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Adultery है जवानी तो इश्क होना है: (हुस्न, जवानी और आशिकी)
#1
अनीता जी ने म्लान स्वर में कहा— "अरी मुनमुन बेटा, तू क्यों इन झंझटों में पड़ रही है? यहाँ बैठ। अविनाश ने मज़दूरों को बुला भेजा है, वे आकर यह सब असबाब नीचे खड़े ट्रक में लाद देंगे।"

मुनमुन चुपचाप अपनी सास, जो उसके लिए माँ के ही साये के समान थीं, उनके पास सोफे पर बैठ गई। अचानक उसकी दृष्टि अनीता जी के मुखमंडल पर पड़ी। वह चौंक उठी। सासू माँ की पलकें भीगी हुई थीं और आँखों के कोरों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी।

मुनमुन ने व्याकुल होकर पूछा— "अरे माँ जी! यह क्या? आपकी आँखों में आँसू? कुशल तो है?"

अनीता जी ने एक ठंडी साँस भरी और रुँधे हुए गले से बोलीं— "कुछ नहीं बहू, बस तुझे देखती हूँ तो हृदय भर आता है। बड़े अरमानों और मान-सम्मान के साथ तुझे इस घर की लक्ष्मी बनाकर लाई थी, पर क्या जानती थी कि भाग्य हमें ऐसे दिन दिखाएगा। तुझे इस कच्ची उम्र में इतनी कठिनाइयां झेलनी पड़ रही हैं... मुझे क्षमा कर देना बेटा!"

मुनमुन ने उनके होंठों पर हाथ रख दिया और मृदु स्वर में कहा— "बस माँ जी, बस! आपने तो मुझे कभी अपनी बेटी समझा ही नहीं।"

अनीता जी अचकचाकर बोलीं— "अरे नहीं बेटा! यह तू क्या कह रही है?"

मुनमुन ने मुस्कराते हुए उनकी आँखें पोंछीं और बड़े अधिकार से कहा— "और नहीं तो क्या? यदि अविनाश आपका बेटा है, तो क्या मैं आपकी बेटी नहीं? यह घर जितना उनका है, उतना ही मेरा भी है। विपत्ति के समय यदि एक बेटी अपनी माँ की ढाल न बने, तो धिक्कार है ऐसे संबंध पर। माँ जी, जो अनहोनी होनी थी, वह हो चुकी। अब अतीत को विदा कीजिए, आगे सब मंगल ही होगा।"

अनीता जी का वात्सल्य उमड़ पड़ा। उन्होंने गद्गद होकर कहा— "जिसकी बहू इतनी सुशील और संस्कारी हो, उसे भला किस बात का दुख? सच तो यह है कि तेरे ससुर के स्वर्गवास के बाद तूने ही इस टूटते हुए घर को संभाला है, वरना हम तो कब के बिखर गए होते।"

मुनमुन ने उनके कंधे थपथपाए— "ओहो माँ! अब पुरानी बातों की पोटली बाँधकर एक कोने में रख दीजिए। आने वाले सुनहरे भविष्य का हँसकर स्वागत कीजिए।"
तभी किवाड़ पर किसी ने दस्तक दी— 'खट-खट!'

अनीता जी ने झटपट अपने आँसू पोंछ डाले और बोलीं— "लगता है मज़दूर आ गए। चलो, यह सामान भी नीचे भिजवाना है।"

मुनमुन उठी— "जी माँ जी, मैं देखती हूँ।"

मुनमुन ने जैसे ही द्वार खोला, सामने घर का दुलारा और छोटा बेटा आयुष खड़ा था। उसे देखते ही मुनमुन के चेहरे पर रौनक आ गई। आयुष ने कृत्रिम क्रोध दिखाते हुए कहा— "अरे भाभी! कितनी देर लगाती हैं आप? मैं कब से द्वार पीट रहा हूँ!"

"अरे मेरा बच्चा!" मुनमुन ने वात्सल्य भाव से उसके गाल थपथपाए। "बता, वे लोग आ गए क्या?"

"हाँ भाभी, वही बताने आया हूँ। मज़दूर ऊपर ही आ रहे हैं। और अभी भैया का भी तार (फ़ोन) आया था, वे लोग भी गंतव्य के लिए निकल चुके हैं। अब हमें भी अविलंब प्रस्थान करना चाहिए।"

मुनमुन ने भीतर जाकर अनीता जी को सूचित किया— "माँ जी, आयुष आया है। अविनाश जी का भी संदेश आ गया है, वे निकल चुके हैं। चलिए, अब हमारी बारी है।"

अनीता जी ने मूक सहमति में सिर हिलाया और भारी कदमों से हॉल के बाहर निकलीं। द्वार की देहरी लांघते समय उन्होंने एक बार मुड़कर उस सूने घर को देखा। उस घर की ईंट-ईंट में उनके जीवन की स्मृतियाँ रची-बसी थीं। आज एक युग का अंत हो रहा था और वह घर हमेशा के लिए पीछे छूटा जा रहा था।

सीढ़ियों पर मज़दूरों की पदचाप सुनाई दी। मुनमुन ने आँखों के इशारे से आयुष को समझा दिया कि वह सब देख लेगी। उसने मज़दूरों को शेष सामान के विषय में निर्देश दिए और ताकीद की कि सारा काम होने के बाद घर को ठीक से ताला लगा दें।

नीचे कार खड़ी थी। दो बड़े ट्रकों में गृहस्थी का सारा सामान लद चुका था। मुनमुन ने एक कुशल गृहिणी की भाँति ड्राइवरों को मार्ग और सावधानी के निर्देश दिए।

अंततः, वह पुरानी यादों को पीछे छोड़, नए जीवन की खोज में हवाई अड्डे की ओर प्रस्थान कर गए।


हवाई अड्डे के शोर-शराबे के बीच पहुँचते ही मुनमुन ने गृहस्थी की कमान अपने हाथ में ले ली। उसने मुझे (आयुष) माँ और असबाब का ध्यान रखने की ताकीद की और स्वयं भीड़ में अविनाश भैया को खोजने निकल पड़ी। वह फ़ोन कान से सटाए, नज़रों से जनसमूह को खंगालती हुई आगे बढ़ गई। इधर मैं और माँ बाहर खड़े सामान की रखवाली कर रहे थे।

मैंने गौर से माँ की ओर देखा; उनका चेहरा किसी मुरझाए हुए पुष्प के समान निस्तेज था। नीले रंग की साड़ी, गले में मोतियों का हार और हाथों में पड़े वही पुराने कंगन—यह सब उनके व्यक्तित्व को एक गरिमा तो दे रहे थे, पर आज उनके भीतर का उत्साह जैसे कहीं खो गया था। कुछ समय की प्रतीक्षा के बाद, मुनमुन भाभी आती दिखाई दीं। उनके साथ भैया भी थे। भैया ने आते ही बड़ी तत्परता से सारा सामान ठीक करवाया और आगे की व्यवस्था की। अब हम सभी हवाई अड्डे के भीतर प्रवेश कर चुके थे।

चेकिंग और बोर्डिंग पास की औपचारिकताओं के बाद जब हम प्रतीक्षालय (वेटिंग एरिया) में पहुँचे, तो दूर से ही मुझे अपनी बड़ी बहन आयुषी दीदी दिखाई दीं। मुझे देखते ही उनके चेहरे पर वसंत खिल उठा। वे दौड़कर आईं और मुझे गले लगा लिया, मानो सदियों बाद कोई बिछड़ा हुआ साथी मिला हो। माँ के पास जाकर उन्होंने बड़े स्नेह से उनका कुशल-क्षेम पूछा।

तभी माँ ने इधर-उधर देखते हुए भैया से पूछा— "अरे अविनाश, वंदना कहाँ है?" अविनाश भैया ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया— "मम्मी, मौसी प्रसाधन (वॉशरूम) गई हैं, अभी आती होंगी।"

नाना-नानी के देहावसान के बाद मौसी हमारे ही परिवार का अटूट हिस्सा बन गई थीं। कुंडली के किसी दोष ने उनके विवाह के मार्ग में ऐसी बाधा डाली थी कि वे आज तक अविवाहित थीं, पर उनके स्वभाव में वही चिर-परिचित वात्सल्य और ममता थी। तभी हवाई जहाज़ की रवानगी की घोषणा हुई। मैंने देखा, मौसी दूर से चली आ रही थीं। मैं दौड़कर उनके पास पहुँचा। मुझे देखते ही उनकी आँखों में चमक आ गई। पीछे खड़े पूरे परिवार को देखकर वे निश्चिंत हुईं और फिर हम सब कतार में लग गए।

मौसी ने मेरा हाथ बड़े अधिकार से थाम रखा था। हमारे पीछे दीदी, फिर माँ-भाभी और अंत में अविनाश भैया थे। जैसे ही मैंने विमान के भीतर पैर रखा, मेरा सामना एक अत्यंत लावण्यमयी विमान परिचारिका (एयर-होस्टेस) से हुआ। वह मधुर मुस्कान के साथ सबका स्वागत कर रही थी। मैंने आज तक इतनी सुंदर युवती नहीं देखी थी। मेरी आँखें जैसे उस पर ठहर-सी गईं।

मौसी ने मेरी टकटकी ताड़ ली। शायद उस लड़की को भी भान हो गया था कि कोई उसे निहार रहा है, क्योंकि उसके होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान रेंग गई। मौसी ने मुझे टोकते हुए चुटकी ली— "क्यों भाई साहब, अब आगे चलने का विचार है या यहीं टिके रहने का इरादा है?"

मैं लज्जा के मारे पानी-पानी हो गया और गर्दन झुकाकर आगे बढ़ गया। विमान में हम कुल छह प्राणी थे। एक ओर मैं, दीदी और मौसी की सीट थी, तो दूसरी ओर माँ, भैया और भाभी। मैंने दीदी से अनुनय किया— "दीदी, क्या मुझे खिड़की वाली सीट मिल सकती है?"

दीदी का मन भी उस सीट के लिए ललचा रहा था, पर अनुज के प्रति उनके अगाध प्रेम ने उनकी इच्छा को दबा दिया। उन्होंने हंसकर मुझे वहाँ बैठने की अनुमति दे दी। मैं अभी अपनी सीट पर बैठ ही रहा था कि अविनाश भैया मौसी के पास आए और स्वर धीमा करके कुछ गंभीर मंत्रणा करने लगे। उनकी बातों का स्वर इतना धीमा था कि मुझे कुछ भी पल्ले नहीं पड़ रहा था कि आखिर माजरा क्या है।


अविनाश भैया के जाते ही मौसी और दीदी के बीच दबे स्वर में कुछ कानाफूसी होने लगी। दीदी बड़ी तन्मयता से मौसी की बातें सुन रही थीं, मानो कोई बड़ी गंभीर गुत्थी सुलझाई जा रही हो। कुछ देर बाद दीदी वापस मेरी बगल वाली सीट पर आकर बैठ गईं, किंतु मैंने देखा कि मौसी अपनी जगह पर नहीं थीं। दीदी के बगल वाली सीट खाली पड़ी थी।

मेरे भीतर उत्सुकता ने करवट ली। मैंने धीरे से पूछा— "दीदी, क्या बात हुई? मौसी कहाँ चली गईं?"

दीदी ने सारा माजरा विस्तार से समझाया। दरअसल, सीटों के आवंटन में कुछ ऐसा फेरबदल हुआ था कि मुनमुन भाभी की सीट आगे की ओर पड़ गई थी। वहाँ माँ और भैया के साथ भाभी को अकेले बैठना पड़ता, और उनके बगल वाली दो सीटों पर अपरिचित पुरुष विराजमान थे—एक नवयुवक और दूसरे अधेड़ आयु के व्यक्ति, जो संभवतः पिता-पुत्र थे। मुनमुन भाभी को उन बेगानों के बीच बैठने में संकोच हो रहा था। लोक-लाज और सहज झिझक के कारण उन्होंने भैया से अपनी असुविधा व्यक्त की।

अंततः भैया और भाभी ने उन सज्जनों से सविनय निवेदन किया। थोड़ी ऊहापोह के बाद वे मान गए। तय यह हुआ कि वह नवयुवक हमारी बगल वाली खाली सीट पर आकर बैठ जाएगा और मुनमुन भाभी एवं मौसी वहाँ आगे वाली सीट पर एक साथ बैठ सकेंगी। इस तरह वह युवक अब दीदी के बगल में आ बैठा था और भाभी अब मौसी के सान्निध्य में निश्चिंत थीं।

तभी विमान के गलियारे से वही लावण्यमयी परिचारिका (एयर-होस्टेस) गुजरी, जिसकी छवि मेरे मानस-पटल पर अंकित हो चुकी थी। वह पुनः हमारे समक्ष उपस्थित हुई और सुरक्षा संबंधी निर्देश देने लगी। उसकी सुरीली आवाज़ और सलीके ने मुझे जैसे मोहपाश में बाँध लिया था। वह बता रही थी कि सुरक्षा पेटी (सीट बेल्ट) कैसे बाँधी जाती है।

मैं तो बस उसे ही निहार रहा था, पर जैसे ही उसने निर्देश समाप्त किए, मैंने अपनी पेटी कस ली। तभी मेरी दृष्टि दीदी पर पड़ी; वे पेटी के बकसुए से जूझ रही थीं। लाख जतन करने पर भी उनसे वह पेटी ठीक से लग नहीं पा रही थी। मेरे मन में एक चतुर विचार कौंधा—क्यों न उसी सुंदर परिचारिका को सहायता के लिए पुकारा जाए? इससे दीदी की समस्या भी हल हो जाएगी और मुझे उसे करीब से देखने का एक स्वर्णिम अवसर भी मिल जाएगा।

अभी मैं पुकारने के लिए मुँह खोलने ही वाला था कि मेरी योजना धरी की धरी रह गई। दीदी की बगल में बैठे उस अज्ञात नवयुवक ने बड़ी शिष्टता से दीदी की ओर सहायता का हाथ बढ़ाया। उसने अपनी मधुर वाणी में सहायता की पेशकश की और दीदी ने भी सहज संकोच के साथ अपनी स्वीकृति दे दी। वह युवक अब दीदी की पेटी ठीक करने में उनकी मदद कर रहा था और मैं मन मसोस कर रह गया।


मेरे (आयुषी) मन में विचारों का एक बवंडर उठा हुआ था। शायद यह मेरी ही भूल थी कि जब वह विमान परिचारिका निर्देश दे रही थी, तब मेरा ध्यान अपने दूरभाष (फ़ोन) में अटका था। अब परिणाम सामने था—यह हतभागा बेल्ट मुझसे सध नहीं रहा था। मैंने कनखियों से देखा, छोटे भाई आयुष ने तो बड़ी कुशलता से अपनी पेटी बाँध ली थी। मुझे कुछ सूझ न रहा था। मन में आया कि आयुष से ही पूछ लूँ, आखिर भाई ही तो है, पर तभी मेरे बगल में बैठे उस अज्ञात युवक ने मेरी ओर झुककर बड़ी शिष्टता से पूछा— 

"क्या कोई समस्या है?"

जब मेरा ध्यान उसकी ओर गया, तो पाया कि वह युवक बड़ा ही सजीला और रूपवान था। काली कमीज और नीली जींस में उसका व्यक्तित्व निखरा हुआ था। मैं साधारणतया परायों पर इतना ध्यान नहीं देती, पर न जाने क्यों, जब से वह मेरी बगल में आकर बैठा था, मेरा अंतर्मन उसकी उपस्थिति से अनभिज्ञ न रह सका।
मैं हड़बड़ा गई। अब इसे कैसे बताऊँ कि मुझे एक साधारण सी पेटी बाँधने में कठिनाई हो रही है? न जाने वह मेरे विषय में क्या सोचेगा! मैंने सकपकाते हुए कहा— "जी नहीं, वह... कुछ नहीं।"

परंतु वह युवक चतुर था, वह मेरी स्थिति ताड़ गया। उसने वातावरण को हल्का करने के लिए एक ठहाका लगाया और बोला— "अरे, इसमें लज्जा की क्या बात है? जब मैं पहली बार विमान में बैठा था, तो मैंने तो गलती से बेल्ट की कुंडी ही निकाल दी थी!" उसकी इस बात ने मेरे मन के बोझ को थोड़ा कम कर दिया। उसका परिहासबोध (सेंस ऑफ ह्यूमर) प्रशंसनीय था।

उसने पुनः प्रस्ताव रखा— "यदि आप मेरी सहायता नहीं चाहतीं, तो मैं किसी परिचारिका को बुला देता हूँ।" मैंने जल्दी से कहा— "अरे नहीं, मैं स्वयं कर लूँगी, अधिक चिंता की बात नहीं है।" उसने शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा— "यदि सच में चिंता की बात नहीं है, तो मुझे ही यह सेवा कर लेने दीजिए। आज्ञा हो तो मैं लगा दूँ?"

उसका यह अंदाज़ इतना सहज था कि मैं 'ना' न कह सकी और मूक सहमति में सिर हिला दिया। वह प्रसन्नता से मेरी ओर बढ़ा। वह अब मेरे इतना समीप था कि उसके वस्त्रों से आती सुगंध मेरे नथुनों को मदहोश करने लगी। उसने मेरे हाथों से वह बेल्ट थाम ली। उस क्षण हमारे हाथों का अनचाहा स्पर्श हुआ, जिससे मेरे भीतर एक अजीब सी कसमसाहट पैदा हुई। मैं संकोच के मारे अपनी दृष्टि नीचे झुकाए बैठी थी।

वह थोड़ा और झुका। उसका एक हाथ एक ओर की पेटी थामे था, तो दूसरा हाथ मेरी कमर के दूसरी ओर की कुंडी खोजने के लिए आगे बढ़ा। अचानक उसका हाथ मेरी कमर से स्पर्श कर गया। वह स्पर्श बिजली के झटके की तरह मेरे पूरे शरीर में दौड़ गया। मेरा हृदय जोरों से धड़कने लगा। उसने अत्यंत धीमे स्वर में 'क्षमा' मांगी और बड़ी सफाई से पेटी के दोनों सिरों को जोड़कर उसे कस दिया।

"ज़्यादा टाइट तो नहीं हुआ?" उसने पूछा। मैं इतनी लज्जित थी कि शब्द न फूटे, बस 'ना' में सिर हिला दिया। जब वह अपनी सीट पर वापस बैठा, तब मैंने साहस बटोरकर उसे 'धन्यवाद' कहा।

उसने मेरी ओर गहराई से देखते हुए पूछा— "आपके माथे पर यह पसीना कैसा?" मैंने बात टालते हुए कहा— "वह... बस ऐसे ही।" तभी उसने मेरे कान के पास झुककर 

अत्यंत धीमे स्वर में कहा— "वैसे धन्यवाद तो मुझे कहना चाहिए।" मैंने विस्मय से पूछा— "वह भला क्यों?"

उसने एक ही सांस में उत्तर दिया— "यदि मैं सहायता न करता, तो मुझे यह कैसे पता चलता कि आपकी त्वचा इतनी कोमल और सुकुमार है? आप स्वयं का बड़ा ध्यान रखती हैं।" मैं तो जैसे पानी-पानी हो गई। यह क्या अनर्थ था? यह युवक तो सरेआम मुझसे ठिठोली (फ्लर्ट) करने लगा था। हमें मिले अभी आधा घंटा भी न बीता था और वह ऐसी धृष्टता पर उतर आया! मन ही मन मैंने स्वयं को कोसा कि आखिर मैंने उससे सहायता माँगी ही क्यों?

अभी मैं सोच ही रही थी कि वह पुनः बोला— "कहाँ खो गईं? आप काफी लचीली (फ्लेक्सिबल) मालूम होती हैं, तभी तो यह पेटी इतनी जल्दी फिट हो गई। वैसे डरिये मत, यह आपकी पहली उड़ान है न? कभी-कभी आकाश में विमान हिचकोले खाने लगता है जिसे 'टर्बुलेंस' कहते हैं।"

विमान के हिलने की बात सुनते ही मेरे प्राण सूख गए। गला सूखने लगा और भय के मारे मैंने अपनी सीट के हत्थों को कसकर पकड़ लिया और आँखें मूंद लीं। तभी मुझे अपने हाथों पर किसी दूसरे हाथ की उष्णता महसूस हुई। मैंने आँखें खोलीं तो देखा कि उस युवक ने अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया था। उसके चेहरे पर एक आश्वस्त करने वाली मुस्कान थी।

उसने मेरे और करीब आकर फुसफुसाते हुए कहा— "घबराइए मत, यदि विमान अधिक हिचकोले ले, तो मेरा हाथ पकड़ लीजिएगा। मैं आपको कुछ नहीं होने दूँगा।"


मोबाइल के कृत्रिम संसार से थककर जब मैंने कान से हेडफोन हटाए, तो दृश्य कुछ बदला हुआ था। बगल की सीट पर दीदी और वह अजनबी युवक किसी गंभीर चर्चा में मग्न थे। युवक के मुख से निकला वह 'लचीला' (फ्लेक्सिबल) शब्द मेरे कानों में पड़ा, तो मुझे अपनी मर्यादा और वहाँ की उपस्थिति बोझिल लगने लगी। लघुशंका (वॉशरुम) का बहाना कर मैं अपनी सीट से उठा। आगे की सीटों पर नज़र डाली तो पाया कि मुनमुन भाभी विश्राम कर रही थीं, किंतु मौसी बगल वाले सज्जन से बातों में लीन थीं।

मैं उतावली में शौचालय की ओर बढ़ा। दाहिनी ओर भैया और माँ निद्रा देवी की गोद में थे। उथल-पुथल भरे मन के साथ मैं जैसे ही शौचालय के भीतर प्रविष्ट हुआ, हड़बड़ाहट में द्वार की सिटकिनी चढ़ाना भूल गया। अभी मैं निवृत्त होकर पलटा ही था कि अचानक द्वार खुला और एक बिजली सी तड़पी। वही रूपवती विमान परिचारिका, जिसे मैं बाहर निहार रहा था, झटके से भीतर आ गई।

उसकी वेशभूषा पर संभवतः कोई पेय पदार्थ गिर गया था। वह अपनी सुध-बुध खोए, केवल उस धब्बे को मिटाने के लिए व्याकुल थी। एक हाथ से कपड़े को खींचकर वह दूसरे हाथ के महीन कागज़ (टिश्यू) से उसे रगड़ रही थी। उसे आभास तक न था कि भीतर कोई और भी है। उसने फुर्ती से द्वार बंद कर दिया और भीतर की कुंडी चढ़ा दी।

अब हम दोनों उस संकुचित स्थान में अकेले थे। तरल पदार्थ के गिरने से उसका वस्त्र वहाँ से भीगकर पारभासी (ट्रांसपेरेंट) हो गया था। सफाई की व्याकुलता में उसने अपने परिधान के ऊपरी बटन खोल दिए थे। अचानक उसकी दृष्टि मुझ पर पड़ी। वह हक्की-बक्की रह गई। लज्जा से उसका गोरा मुखमंडल सिंदूरी हो उठा। वह हकलाकर बोली— "तु... तु... तुम यहाँ कैसे?"

बेचारी इस आकस्मिक संकट से अनजान थी। मेरी भी सिट्टी-पिट्टी गुम थी। लज्जा और अपराधबोध के मारे मेरा सिर झुक गया। मैंने चाहा कि तत्काल वहां से निकल जाऊं, पर जैसे ही मेरा हाथ द्वार की ओर बढ़ा, बाहर से 'खट-खट' की आवाज़ हुई।

बाहर किसी की उपस्थिति ने मेरे प्राण सुखा दिए। यदि इस अवस्था में कोई हमें साथ देख लेता, तो लोक-परलोक की मर्यादा धूल में मिल जाती। भय के मारे मेरा गला सूख गया। तभी मुझे अपने कंधे पर एक अत्यंत कोमल और ऊष्म स्पर्श का अनुभव हुआ। मैंने मुड़कर देखा, उस परिचारिका ने धैर्य न खोते हुए मेरे कंधे पर अपना सुकुमार हाथ रखा था और होंठों पर उंगली रखकर मुझे मौन रहने का संकेत किया।

वह अपने बाएं हाथ की लंबी उंगली के नाखून को दांतों तले दबाए कुछ सोच रही थी। इस विकट परिस्थिति में भी कामदेव का प्रभाव मुझ पर हावी था। वह मेरे समीप कुछ झुकी हुई थी, जिससे उसके खुले हुए बटनों के अंतराल से उसके कंठ की धवल आभा और वक्ष की वह सूक्ष्म रेखा दृष्टिगोचर हो रही थी, जो किसी सुरम्य घाटी की भांति प्रतीत होती थी।

प्रसाधन कक्ष (वॉशरूम) की उस कृत्रिम ठंडक में भी मुझे पसीने आ रहे थे। मेरी आँखें अपलक उस अनन्य सौंदर्य को निहार रही थीं, मानो कोई प्यासा मृग रेगिस्तान में जल की तलाश कर रहा हो। तभी पुनः किवाड़ पर दस्तक हुई। मेरा हृदय डूबने लगा। भय और उत्तेजना के उस भँवर में मैं जैसे चेतना खोने ही वाला था कि उस युवती ने मुझे झकझोरा।

उसने मंद स्वर में, पर दृढ़ता के साथ कहा— "सुनो! मेरी तरफ देखो... हे भगवान, होश में आओ!"

उसके शब्द मेरे कानों में पड़े, पर मेरी दृष्टि तो उस अलौकिक दृश्य पर जमी थी जिसने मेरी विचार-शक्ति का हरण कर लिया था।

जैसे-तैसे मेरी चेतना वापस आई। मैंने देखा, वह सुंदरी बड़े गौर से मेरे चेहरे के भावों को पढ़ रही थी। उसके मस्तिष्क में इस भंवर से निकलने की कोई युक्ति चल रही थी। तभी अचानक बाहर से होने वाली वह दस्तक़ बंद हो गई। शायद बाहर खड़ा व्यक्ति धैर्य खोकर लौट गया था। मन का बोझ कुछ हल्का तो हुआ, परंतु भय का पसीना अब भी कपोलों पर बह रहा था।

मैंने देखा, उसके अधरों पर एक शरारत भरी मुस्कान खेल रही थी। उसने अपनी जेब से एक रेशमी और सुगंधित रुमाल निकाला और मेरे अत्यंत समीप आ गई। मेरे माथे पर आए पसीने की बूंदों को वह बड़ी कोमलता से पोंछने लगी। उस क्षण मेरी दृष्टि उसकी कजरारी आँखों में उलझकर रह गई। उस रुमाल की भीनी-भीनी सुगंध और उसके शरीर से उठने वाली मादक इत्र की खुशबू ने शौचालय के उस संकुचित स्थान को जैसे किसी स्वप्नलोक में बदल दिया था।

उसने अत्यंत धीमे और मादक स्वर में कहा— "आप तो बड़े चतुर निकले मिस्टर! विमान में कदम रखते ही आप मुझे निहार रहे थे और अभी... अभी तो आपने मुझे उस नज़र से देख लिया, जिससे केवल मेरा प्रियतम (बॉयफ्रेंड) ही मुझे देख सकता है। तो क्या अब मैं आपको अपना प्रियतम समझूँ? बोलिए, बनेंगे मेरे प्रियतम?"

मेरे कानों में विश्वास ही नहीं हो रहा था। क्या यह सत्य था या मेरी इंद्रियाँ मुझे धोखा दे रही थीं? मेरे शब्द गले में ही सूख गए। लज्जा और संकोच के मारे मेरा चेहरा और कान तवे की भाँति लाल हो उठे। उसके लाल सुर्ख होंठ, जिन पर लिपस्टिक की चमक थी, किसी रसीले फल की भाँति प्रतीत हो रहे थे। मैं घबराकर पीछे हटा, पर उसने दृढ़ता से मेरा कंधा थाम लिया।

"ठहरो!" वह फुसफुसायी। "पहले मुझे देख लेने दो कि बाहर कोई है तो नहीं।"

वह मुड़ी और उसने बड़ी शालीनता से अपने परिधान के वे दो खुले हुए बटन बंद किए। मेरी अपराधी आँखें एक बार फिर उसी ओर उठ गईं, पर इस बार उसने मुझे रंगे हाथों पकड़ लिया। उसकी पारखी नज़रों ने देख लिया कि मेरी दृष्टि कहाँ अटकी है। मैंने झट से गर्दन झुका ली।

उसने द्वार को थोड़ा सा खोलकर बाहर की स्थिति का जायजा लिया। गलियारा सूना था। उसने पीछे मुड़कर मेरी ओर देखा और मुस्कुराते हुए कहा— "जाओ, मार्ग निष्कंटक है। पर संभलकर जाना। विदा (बाय)!"

मुझे तो बस इसी अवसर की प्रतीक्षा थी। जैसे ही द्वार खुला, मैं वहाँ से किसी तीर की भाँति निकला और बिना पीछे मुड़े सीधा अपनी सीट की ओर भागा, मानो कोई कैदी जेल की सलाखों से आज़ाद हुआ हो।

जब मैं बदहवास सा अपनी सीट की ओर भागा, तो देखा कि मुनमुन भाभी की निद्रा टूट चुकी थी। मेरी व्याकुलता और माथे पर मोतियों की भांति चमकते पसीने को देखकर वे चिंतित हो उठीं। उन्होंने ममता भरे स्वर में पूछा— "यह क्या हाल बना रखा है आयुष? तबीयत तो ठीक है?" मैंने किसी तरह शब्दों को बटोरकर उत्तर दिया कि मैं ठीक हूँ, पर भाभी की पारखी नज़रों से भला क्या छिप सकता था। वे हल्का सा मुस्कुराईं और बोलीं— "जाओ बैठो, अब विमान उतरने ही वाला है।"

जाते-जाते मेरी दृष्टि मौसी पर पड़ी। वे कंबल ओढ़े निद्रा में मग्न थीं, किंतु एक विचित्र बात ने मेरा ध्यान खींचा। उनके बगल वाली सीट पर बैठे उस अज्ञात वृद्ध का शरीर भी उसी कंबल के भीतर सिमटा हुआ था। संशय तो हुआ, पर समय और परिस्थिति ऐसी न थी कि मैं वहाँ रुककर छानबीन करता।

मैं अपनी सीट पर पहुँचा तो देखा दीदी सो रही थीं, और वह अजनबी युवक किसी भूखे भेड़िये की भांति उन्हें निहार रहा था। मेरे पहुँचते ही वह सकपका गया और बनावटी गंभीरता से अपने फोन में उलझ गया। दीदी की आँखें खुलीं, तो उन्होंने बड़े स्नेह से मेरा हाथ थाम लिया और मेरे कंधे पर सिर रख दिया। उनके चेहरे पर बिखरी लटों को जब मैंने हटाया, तो उनके मासूम चेहरे ने मेरा हृदय जीत लिया। पर तभी मैंने देखा कि वह युवक हमें घृणास्पद मुस्कान के साथ देख रहा था। उसकी वह मुस्कुराहट मुझे चुभ गई, मानो वह मेरे और दीदी के पवित्र संबंध को किसी और ही दृष्टि से देख रहा हो।

अचानक उस युवक ने दीदी को पुकारा और उनका फोन लौटाते हुए कहा— "यह लीजिए, काम हो गया।" मेरा माथा ठनका। दीदी ने एक अजनबी को अपना फोन क्यों दिया? क्या उन्हें आज के छल-कपट का ज्ञान नहीं?

जैसे ही विमान की भूमि से छुअन हुई, यात्रियों में उतरने की आपाधापी मच गई। मैंने चतुराई से दीदी को खिड़की वाली सीट दे दी और स्वयं उस युवक और दीदी के बीच की दीवार बन गया। उस युवक के चेहरे पर छाई मायूसी देख मुझे आत्मिक संतोष हुआ।

विमान से बाहर निकलते समय भीड़ का रेला आया। माँ, भैया और भाभी आगे निकल गए। मौसी के पीछे वही वृद्ध चल रहा था, जो न जाने क्या फुसफुसा रहा था। इसी बीच, न जाने किस प्रेरणा वश मैं पुनः शौचालय की ओर मुड़ा। जब बाहर निकला, तो द्वार पर वही परिचारिका खड़ी थी। उसने अब वेशभूषा बदल ली थी। जैसे ही उसकी और मेरी नज़रें मिलीं, उसने एक गुलाब का फूल मेरी ओर बढ़ाया।

वह मेरे कान के पास झुकी, उसकी उष्ण साँसें मेरे रोम-रोम में सिहरन पैदा कर गईं। उसने धीमे से कहा— "विदा, मेरे नए प्रियतम! मुझे भूलना मत।" और इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, उसके रसीले और कोमल होंठों ने मेरे गालों पर अपनी छाप छोड़ दी। मैं जड़वत खड़ा रह गया और वह लजाकर मुस्कुरा दी। मैं बिना पीछे मुड़े बाहर की ओर भागा।

बाहर भैया सामान के साथ प्रतीक्षारत थे। हम सब एक स्थान पर एकत्र हुए। दीदी अपने फोन में मग्न थीं। मुझसे रहा न गया, मैंने उलाहना देते हुए कहा— "दीदी, आप अजनबियों पर इतना विश्वास कैसे कर लेती हैं? उसे फोन देने की क्या आवश्यकता थी?"

दीदी ने कान से 'इयरपॉड' निकालते हुए सहज भाव से कहा— "अरे पगले, उसे कोई गुप्त जानकारी नहीं दी। उसके पास एक नई कहानियों की श्रृंखला (सीरीज) थी, बस वही ली है।" मैंने शंका व्यक्त की तो उन्होंने बड़े आत्मविश्वास से मेरे सिर पर हाथ फेरा और बोलीं— "तेरी दीदी इतनी नादान नहीं है। उसने मेरा नाम, पता और परिचय सब जानना चाहा, पर मैंने उसे ठेंगा दिखा दिया। अपना काम निकल गया, बस काफी है।"

तभी भैया और भाभी प्रसन्नचित्त मुद्रा में आए और बोले— "माँ, सारा सामान गाड़ी में लद चुका है। चलिए, अब अपने नए घर, अपनी नई दुनिया की ओर कदम बढ़ाते हैं।"

विमान तल से बाहर निकलते हुए मेरे मन में एक ओर उस परिचारिका का स्पर्श था, तो दूसरी ओर नए घर की उत्सुकता। स्मृतियों का एक अध्याय पीछे छूट रहा था और नियति हमें एक नए मोड़ पर ले जा रही थी।
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है जवानी तो इश्क होना है: (हुस्न, जवानी और आशिकी) - by आपकी रायली - 18-04-2026, 04:33 PM



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