17-04-2026, 11:49 PM
(This post was last modified: 17-04-2026, 11:55 PM by Pramod_Bhasin. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
नाश्ता खत्म होने के बाद, आलोक अपने ऑफिस के लिए निकल गए। मौशुमी ने अपनी चाबियाँ उठाईं। "चलो, कौशिक। मैं तुम्हें कॉलेज छोड़ देती हूँ।"
मौशुमी ने कार को भीड़ भरी सड़क पर आगे बढ़ाया। उसकी आँखें सामने थीं, लेकिन उसका मन कहीं और भटक रहा था। कौशिक की हरकतें, उसकी आँखों की प्यास, उसके हाथों का स्पर्श – ये सब उसके दिमाग में घूम रहे थे।
मौशुमी ने गाड़ी सड़क पर दौड़ाई। "कॉलेज में कोई दिक्कत तो नहीं?" उसने एक सामान्य सवाल पूछा।
मौशुमी ने एक गहरी साँस ली। उसने अपनी गाड़ी स्टार्ट की और अपनी ऑफिस की ओर चल पड़ी।
कौशिक का चेहरा खिल उठा। "हाँ।"
वे दोनों अपार्टमेंट से बाहर निकले और लिफ्ट की तरफ बढ़े। लिफ्ट के अंदर घुसते ही, कौशिक ने मौशुमी का हाथ पकड़ लिया। उसकी उंगलियाँ मौशुमी की नरम हथेली पर धीरे से सरकीं। मौशुमी के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसने एक पल के लिए कौशिक की आँखों में देखा, जहाँ एक गहरी, अनबुझी प्यास तैर रही थी।
कौशिक ने धीरे से उसके चेहरे को अपनी ओर खींचा, उसके होंठों की ओर झुक रहा था। उसकी साँसों की गर्मी मौशुमी के गालों पर महसूस हुई।
"कौशिक!" मौशुमी फुसफुसाई, उसकी आवाज़ में चेतावनी थी। उसकी आँखें ऊपर, लिफ्ट के कोने में लगे छोटे, चमकदार लेंस पर गईं। "सीसीटीवी है।"
कौशिक ने आँखें घुमाईं, लेकिन उसका हाथ मौशुमी की कमर पर चला गया, साड़ी के कपड़े के नीचे से उसकी त्वचा को छू रहा था। मौशुमी ने एक गहरी साँस ली, उसके शरीर में एक अजीब सी गर्मी फैल गई।
लिफ्ट नीचे रुकी, और वे बाहर निकल आए, उनके बीच एक तनाव था।
कार पार्किंग में, मौशुमी अपनी मारुति रिट्ज की तरफ बढ़ी। कौशिक उसके पीछे-पीछे आया। मौशुमी ड्राइवर की सीट पर बैठकर चाबी घुमाई, और इंजन एक हल्की गुनगुनाहट के साथ चालू हो गया। कौशिक बगल वाली सीट पर बैठ गया। जैसे ही कार पार्किंग से बाहर निकली, बेंगलुरु की सड़कों पर गाड़ियों का शोर और धुएँ का गुबार उन्हें घेरने लगा।
मौशुमी ने गाड़ी सड़क पर दौड़ाई। "कॉलेज में कोई दिक्कत तो नहीं?" उसने एक सामान्य सवाल पूछा।
कौशिक ने सिर हिलाया। "नहीं, सब ठीक है।", उसकी आवाज़ में भी बेचैनी थी।
वे कॉलेज के गेट पर पहुँचे। मौशुमी ने गाड़ी रोकी। "अच्छे से पढ़ना।" उसने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसके होंठों पर कँपकँपी थी।
कौशिक ने बैग उठाया, दरवाज़ा खोला। एक पल के लिए वह रुका, फिर उसने पलटकर मौशुमी को देखा। उसकी आँखें फिर से मौशुमी की आँखों से मिलीं। इस बार कोई कैमरा नहीं था, सिर्फ खुली सड़क और सुबह की रोशनी थी। उनकी नज़रें एक-दूसरे में उलझ गईं, एक गहरा, अनकहा संवाद उनके बीच शुरू हो गया। कौशिक के मन में हजारों शब्द उमड़ रहे थे, लेकिन वह कुछ कह नहीं पाया। मौशुमी ने अपनी उंगली से स्टीयरिंग व्हील को धीरे से थपथपाया, लेकिन वह भी चुप रही।
कौशिक कार से उतरा, और कॉलेज के गेट की ओर चल पड़ा। उसने एक बार फिर पलटकर देखा। मौशुमी की गाड़ी वहीं खड़ी थी, और वह उसे देख रही थी। जब तक वह कॉलेज के गेट के अंदर नहीं चला गया, मौशुमी ने गाड़ी नहीं बढ़ाई।


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