14-04-2026, 02:39 PM
पार्ट 15
गतान्क से आगे..............................
मेनका महल पहुँची तो देखा की सेशाद्री उसका इंतेज़ार कर रहे हैं,"नमस्ते!अंकल,आइए हॉल मे चलिए।" उसने एक नौकर को चाइ का इंतेज़ाम करने को कहा।
"रानी साहिबा,एक बुरी खबर है।"
"और भी कुछ बुरा होने को बाकी है अंकल!",उसने चाइ का कप उन्हे बढ़ाया।
"मिल वर्कर्स ने हड़ताल कर दी है।"
"पर क्यूँ?"
"उन्हे पता चला कि आप अपना हिस्सा बेच रही हैं तो उनका कहना है कि इसमे उनके हितों का ख़याल नही रखा जाएगा।"
"अंकल,हम तो हमेशा उनका अच्छा सोच कर ही सारे फ़ैसले लेते हैं,फिर अचानक हड़ताल?" मैत्री की पेशकश.
"रानी साहिबा,इन सब के पीछे जब्बार का हाथ है। वो मज़दूरो के नेता को अपनी उंगलियो पे नचाता है। वो ये चाहता है कि खरीदार उसका आदमी हो। ऐसी कोशिश उसने पिछली बार भी की थी पर तब उसे मुँह की खानी पड़ी थी।"
"ह्म्म्म.....ठीक है,अंकल, आप मज़दूरो को कह दीजिए कि हम बिना उनके सपोर्ट के कोई फ़ैसला नही लेंगे। बस वो कल से काम पे आ जाएँ।"
"पर रानी साहिबा, ये तो उनके सामने घुटने टेकना हुआ।"
"अंकल,एक इंसान की वजह से कितने मज़दूरो को नुकसान उठना पड़ रहा है। एक बार हम पीछे हट रहे हैं, इसका मतलब ये नही है कि हर बार ऐसा होगा। प्लीज़,आप हमारी तरफ से मज़दूरो को समझा दीजिए।"
"जैसा आप कहें।",सेशाद्री साहब ने चाइ ख़त्म की और चले गये।
उस रात मेनका राजासाहब की मौत के बाद पहली बार अकेली अपने बिस्तर पे लेटी थी। उनकी मौत के बाद से उसकी मा ने अपनी बेटी को एक पल के लिए भी अकेला नही छोडा था।
उसने एक स्लिप पहनी हुई थी जोकि उसके घुटनो के उपर तक आ रही थी। वो करवटे बदल रही थी पर उसकी आँखो मे नींद आ ही नही रही थी। उसे राजासाहब की याद आ रही थी। काफ़ी देर तक करवटे बदलने के बाद सफ़र की थकान ने असर दिखाया और उसकी पलके भारी हो गयी और थोड़ी ही देर मे वो सो गयी।
रात के एक बज रहे थे। चारो तरफ सन्नाटा छाया था पर वो क्या है.....वो कौन है जो महल के चौकीदारो से छुपता हुआ, लॉन पार कर महल तक आ पहुँचा है! थोड़ी ही देर मे वो साया एक खिड़की खोल अंदर दाखिल हो चुका था। ये भी हैरत की बात है कि उसने सेक्यूरिटी अलार्म्स को कैसे चकमा दिया! अब वो उपरी मंज़िल की सीढ़िया चढ़ रहा था। पहले उसने राजासाहब का कमरा खोला और अंदर झाँका पर वहा किसी को ना पाके आगे बढ़ा और मेनका के कमरे का दरवाज़ा खोला। मैत्री की रचना है.
खिड़की से आती चाँदनी सोती हुई मेनका के उस छोटी स्लिप मे क़ैद गोरे बदन को नहला रही थी। वो अजनबी थोड़ी देर तक उसके हुस्न को निहारता रहा और फिर बिस्तर पे चढ़ उसके उपर झुक गया। मेनका को अपने चेहरे पे उसकी गरम साँसे महसूस हुई तो उसकी आँख खुली। वो डर के मारे चीखने वाली थी कि उस अजनबी ने अपना हाथ उसके मुँह पे दबा दिया।
मेनका की ख़ौफ़ और हैरत से फैली आँखो मे अचानक पहचान की झलक आई तो उस अजनबी ने अपना हाथ उसके मुँह से हटा दिया,"...तुम!!"
"हां,मैं।",उस अजनबी ने रानी साहिबा के होंठो पे अपने होठ रख दिए। मेनका भी उसे चूमने लगी और अपनी बाहों मे भर लिया।
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दोस्तों आज के लिए बस यही तक फिर मिलेंगे एक नए एपिसोड के साथ. तब तक के लिए मैत्री की तरफ से जय भारत.
गतान्क से आगे..............................
मेनका महल पहुँची तो देखा की सेशाद्री उसका इंतेज़ार कर रहे हैं,"नमस्ते!अंकल,आइए हॉल मे चलिए।" उसने एक नौकर को चाइ का इंतेज़ाम करने को कहा।
"रानी साहिबा,एक बुरी खबर है।"
"और भी कुछ बुरा होने को बाकी है अंकल!",उसने चाइ का कप उन्हे बढ़ाया।
"मिल वर्कर्स ने हड़ताल कर दी है।"
"पर क्यूँ?"
"उन्हे पता चला कि आप अपना हिस्सा बेच रही हैं तो उनका कहना है कि इसमे उनके हितों का ख़याल नही रखा जाएगा।"
"अंकल,हम तो हमेशा उनका अच्छा सोच कर ही सारे फ़ैसले लेते हैं,फिर अचानक हड़ताल?" मैत्री की पेशकश.
"रानी साहिबा,इन सब के पीछे जब्बार का हाथ है। वो मज़दूरो के नेता को अपनी उंगलियो पे नचाता है। वो ये चाहता है कि खरीदार उसका आदमी हो। ऐसी कोशिश उसने पिछली बार भी की थी पर तब उसे मुँह की खानी पड़ी थी।"
"ह्म्म्म.....ठीक है,अंकल, आप मज़दूरो को कह दीजिए कि हम बिना उनके सपोर्ट के कोई फ़ैसला नही लेंगे। बस वो कल से काम पे आ जाएँ।"
"पर रानी साहिबा, ये तो उनके सामने घुटने टेकना हुआ।"
"अंकल,एक इंसान की वजह से कितने मज़दूरो को नुकसान उठना पड़ रहा है। एक बार हम पीछे हट रहे हैं, इसका मतलब ये नही है कि हर बार ऐसा होगा। प्लीज़,आप हमारी तरफ से मज़दूरो को समझा दीजिए।"
"जैसा आप कहें।",सेशाद्री साहब ने चाइ ख़त्म की और चले गये।
उस रात मेनका राजासाहब की मौत के बाद पहली बार अकेली अपने बिस्तर पे लेटी थी। उनकी मौत के बाद से उसकी मा ने अपनी बेटी को एक पल के लिए भी अकेला नही छोडा था।
उसने एक स्लिप पहनी हुई थी जोकि उसके घुटनो के उपर तक आ रही थी। वो करवटे बदल रही थी पर उसकी आँखो मे नींद आ ही नही रही थी। उसे राजासाहब की याद आ रही थी। काफ़ी देर तक करवटे बदलने के बाद सफ़र की थकान ने असर दिखाया और उसकी पलके भारी हो गयी और थोड़ी ही देर मे वो सो गयी।
रात के एक बज रहे थे। चारो तरफ सन्नाटा छाया था पर वो क्या है.....वो कौन है जो महल के चौकीदारो से छुपता हुआ, लॉन पार कर महल तक आ पहुँचा है! थोड़ी ही देर मे वो साया एक खिड़की खोल अंदर दाखिल हो चुका था। ये भी हैरत की बात है कि उसने सेक्यूरिटी अलार्म्स को कैसे चकमा दिया! अब वो उपरी मंज़िल की सीढ़िया चढ़ रहा था। पहले उसने राजासाहब का कमरा खोला और अंदर झाँका पर वहा किसी को ना पाके आगे बढ़ा और मेनका के कमरे का दरवाज़ा खोला। मैत्री की रचना है.
खिड़की से आती चाँदनी सोती हुई मेनका के उस छोटी स्लिप मे क़ैद गोरे बदन को नहला रही थी। वो अजनबी थोड़ी देर तक उसके हुस्न को निहारता रहा और फिर बिस्तर पे चढ़ उसके उपर झुक गया। मेनका को अपने चेहरे पे उसकी गरम साँसे महसूस हुई तो उसकी आँख खुली। वो डर के मारे चीखने वाली थी कि उस अजनबी ने अपना हाथ उसके मुँह पे दबा दिया।
मेनका की ख़ौफ़ और हैरत से फैली आँखो मे अचानक पहचान की झलक आई तो उस अजनबी ने अपना हाथ उसके मुँह से हटा दिया,"...तुम!!"
"हां,मैं।",उस अजनबी ने रानी साहिबा के होंठो पे अपने होठ रख दिए। मेनका भी उसे चूमने लगी और अपनी बाहों मे भर लिया।
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दोस्तों आज के लिए बस यही तक फिर मिलेंगे एक नए एपिसोड के साथ. तब तक के लिए मैत्री की तरफ से जय भारत.


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