15-04-2026, 12:34 PM
अध्याय 4
सलीम अब धीरे-धीरे अपना हाथ उनके मखमली गले से नीचे उतार रहा था, और अम्मी बस 'साहिल' का नाम जपने के अलावा और कुछ नहीं कर पा रही थीं।
उस बंद और घुटन भरी गैलरी में वक्त जैसे थम सा गया। अम्मी की तेज़ होती साँसें उस नीली सिल्क की नाइटगाउन के नीचे एक तूफ़ान की तरह उठ और गिर रही थीं। सलीम की आँखों में हवस की सुर्ख़ी उतर आई थी, अब पूरी तरह बेखौफ हो चुका था।
उसने अपना काला हाथ धीरे से अम्मी की गर्दन से नीचे उतारा और बिना किसी हिचकिचाहट के उसे सीधे अम्मी के भरे हुए और पुष्ट सीने पर रख दिया।
जैसे ही सलीम की हथेलियाँ उस नीले रेशमी कपड़े के ऊपर से अम्मी के नर्म और मांसल उभार से टकराईं, अम्मी के मुँह से एक ऐसी सिसकी निकली जो दर्द और बेइंतहा शर्म का मिला-जुला शोर थी। उस नीली सिल्क की पतली परत के नीचे अम्मी का वह दूधिया बदन इतना कोमल था कि उस शख्स की उंगलियाँ उनके मखमली त्वचा में धंसती चली गईं।
उसने अपने हाथ की पकड़ मज़बूत की और अम्मी के उस गर्व से भरे उरोज को अपनी मुट्ठी में भींच लिया। अम्मी का पूरा शरीर एक झटके के साथ कमान की तरह मुड़ गया। उनके गुलाबी होंठ थरथराने लगे और उन्होंने अपनी दोनों आँखें इतनी ज़ोर से मींच लीं कि उनके पलकों के कोनों से आँसू छलक पड़े।
उस मंज़र को देखकर पीछे खड़े रऊडी लड़कों का उत्साह सातवें आसमान पर पहुँच गया।
सलीम: "वाह राजू! क्या नर्म और गरम माल है! कसम से, इस दूधिया सफेदी का अहसास तो मखमल से भी ज़्यादा कीमती लग रहा है।"
उनमें से एक ने सीटी बजाई, जबकि दूसरा अम्मी की पतली कमर और पीछे के उन सुडौल कूल्हों को देखकर अपनी ज़ुबान लबों पर फेर रहा था।
अम्मी का वह नूरानी चेहरा अब खौफ और जिल्लत से काला पड़ रहा था। वह सलीम के सीने पर अपने गोरे हाथ रखकर उसे दूर धकेलने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन सलीम की ताक़त के सामने उनकी नज़ाकत हार रही थी। उनके उभरे हुए सीने का वह हिस्सा, जिसे सलीम ने दबोच रखा था, उस नीले कपड़े के खिंचाव की वजह से और भी ज़्यादा नुमाया हो गया था।
मैं यह सब देख रहा था—अपनी अम्मी के उस कातिलाना और सेक्सी बदन को इस तरह सरेआम कुचले जाते हुए। मेरे कंधे पर रखा हाथ अब मुझे और ज़ोर से दबा रहा था, जैसे वह मुझे इस 'तमाशे' का गवाह बनने पर मजबूर कर रहा हो। एक तरफ अम्मी की वह सिसकियाँ मेरा दिल चीर रही थीं, और दूसरी तरफ उनके उस बेपनाह हुस्न की यह नग्न और दर्दनाक नुमाइश मेरे टीनएज दिमाग को सुन्न कर रही थी।
अम्मी का वह नीला रेशमी गाउन अब उनके जिस्म की हर हरकत के साथ उनके चौड़े कूल्हों और स्तनों के उभार को और भी साफ़ दिखा रहा था।
सलीम अब दूसरे हाथ से अम्मी की कमर को सहलाते हुए नीचे की तरफ बढ़ रहा था, और अम्मी बस बेबसी में अपना सिर दीवार पर टिकाए हुए सिसक रही थीं।
अम्मी की सिसकियाँ अब एक बेबस इल्तजा में बदल चुकी थीं। उनकी आँखों से बहते आँसू उनके दूधिया गालों को भिगो रहे थे। उस सांवले शख्स का हाथ अभी भी अम्मी के भरे हुए सीने पर अपनी पकड़ बनाए हुए था, और नीली सिल्क की नाइटगाउन के नीचे अम्मी का वह मखमली बदन खौफ से थरथरा रहा था।
अम्मी: (आसमान की तरफ नज़रें उठाकर, सुबकते हुए) "या अल्लाह... मेरी इज़्ज़त की हिफाज़त कर! किसी फरिश्ते को भेज दे मौला... रहम कर!"
उनकी इस तड़प भरी आवाज़ पर वे आवारा लड़के और भी ज़ोर से हँसने लगे। सलीम अम्मी के गोरे चेहरे के और करीब आया, उसके चेहरे पर एक दरिंदा मुस्कान थी।
सलीम: "यहाँ कोई फरिश्ता नहीं आएगा जान, यहाँ बस हम हैं और तेरा यह कातिलाना बदन..."
अभी उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि बगल वाले कंपार्टमेंट का भारी लोहे का दरवाज़ा एक धमाके के साथ खुला। ट्रेन के शोर के बीच वह आवाज़ किसी गर्जना जैसी थी।
सामने एक सिख सज्जन खड़े थे—कद 6 फीट 2 इंच, चौड़ा सीना, और बदन पर सिक्युरिटी की रौबदार वर्दी। उनकी आँखों में बिजली सी चमक थी । वर्दी पर लगे सितारे डिम लाइट में चमक रहे थे। उन्होंने एक पल में उस पूरे मंज़र को अपनी पैनी नज़रों से नाप लिया—अम्मी का वह नीला रेशमी लिबास जो बेतरतीब हो चुका था, उनके नंगे सफेद कंधे, उनकी सिसकियाँ, और उन भेड़ियों के गंदे हाथ।
जैसे ही उन्होंने देखा कि एक गंदा हाथ अम्मी के पुष्ट सीने को दबोचे हुए है, उनका चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उन्होंने अपनी भारी, रोबीली आवाज़ में दहाड़ मारी, जिससे पूरा गलियारा कांप उठा।
सिख ऑफिसर: ( सिक्युरिटीिया कड़क आवाज़ में) "ओए! ये क्या बदतमीज़ी हो रही है यहाँ?! हाथ हटा पीछे!"
उनकी वह आवाज़ किसी फरिश्ते की दस्तक से कम नहीं थी। अम्मी की आँखों में उम्मीद की एक किरण जागी। सलीम, जो अभी तक शेर बना हुआ था, उस 6 फीट 2 इंच के वर्दीधारी को देखकर एकदम से जम गया। उसका हाथ अम्मी के नर्म उरोज से झटके के साथ पीछे हटा, जैसे किसी ने उसे बिजली का झटका दे दिया हो।
बाकी के तीन लड़के, जो मुझे घेरे हुए थे और अम्मी की पीछली बनावट और कूल्हों का नज़ारा ले रहे थे, उनके चेहरे का रंग फक पड़ गया। वे फौरन मुझसे दूर हट गए।
सिख ऑफिसर: (आगे बढ़ते हुए) "क्या समझ रखा है? ये ट्रेन है या तुम्हारा घर? ज़रा पीछे हटो सब के सब, वरना अभी ऐसी जगह मारूँगा कि सारी जवानी भूल जाओगे!"
अम्मी फौरन उस सांवले शख्स की गिरफ्त से छूटीं और लड़खड़ाती हुई मेरी तरफ भागीं। उन्होंने अपना ढीला-ढाला अबाया मेरे हाथ से झपटा और उसे अपनी नीली नाइटगाउन के ऊपर लपेट लिया, ताकि उनका वह बेपनाह और सेक्सी बदन दोबारा पर्दों में छिप सके।
उनका पूरा वजूद अभी भी कांप रहा था, और मैं उन्हें सहारा देते हुए उस ऑफिसर के पीछे खड़ा हो गया।
सलीम की हिमाकत अभी कम नहीं हुई थी। अपनी सांवली और पसीने से तरबतर देह को सिकोड़ते हुए उसने उस 6 फीट 2 इंच के सिख ऑफिसर की आँखों में आँखें डालने की जुर्रत की। उसे लगा कि शायद पैसा या रसूख इस वर्दी को झुका देगा।
सलीम: (हिकारत भरी और धौंस वाली आवाज़ में) "ओए सरदार साहब! आप बीच में मत पड़ें। अपनी ड्यूटी करो और किनारे हो जाओ। आपको आपका 'मेहनताना' मिल जाएगा, बस हमें अकेला छोड़ दो। आप शायद जानते नहीं कि हम किसके आदमी हैं… शहर के बड़े-बड़े अफसरों को रोज़ 'हफ्ता' देते हैं हम। आप जैसे कितनों को जेब में रखते हैं।"
यह सुनते ही अम्मी, जो अभी-अभी उस नीली सिल्क की नाइटगाउन को अपने काले अबाया में छुपा पाई थीं, खौफ के मारे फिर से कांपने लगीं। उन्हें लगा कि शायद यह सिक्युरिटी वाला भी उन गुंडों से मिल जाएगा।
मगर उस ऑफिसर के चेहरे पर जो गुस्सा उतरा, वह किसी जलजले से कम नहीं था। उनकी आँखों में खून उतर आया। जैसे ही 'हफ्ते' का ज़िक्र हुआ, उन्होंने बिजली की फुर्ती से अपना भारी हाथ हवा में लहराया।
"चटाक!"
एक ज़ोरदार तमाचा सलीम के गाल पर पड़ा, जिससे उसका सिर घूम गया। अभी वह खुद को संभाल भी नहीं पाया था कि ऑफिसर का एक वज्र जैसा घूँसा सीधे उसके पेट में धंसा।
सरताज सिंह: (दहाड़ते हुए) "हफ्ता देगा मुझे? कुत्ते की औलाद! मुझे खरीदेगा तू?"
उन्होंने सलीम का कॉलर पकड़ा और उसे दीवार से दे मारा। उनकी आवाज़ पूरे डिब्बे में गूँज रही थी, जिससे सोए हुए मुसाफिरों की भी आँखें खुलने लगीं।
सरताज सिंह: "ध्यान से सुन ले... सरताज नाम है मेरा! सरताज सिंह! तेरी और तेरे बाप की क्या, किसी की भी इतनी औकात नहीं कि सरताज सिंह को अपनी उंगली पर नचा सके। वर्दी पर दाग लगाने की बात करता है, साले, तेरी खाल उधेड़ दूँगा यहीं!"
बाकी के तीन लड़के, अब अपनी जान बचाने के लिए पीछे हटने लगे। ऑफिसर का वह रौब देखकर उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी।
सरताज सिंह: "ओए! तुम तीनों भी इधर आओ! लाइन में लगो वरना रेल की पटरी पर तुम्हारी हड्डियाँ गिनूँगा आज!"
अम्मी ने डर और राहत के मिले-जुले अहसास में मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया। उनके दूधिया सफेद हाथ अभी भी पसीने से भीगे हुए थे। वह उस 6 फीट 2 इंच के 'फरिश्ते' के पीछे दुबक गई थीं, जिनका नाम 'सरताज' वाकई उनके लिए उस वक्त खुदा का भेजा हुआ सिर का ताज साबित हो रहा था।
सरताज सिंह ने मुड़कर एक नज़र अम्मी के उस नूरानी मगर सहमे हुए चेहरे पर डाली। उनकी नज़रों में हवस नहीं, बल्कि एक रक्षक वाली हमदर्दी थी।
सरताज सिंह: "बहन जी, आप घबराइए मत। जब तक सरताज ज़िंदा है, कोई आपकी तरफ आँख उठाकर भी नहीं देख सकता। बेटा, अपनी अम्मी को लेकर अंदर जा, मैं इन कुत्तों का हिसाब यहीं चुकता करता हूँ।"
अम्मी की आँखों में शुक्रगुज़ारी के आँसू आ गए। उन्होंने अपने भारी सीने पर अबाया को और कस लिया, जैसे वह उस गंदी छुअन की यादों को मिटा देना चाहती हों, और हम धीरे-धीरे उस गलियारे से निकलने लगे।
दहशत और अफरातफरी के उस माहौल में सरताज सिंह का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उन्होंने बिजली की फुर्ती से अपनी कमर से चमड़े की भारी बेल्ट निकाली और दूसरी तरफ अपनी सरकारी रिवॉल्वर निकालकर उन चारों दरिंदों पर तान दी।
"कटाक... सड़ाक!"
बेल्ट की हर गूँज के साथ उन चारों रऊडी लड़कों की चीखें डिब्बे की दीवारों से टकरा रही थीं। सरताज सिंह उन्हें जानवरों की तरह पीट रहे थे। सलीम, जिसने अम्मी के मखमली बदन को छुआ था, अब फर्श पर पड़ा रहम की भीख मांग रहा था।
इसी बीच, अम्मी शुक्रगुज़ारी और घबराहट के आलम में दोबारा गलियारे की तरफ आईं। वह उस फरिश्ते का शुक्रिया अदा करना चाहती थीं, जिसने उनकी इज़्ज़त बचाई थी। पर जल्दबाजी और घबराहट में वह अपना काला अबाया पहनना भूल गईं। काला अबाया अभी भी उनके हाथ में था।
जब अम्मी ने देखा कि सरताज सिंह बेतहाशा उन लोगों को मार रहे हैं और वे चारों खून से लथपथ होकर तड़प रहे हैं, तो उनकी ममता और रहमदिली जाग उठी। उन्हें लगा कि शायद वे आज ज़िंदा नहीं बचेंगे।
अम्मी: (हाथ जोड़कर, कांपती हुई आवाज़ में) "सरदार साहब... बस कीजिए! खुदा के वास्ते इन्हें छोड़ दीजिए। ये मर जाएंगे... बहुत हो गया, प्लीज इन्हें माफ़ कर दीजिए!"
अम्मी जब बोल रही थीं, तो उनके पुष्ट सीने की हरकत और उनकी वह शहद जैसी मीठी आवाज़ उस तनावपूर्ण माहौल में एक अजीब सी नरमी घोल रही थी। सरताज सिंह ने हाथ रोका और अपनी गहरी नज़रों से एक बार अम्मी को ऊपर से नीचे तक देखा। उनकी नज़रों में उन भेड़ियों जैसी हवस तो नहीं थी, पर वह भी एक मर्द थे और अम्मी का वह नीला रेशमी हुस्न उनके सामने पूरी तरह बेपर्दा था।
सरताज सिंह ने अपनी रिवॉल्वर वापस होलस्टर में डाली और हाँफते हुए अम्मी की तरफ देखा।
सरताज सिंह: "बहन जी, आप बहुत भोली हैं। ये कुत्ते इसी लायक हैं। अगर आज मैं नहीं आता, तो ये आपकी इस कीमती इज़्ज़त और आपके इस मासूम वजूद के साथ क्या करते, आपको अंदाज़ा भी नहीं है।"
उन चारों लड़कों ने अम्मी के पैरों की तरफ हाथ फैलाए, "मैडम, हमें बचा लो... साहब हमें मार डालेंगे! माफ़ कर दो मैडम!"
अम्मी की आँखों में आँसू थे। उन्होंने मेरी तरफ देखा और फिर सरताज की तरफ। उन्हें अभी भी अहसास नहीं था कि वह महज़ एक तंग नाइटगाउन में खड़ी हैं, जिसमें उनकी सुडौल काया का एक-एक हिस्सा नुमाया हो रहा है।
सरताज सिंह: (थोड़ा धीमे स्वर में) "ठीक है, आपकी खातिर इन्हें छोड़ रहा हूँ। पर ओए! तुम चारों... अगले स्टेशन पर तुम सिक्युरिटी के हवाले होगे। अगर किसी ने हिलने की कोशिश की, तो सीधे गोली मारूँगा।"
अम्मी की आँखों में शुक्रगुज़ारी के आँसू थे और उनका दिल अभी भी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उस खौफनाक मंज़र से बाहर निकलने के बाद, सरताज सिंह उनके लिए किसी फरिश्ते से कम नहीं थे। वह धीरे-धीरे सरताज के और करीब गईं, ताकि उनका शुक्रिया अदा कर सकें।
अम्मी उस नीली सिल्क की नाइटगाउन में थीं, जो उनके भरे हुए बदन से चिपक कर उनके हर कर्व को नुमाया कर रही थी। उनके एक हाथ में वह काला अबाया मुड़ा हुआ रखा था, जिसे वह घबराहट में पहनना भूल गई थीं।
उस नीले रेशमी लिबास के नीचे अम्मी का दूधिया सफेद और सुडौल जिस्म रोशनी में किसी संगमरमर की मूरत जैसा दमक रहा था। उनके नंगे गोरे कंधे और पुष्ट सीने का उभार उस तंग कपड़े के खिंचाव की वजह से साफ़ नज़र आ रहा था।
अम्मी: (रुँधे हुए गले और शहद जैसी मीठी आवाज़ में) "सरदार साहब... आपने आज मुझ पर बहुत बड़ा अहसान कर दिया है। अगर आप न होते, तो पता नहीं मेरा क्या होता। मैं आपकी बहुत शुक्रगुज़ार हूँ... ताउम्र आपकी इस मदद को याद रखूँगी।"
अम्मी जब सरताज के इतने करीब खड़ी थीं, तो उनकी चमेली वाली खुशबू और उनके बदन की तपिश उस 6 फीट 2 इंच के गठीले ऑफिसर तक पहुँच रही थी। अम्मी का वह कातिलाना और सेक्सी हुस्न उस वक्त अपने पूरे शबाब पर था, और कोई भी आम मर्द होता तो उनकी उस नूरानी सफेदी और सुडौल बनावट को देखकर अपना ईमान खो देता।
मगर सरताज सिंह की शख्सियत कुछ और ही मिट्टी की बनी थी। उन्होंने अम्मी की तरफ देखा, पर उनकी नज़रों में उन भेड़ियों जैसी कोई हवस या गंदी चमक नहीं थी। उनके लिए अम्मी की वह बेपनाह खूबसूरती महज़ एक औरत की इज़्ज़त थी जिसे बचाना उनका फर्ज़ था। उनकी नज़र एकदम साफ़ और भाई जैसी थी।
सरताज सिंह: (नर्मी और भारी आवाज़ में) "बहन जी, बहनें कभी भाई को थैंक्स नहीं बोलतीं। ये मेरा फर्ज़ था।"
तभी सरताज की नज़र अम्मी के उन भरे हुए और मखमली अंगों पर पड़ी, जो उस पतली नाइटगाउन की वजह से पूरी तरह बेपर्दा हो रहे थे। अम्मी अपनी भावुकता में भूल गई थीं कि वह किस हाल में खड़ी हैं। सरताज ने बड़े सम्मान के साथ अपना हाथ आगे बढ़ाया और अम्मी के हाथ से वह काला अबाया ले लिया।
उन्होंने बिना किसी गंदी नीयत के, उस अबाया को खोला और बड़े ग्रेस के साथ अम्मी के सामने वाले हिस्से पर डाल दिया, ताकि उनका वह पुष्ट सीना और मखमली बदन दोबारा ढका जा सके।
सरताज सिंह: (नज़रें झुकाते हुए) "आप अंदर जाइए और इसे पहन लीजिए।"
अम्मी को अचानक अहसास हुआ कि वह किस हाल में थीं। उनका चेहरा शर्म से लाल हो गया, जैसे कश्मीर का सेब हो। उन्होंने जल्दी से उस अबाया को अपने नूरानी जिस्म पर लपेट लिया।
सरताज के उस एक कदम ने अम्मी के दिल में उनके लिए इज़्ज़त और भी बढ़ा दी थी। मैं अपनी अम्मी को उस फौलादी मर्द के साये में सुरक्षित महसूस करते देख रहा था, और मुझे अहसास हुआ कि असली मर्दानगी सिर्फ ताक़त में नहीं, बल्कि नज़र की पाकीज़गी में होती है।
अम्मी, सरताज सिंह की उस दरियादिली और पाकीज़ा नज़र से इस कदर मुतासिर थीं कि उनके चेहरे पर शर्म और शुक्रगुज़ारी का एक अजब सा मिला-जुला रंग था। वह तेज़ी से वापस उस तंग टॉयलेट की तरफ मुड़ीं ताकि अपना काला अबाया ढंग से पहन सकें। उस नीली सिल्क की नाइटगाउन में उनका सुडौल और दूधिया बदन जिस तरह नुमाया हो रहा था, उसे अब वह दोबारा पर्दों में छुपा लेना चाहती थीं।
जब तक अम्मी अंदर गईं, गलियारे में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया था। बस ट्रेन के पहियों की गूँज और पटरियों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
कुछ ही मिनटों में जब अम्मी अपना अबाया ठीक से लपेटकर और अपना नूरानी चेहरा नकाब से ढंककर बाहर आईं, तो नज़ारा बदल चुका था। सरताज सिंह, वहाँ से जा चुका था। वह उन चारों लहूलुहान दरिंदों को उनके कॉलर से घसीटते हुए अगले कंपार्टमेंट की तरफ ले गया था।
अम्मी की आँखें गलियारे में उस 'फरिश्ते' को तलाश रही थीं, पर वहाँ अब सिर्फ बीड़ी की बुझती हुई गंध और उन गुंडों के संघर्ष के निशान बाकी थे।
अम्मी: (धीमी और हैरान आवाज़ में) "साहिल... कहाँ गए सरदार साहब? मैं तो उन्हें ठीक से दुआ भी नहीं दे पाई।"
मैं: "अम्मी, वह उन्हें अगले डिब्बे की तरफ ले गए। शायद सिक्युरिटी चौकी या अगले स्टेशन पर हैंडओवर करने के लिए।"
अम्मी वहीं खड़ी रह गईं। उनके भरे हुए सीने पर रखा हाथ उनकी तेज़ धड़कनों को थामने की कोशिश कर रहा था। उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि इस ज़माने में कोई मर्द इतना निस्वार्थ भी हो सकता है। सरताज सिंह ने अम्मी के उस कातिलाना और सेक्सी हुस्न को इतने करीब से देखा था, मगर उनकी नज़रों में रत्ती भर भी लालच या हवस नहीं थी।
उन्होंने बिना किसी उम्मीद या 'उल्टे सीधे' इरादे के एक अजनबी औरत की इज़्ज़त के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी थी।
अम्मी वापस अपनी बर्थ की तरफ चलने लगीं। अबाया के ढीले कपड़ों के नीचे अभी भी उनका वह नीला रेशमी गाउन उनके जिस्म की तपिश को समेटे हुए था। उनके चलने के अंदाज़ में अब एक अलग सा सुकून था, जैसे उन्हें अहसास हो गया हो कि दुनिया में अगर भेड़िये हैं, तो सरताज सिंह जैसे रखवाले भी हैं।
अम्मी: (मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए) "साहिल, आज अल्लाह ने हमारी सुन ली। ऐसे नेक इंसान बहुत कम मिलते हैं जो बिना किसी मतलब के किसी की ढाल बन जाएं।"
मैं अम्मी को देख रहा था। अबाया के उस काले पर्दे के पीछे छिपा उनका वह मखमली और बेपनाह खूबसूरत जिस्म अब सुरक्षित था। उस रात के हादसे ने अम्मी के वजूद में एक नई गरिमा भर दी थी, और मेरे टीनएज दिमाग को यह सिखा दिया था कि असली ताकत किसी को 'पाने' में नहीं, बल्कि किसी की 'हिफाज़त' करने में होती है।
हम अपनी सीटों पर लौट आए, जहाँ नानी अभी भी बेखबर सो रही थीं।
Deepak Kapoor
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