5 hours ago
"बताओ ना,कैसे सोचा ये सब?" मैत्री की रचना.
"बताते हैं।" राजासाहब बिस्तर पे उसकी बगल मे बैठ गये और उसे बाहों मे भर उसकी आँखो मे झाँकने लगे।
"तुम्हे वो दिन याद है, जब हम तुम्हारे मायके से लौटने के बाद अपने वकील से मिलने शहर गये थे?" उन्होने अपना एक हाथ उसकी ड्रेस मे घुसा दिया और उसकी जांघे सहलाने लगे। मेनका भी मचल गयी और उनसे और सताते हुए उनकी टी-शर्ट मे हाथ घुसा उनकी पीठ पे फेरने लगी।
"हाँ।"
"वकील के साथ जैसे ही हमारी मीटिंग ख़त्म हुई कि हुमारे दोस्त दुष्यंत का फोन आया। दुष्यंत एक डीटेक्टिव एजेन्सी चलाता है और हमारे कहने पे वो विश्वा की मौत की छानबीन कर रहा था। उसने उस आदमी को ढूंढ निकाला था जिसपे उसे और हमे विश्वा का कातिल होने का शक़ था।" मेनका की ड्रेस उसकी कमर तक उठ चुकी थी और राजासाहब का हाथ अब उसकी पेंटी मे घुस उसकी गांड मसल रहा था।
मेनका ने अपनी टांग उठा कर उनकी टांग पे रख दी तो राजासाहब ने भी अपनी टांग उसकी टांगो के बीच घुसा उसकी गांड को भीचते हुए अपने से इस तरह सटा लिया कि उनका लंड सीधा उसकी चूत पे रगड़ खाने लगा। मेनका ने उनकी शर्ट निकाल दी और मस्त हो उनके बालो भरे सीने को चूमने-सहलाने लगी;
"फिर क्या हुआ?"
"हमने किसी तरह से उस इंसान को अपने क़ब्ज़े मे इस तरह ले लिया कि दुष्यंत को पता भी ना चला।" राजासाहब ने अपना हाथ उसकी पेंटी मे से निकाल कर उसकी ड्रेस का ज़िप खोल दिया और उसमे हाथ घुसा उसकी पीठ सहलाने लगे और बताने लगे कि कैसे उन्होने कल्लन को पकड़ा और उस से सारी बात उगलवाई।
इतने दीनो बाद अपने आशिक़ से ऐसी बेताकल्लूफ़ी से मिलने के कारण मेनका अब पूरी तरह से गरम हो चुकी थी। उसने अपने ससुर की पॅंट निकाल दी और खुद ही खड़ी हो कर अपनी ड्रेस और पेंटी अपने जिस्म से अलग कर दी। फिर बेड पे चढ़ि और राजासाहब को धकेल कर लिटा दिया और फिर झुक गयी उनके लंड पे।
"एयेए....आअहह!" राजासाहब की आँखे मज़े मे बंद हो गयी और वो अपनी बहू की जीभ का लुत्फ़ उठाने लगे। मैत्री द्वारा लिखित प्रस्तुती.
"मुझे समझ मे नही आ रहा था कि मैं क्या करू? दिल तो कर रहा था कि कल्लन,जब्बार और मलिका को तुरंत मौत के घाट उतार दे। पर ऐसा करने से हमे सज़ा होती और मैं तुम से दूर हो जाता।" राजासाहब अपनी लंड चुस्ती बहू के बाल सहला रहे थे।
"इसी पशोपेश मे ड्राइव करते मैं कल्लन को बंदी बना कर राजपुरा लौट रहे था, जब उसने गाड़ी से भागने की कोशिश की और हमारा एक्सिडेंट हो गया और हम कार सहित खाई मे जा गिरे।" मेनका उनके लंड और आंडो पे पूरे जोश के साथ जुटी उनकी बात सुन रही थी।
"भगवान की दया से हमे थोड़ी खरोन्चे ही आई थी और कोई गहरी चोट नही पर कल्लन मर चुका था। तभी हमारे दिमाग़ मे एक तरकीब आई। हमने कल्लन को अपने कपड़े पहनाए और उसे कार मे बिठा उसमे आग लगा दी और ध्यान रखा कि उसका चेहरा पूरी तरह से जल जाए। हमने अपना ब्रेसलेट उसे पहना दिया ताकि जिस से तुम उसकी शिनाख्त हमारे नाम की कर दो।" मेनका ने लंड छोड़ उनकी तरफ भारी आँखो से देखा तो राजासाहब ने उसे खीच कर अपने उपर ले लिया और बाहो मे भर उसके चेहरे पे किसो की बैछार कर दी।
"मुझे माफ़ कर देना। मैंने तुम्हे बहुत तकलीफ़ पहुँचाई ना उस समय?"
"कोई बात नही। अब तो सब ठीक है।" उन्होने उसके आँसू अपने होंठो से साफ कर दिए तो मेनका मुस्कुरा दी।
"पर उन कामीनो तक कैसे पहुँचे?" अपनी भारी छातिया उनके सीने पे दबाए हुए उसने उनके चेहरे को अपने हाथों मे ले चूम लिया।
"मैं कुछ दीनो के लिए हमारे एक घर मे छुप गया और दाढ़ी-मूँछ बढ़ा एक सरदार का भेस ले लिया। फिर जब्बार की हर हरकतों पे निगाह रखने लगे और एक दिन मौका देख उस से मुलाकात कर ली।"
राजासाहब उसे बाहों मे भर करवट ले उसके उपर सवार हो गये और उसकी मस्त,कसी हुई बड़ी चूचियों से खेलने लगे। उसकी चूचियो को दबाने,मसलने,चूमने,चाटने और चूसने के बीच उन्होने उसे बताया कि कैसे उन्होने भाड़े के गुंडों से जब्बार और मलिका पे हमला करवाया और फिर उनका विश्वास जीत लिया और कैसे जब्बार उन्हे मिल्स खरीदने राजपुरा ले गया। मैत्री रचित और फनलव की मदद से आप तक पंहुचा.
वो नीचे उतर उसकी चूत चाटने लगे, "उसके बाद तो तुम्हे पता ही है कि हम गुप्त रास्ते से महल मे घुस कर तुमसे मिलने आए और ये प्लान बनाया कि सारी इल्लीगल प्रॉपर्टी और पैसों को इकट्ठा कर यहा बहामास मे सेट्ल हो जाएँ और तुम अपनी वसीयत मे अपनी मौत के बाद सबकुछ दान कर दो,ताकि हमने तुम्हे जो वादा किया था वो भी पूरा हो जाए।"
"ह्म्म्म....!" मेनका उनके सर को अपनी चूत पे दबाती अपनी कमर उचकती बस इतना ही कह पाई।
"मेनका,मेरी जान! हमारा मक़सद था अपनी बची हुई ज़िंदगी तुम्हारी बाहों मे गुज़ारना और इसीलिए हमने तुम्हारे ज़रिए जब्बार को ये धोखा दिया कि तुम मिल्स उसे बेचोगी जबकि तुमने सपरू साहब के साथ डील कर ली थी। हमारे महल मे आग लगाके मलिका और उसे मौत की नींद सुलाने से हमारा बदला तो पूरा हुआ ही,साथ मे मलिका की जाली लाश मिलने से सब ने यही समझा कि वो तुम हो।" मेनका अब तक 3 बार झड़ चुकी थी। अपने प्रेमी की हरकते ही नही उसकी बातें-जो ये ज़ाहिर करती थी कि वो उसे कितना चाहता है और केवल उसके साथ चैन से ज़िंदगी बिताने के लिए उसने इतना जोखिम उठाया-भी उसे मस्त किए जा रही थी। मैत्री रचित और फनलवर के सहकार से.
उसने हाथ बढ़ा राजासाहब का सर अपनी चूत से अलग किया और खींच कर अपने उपर आने का इशारा किया। राजासाहब फ़ौरन उसके उपर आ गये तो उसने अपनी टांगे फैला दी, "उन पैसों से यहा हमने काफ़ी प्रॉपर्टी खरीदी है,जानेमन। दुनिया के लिए राजा यशवीर और मेनका मर चुके हैं पर अनिता और विजय के नाम से आज हम अपनी नयी ज़िंदगी का यहा इस खूबसूरत जगह मे आगाज़ करते हैं।"
और उन्होने अपना लंड उसकी गीली चूत मे पेल दिया,मेनका ने भी अपनी टांगे और बाहें उनके जिस्म के गिर्द लपेट दी और दोनो प्यार के समंदर मे गोते लगाने लगे।
तो दोस्तो इस तरह दोनो ससुर बहू अब एक पति-पत्नी बनकर अपनी जिंदगी गुजारने लगे। समय के पैहो को कौन रोक सकता है?
समय के साथ मेनका ने 4 बच्चो को जन्म दिया दो बेटे और दो बेटी और सभी एक सुखमय,शांतिमय और आनंदित जीवन गुजार रहे है।
आप सब का बहोत बहोत धन्यवाद की आपने इस कहानी को शुरू से अंत तक पढ़ी। कुछ लोगो ने कोमेंट कर के सराहा भी।
चलिए अब आप इस कहानी की लेखिका "मैत्री " को अगली कहानी शुरू करू तब तक के लिए जाने की आज्ञा चाहूंगी।
जल्द ही नयी कहानी शुरू करुँगी।
मिलते है एक नयी मजेदार कहानी में। तब तक के लिए शुक्रिया, बाय बाय।
जय भारत.
ध एंड ************* समाप्त........................
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"बताते हैं।" राजासाहब बिस्तर पे उसकी बगल मे बैठ गये और उसे बाहों मे भर उसकी आँखो मे झाँकने लगे।
"तुम्हे वो दिन याद है, जब हम तुम्हारे मायके से लौटने के बाद अपने वकील से मिलने शहर गये थे?" उन्होने अपना एक हाथ उसकी ड्रेस मे घुसा दिया और उसकी जांघे सहलाने लगे। मेनका भी मचल गयी और उनसे और सताते हुए उनकी टी-शर्ट मे हाथ घुसा उनकी पीठ पे फेरने लगी।
"हाँ।"
"वकील के साथ जैसे ही हमारी मीटिंग ख़त्म हुई कि हुमारे दोस्त दुष्यंत का फोन आया। दुष्यंत एक डीटेक्टिव एजेन्सी चलाता है और हमारे कहने पे वो विश्वा की मौत की छानबीन कर रहा था। उसने उस आदमी को ढूंढ निकाला था जिसपे उसे और हमे विश्वा का कातिल होने का शक़ था।" मेनका की ड्रेस उसकी कमर तक उठ चुकी थी और राजासाहब का हाथ अब उसकी पेंटी मे घुस उसकी गांड मसल रहा था।
मेनका ने अपनी टांग उठा कर उनकी टांग पे रख दी तो राजासाहब ने भी अपनी टांग उसकी टांगो के बीच घुसा उसकी गांड को भीचते हुए अपने से इस तरह सटा लिया कि उनका लंड सीधा उसकी चूत पे रगड़ खाने लगा। मेनका ने उनकी शर्ट निकाल दी और मस्त हो उनके बालो भरे सीने को चूमने-सहलाने लगी;
"फिर क्या हुआ?"
"हमने किसी तरह से उस इंसान को अपने क़ब्ज़े मे इस तरह ले लिया कि दुष्यंत को पता भी ना चला।" राजासाहब ने अपना हाथ उसकी पेंटी मे से निकाल कर उसकी ड्रेस का ज़िप खोल दिया और उसमे हाथ घुसा उसकी पीठ सहलाने लगे और बताने लगे कि कैसे उन्होने कल्लन को पकड़ा और उस से सारी बात उगलवाई।
इतने दीनो बाद अपने आशिक़ से ऐसी बेताकल्लूफ़ी से मिलने के कारण मेनका अब पूरी तरह से गरम हो चुकी थी। उसने अपने ससुर की पॅंट निकाल दी और खुद ही खड़ी हो कर अपनी ड्रेस और पेंटी अपने जिस्म से अलग कर दी। फिर बेड पे चढ़ि और राजासाहब को धकेल कर लिटा दिया और फिर झुक गयी उनके लंड पे।
"एयेए....आअहह!" राजासाहब की आँखे मज़े मे बंद हो गयी और वो अपनी बहू की जीभ का लुत्फ़ उठाने लगे। मैत्री द्वारा लिखित प्रस्तुती.
"मुझे समझ मे नही आ रहा था कि मैं क्या करू? दिल तो कर रहा था कि कल्लन,जब्बार और मलिका को तुरंत मौत के घाट उतार दे। पर ऐसा करने से हमे सज़ा होती और मैं तुम से दूर हो जाता।" राजासाहब अपनी लंड चुस्ती बहू के बाल सहला रहे थे।
"इसी पशोपेश मे ड्राइव करते मैं कल्लन को बंदी बना कर राजपुरा लौट रहे था, जब उसने गाड़ी से भागने की कोशिश की और हमारा एक्सिडेंट हो गया और हम कार सहित खाई मे जा गिरे।" मेनका उनके लंड और आंडो पे पूरे जोश के साथ जुटी उनकी बात सुन रही थी।
"भगवान की दया से हमे थोड़ी खरोन्चे ही आई थी और कोई गहरी चोट नही पर कल्लन मर चुका था। तभी हमारे दिमाग़ मे एक तरकीब आई। हमने कल्लन को अपने कपड़े पहनाए और उसे कार मे बिठा उसमे आग लगा दी और ध्यान रखा कि उसका चेहरा पूरी तरह से जल जाए। हमने अपना ब्रेसलेट उसे पहना दिया ताकि जिस से तुम उसकी शिनाख्त हमारे नाम की कर दो।" मेनका ने लंड छोड़ उनकी तरफ भारी आँखो से देखा तो राजासाहब ने उसे खीच कर अपने उपर ले लिया और बाहो मे भर उसके चेहरे पे किसो की बैछार कर दी।
"मुझे माफ़ कर देना। मैंने तुम्हे बहुत तकलीफ़ पहुँचाई ना उस समय?"
"कोई बात नही। अब तो सब ठीक है।" उन्होने उसके आँसू अपने होंठो से साफ कर दिए तो मेनका मुस्कुरा दी।
"पर उन कामीनो तक कैसे पहुँचे?" अपनी भारी छातिया उनके सीने पे दबाए हुए उसने उनके चेहरे को अपने हाथों मे ले चूम लिया।
"मैं कुछ दीनो के लिए हमारे एक घर मे छुप गया और दाढ़ी-मूँछ बढ़ा एक सरदार का भेस ले लिया। फिर जब्बार की हर हरकतों पे निगाह रखने लगे और एक दिन मौका देख उस से मुलाकात कर ली।"
राजासाहब उसे बाहों मे भर करवट ले उसके उपर सवार हो गये और उसकी मस्त,कसी हुई बड़ी चूचियों से खेलने लगे। उसकी चूचियो को दबाने,मसलने,चूमने,चाटने और चूसने के बीच उन्होने उसे बताया कि कैसे उन्होने भाड़े के गुंडों से जब्बार और मलिका पे हमला करवाया और फिर उनका विश्वास जीत लिया और कैसे जब्बार उन्हे मिल्स खरीदने राजपुरा ले गया। मैत्री रचित और फनलव की मदद से आप तक पंहुचा.
वो नीचे उतर उसकी चूत चाटने लगे, "उसके बाद तो तुम्हे पता ही है कि हम गुप्त रास्ते से महल मे घुस कर तुमसे मिलने आए और ये प्लान बनाया कि सारी इल्लीगल प्रॉपर्टी और पैसों को इकट्ठा कर यहा बहामास मे सेट्ल हो जाएँ और तुम अपनी वसीयत मे अपनी मौत के बाद सबकुछ दान कर दो,ताकि हमने तुम्हे जो वादा किया था वो भी पूरा हो जाए।"
"ह्म्म्म....!" मेनका उनके सर को अपनी चूत पे दबाती अपनी कमर उचकती बस इतना ही कह पाई।
"मेनका,मेरी जान! हमारा मक़सद था अपनी बची हुई ज़िंदगी तुम्हारी बाहों मे गुज़ारना और इसीलिए हमने तुम्हारे ज़रिए जब्बार को ये धोखा दिया कि तुम मिल्स उसे बेचोगी जबकि तुमने सपरू साहब के साथ डील कर ली थी। हमारे महल मे आग लगाके मलिका और उसे मौत की नींद सुलाने से हमारा बदला तो पूरा हुआ ही,साथ मे मलिका की जाली लाश मिलने से सब ने यही समझा कि वो तुम हो।" मेनका अब तक 3 बार झड़ चुकी थी। अपने प्रेमी की हरकते ही नही उसकी बातें-जो ये ज़ाहिर करती थी कि वो उसे कितना चाहता है और केवल उसके साथ चैन से ज़िंदगी बिताने के लिए उसने इतना जोखिम उठाया-भी उसे मस्त किए जा रही थी। मैत्री रचित और फनलवर के सहकार से.
उसने हाथ बढ़ा राजासाहब का सर अपनी चूत से अलग किया और खींच कर अपने उपर आने का इशारा किया। राजासाहब फ़ौरन उसके उपर आ गये तो उसने अपनी टांगे फैला दी, "उन पैसों से यहा हमने काफ़ी प्रॉपर्टी खरीदी है,जानेमन। दुनिया के लिए राजा यशवीर और मेनका मर चुके हैं पर अनिता और विजय के नाम से आज हम अपनी नयी ज़िंदगी का यहा इस खूबसूरत जगह मे आगाज़ करते हैं।"
और उन्होने अपना लंड उसकी गीली चूत मे पेल दिया,मेनका ने भी अपनी टांगे और बाहें उनके जिस्म के गिर्द लपेट दी और दोनो प्यार के समंदर मे गोते लगाने लगे।
तो दोस्तो इस तरह दोनो ससुर बहू अब एक पति-पत्नी बनकर अपनी जिंदगी गुजारने लगे। समय के पैहो को कौन रोक सकता है?
समय के साथ मेनका ने 4 बच्चो को जन्म दिया दो बेटे और दो बेटी और सभी एक सुखमय,शांतिमय और आनंदित जीवन गुजार रहे है।
आप सब का बहोत बहोत धन्यवाद की आपने इस कहानी को शुरू से अंत तक पढ़ी। कुछ लोगो ने कोमेंट कर के सराहा भी।
चलिए अब आप इस कहानी की लेखिका "मैत्री " को अगली कहानी शुरू करू तब तक के लिए जाने की आज्ञा चाहूंगी।
जल्द ही नयी कहानी शुरू करुँगी।
मिलते है एक नयी मजेदार कहानी में। तब तक के लिए शुक्रिया, बाय बाय।
जय भारत.
ध एंड ************* समाप्त........................
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