Yesterday, 12:14 PM
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अब आगे...................
आज दशहरे का दिन था और पास के गाँव मे बहुत बड़ा मेला लगा था,जहा रावण को जलाया जाने वाला था। पूरा राजपुरा वही जा रहा था। मेनका ने भी महल के एक-एक नौकर को वही भेज दिया,यहा तक की गेट पे एक गार्ड को भी नही रहने दिया। जब उन्होने उसके बारे मे पूछा तो उसने कहा कि वो सेशाद्री साहब की फॅमिली के साथ आ जाएगी।
पूरा गाँव मेले की ओर जा रहा था और थोड़ी ही देर बाद राजपुरा मे सन्नाटा च्छा गया और महल मे भी। मेनका नही चाहती थी कि जब्बार महल आए तो कोई भी देखे।
"रानी साहिबा,मैं एक घंटे बाद महल पहुँच जाऊँगा।" मैत्री रचित.
"ठीक है,सेशाद्री अंकल। मैं आपके साथ ही दशहरे के मेले मे जाउंगी।",मेनका ने फोन रख दिया। तभी बाहर कोई कार रुकने की आवाज़ आई।
मेनका बाहर आई तो देखा कि कार से जब्बार,मलिका और सोढी उतर रहे हैं।
"नमस्कार रानी साहिबा,हम आ गये आपका भार हल्का करने। चलिए पेपर्स साइन करते हैं।"जब्बार नशे मे चूर बोले जा रहा था।
तीनो मेनका के साथ अंदर हॉल मे आकर बैठ गये। हॉल मे कुछ अजीब सी बू आ रही थी। मलिका बुरा सा मुँह बनाते हुए मेनका से बोली,"कुछ बदबू नही आ रही?"
"नही तो।"
"ये लीजिए पेपर्स,साइन कीजिए और अगले 3 दीनो मे आपके बॅंक अकाउंट्स मे सारे पैसे जमा हो जाएँगे।",जब्बार ने कुछ काग़ज़ मेनका की तरफ बढ़ाए।
मेनका ने काग़ज़ उठाए और बगल की टेबल से एक लाइटर उठाकर उन पेपर्स को आग लगा दी।
"ये क्या बेहूदगी है!",जब्बार चीखा। प्रस्तुतकर्ता मैत्री है.
"नीच इंसान! तूने ये सोच भी कैसे लिया कि हम तुझे,उस इंसान को,जिसने हमारे खानदान को तबाह कर दिया,उसे अपनी अमानत बेचेंगे!" मेनका ने जलते कागज़ात सोफे पे फेंक दिए जिस से कि सोफा धू-धू कर जलने लगा। आग तेज़ी से हॉल मे फैलने लगी तो मलिका को समझ मे आया कि वो बू पेट्रोल की थी। वो घबरा गयी। आख़िर ये रानी क्या चाहती है?
"हमे यहा से निकलना चाहिए,जब्बार। ये औरत पागल हो गयी है। खुद भी मरेगी हमे भी मारेगी।" उसने जब्बार का हाथ पकड़ कर बाहर निकलने का इशारा किया।
"तुम लोग कही नही जाओगे। यही इस आग मे जलके अपने कर्मो की सज़ा पाओगे।" मेनका गर्जि।
" साली मादरचोद,कुतिया!",जब्बार ने झपट कर मेनका को पकड़ लिया पर तभी एक करारा हाथ उसके जबड़े पे पड़ा। सोढी ने उसे मारा था पर सोढी कहा! ये तो....ये तो कोई और था। सोढी ने अपनी पगड़ी उतार फेंकी थी,जब्बार ने गौर से देखा तो उसकी आँखे हैरत से फैल गयी। ये तो राजा,यशवीरसिंग था। इतने दिन ये आदमी भेस बदल कर उसके पास आता रहा,बात करता रहा और वो अपने सबसे बड़े दुश्मन को पहचान नही पाया!
किसी ने सही कहा है,विनाश काले विपरीत बुद्धि।
"जब्बार,तूने हमारे दोनो मासूम बेटो को मौत की नींद सुला दिया। उनका क्या कसूर था। हमारे पिताजी की ग़लती की सज़ा हमे देता। एक मर्द की तरह सामने से वार करता, पर नही तू एक बुज़दिल चूहा है और आज चूहे की मौत मरेगा।"
आग ने पूरे हॉल को अपने आगोश मे ले लिया था। मलिका नज़र बचा कर भागने ही वाली थी कि तभी राजासाहब ने उसे पकड़ लिया,"तूने भी विश्वा की हत्या की थी। तेरे दूसरे आशिक़ कल्लन ने हमे सब बताया था,चल!",राजासाहब ने उसे एक रस्सी से बाँध वही फर्श पे पटक दिया। मलिका अपनी जान की भीख मांगती रही पर राजासाहब और मेनका जैसे बहरे हो गये थे।
थोड़ी ही देर मे मलिका की चीखें बढ़ती लपटो मे घुट गयी। मैत्री की पेशकश.
राजासाहब ने जब्बार को एक जलती लकड़ी से जम कर पीटा और आख़िर मे उस लकड़ी से उसके चेहरे को झुलस कर मौत के घाट पहुँचा दिया।
"मेनका,चलो यहा से निकले। सेशाद्री के आने से पहले हमे निकलना होगा। हमारा हाथ पकड़ो।" उन्होने मेनका का हाथ पकड़ा और जलते हुए हॉल से निकलने लगे कि तभी आग से खाक हो दीवार का एक बड़ा हिस्सा उनके सामने गिरा,"यश!",मेनका की चीख सुनाई दी ,फिर इतना धुआँ फैला कि कुछ नज़र नही आया।
वह दोनो ससुर और बहु, कहा गये?
निकल भी पाए की नही उस आग के तूफान से!
जल कर वे लोग भी मर गए????????????
चारो तरफ बस आग ही आग थी। सेशाद्री तो ये नज़ारा देख बेहोश ही हो गये। किसी तरह उन्होने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और पोलीस को और फायर ब्रिगेड को फोन मिलाने लगे।
**********************************
जानेंगे अगले एपिसोड में....तब तक के लिए मैत्री आपसे विदा लेती है। और आप इस एपिसोड और कहानी के बारे में अपने मंतव्य की प्रतीक्षा करेगी।
क्रमशः।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
जय भारत.
आज दशहरे का दिन था और पास के गाँव मे बहुत बड़ा मेला लगा था,जहा रावण को जलाया जाने वाला था। पूरा राजपुरा वही जा रहा था। मेनका ने भी महल के एक-एक नौकर को वही भेज दिया,यहा तक की गेट पे एक गार्ड को भी नही रहने दिया। जब उन्होने उसके बारे मे पूछा तो उसने कहा कि वो सेशाद्री साहब की फॅमिली के साथ आ जाएगी।
पूरा गाँव मेले की ओर जा रहा था और थोड़ी ही देर बाद राजपुरा मे सन्नाटा च्छा गया और महल मे भी। मेनका नही चाहती थी कि जब्बार महल आए तो कोई भी देखे।
"रानी साहिबा,मैं एक घंटे बाद महल पहुँच जाऊँगा।" मैत्री रचित.
"ठीक है,सेशाद्री अंकल। मैं आपके साथ ही दशहरे के मेले मे जाउंगी।",मेनका ने फोन रख दिया। तभी बाहर कोई कार रुकने की आवाज़ आई।
मेनका बाहर आई तो देखा कि कार से जब्बार,मलिका और सोढी उतर रहे हैं।
"नमस्कार रानी साहिबा,हम आ गये आपका भार हल्का करने। चलिए पेपर्स साइन करते हैं।"जब्बार नशे मे चूर बोले जा रहा था।
तीनो मेनका के साथ अंदर हॉल मे आकर बैठ गये। हॉल मे कुछ अजीब सी बू आ रही थी। मलिका बुरा सा मुँह बनाते हुए मेनका से बोली,"कुछ बदबू नही आ रही?"
"नही तो।"
"ये लीजिए पेपर्स,साइन कीजिए और अगले 3 दीनो मे आपके बॅंक अकाउंट्स मे सारे पैसे जमा हो जाएँगे।",जब्बार ने कुछ काग़ज़ मेनका की तरफ बढ़ाए।
मेनका ने काग़ज़ उठाए और बगल की टेबल से एक लाइटर उठाकर उन पेपर्स को आग लगा दी।
"ये क्या बेहूदगी है!",जब्बार चीखा। प्रस्तुतकर्ता मैत्री है.
"नीच इंसान! तूने ये सोच भी कैसे लिया कि हम तुझे,उस इंसान को,जिसने हमारे खानदान को तबाह कर दिया,उसे अपनी अमानत बेचेंगे!" मेनका ने जलते कागज़ात सोफे पे फेंक दिए जिस से कि सोफा धू-धू कर जलने लगा। आग तेज़ी से हॉल मे फैलने लगी तो मलिका को समझ मे आया कि वो बू पेट्रोल की थी। वो घबरा गयी। आख़िर ये रानी क्या चाहती है?
"हमे यहा से निकलना चाहिए,जब्बार। ये औरत पागल हो गयी है। खुद भी मरेगी हमे भी मारेगी।" उसने जब्बार का हाथ पकड़ कर बाहर निकलने का इशारा किया।
"तुम लोग कही नही जाओगे। यही इस आग मे जलके अपने कर्मो की सज़ा पाओगे।" मेनका गर्जि।
" साली मादरचोद,कुतिया!",जब्बार ने झपट कर मेनका को पकड़ लिया पर तभी एक करारा हाथ उसके जबड़े पे पड़ा। सोढी ने उसे मारा था पर सोढी कहा! ये तो....ये तो कोई और था। सोढी ने अपनी पगड़ी उतार फेंकी थी,जब्बार ने गौर से देखा तो उसकी आँखे हैरत से फैल गयी। ये तो राजा,यशवीरसिंग था। इतने दिन ये आदमी भेस बदल कर उसके पास आता रहा,बात करता रहा और वो अपने सबसे बड़े दुश्मन को पहचान नही पाया!
किसी ने सही कहा है,विनाश काले विपरीत बुद्धि।
"जब्बार,तूने हमारे दोनो मासूम बेटो को मौत की नींद सुला दिया। उनका क्या कसूर था। हमारे पिताजी की ग़लती की सज़ा हमे देता। एक मर्द की तरह सामने से वार करता, पर नही तू एक बुज़दिल चूहा है और आज चूहे की मौत मरेगा।"
आग ने पूरे हॉल को अपने आगोश मे ले लिया था। मलिका नज़र बचा कर भागने ही वाली थी कि तभी राजासाहब ने उसे पकड़ लिया,"तूने भी विश्वा की हत्या की थी। तेरे दूसरे आशिक़ कल्लन ने हमे सब बताया था,चल!",राजासाहब ने उसे एक रस्सी से बाँध वही फर्श पे पटक दिया। मलिका अपनी जान की भीख मांगती रही पर राजासाहब और मेनका जैसे बहरे हो गये थे।
थोड़ी ही देर मे मलिका की चीखें बढ़ती लपटो मे घुट गयी। मैत्री की पेशकश.
राजासाहब ने जब्बार को एक जलती लकड़ी से जम कर पीटा और आख़िर मे उस लकड़ी से उसके चेहरे को झुलस कर मौत के घाट पहुँचा दिया।
"मेनका,चलो यहा से निकले। सेशाद्री के आने से पहले हमे निकलना होगा। हमारा हाथ पकड़ो।" उन्होने मेनका का हाथ पकड़ा और जलते हुए हॉल से निकलने लगे कि तभी आग से खाक हो दीवार का एक बड़ा हिस्सा उनके सामने गिरा,"यश!",मेनका की चीख सुनाई दी ,फिर इतना धुआँ फैला कि कुछ नज़र नही आया।
वह दोनो ससुर और बहु, कहा गये?
निकल भी पाए की नही उस आग के तूफान से!
जल कर वे लोग भी मर गए????????????
चारो तरफ बस आग ही आग थी। सेशाद्री तो ये नज़ारा देख बेहोश ही हो गये। किसी तरह उन्होने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और पोलीस को और फायर ब्रिगेड को फोन मिलाने लगे।
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जानेंगे अगले एपिसोड में....तब तक के लिए मैत्री आपसे विदा लेती है। और आप इस एपिसोड और कहानी के बारे में अपने मंतव्य की प्रतीक्षा करेगी।
क्रमशः।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
जय भारत.


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