उस रात, मौशुमी और कौषिक दोनों को नींद नहीं आई। मौशुमी अपने बिस्तर पर लेटी रही, उसकी आँखें खुली थीं। उसके शरीर में अभी भी कौषिक के स्पर्श की गर्मी महसूस हो रही थी, उसकी उंगलियों का एहसास, उसके होंठों का स्वाद। उसके मन में वह पल बार-बार घूम रहा था, जब आलोक ने दरवाज़ा खटखटाया था। वह डर से काँप उठी, यह सोचकर कि अगर वे पकड़े जाते तो क्या होता। लेकिन डर के साथ-साथ, एक अजीब सी निराशा भी थी, कि उनका मिलन अधूरा रह गया।
कौषिक अपने कमरे में बेचैन था। उसकी आँखों के सामने मौशुमी का चेहरा घूम रहा था, उसके खुले हुए बूब्स, उसकी गीली चूत। उसका लंड अभी भी उत्तेजित था, और उसे शांत करना मुश्किल हो रहा था। उसने अपने शरीर में एक अजीब सी आग महसूस की। वह जानता था कि उसने कुछ गलत किया है, लेकिन उसे कोई पछतावा नहीं था, बस एक अधूरी इच्छा का दर्द था।


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