17-04-2026, 10:30 PM
अगली सुबह, नाश्ते की मेज पर एक अजीब सी चुप्पी थी। आलोक अख़बार पढ़ रहा था, और मौशुमी नाश्ता बना रही थी। कौषिक अपने कमरे से आया और मेज पर बैठ गया। उसने मौशुमी की ओर देखा, और उनकी आँखें मिलीं। उस पल में, उनके बीच एक अनकहा संवाद हुआ, एक चोरी की हुई नज़र, जिसमें रात की अधूरी इच्छा और सुबह की शर्मिंदगी दोनों झलक रही थीं। मौशुमी ने जल्दी से अपनी नज़रें हटा लीं, और कौषिक ने भी अपनी प्लेट में देखना शुरू कर दिया।
"मौशुमी, चाय कहाँ है?" आलोक ने पूछा, अख़बार से अपनी नज़रें हटाए बिना।
"अभी लाती हूँ," मौशुमी ने कहा, और किचन की ओर चली गई।
कौषिक ने एक पल का इंतज़ार नहीं किया। वह तुरंत अपनी कुर्सी से उठा और मौशुमी के पीछे किचन में चला गया। किचन में घुसते ही, उसने मौशुमी को अपनी ओर खींचा। मौशुमी ने एक पल के लिए विरोध किया, लेकिन फिर उसकी बाहों में ढीली पड़ गई। कौषिक ने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया, और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। यह एक फ्रेंच किस था, तीव्र और भावुक। उनकी जीभें एक-दूसरे से उलझ गईं, एक पल की भी देरी किए बिना। मौशुमी ने भी उतनी ही शिद्दत से उसका जवाब दिया, उसकी जीभ कौषिक की जीभ को चूस रही थी, उसके मुँह में एक अजीब सी उत्तेजना पैदा कर रही थी।
उनके बीच की दूरी मिट गई, उनके शरीर एक-दूसरे से चिपक गए, और उस पल में, दुनिया में केवल वे दोनों थे। उनकी साँसें तेज़ी से चलने लगीं, और उनके मुँह से धीमी, उत्तेजित आवाज़ें निकल रही थीं। वे एक-दूसरे को चूमते रहे, जैसे वे रात की अधूरी इच्छा को पूरा करना चाहते हों।
तभी, आलोक की आवाज़ आई।
"मौशुमी! कौषिक! क्या कर रहे हो किचन में? नाश्ता ठंडा हो रहा है I"
दोनों एक झटके में एक-दूसरे से अलग हो गए। मौशुमी का चेहरा लाल हो चुका था, और कौषिक की साँसें अभी भी तेज़ी से चल रही थीं। उन्होंने एक-दूसरे की ओर देखा, उनकी आँखों में एक अजीब सी लालसा और डर का मिश्रण था। उन्होंने जल्दी से अपने कपड़े ठीक किए, और किचन से बाहर निकलकर नाश्ते की मेज पर बैठ गए, जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन उनके भीतर की आग अभी भी जल रही थी, और उनके बीच की दूरी, अब पहले से कहीं ज़्यादा कम हो चुकी थी।


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