17-04-2026, 12:59 PM
मैं कार की पिछली सीट के कोने में सिमटी हुई थी।
मेरा बायाँ कंधा दरवाज़े से सटा हुआ था।
बायाँ पैर फर्श पर टिका था, दाहिना पैर सीट पर ऊपर चढ़ा हुआ — पूरी तरह फैला हुआ।
स्कर्ट अब मेरी कमर तक सरक चुकी थी।
मैं ऊपर से पूरी तरह नंगी थी — सिर्फ़ स्कर्ट का किनारा बचा था।
बिल्लू कार के फर्श पर घुटनों के बल बैठा हुआ था।
उसका चेहरा मेरी चूत में दबा हुआ था।
उसकी जीभ मेरी क्लिट पर तेज़-तेज़ घूम रही थी।
दो उँगलियाँ मेरी चूत में गहराई तक अंदर-बाहर हो रही थीं — G-स्पॉट पर बार-बार दबाव डालते हुए।
उसकी साँसें मेरी चूत पर गरम-गरम पड़ रही थीं।
अंकल दोनों घुटनों के बल सीट पर था।
वो मुझ पर झुका हुआ था।
उसका मुँह मेरे स्तनों पर था — बारी-बारी दोनों निप्पल्स चूस रहा था।
उसकी जीभ मेरे निप्पल्स के चारों ओर घूम रही थी।
उसी बीच... उसका दायाँ हाथ धीरे-धीरे नीचे सरक रहा था।
इंच-दर-इंच... मेरी कमर से... पेट से... फिर स्कर्ट के नीचे।
मेरी चूत... अब उसके हाथ के बहुत करीब थी।
पहली बार... किसी मर्द ने... इतनी गहराई से... वहाँ छुआ था।
और अब... दो मर्द... एक साथ।
अंकल की उँगलियाँ मेरी चूत के ऊपर पहुँच गईं।
वो मेरी क्लिट पर रगड़ रहा था — बिल्लू की जीभ के ठीक बगल में।
बिल्लू अभी भी मेरी चूत चाट रहा था।
उसकी जीभ और अंकल की उँगलियाँ... एक साथ काम कर रही थीं।
अंकल ने बिल्लू की जीभ पर भी अपनी उँगली रख दी।
उसने हल्के से चाटा — बिल्लू की जीभ पर मेरा रस लगाकर।
अंकल ने गुस्से और उत्तेजना से भरी आवाज़ में कहा —
“मेरी उँगली... भैंचोद...”
बिल्लू हँस पड़ा।
उसने अपना मुँह मेरी चूत से हटाया।
उसने अंकल की उँगली को देखा — जो अब मेरी क्लिट पर रगड़ रही थी।
उसकी उँगली गीली थी... मेरे रस से चमक रही थी।
अचानक बिल्लू ने ऊपर देखा।
उसकी आँखें अंकल पर टिकीं।
वो मुस्कुराया... गंदी मुस्कान।
फिर बोला —
“साहब... कभी टेम्परेचर चेक किया है?”
अंकल ने मुँह मेरे स्तन से हटाया।
मेरी तरफ देखा।
फिर सिर हिलाया — “नहीं।”
मैं मुस्कुराई।
मेरी आँखें आधी बंद... होंठ काँप रहे थे।
बिल्लू ने फिर कहा —
“तो नीचे जाओ... और चेक करो... ये कुतिया कितनी गर्म है।”
उसने अपना दायाँ हाथ नीचे किया।
धीरे से... एक उँगली मेरी चूत में डाल दी।
बहुत धीरे... मेरे चेहरे को देखते हुए।
मेरी आँखें आधी बंद थीं... चेहरे पर संतुष्टि साफ़ दिख रही थी।
अंकल ने उँगली अंदर-बाहर की।
फिर बोला —
“पहली बार कर रहा हूँ ऐसा...
शादी में... बस बच्चे पैदा करने के लिए होता था।
कभी... ऐसे मज़े से नहीं किया।
बहुत गीली है ये...
“साहब... अगर कभी नहीं किया तो... अब चख लो।
ये ताज़ा है... बहुत स्वादिष्ट... तुम्हें बहुत पसंद आएगा।
लेकिन... इस पोज़िशन में... कार इतनी छोटी है... तुम नीचे नहीं जा सकते।”
अंकल ने मेरी तरफ देखा।
उसकी आँखें... अब पूरी तरह जल रही थीं।
वो कुछ नहीं बोला।
बस... मेरी आँखों में देखता रहा।
अंकल ने मेरी दोनों जाँघें पकड़ीं।
बहुत ज़ोर से... लेकिन प्यार से।
उसने मुझे सीट पर पूरी तरह लिटा दिया।
मेरी पीठ सीट पर... सिर कोने में टिका हुआ।
उसने मेरी दोनों टाँगें फैलाईं — बहुत चौड़ा।
मेरी चूत... अब पूरी तरह खुलकर उसके और अंकल के सामने थी।
फिर अंकल ने अपनी तरफ वाला दरवाज़ा खोल दिया।
ठंडी हवा अंदर आई।
वो थोड़ा बाहर निकला — आधा शरीर कार के बाहर, आधा अंदर।
उसने अपना चेहरा मेरी चूत के ठीक सामने कर लिया।
अब वो आराम से... पूरी तरह मेरी चूत पर झुक सकता था।
अंकल ने मुझे धीरे से सीट पर लिटा दिया।
मेरी पीठ अब सीट पर टिकी हुई थी, सिर कोने में।
स्कर्ट पूरी तरह कमर तक सरक चुकी थी।
बिल्लू अभी भी कार के फर्श पर घुटनों के बल बैठा हुआ था।
मैंने ये सब इतनी तेज़ी से होता देखा कि हल्का-सा हँस पड़ी।
एक छोटी, शरारती हँसी।
मेरा शरीर अभी भी काँप रहा था।
तभी... मैंने महसूस किया।
अंकल की जीभ... मेरी चूत पर।
एक और मर्द...
जिसने कभी किसी की चूत नहीं चाटी थी।
पहली बार... उसकी जीभ मेरी क्लिट पर लगी।
बहुत धीरे... बहुत सावधानी से।
मैंने सिहरकर कराहा —
“आह्ह... अंकल...”
अंकल मेरी जाँघों के बीच में था।
मैं उसे देख नहीं पा रही थी — उसका चेहरा मेरी चूत में दबा हुआ था।
लेकिन महसूस कर रही थी... सब कुछ।
उसकी गरम जीभ... मेरी सिलवटों पर सरक रही थी।
उसके होंठ मेरी क्लिट को चूस रहे थे।
और सामने... बिल्लू था।
वो मेरे चेहरे के ठीक सामने झुका हुआ था।
उसने फिर मौका नहीं छोड़ा।
उसने मेरे होंठ पकड़ लिए।
उसका गटके वाला मुँह मेरे मुँह में घुस गया।
उसकी जीभ मेरी जीभ से खेल रही थी।
गटके की कड़वाहट... मेरे रस की नमकीन मिठास... सब मिलकर मेरे मुँह में भर गया।
बहुत गंदा... बहुत तेज़... लेकिन मुझे बहुत अच्छा लग रहा था।
मैं बिल्लू को जवाब दे रही थी — जीभ से, होंठों से।
लेकिन मेरा पूरा ध्यान... नीचे अंकल पर था।
उसकी जीभ... उसकी उँगलियाँ... वो सब... मुझे पागल कर रहे थे।
पहला ऑर्गेज़्म आया था।
दूसरा ऑर्गेज़्म... और तेज़ आया।
मैंकई बार झड़ गई।
मैं... और चाहती थी।
एक और... वो गहरा, पागल करने वाला एहसास।
मैं तैयार थी... जो भी करना पड़े... वो करने को।
फिर वो नीचे सरका।
उसका मुँह मेरे स्तनों पर आ गया।
पहली बार... बिल्लू मेरे स्तनों को चख रहा था।
वो एक भूखे बच्चे की तरह चूस रहा था — बाएँ स्तन को मुँह में लेकर ज़ोर से चूसता, जीभ से निप्पल घुमाता... फिर दाएँ पर।
मेरे स्तन पहले से ही अंकल की थूक से गीले थे।
लेकिन बिल्लू को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।
वो और ज़ोर से चूस रहा था।
उसकी जीभ मेरे निप्पल्स पर घूम रही थी।
वो दाँतों से हल्का-हल्का काट भी रहा था।
नीचे... अंकल अब मेरी चूत पर था।
वो बिल्लू की थूक और मेरे रस को चाट रहा था।
दोनों मर्द... अब किसी भी हाल में रुकने वाले नहीं थे।
बिल्लू मेरे स्तनों से नीचे सरका।
उसकी जीभ मेरी पेट पर... नाभि पर आ गई।
उसने नाभि में जीभ डाल दी।
बहुत गहराई तक... घुमाते हुए... चाटते हुए।
जैसे वो मेरे पूरे शरीर को अपनी थूक से गंदा करना चाहता हो।
बिल्लू अब फिर से मेरी चूत की तरफ झुक गया।
अंकल अभी भी मेरी चूत पर काम कर रहा था — उसकी जीभ क्लिट पर घूम रही थी, उँगलियाँ अंदर-बाहर हो रही थीं।
बिल्लू ने जगह बनाई।
उसकी जीभ मेरी चूत के ऊपरी हिस्से पर आ गई।
अब दोनों की जीभें... एक साथ... मेरी चूत पर थीं।
अंकल क्लिट और नीचे वाले हिस्से पर... बिल्लू ऊपरी हिस्से और सिलवटों पर।
दो जीभें... दो अलग-अलग स्पर्श... एक साथ।
मैं पागल हो गई।
मेरा शरीर काँप रहा था।
जाँघें थरथरा रही थीं।
मैंने अंकल के बाल पकड़े... बिल्लू के सिर को दबाया।
दोनों की जीभें मेरी चूत पर मिल रही थीं।
कभी-कभी उनकी जीभें एक-दूसरे को भी छू जातीं।
मैं ये सब महसूस कर रही थी।
बहुत गंदा... बहुत तेज़... लेकिन मेरे लिए... स्वर्ग जैसा।
मैं फिर से झड़ने वाली थी।
ये ऑर्गेज़्म पिछले वाले से भी ज़्यादा तीव्र था।
मेरा शरीर कस गया।
मेरा रस... दोनों के मुँह में... उनके चेहरों पर... बह गया।
मैं काँपती हुई... पूरी तरह झड़ गई।
अगले एक मिनट तक मेरा पूरा शरीर सिर्फ़ काँपता रहा।
मैं झड़ चुकी थी... लेकिन झटके अभी भी आ रहे थे।
मेरी जाँघें थरथरा रही थीं, साँसें बहुत तेज़ चल रही थीं।
धीरे-धीरे... मैं शांत हुई।
मैंने घड़ी देखी।
लगभग एक घंटा हो चुका था।
कॉलेज का गेट बंद होने वाला था।
मैंने भारी साँसों के साथ कहा —
“अंकल... अब हमें जाना चाहिए...
कॉलेज का गेट बंद हो जाएगा।”
अंकल ने तुरंत समझ लिया।
वो उठ गया।
मैं भी सीट पर बैठ गई।
मैंने चारों तरफ देखा — मेरी ब्रा कहाँ गई?
मैंने ब्रा ढूँढनी शुरू की।
जैसे ही मैं सीट पर बैठी, अंकल फिर से अंदर आ गया।
उसने मुझे झपट्टा मारा।
बहुत जोर से... बहुत भूख से किस करने लगा।
उसके होंठ मेरे होंठों पर थे।
उसने मेरे हाथ पकड़े और अपने लुंड पर रख दिए।
उसका लुंड... बहुत सख्त... बहुत गर्म... फड़क रहा था।
वो मेरे कान में हाँफते हुए बोला —
“हिलाओ... हिलाओ नेहा... जल्दी..."
मैंने अपना हाथ ऊपर-नीचे करने शुरू कर दिया।
कुछ ही झटकों में... अंकल झड़ गया।
उसका गाढ़ा, गरम वीर्य... मेरी जाँघों पर... स्कर्ट पर... फैल गया।
अंकल ने मुझे आखिरी बार बहुत गहरा किस किया।
उसके होंठ मेरे होंठों पर थे... जैसे वो इस पल को हमेशा के लिए अपने अंदर कैद करना चाहता हो।
फिर उसने अपना लुंड मेरी जाँघों पर रखा और आखिरी बूँदें भी निकाल दीं।
गरम, गाढ़ा वीर्य मेरी जाँघों पर फैल गया।
वो धीरे से उठा।
पैंट ठीक की।
फिर आगे बैठ गया और कार स्टार्ट कर दी।
मैं एक पल के लिए वैसी ही बैठी रही।
मेरी जाँघें... पूरी तरह गीली और गंदी थीं।
अंकल का वीर्य... बिल्लू की थूक... मेरा रस... सब मिलकर चिपचिपा हुआ था।
मैंने चारों तरफ देखा — कुछ साफ़ करने के लिए ढूँढा।
बिल्लू अभी भी फर्श पर बैठा था।
उसने मुझे देखा।
फिर बिना किसी झिझक के... अपना गंदा शर्ट उतारा।
उसने शर्ट से मेरी जाँघें पोंछनी शुरू कर दीं।
धीरे-धीरे... बहुत ध्यान से... अंकल के वीर्य को साफ़ कर रहा था।
उसके हाथ... मेरी जाँघों पर... बिना किसी शर्म के।
मैंने ब्रा पहनी।
फिर स्कर्ट नीचे की।
पैंटी... कार में ही... हिलते-डुलते... पहन ली।
कार अब फिर से तेज़ हो गई थी।
हम हाईवे पर थे।
कॉलेज की तरफ बढ़ रहे थे।
बिल्लू अब मेरी बाईं तरफ सरक आया था।
वो कुछ नहीं बोल रहा था।
समय बहुत कम बचा था।
मैं थोड़ी चिंतित थी — कॉलेज का गेट कब बंद हो जाए, पता नहीं।
लेकिन बिल्लू के हाथ... मेरे चारों तरफ थे।
वो हर संभव मौके का फायदा उठा रहा था।
उसके हाथ मेरे कपड़ों के ऊपर से मेरे शरीर को महसूस कर रहे थे — कमर, जाँघें, स्तन... कहीं भी छूट नहीं रहा था।
उसने मेरी गर्दन पर किस किया।
फिर कान के पास फुसफुसाया —
“प्लीज... जो तुम साहब के साथ करती हो... वो मेरे साथ भी कर दो...”
मैंने उसकी तरफ देखा।
वो पहले से ही अपनी पैंट नीचे कर चुका था।
उसका लुंड बाहर था।
मैंने देखा... और हल्का-सा हँस पड़ी।
ये बिल्कुल अलग था।
मैंने सोचा था कि ये काला होगा... लेकिन ये गुलाबी था।
फोरस्किन नहीं थी।
बहुत मोटा... लेकिन छोटा... जैसे मेंढक का सिर।
बिल्लू ने मेरे हाथ को पकड़कर अपने लुंड पर रख दिया।
मैं समझ गई — वो चाहता है कि मैं उसे झड़वाऊँ।
मैंने उसे पकड़ लिया।
दूसरा लुंड... मेरी ज़िंदगी में... सिर्फ़ 10 मिनट के अंदर।
मैंने हाथ ऊपर-नीचे करना शुरू कर दिया।
बिल्लू की साँसें तेज़ हो गईं।
वो मेरी गर्दन चूस रहा था।
कुछ ही झटकों में... वो झड़ गया।
उसका वीर्य... कार की आगे वाली सीट की पीठ पर... छींटों में गिरा।
वो हाँफते हुए पीछे टिक गया।
मैंने अपना हाथ देखा — उस पर भी थोड़ा वीर्य लगा था।
मैंने उसे अपनी स्कर्ट पर पोंछ लिया।
कार कॉलेज गेट के ठीक बाहर रुक गई।
मैंने जल्दी से अपने कपड़े ठीक किए — शर्ट के बटन बंद किए, स्कर्ट नीचे की, बालों को हाथ से संवारा।
बाहर से देखने में मैं पूरी तरह डिसेंट लग रही थी — एक नॉर्मल कॉलेज स्टूडेंट।
बिल्लू और अंकल अब आगे वाली सीट पर बैठे थे।
मैं अकेली पीछे।
लेकिन कार के अंदर का माहौल... पूरी तरह अलग था।
हवा में भारी गंध थी — पसीना, गटका, बीड़ी, वीर्य... सब मिला हुआ।
सीट पर... जाँघों पर... आगे वाली सीट की पीठ पर... कहीं-कहीं सूखे वीर्य के धब्बे दिख रहे थे।
मैंने अपना बैग उठाया।
दरवाज़ा खोलने ही वाली थी कि बिल्लू ने पीछे मुड़कर कहा —
“लेकिन... तुमने मेरा तो मुँह में नहीं लिया... जैसा साहब का लिया था झोपड़ी में।”
मैं चुप रही।
कोई जवाब नहीं दिया।
मैं कार से उतरी।
गेट की तरफ बढ़ी।
कुछ कदम चलने के बाद... मैंने पीछे मुड़कर देखा।
अंकल और बिल्लू दोनों मुझे देख रहे थे।
मैंने धीरे से मुस्कुराया।
फिर... आँख मारते हुए कहा —
“नेक्स्ट टाइम।”
दोनों के चेहरे पर एक साथ मुस्कान फैल गई।
मैंने मुड़कर गेट की तरफ बढ़ गई।
पीछे कार धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
मैं कॉलेज के अंदर दाखिल हुई।
बाहर से देखने में मैं बिल्कुल नॉर्मल थी — लेकिन अंदर... मेरी चूत अभी भी गीली थी।
जाँघें चिपचिपी थीं।
मेरे मुँह में अभी भी दोनों का स्वाद था।
मेरा बायाँ कंधा दरवाज़े से सटा हुआ था।
बायाँ पैर फर्श पर टिका था, दाहिना पैर सीट पर ऊपर चढ़ा हुआ — पूरी तरह फैला हुआ।
स्कर्ट अब मेरी कमर तक सरक चुकी थी।
मैं ऊपर से पूरी तरह नंगी थी — सिर्फ़ स्कर्ट का किनारा बचा था।
बिल्लू कार के फर्श पर घुटनों के बल बैठा हुआ था।
उसका चेहरा मेरी चूत में दबा हुआ था।
उसकी जीभ मेरी क्लिट पर तेज़-तेज़ घूम रही थी।
दो उँगलियाँ मेरी चूत में गहराई तक अंदर-बाहर हो रही थीं — G-स्पॉट पर बार-बार दबाव डालते हुए।
उसकी साँसें मेरी चूत पर गरम-गरम पड़ रही थीं।
अंकल दोनों घुटनों के बल सीट पर था।
वो मुझ पर झुका हुआ था।
उसका मुँह मेरे स्तनों पर था — बारी-बारी दोनों निप्पल्स चूस रहा था।
उसकी जीभ मेरे निप्पल्स के चारों ओर घूम रही थी।
उसी बीच... उसका दायाँ हाथ धीरे-धीरे नीचे सरक रहा था।
इंच-दर-इंच... मेरी कमर से... पेट से... फिर स्कर्ट के नीचे।
मेरी चूत... अब उसके हाथ के बहुत करीब थी।
पहली बार... किसी मर्द ने... इतनी गहराई से... वहाँ छुआ था।
और अब... दो मर्द... एक साथ।
अंकल की उँगलियाँ मेरी चूत के ऊपर पहुँच गईं।
वो मेरी क्लिट पर रगड़ रहा था — बिल्लू की जीभ के ठीक बगल में।
बिल्लू अभी भी मेरी चूत चाट रहा था।
उसकी जीभ और अंकल की उँगलियाँ... एक साथ काम कर रही थीं।
अंकल ने बिल्लू की जीभ पर भी अपनी उँगली रख दी।
उसने हल्के से चाटा — बिल्लू की जीभ पर मेरा रस लगाकर।
अंकल ने गुस्से और उत्तेजना से भरी आवाज़ में कहा —
“मेरी उँगली... भैंचोद...”
बिल्लू हँस पड़ा।
उसने अपना मुँह मेरी चूत से हटाया।
उसने अंकल की उँगली को देखा — जो अब मेरी क्लिट पर रगड़ रही थी।
उसकी उँगली गीली थी... मेरे रस से चमक रही थी।
अचानक बिल्लू ने ऊपर देखा।
उसकी आँखें अंकल पर टिकीं।
वो मुस्कुराया... गंदी मुस्कान।
फिर बोला —
“साहब... कभी टेम्परेचर चेक किया है?”
अंकल ने मुँह मेरे स्तन से हटाया।
मेरी तरफ देखा।
फिर सिर हिलाया — “नहीं।”
मैं मुस्कुराई।
मेरी आँखें आधी बंद... होंठ काँप रहे थे।
बिल्लू ने फिर कहा —
“तो नीचे जाओ... और चेक करो... ये कुतिया कितनी गर्म है।”
उसने अपना दायाँ हाथ नीचे किया।
धीरे से... एक उँगली मेरी चूत में डाल दी।
बहुत धीरे... मेरे चेहरे को देखते हुए।
मेरी आँखें आधी बंद थीं... चेहरे पर संतुष्टि साफ़ दिख रही थी।
अंकल ने उँगली अंदर-बाहर की।
फिर बोला —
“पहली बार कर रहा हूँ ऐसा...
शादी में... बस बच्चे पैदा करने के लिए होता था।
कभी... ऐसे मज़े से नहीं किया।
बहुत गीली है ये...
“साहब... अगर कभी नहीं किया तो... अब चख लो।
ये ताज़ा है... बहुत स्वादिष्ट... तुम्हें बहुत पसंद आएगा।
लेकिन... इस पोज़िशन में... कार इतनी छोटी है... तुम नीचे नहीं जा सकते।”
अंकल ने मेरी तरफ देखा।
उसकी आँखें... अब पूरी तरह जल रही थीं।
वो कुछ नहीं बोला।
बस... मेरी आँखों में देखता रहा।
अंकल ने मेरी दोनों जाँघें पकड़ीं।
बहुत ज़ोर से... लेकिन प्यार से।
उसने मुझे सीट पर पूरी तरह लिटा दिया।
मेरी पीठ सीट पर... सिर कोने में टिका हुआ।
उसने मेरी दोनों टाँगें फैलाईं — बहुत चौड़ा।
मेरी चूत... अब पूरी तरह खुलकर उसके और अंकल के सामने थी।
फिर अंकल ने अपनी तरफ वाला दरवाज़ा खोल दिया।
ठंडी हवा अंदर आई।
वो थोड़ा बाहर निकला — आधा शरीर कार के बाहर, आधा अंदर।
उसने अपना चेहरा मेरी चूत के ठीक सामने कर लिया।
अब वो आराम से... पूरी तरह मेरी चूत पर झुक सकता था।
अंकल ने मुझे धीरे से सीट पर लिटा दिया।
मेरी पीठ अब सीट पर टिकी हुई थी, सिर कोने में।
स्कर्ट पूरी तरह कमर तक सरक चुकी थी।
बिल्लू अभी भी कार के फर्श पर घुटनों के बल बैठा हुआ था।
मैंने ये सब इतनी तेज़ी से होता देखा कि हल्का-सा हँस पड़ी।
एक छोटी, शरारती हँसी।
मेरा शरीर अभी भी काँप रहा था।
तभी... मैंने महसूस किया।
अंकल की जीभ... मेरी चूत पर।
एक और मर्द...
जिसने कभी किसी की चूत नहीं चाटी थी।
पहली बार... उसकी जीभ मेरी क्लिट पर लगी।
बहुत धीरे... बहुत सावधानी से।
मैंने सिहरकर कराहा —
“आह्ह... अंकल...”
अंकल मेरी जाँघों के बीच में था।
मैं उसे देख नहीं पा रही थी — उसका चेहरा मेरी चूत में दबा हुआ था।
लेकिन महसूस कर रही थी... सब कुछ।
उसकी गरम जीभ... मेरी सिलवटों पर सरक रही थी।
उसके होंठ मेरी क्लिट को चूस रहे थे।
और सामने... बिल्लू था।
वो मेरे चेहरे के ठीक सामने झुका हुआ था।
उसने फिर मौका नहीं छोड़ा।
उसने मेरे होंठ पकड़ लिए।
उसका गटके वाला मुँह मेरे मुँह में घुस गया।
उसकी जीभ मेरी जीभ से खेल रही थी।
गटके की कड़वाहट... मेरे रस की नमकीन मिठास... सब मिलकर मेरे मुँह में भर गया।
बहुत गंदा... बहुत तेज़... लेकिन मुझे बहुत अच्छा लग रहा था।
मैं बिल्लू को जवाब दे रही थी — जीभ से, होंठों से।
लेकिन मेरा पूरा ध्यान... नीचे अंकल पर था।
उसकी जीभ... उसकी उँगलियाँ... वो सब... मुझे पागल कर रहे थे।
पहला ऑर्गेज़्म आया था।
दूसरा ऑर्गेज़्म... और तेज़ आया।
मैंकई बार झड़ गई।
मैं... और चाहती थी।
एक और... वो गहरा, पागल करने वाला एहसास।
मैं तैयार थी... जो भी करना पड़े... वो करने को।
फिर वो नीचे सरका।
उसका मुँह मेरे स्तनों पर आ गया।
पहली बार... बिल्लू मेरे स्तनों को चख रहा था।
वो एक भूखे बच्चे की तरह चूस रहा था — बाएँ स्तन को मुँह में लेकर ज़ोर से चूसता, जीभ से निप्पल घुमाता... फिर दाएँ पर।
मेरे स्तन पहले से ही अंकल की थूक से गीले थे।
लेकिन बिल्लू को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।
वो और ज़ोर से चूस रहा था।
उसकी जीभ मेरे निप्पल्स पर घूम रही थी।
वो दाँतों से हल्का-हल्का काट भी रहा था।
नीचे... अंकल अब मेरी चूत पर था।
वो बिल्लू की थूक और मेरे रस को चाट रहा था।
दोनों मर्द... अब किसी भी हाल में रुकने वाले नहीं थे।
बिल्लू मेरे स्तनों से नीचे सरका।
उसकी जीभ मेरी पेट पर... नाभि पर आ गई।
उसने नाभि में जीभ डाल दी।
बहुत गहराई तक... घुमाते हुए... चाटते हुए।
जैसे वो मेरे पूरे शरीर को अपनी थूक से गंदा करना चाहता हो।
बिल्लू अब फिर से मेरी चूत की तरफ झुक गया।
अंकल अभी भी मेरी चूत पर काम कर रहा था — उसकी जीभ क्लिट पर घूम रही थी, उँगलियाँ अंदर-बाहर हो रही थीं।
बिल्लू ने जगह बनाई।
उसकी जीभ मेरी चूत के ऊपरी हिस्से पर आ गई।
अब दोनों की जीभें... एक साथ... मेरी चूत पर थीं।
अंकल क्लिट और नीचे वाले हिस्से पर... बिल्लू ऊपरी हिस्से और सिलवटों पर।
दो जीभें... दो अलग-अलग स्पर्श... एक साथ।
मैं पागल हो गई।
मेरा शरीर काँप रहा था।
जाँघें थरथरा रही थीं।
मैंने अंकल के बाल पकड़े... बिल्लू के सिर को दबाया।
दोनों की जीभें मेरी चूत पर मिल रही थीं।
कभी-कभी उनकी जीभें एक-दूसरे को भी छू जातीं।
मैं ये सब महसूस कर रही थी।
बहुत गंदा... बहुत तेज़... लेकिन मेरे लिए... स्वर्ग जैसा।
मैं फिर से झड़ने वाली थी।
ये ऑर्गेज़्म पिछले वाले से भी ज़्यादा तीव्र था।
मेरा शरीर कस गया।
मेरा रस... दोनों के मुँह में... उनके चेहरों पर... बह गया।
मैं काँपती हुई... पूरी तरह झड़ गई।
अगले एक मिनट तक मेरा पूरा शरीर सिर्फ़ काँपता रहा।
मैं झड़ चुकी थी... लेकिन झटके अभी भी आ रहे थे।
मेरी जाँघें थरथरा रही थीं, साँसें बहुत तेज़ चल रही थीं।
धीरे-धीरे... मैं शांत हुई।
मैंने घड़ी देखी।
लगभग एक घंटा हो चुका था।
कॉलेज का गेट बंद होने वाला था।
मैंने भारी साँसों के साथ कहा —
“अंकल... अब हमें जाना चाहिए...
कॉलेज का गेट बंद हो जाएगा।”
अंकल ने तुरंत समझ लिया।
वो उठ गया।
मैं भी सीट पर बैठ गई।
मैंने चारों तरफ देखा — मेरी ब्रा कहाँ गई?
मैंने ब्रा ढूँढनी शुरू की।
जैसे ही मैं सीट पर बैठी, अंकल फिर से अंदर आ गया।
उसने मुझे झपट्टा मारा।
बहुत जोर से... बहुत भूख से किस करने लगा।
उसके होंठ मेरे होंठों पर थे।
उसने मेरे हाथ पकड़े और अपने लुंड पर रख दिए।
उसका लुंड... बहुत सख्त... बहुत गर्म... फड़क रहा था।
वो मेरे कान में हाँफते हुए बोला —
“हिलाओ... हिलाओ नेहा... जल्दी..."
मैंने अपना हाथ ऊपर-नीचे करने शुरू कर दिया।
कुछ ही झटकों में... अंकल झड़ गया।
उसका गाढ़ा, गरम वीर्य... मेरी जाँघों पर... स्कर्ट पर... फैल गया।
अंकल ने मुझे आखिरी बार बहुत गहरा किस किया।
उसके होंठ मेरे होंठों पर थे... जैसे वो इस पल को हमेशा के लिए अपने अंदर कैद करना चाहता हो।
फिर उसने अपना लुंड मेरी जाँघों पर रखा और आखिरी बूँदें भी निकाल दीं।
गरम, गाढ़ा वीर्य मेरी जाँघों पर फैल गया।
वो धीरे से उठा।
पैंट ठीक की।
फिर आगे बैठ गया और कार स्टार्ट कर दी।
मैं एक पल के लिए वैसी ही बैठी रही।
मेरी जाँघें... पूरी तरह गीली और गंदी थीं।
अंकल का वीर्य... बिल्लू की थूक... मेरा रस... सब मिलकर चिपचिपा हुआ था।
मैंने चारों तरफ देखा — कुछ साफ़ करने के लिए ढूँढा।
बिल्लू अभी भी फर्श पर बैठा था।
उसने मुझे देखा।
फिर बिना किसी झिझक के... अपना गंदा शर्ट उतारा।
उसने शर्ट से मेरी जाँघें पोंछनी शुरू कर दीं।
धीरे-धीरे... बहुत ध्यान से... अंकल के वीर्य को साफ़ कर रहा था।
उसके हाथ... मेरी जाँघों पर... बिना किसी शर्म के।
मैंने ब्रा पहनी।
फिर स्कर्ट नीचे की।
पैंटी... कार में ही... हिलते-डुलते... पहन ली।
कार अब फिर से तेज़ हो गई थी।
हम हाईवे पर थे।
कॉलेज की तरफ बढ़ रहे थे।
बिल्लू अब मेरी बाईं तरफ सरक आया था।
वो कुछ नहीं बोल रहा था।
समय बहुत कम बचा था।
मैं थोड़ी चिंतित थी — कॉलेज का गेट कब बंद हो जाए, पता नहीं।
लेकिन बिल्लू के हाथ... मेरे चारों तरफ थे।
वो हर संभव मौके का फायदा उठा रहा था।
उसके हाथ मेरे कपड़ों के ऊपर से मेरे शरीर को महसूस कर रहे थे — कमर, जाँघें, स्तन... कहीं भी छूट नहीं रहा था।
उसने मेरी गर्दन पर किस किया।
फिर कान के पास फुसफुसाया —
“प्लीज... जो तुम साहब के साथ करती हो... वो मेरे साथ भी कर दो...”
मैंने उसकी तरफ देखा।
वो पहले से ही अपनी पैंट नीचे कर चुका था।
उसका लुंड बाहर था।
मैंने देखा... और हल्का-सा हँस पड़ी।
ये बिल्कुल अलग था।
मैंने सोचा था कि ये काला होगा... लेकिन ये गुलाबी था।
फोरस्किन नहीं थी।
बहुत मोटा... लेकिन छोटा... जैसे मेंढक का सिर।
बिल्लू ने मेरे हाथ को पकड़कर अपने लुंड पर रख दिया।
मैं समझ गई — वो चाहता है कि मैं उसे झड़वाऊँ।
मैंने उसे पकड़ लिया।
दूसरा लुंड... मेरी ज़िंदगी में... सिर्फ़ 10 मिनट के अंदर।
मैंने हाथ ऊपर-नीचे करना शुरू कर दिया।
बिल्लू की साँसें तेज़ हो गईं।
वो मेरी गर्दन चूस रहा था।
कुछ ही झटकों में... वो झड़ गया।
उसका वीर्य... कार की आगे वाली सीट की पीठ पर... छींटों में गिरा।
वो हाँफते हुए पीछे टिक गया।
मैंने अपना हाथ देखा — उस पर भी थोड़ा वीर्य लगा था।
मैंने उसे अपनी स्कर्ट पर पोंछ लिया।
कार कॉलेज गेट के ठीक बाहर रुक गई।
मैंने जल्दी से अपने कपड़े ठीक किए — शर्ट के बटन बंद किए, स्कर्ट नीचे की, बालों को हाथ से संवारा।
बाहर से देखने में मैं पूरी तरह डिसेंट लग रही थी — एक नॉर्मल कॉलेज स्टूडेंट।
बिल्लू और अंकल अब आगे वाली सीट पर बैठे थे।
मैं अकेली पीछे।
लेकिन कार के अंदर का माहौल... पूरी तरह अलग था।
हवा में भारी गंध थी — पसीना, गटका, बीड़ी, वीर्य... सब मिला हुआ।
सीट पर... जाँघों पर... आगे वाली सीट की पीठ पर... कहीं-कहीं सूखे वीर्य के धब्बे दिख रहे थे।
मैंने अपना बैग उठाया।
दरवाज़ा खोलने ही वाली थी कि बिल्लू ने पीछे मुड़कर कहा —
“लेकिन... तुमने मेरा तो मुँह में नहीं लिया... जैसा साहब का लिया था झोपड़ी में।”
मैं चुप रही।
कोई जवाब नहीं दिया।
मैं कार से उतरी।
गेट की तरफ बढ़ी।
कुछ कदम चलने के बाद... मैंने पीछे मुड़कर देखा।
अंकल और बिल्लू दोनों मुझे देख रहे थे।
मैंने धीरे से मुस्कुराया।
फिर... आँख मारते हुए कहा —
“नेक्स्ट टाइम।”
दोनों के चेहरे पर एक साथ मुस्कान फैल गई।
मैंने मुड़कर गेट की तरफ बढ़ गई।
पीछे कार धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
मैं कॉलेज के अंदर दाखिल हुई।
बाहर से देखने में मैं बिल्कुल नॉर्मल थी — लेकिन अंदर... मेरी चूत अभी भी गीली थी।
जाँघें चिपचिपी थीं।
मेरे मुँह में अभी भी दोनों का स्वाद था।


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