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पार्ट--16
गतान्क से आगे।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
जब्बार ने मेनका और सोढी की मीटिंग करवा दी जिसमे मेनका उसे अपना हिस्सा बेचने को राज़ी हो गयी। जब्बार की तो खुशी का ठिकाना नही था। अब तो वो बेसब्री से उस दिन का इंतेज़ार कर रहा था जिस दिन मिल्स के पेपर्स उसके हाथों मे आते।
इधर मेनका ने सपरू साहब के साथ चुप-चाप डील साइन कर ली। इस डील के मुताबिक दशहरे के अगले दिन एक फॉर्मल अनाउन्स्मेंट होनी थी जिसके बाद मिल्स के मालिक सपरू साहब हो जाते। मेनका ने अपनी वसीयत मे भी ज़रूरी बदलाव कर दिए।
और आख़िर दशहरे का दिन आ ही गया जब जब्बार का सपना पूरा होने वाला था। आज वो सुबह से ही बॉटल खोल कर बैठा था और अभी जब शाम के 4 बज रहे थे,पी कर पूरी तरह से नशे मे था। मैत्री रचित कहानी.
"सोढीसाहब,आप ना होते तो मैं आज का दिन कभी नही देख पता। थेंक यु,सर!"
"अरे,जब्बार भाई इसमे थॅंक्स की क्या बात है,आपने हमारी मदद की हमने आपकी।बस।"
"नही,सर। आपने मुझपे बहुत बड़ी कृपा की है,आज। आज जाके मेरी मा की आत्मा को शांति मिलेगी।"
"जी,मैं समझा नही।"
"सोढी साहब अपने मुझे अपनी दास्तान सुनाई थी ना कि कैसे राजा ने आपकी ज़िंदगी का रुख़ बदल दिया। आज मैं आपको अपनी कहानी सुनाता हूँ।"
"मैं कोई 13-14 साल का था। मैं शहर मे अपनी मा के साथ रहता था,पिता तो थे ही नही। माँ के लिए तो बस मैं ही सब कुछ था,हर वक़्त उसे बस मेरी ही फ़िक्र लगी रहती थी। पर एक बात थी जो मुझे कभी-कभी ख़टकती थी। मैं बड़ा हो रहा था और मैने एक बात गौर की थी कि हर शनिवार को माँ शाम 5 बजते कही चली जाती और दूसरे दिन दोपहर 2-3 बजे तक आती। पुच्छने पर टाल जाती कि पास के गाँव के मंदिर जाती है और चूँकि वहा बहुत भीड़ रहती है इसीलिए उसे इतना समय लगता है।"
"...माँ अपनी एक सहेली के परिवार के पास मुझे छोड़ कर जाती थी पर इधर कुछ महीनो से मैं अकेला ही घर पे रह जाता था,अब मैं बड़ा हो रहा था और किसी और के घर पे रहना मुझे अच्छा नही लगता था। उस शनिवार भी मा शाम होते चली गयी। मैं घर पे यूही बैठा था कि तभी मेरा एक दोस्त आ गया और मुझ से साथ मे बाज़ार चलने को कहने लगा। माँ तो दूसरे दिन से पहले आती नही सो मैं उस के साथ चला गया।"
"...हम काफ़ी देर तक बाज़ार मे घूमते रहे कि तभी एक आलीशान कार की पिछली सीट के दरवाज़े को खोल कर अंदर बैठती मुझे माँ नज़र आई। मैं उस तरफ बढ़ गया। मुझे हैरत हो रही थी माँ इतनी शानदार कार मे! मैं उस कार की तरफ बढ़ ही रहा था कि तभी देखा कि दूसरी तरफ का दरवाज़ा खोल कर एक शख्स कार के अंदर बैठा और बैठते ही माँ को बाहों मे भर लिया। आगे मैं कुछ देख नही पाया क्यो कि कार के काले शीशे बंद हो गये थे और कार वहा से निकल गयी।"
********************************
आज के लिए बस यही तक.
जय भारत.
गतान्क से आगे।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
जब्बार ने मेनका और सोढी की मीटिंग करवा दी जिसमे मेनका उसे अपना हिस्सा बेचने को राज़ी हो गयी। जब्बार की तो खुशी का ठिकाना नही था। अब तो वो बेसब्री से उस दिन का इंतेज़ार कर रहा था जिस दिन मिल्स के पेपर्स उसके हाथों मे आते।
इधर मेनका ने सपरू साहब के साथ चुप-चाप डील साइन कर ली। इस डील के मुताबिक दशहरे के अगले दिन एक फॉर्मल अनाउन्स्मेंट होनी थी जिसके बाद मिल्स के मालिक सपरू साहब हो जाते। मेनका ने अपनी वसीयत मे भी ज़रूरी बदलाव कर दिए।
और आख़िर दशहरे का दिन आ ही गया जब जब्बार का सपना पूरा होने वाला था। आज वो सुबह से ही बॉटल खोल कर बैठा था और अभी जब शाम के 4 बज रहे थे,पी कर पूरी तरह से नशे मे था। मैत्री रचित कहानी.
"सोढीसाहब,आप ना होते तो मैं आज का दिन कभी नही देख पता। थेंक यु,सर!"
"अरे,जब्बार भाई इसमे थॅंक्स की क्या बात है,आपने हमारी मदद की हमने आपकी।बस।"
"नही,सर। आपने मुझपे बहुत बड़ी कृपा की है,आज। आज जाके मेरी मा की आत्मा को शांति मिलेगी।"
"जी,मैं समझा नही।"
"सोढी साहब अपने मुझे अपनी दास्तान सुनाई थी ना कि कैसे राजा ने आपकी ज़िंदगी का रुख़ बदल दिया। आज मैं आपको अपनी कहानी सुनाता हूँ।"
"मैं कोई 13-14 साल का था। मैं शहर मे अपनी मा के साथ रहता था,पिता तो थे ही नही। माँ के लिए तो बस मैं ही सब कुछ था,हर वक़्त उसे बस मेरी ही फ़िक्र लगी रहती थी। पर एक बात थी जो मुझे कभी-कभी ख़टकती थी। मैं बड़ा हो रहा था और मैने एक बात गौर की थी कि हर शनिवार को माँ शाम 5 बजते कही चली जाती और दूसरे दिन दोपहर 2-3 बजे तक आती। पुच्छने पर टाल जाती कि पास के गाँव के मंदिर जाती है और चूँकि वहा बहुत भीड़ रहती है इसीलिए उसे इतना समय लगता है।"
"...माँ अपनी एक सहेली के परिवार के पास मुझे छोड़ कर जाती थी पर इधर कुछ महीनो से मैं अकेला ही घर पे रह जाता था,अब मैं बड़ा हो रहा था और किसी और के घर पे रहना मुझे अच्छा नही लगता था। उस शनिवार भी मा शाम होते चली गयी। मैं घर पे यूही बैठा था कि तभी मेरा एक दोस्त आ गया और मुझ से साथ मे बाज़ार चलने को कहने लगा। माँ तो दूसरे दिन से पहले आती नही सो मैं उस के साथ चला गया।"
"...हम काफ़ी देर तक बाज़ार मे घूमते रहे कि तभी एक आलीशान कार की पिछली सीट के दरवाज़े को खोल कर अंदर बैठती मुझे माँ नज़र आई। मैं उस तरफ बढ़ गया। मुझे हैरत हो रही थी माँ इतनी शानदार कार मे! मैं उस कार की तरफ बढ़ ही रहा था कि तभी देखा कि दूसरी तरफ का दरवाज़ा खोल कर एक शख्स कार के अंदर बैठा और बैठते ही माँ को बाहों मे भर लिया। आगे मैं कुछ देख नही पाया क्यो कि कार के काले शीशे बंद हो गये थे और कार वहा से निकल गयी।"
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आज के लिए बस यही तक.
जय भारत.


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