष) देखा कि दीदी अपने बेड पर बैठीं अंगड़ाई ले रही थीं। उनका चेहरा सुबह की धूप में बहुत भोला लग रहा था। उन्होंने खिड़की खोली और नीचे बने स्विमिंग पूल को देखकर चौंक गईं— "अरे आयुष, देख तो सही! नीचे कितना बड़ा पूल है।"

मौसी भी बगल वाले कमरे से बाहर आईं। उनके बाल बिखरे हुए थे और आँखों में अभी भी नींद थी। उन्होंने बस इतना कहा— "बड़ी ऊंची जगह ले ली है अविनाश ने, नीचे देखने पर तो चक्कर आता है।"

नाश्ते के बाद भैया ने ऐलान किया— "चलो भाई, अब कमर कस लो। आज दोपहर तक सारा सामान अपनी जगह पर होना चाहिए।"

मज़दूर और कुछ बिजली वाले घर के अंदर आने लगे। घर में अजीब सी हलचल मच गई। मुनमुन भाभी हॉल में सोफे के कवर बिछा रही थीं, तभी एक युवा बिजली वाला (इलेक्ट्रीशियन) उनके पास आया। उसने बड़े अदब से पूछा— "मैडम जी, इस झूमर को कहाँ टाँगना है?"

भाभी ने ऊपर छत की ओर इशारा किया। झूमर काफी भारी था और ऊपर हुक तक हाथ नहीं पहुँच रहा था। वह लड़का सीढ़ी लगाकर चढ़ा, पर संतुलन बिगड़ने लगा। भाभी ने अनजाने में सीढ़ी को सहारा देने के लिए उसे थाम लिया। उस समय भाभी का पूरा ध्यान सीढ़ी पर था, पर उस लड़के की नज़रें नीचे झुककर भाभी की ओर देख रही थीं। भाभी के माथे पर मेहनत की वजह से पसीने की छोटी-छोटी बूंदें आ गई थीं और उनकी साड़ी का पल्लू काम के चक्कर में बार-बार कंधे से फिसल रहा था।

मैंने दूर खड़े होकर देखा कि वह लड़का झूमर कम और भाभी को ज़्यादा देख रहा था। पर भाभी अपनी सहजता में उसे बस हिदायत दे रही थीं— "ज़रा ध्यान से, कहीं गिर न जाओ।"

दोपहर ढलते-ढलते घर का हुलिया थोड़ा बदलने लगा था। चारों तरफ गत्ते के डिब्बे, सुतली और पैकिंग वाले कागज बिखरे हुए थे। घर को व्यवस्थित करने की इस जद्दोजहद में पसीने और धूल ने सबको बेहाल कर रखा था।

हॉल में झूमर लग चुका था, लेकिन अभी भी बहुत सा काम बाकी था। अविनाश भैया बाहर सोसाय़टी के दफ्तर गए थे कुछ कागजी कार्रवाई पूरी करने। घर में मैं (आयुष), माँ, भाभी, दीदी और मौसी थे, और साथ में वे दो-तीन बाहरी कामगार जो सामान सेट कर रहे थे।

मुनमुन भाभी रसोई में डिब्बे सेट कर रही थीं। गर्मी और थकान की वजह से उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंस लिया था ताकि काम करने में आसानी हो। तभी वही बिजली वाला लड़का, जो झूमर लगा रहा था, रसोई के पास आया और बोला— "मैडम जी, वाटर प्यूरीफायर का प्लग चेक करना है, ज़रा रास्ता देंगे?"

रसोई काफी संकरी थी। जैसे ही वह लड़का अंदर दाखिल हुआ, भाभी को एक तरफ दबकर उसे जगह देनी पड़ी। भाभी ऊपर वाले कैबिनेट में मसाले के डिब्बे रख रही थीं, जिससे उनका हाथ ऊपर की ओर तना हुआ था। उस लड़के ने झुककर प्लग ठीक करने का बहाना किया, लेकिन उसकी नज़रें तिरछी होकर भाभी के खुले हुए पेट और कमर के उस हिस्से पर टिकी थीं जो साड़ी के सरकने से साफ़ दिख रहा था। भाभी अपनी धुन में काम कर रही थीं, पर उस लड़के की सांसें तेज़ हो रही थीं। वह जानबूझकर भाभी के पैरों के पास झुककर काम को लंबा खींच रहा था।

तभी डोरबेल बजी। भैया बाहर थे, इसलिए मैंने दरवाज़ा खोला। सामने एक लम्बा, गठीला युवक खड़ा था। उसने जिम वाली टी-शर्ट पहनी थी जिससे उसके बाजू साफ़ झलक रहे थे। उसने बड़े आत्मविश्वास के साथ मुस्कुराते हुए कहा— "नमस्ते, मैं बगल वाले फ्लैट से हूँ, राहुल। भैया (अविनाश) ने मुझे कुछ सामान सेट करवाने के लिए कहा था।"

जैसे ही वह अंदर आया, घर का माहौल अचानक बदल गया। मुनमुन भाभी हॉल में आईं, उनका पल्लू अभी भी थोड़ा ढीला था। जब राहुल की नज़र भाभी पर पड़ी और भाभी की राहुल पर, तो पल भर के लिए वहां सन्नाटा छा गया।

राहुल ने भाभी की ओर देखते हुए बड़े सलीके से कहा— "भाभी जी, आप फिक्र मत कीजिये, मैं सब संभाल लूँगा। आप बस मुझे निर्देश दीजिये।"

भाभी ने एक गहरी सांस ली और बड़े धीमे स्वर में कहा— "शुक्रिया राहुल, सच में हमें मदद की बहुत ज़रूरत थी।"

दूसरी ओर, आयुषी दीदी और मौसी अपने कमरे की अलमारियां ठीक कर रही थीं। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। राहुल हाथ में कुछ जूस के गिलास लेकर खड़ा था। "नमस्ते! मम्मी ने भेजा है, आप लोग सुबह से काम में जुटे हैं, थोड़ा फ्रेश हो जाइए," उसने बड़ी सहजता से कहा।

दीदी ने मुस्कुराकर गिलास थाम लिया। राहुल अंदर आ गया और सामान उठाने में मदद करने लगा। वह दीदी से बातें कर रहा था और बार-बार उनके करीब जाकर भारी सूटकेस उठाने की पेशकश कर रहा था। मैंने गौर किया कि राहुल की नज़रें दीदी के गले और उनके झुके हुए कंधों पर फिसल रही थीं। दीदी हँस-हँसकर उससे बातें कर रही थीं, उन्हें राहुल की मदद अच्छी लग रही थी, पर शायद वे उस 'शिकारी' नज़र को नहीं देख पा रही थीं जो राहुल की आँखों में तैर रही थी।

मौसी बेड पर बैठीं चादरें तह कर रही थीं। राहुल ने एक भारी संदूक उठाते हुए मौसी की ओर देखा और बोला— "मौसी जी, आप थक गई होंगी, लाइये मैं ये ऊपर रख देता हूँ।" राहुल जब संदूक रखने के लिए मौसी के पास से गुज़रा, तो उसका हाथ 'गलती' से मौसी के घुटने से रगड़ गया। मौसी ने एक पल के लिए अपनी आँखें ऊपर उठाईं, उनके चेहरे पर एक अजीब सा संकोच और चौंकने का भाव आया, पर राहुल ने तुरंत "ओह सॉरी" कहकर बात संभाल ली। मौसी कुछ नहीं बोलीं, बस अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा और कस लिया।

मैं हॉल में बैठकर इन सब दृश्यों को देख रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ये बाहरी लोग मदद के बहाने मेरे घर की औरतों के इतने करीब कैसे पहुँच रहे हैं। वह बिजली वाला लड़का रसोई से बाहर ही नहीं निकल रहा था, और राहुल अब दीदी के कमरे में पूरी तरह जम चुका था।

तभी माँ ने आवाज़ दी— "आयुष, ज़रा भाभी की मदद कर दे रसोई में।"

मैं जैसे ही रसोई की तरफ बढ़ा, मैंने देखा कि वह बिजली वाला लड़का प्यूरीफायर ठीक कर चुका था, लेकिन वह अभी भी भाभी के पीछे खड़ा होकर उन्हें कुछ समझा रहा था। उसका शरीर भाभी से बस कुछ इंच की दूरी पर था। भाभी जैसे ही पीछे मुड़ीं, वे लगभग उससे टकराते-टकराते बचीं। वह लड़का मुस्कुराते हुए बोला— "ध्यान से मैडम जी, जगह कम है न!"

भाभी के चेहरे पर एक हल्की सी लाली छा गई। वे बस "जी, शुक्रिया" कहकर बाहर निकल आईं, पर मैंने देखा कि उनके हाथों में एक हल्की सी कंपन थी।

दोपहर के दो बज चुके थे। बाहर सूरज की तपिश तेज़ थी, लेकिन फ्लैट के अंदर उमस और धूल ने सबका बुरा हाल कर रखा था। घर अब भी पूरी तरह व्यवस्थित नहीं हुआ था, पर रहने लायक शक्ल लेने लगा था।

रसोई में मुनमुन भाभी अब अकेली थीं। वह बिजली वाला लड़का काम खत्म करके हॉल में जा चुका था, पर भाभी के मन में अब भी एक अजीब सी हलचल थी। उन्होंने एक गिलास ठंडा पानी पिया और अपनी हथेलियों को देखा, जो काम की वजह से लाल हो गई थीं। तभी उन्होंने महसूस किया कि उनकी पीठ पर पसीने की एक बूंद धीरे से सरक रही है। उन्होंने पल्लू से उसे सुखाना चाहा, पर उनके हाथ वहाँ तक नहीं पहुँच पा रहे थे।

तभी उन्होंने देखा कि वही बिजली वाला लड़का रसोई के दरवाज़े के पास खड़ा अपना औज़ार ढूँढ रहा है। उनकी नज़रें मिलीं—भाभी ने तुरंत अपनी नज़रें झुका लीं और साड़ी के पल्लू को ठीक करने का बहाना करने लगीं। उस लड़के ने कुछ कहा नहीं, बस एक गहरी साँस ली और अपना सामान उठाकर चला गया। वह पल छोटा था, पर भाभी के चेहरे पर चढ़ी लाली ने बता दिया कि वह पल कितना भारी था।

उधर आयुषी दीदी के कमरे में राहुल अभी भी मदद करवा रहा था। वह बहुत चतुराई से बात कर रहा था। "आयुषी जी, आप शहर की लड़कियों जैसी बिल्कुल नहीं लगतीं, आपकी सादगी में ही असली चमक है।" दीदी ने बस एक हल्की सी मुस्कान दी, पर उनके कान थोड़े लाल हो गए थे।

राहुल जब भारी अलमारी को दीवार से सटा रहा था, तो उसने दीदी से कहा— "ज़रा उस तरफ से हाथ लगाइएगा?" दीदी ने जैसे ही हाथ बढ़ाया, राहुल का हाथ दीदी की उंगलियों के ठीक ऊपर था। स्पर्श मात्र एक सेकंड का था, पर दीदी ने तुरंत अपना हाथ खींच लिया। राहुल ने ऐसा जताया जैसे उसे कुछ पता ही न चला हो, पर उसने अपनी नज़रों से दीदी को ऊपर से नीचे तक एक बार फिर नाप लिया। दीदी के मन में एक अजीब सा संकोच पैदा हो गया था, पर वे उसे 'दोस्ताना मदद' समझकर नज़रअंदाज़ करने की कोशिश कर रही थीं।

अनीता जी और मौसी अब हॉल के सोफे पर बैठी थीं। मौसी का ध्यान बार-बार अपने पैरों की ओर जा रहा था, जहाँ राहुल का स्पर्श हुआ था। वे बार-बार अपनी साड़ी को नीचे खींच रही थीं, मानो उस स्पर्श की याद को मिटाना चाह रही हों। मौसी ने अनीता जी से कहा— "दीदी, शहर के लोग बड़े मददगार होते हैं न? देखो, वह लड़का राहुल कितनी मेहनत कर रहा है।"

अनीता जी ने बस सिर हिलाया। उनके मन में पुराने घर की यादें थीं, पर मौसी की आँखों में इस नए शहर को लेकर एक नई चमक और थोड़ा सा खौफ, दोनों साथ-साथ तैर रहे थे।

मैं (आयुष) सब देख रहा था। मुझे राहुल का बार-बार दीदी के पास जाना और उस बिजली वाले लड़के का भाभी को छिप-छिप कर देखना बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था। पर मैं क्या कर सकता था? वे सब तो मदद ही कर रहे थे।

तभी भाभी रसोई से बाहर आईं। उनके चेहरे पर थकान साफ़ दिख रही थी। उन्होंने मुझसे कहा— "आयुष, जा देख तो भैया आए क्या? और राहुल को भी बोल दे कि अब बहुत काम हो गया, बाकी हम देख लेंगे।"

भाभी की आवाज़ में एक घबराहट थी, जो शायद उन्होंने खुद भी महसूस की थी। वे अब और अधिक 'मदद' लेने के पक्ष में नहीं थीं, क्योंकि अजनबियों की वह करीबी अब धीरे-धीरे मर्यादा की सीमाओं को छूने लगी थी।

शाम के पाँच बज रहे थे। खिड़की से आती धूप अब सुनहरी पड़ चुकी थी। घर का काफी सामान अपनी जगह पहुँच चुका था, पर थकान अब चेहरों पर साफ झलक रही थी। राहुल अभी भी वहीं था, वह थकावट के बावजूद जाने का नाम नहीं ले रहा था।

मुनमुन भाभी रसोई में चाय बनाने गईं। सुबह से काम करते-करते उनके बाल बिखर गए थे और माथे पर पसीने की बारीक बूंदें फिर से चमकने लगी थीं। तभी राहुल रसोई के दरवाज़े पर आकर रुक गया।

"भाभी जी, एक गिलास पानी मिल सकता है? बड़ी प्यास लगी है।" राहुल की आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन था।

भाभी ने जैसे ही पलटकर देखा, राहुल ठीक उनके पीछे खड़ा था। रसोई में जगह कम थी, और राहुल का कद ऊँचा था। भाभी ने घबराकर एक गिलास पानी भरा और उसकी ओर बढ़ाया। जब राहुल ने गिलास पकड़ा, तो उसकी उँगलियों का स्पर्श भाभी के हाथ से थोड़ा ज़्यादा देर तक रहा। भाभी ने तुरंत अपना हाथ खींच लिया, जिससे पानी की कुछ बूंदें उनकी साड़ी के पल्लू और राहुल के हाथ पर गिर गईं।

"ओह, माफ़ कीजियेगा..." राहुल ने मुस्कुराते हुए कहा। उसकी नज़रें भाभी के चेहरे पर टिकी थीं, जो संकोच से गुलाबी पड़ गया था। भाभी ने बस एक हल्की सी गर्दन हिलाई और चाय के कप सेट करने में व्यस्त हो गईं। वह स्पर्श छोटा था, पर भाभी को अपने हाथ में अब भी एक अजीब सी सिहरन महसूस हो रही थी।

हॉल में आयुषी दीदी और मौसी सोफे पर बैठी थीं। राहुल पानी पीकर वापस आया और उनके सामने वाले स्टूल पर बैठ गया। दीदी ने राहुल की ओर देखते हुए कहा— "राहुल, तुमने आज बहुत मदद की, सच में हम अकेले नहीं कर पाते।"

राहुल ने दीदी की आँखों में आँखें डालकर कहा— "पड़ोसी ही पड़ोसी के काम न आए, तो फिर क्या फायदा? और वैसे भी, आपकी मदद करने में थकान का पता ही नहीं चला।" दीदी ने अपनी नज़रें झुका लीं। उन्हें राहुल की ये बेबाकी थोड़ी अजीब लग रही थी, पर साथ ही एक अनजाना सा रोमांच भी महसूस हो रहा था।

मौसी चुपचाप यह सब देख रही थीं। उन्हें राहुल का बार-बार घर में रुकना थोड़ा खटक रहा था, पर उसकी मदद को नज़रअंदाज़ करना भी मुश्किल था। तभी मौसी के पैर में हल्का सा खिंचाव (cramp) आया और वे धीरे से कराह उठीं। दीदी घबरा गईं— "क्या हुआ मौसी?"

"कुछ नहीं बेटा, बस नस चढ़ गई शायद," मौसी ने पैर मलते हुए कहा। राहुल तुरंत आगे बढ़ा— "मौसी जी, मैं दबा दूँ? मुझे एक्यूप्रेशर का थोड़ा पता है।" मौसी ने हड़बड़ाकर अपना पैर पीछे खींच लिया और साड़ी ठीक करते हुए बोलीं— "अरे नहीं-नहीं बेटा, ठीक है, तू बैठ।" मौसी के इनकार में एक डर था, पर राहुल की नज़रों में अब भी वही बेतकल्लुफी थी।

मैं (आयुष) कोने में खड़ा होकर चाय के कप उठा रहा था। मैंने देखा कि भाभी रसोई से बाहर आईं, तो उनकी साड़ी का वह हिस्सा जहाँ पानी गिरा था, शरीर से चिपका हुआ था। वे बार-बार उसे ठीक करने की कोशिश कर रही थीं, पर राहुल की नज़रें वहीं जमी हुई थीं।

चाय पीते वक्त भी घर में एक भारी सन्नाटा था। कोई कुछ बोल नहीं रहा था, पर हर किसी के मन में कुछ न कुछ चल रहा था। दीदी बार-बार अपने फोन को देख रही थीं, शायद उस अजनबी लड़के का कोई मैसेज आया हो। मौसी संकोच में डूबी हुई थीं, और भाभी की नज़रें फर्श से उठ ही नहीं रही थीं।

राहुल ने चाय का कप मेज़ पर रखा और उठते हुए बोला— "ठीक है, अब मैं चलता हूँ। रात को अगर किसी और चीज़ की ज़रूरत हो, तो मेरा फ्लैट ठीक बगल में ही है। झिझकियेगा मत।"

उसके जाने के बाद घर में जैसे हवा फिर से बहने लगी। पर वह जो एक 'अजनबियत' और 'करीबी' का मिला-जुला अहसास राहुल छोड़ गया था, वह घर की हवाओं में घुल चुका था।

दिन भर की भागदौड़ और राहुल के जाने के बाद घर में फिर से वही शांति छा गई थी, जो एक नई जगह पर अक्सर महसूस होती है। रात के नौ बज रहे थे। सामान लगभग लग चुका था, पर घर के कोनों में अभी भी कुछ खालीपन बाकी था।

आयुषी दीदी अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी थीं। बाहर सोसायटी की ऊंची इमारतों की रोशनियाँ टिमटिमा रही थीं। उनके हाथ में उनका फोन था। वह बार-बार उसे खोलतीं और फिर बंद कर देतीं। वह जो अजनबी लड़का विमान में मिला था, उसने जो डेटा ट्रांसफर किया था, उसमें सिर्फ सीरीज नहीं थी, बल्कि उसका नाम और एक छोटा सा 'नोट' भी था। दीदी उसे पढ़ रही थीं और उनके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो वह खुद से भी छिपाना चाह रही थीं। वह अजनबी अब उनके ख्यालों में अपनी जगह बना रहा था, पर दीदी अभी भी संकोच की दीवार के पीछे थीं।

मुनमुन भाभी कमरे में अलमारी सेट कर रही थीं। अविनाश भैया लैपटॉप पर कुछ ऑफिस का काम कर रहे थे। भाभी का ध्यान बार-बार अपने उस हाथ पर जा रहा था जहाँ राहुल का स्पर्श हुआ था। उन्हें राहुल की वह बेबाक नज़रें याद आ रही थीं। उन्होंने आईने में खुद को देखा—चेहरे पर थकान थी, पर न जाने क्यों, उस अजनबी की तारीफ ने उनके भीतर एक दबी हुई स्त्री को जगा दिया था। वह अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए गहरी सोच में डूबी थीं। क्या वह स्पर्श सच में अनजाने में हुआ था या उसमें कोई और बात थी? यह सवाल उनके मन में एक सिहरन पैदा कर रहा था।

मौसी अपने बिस्तर पर लेटी थीं, पर नींद उनकी आँखों से कोसों दूर थी। वह राहुल का वह "मौसी जी, मैं दबा दूँ?" कहना और उनके पैर की ओर बढ़ता उसका हाथ बार-बार उनकी बंद आँखों के सामने आ रहा था। सालों से एकाकी जीवन जी रही मौसी के लिए किसी जवान लड़के का ऐसा जुड़ाव अजीब और डरावना, पर कहीं न कहीं चौंकाने वाला भी था। वे अपनी साड़ी को और कसकर ओढ़ लेतीं, मानो खुद को उन ख्यालों से बचाना चाह रही हों।

मैं (आयुष) हॉल में सोफे पर लेटा हुआ था। घर के हर कमरे से आती मद्धम रोशनी और खामोशी मुझे बहुत कुछ कह रही थी। मुझे महसूस हो रहा था कि घर की औरतें आज कुछ बदली-बदली सी हैं। वह पुराना शहर और पुराने घर की मर्यादा यहाँ आकर थोड़ी सी शिथिल (loose) पड़ने लगी थी।

तभी मैंने देखा कि भाभी रसोई की ओर जा रही हैं, शायद पानी पीने। उनके चलने के अंदाज़ में एक अजीब सा ठहराव था। उसी समय बालकनी की ओर से राहुल के फ्लैट से संगीत की धीमी आवाज़ सुनाई दी। वह धुन बहुत ही मदहोश कर देने वाली थी। भाभी रसोई की खिड़की के पास रुक गईं और कुछ पल के लिए उस संगीत को सुनने लगीं।

अचानक भैया ने आवाज़ दी— "मुनमुन, वो मेरी नीली फ़ाइल कहाँ रखी है?"

भाभी चौंककर ख्यालों से बाहर आईं और हड़बड़ाहट में बोलीं— "जी, अभी लाई!"
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RE: है जवानी तो इश्क होना है: (हुस्न, जवानी और आशिकी) - by आपकी रायली - 18-04-2026, 07:28 PM



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