13-04-2026, 04:38 PM
(This post was last modified: 13-04-2026, 10:29 PM by Pramod_Bhasin. Edited 4 times in total. Edited 4 times in total.)
कौशिक ने कुछ देर तक उसे देखा, उसकी आँखें उसकी माँ के चेहरे पर टिकी थीं, जैसे वह कुछ ढूंढ रहा हो। "माँ, मुझे कुछ पूछना था।"
मौशुमी ने अपनी साँस रोकी। उसे पता था कि वह क्या पूछने वाला था। "क्या, बेटा?"
"वो कुत्ते… वो ऐसा क्यों कर रहे थे?" उसकी आवाज़ धीमी थी, लगभग फुसफुसाहट।
मौशुमी ने उसे अपने पास बैठने का इशारा किया। कौशिक बिस्तर पर उसके बगल में बैठ गया, लेकिन थोड़ी दूरी बनाए रखी। मौशुमी ने अपनी उंगलियाँ अपनी साड़ी के पल्लू पर फिराईं।
"बेटा, वो… वो जानवरों का प्यार जताने का तरीका होता है," मौशुमी ने कहा, उसके शब्दों में एक हिचकिचाहट थी। "वे एक-दूसरे के साथ मिलकर नए बच्चे पैदा करते हैं।"
कौशिक ने ध्यान से सुना। "इंसान भी ऐसे करते हैं?" उसने पूछा, उसकी आँखें उसकी माँ की आँखों में गहराई से झाँक रही थीं।
मौशुमी को लगा जैसे किसी ने उसके पेट में मुक्का मारा हो। उसके गाल फिर से लाल हो गए। उसने अपनी नज़र हटाई। "कुछ-कुछ ऐसा ही, बेटा," उसने कहा, उसकी आवाज़ और भी धीमी हो गई थी। "लेकिन इंसानों में… यह थोड़ा अलग होता है।"
"कैसे अलग?" कौशिक ने जोर दिया, उसकी जिज्ञासा कम नहीं हुई थी।
मौशुमी ने एक गहरी साँस ली। उसे नहीं पता था कि उसे क्या कहना चाहिए। यह पहली बार था जब उसने अपने बेटे के साथ ऐसी बात की थी। उसने सोचा कि उसके पति को यह सब समझाना चाहिए था, लेकिन आलोक हमेशा इन बातों से बचते थे।
"बेटा, यह… यह बहुत निजी बात होती है," मौशुमी ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कंपकंपी थी। "जब दो लोग एक-दूसरे को बहुत प्यार करते हैं, तो वे एक-दूसरे के बहुत करीब आते हैं।"
कौशिक ने अपनी नज़र उसकी माँ के शरीर पर डाली, उसके दिख रहे उभारों पर। मौशुमी को महसूस हुआ कि उसकी नज़र कहाँ है, और उसके शरीर में एक अजीब सी हलचल हुई।
"क्या तुम पापा से भी ऐसा करती हो?" कौशिक ने पूछा, उसकी आवाज़ में अब एक नई सी आवाज़ थी, एक ऐसी आवाज़ जो मौशुमी ने पहले कभी नहीं सुनी थी।
मौशुमी का दिल ज़ोर से धड़का। यह सवाल अनपेक्षित था। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, और उसके गालों पर और भी ज़्यादा गर्मी चढ़ गई। "बेटा, यह… यह ऐसी बातें नहीं हैं जो हमें अपने बच्चों से करनी चाहिए।"
"पर क्यों नहीं?" कौशिक ने अपनी आवाज़ थोड़ी ऊँची की। "तुमने ही तो कहा कि प्यार जताने का तरीका है। क्या तुम पापा से प्यार नहीं करती?"
मौशुमी ने अपनी आँखें खोलीं और अपने बेटे की ओर देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चुनौती थी, एक ऐसी चीज़ जो उसे परेशान कर रही थी। "मैं करती हूँ, बेटा," उसने फुसफुसाया। "मैं करती हूँ।"
"तो फिर तुम मुझे क्यों नहीं बता सकती?" कौशिक ने उसके करीब आकर पूछा। उसकी साँसें मौशुमी के चेहरे पर पड़ रही थीं, और मौशुमी को महसूस हुआ कि उसके शरीर में एक अजीब सी ऊर्जा दौड़ रही है।
मौशुमी को लगा जैसे वह एक जाल में फँस गई हो। उसे पता था कि उसे अपने बेटे को कुछ बताना चाहिए, लेकिन उसे यह भी पता था कि वह क्या नहीं बताना चाहती थी। उसने अपने हाथ से कौशिक के बालों को सहलाया। उसके बाल नरम और घुंघराले थे, और उसकी उंगलियों को छूने पर उसे एक अजीब सी सनसनी हुई।
"बेटा, यह एक बहुत ही… अंतरंग बात होती है," मौशुमी ने कहा, उसके होंठ काँप रहे थे। "जब दो लोग एक-दूसरे के बहुत करीब आते हैं, तो उनके शरीर भी एक-दूसरे के बहुत करीब आते हैं। वे एक-दूसरे को छूते हैं, गले लगाते हैं, और… और प्यार करते हैं।"
"जैसे कुत्ते कर रहे थे?" कौशिक ने पूछा, उसकी आँखें अब भी उसकी माँ के चेहरे पर टिकी थीं।
मौशुमी ने अपनी नज़र हटाई। "कुछ-कुछ वैसा ही, बेटा। लेकिन हम इंसान… हम इसे और भी खूबसूरती से करते हैं।" उसने अपने शब्दों को चुना, जैसे वह एक पतली रस्सी पर चल रही हो।
कौशिक ने मौशुमी के हाथ को पकड़ा। उसकी उंगलियाँ मौशुमी की उंगलियों पर फँस गईं। मौशुमी को लगा जैसे बिजली का एक झटका उसके शरीर में दौड़ गया हो। कौशिक का हाथ गर्म था, और उसकी पकड़ मज़बूत थी।
"माँ, क्या तुम मुझे दिखा सकती हो?" कौशिक ने पूछा, उसकी आवाज़ अब केवल फुसफुसाहट थी, लेकिन उसमें एक अजीब सी दृढ़ता थी।
मौशुमी का दिल उसके सीने में पागलों की तरह धड़कने लगा। उसे लगा जैसे उसकी साँसें अटक गई हों। यह क्या था जो उसका बेटा पूछ रहा था? यह क्या था जो उसके मन में चल रहा था? उसके शरीर में एक अजीब सी बेचैनी थी, एक ऐसी बेचैनी जिसे वह दबाने की कोशिश कर रही थी।
"कौशिक, यह… यह सही नहीं है," मौशुमी ने कहा, उसकी आवाज़ काँप रही थी। "तुम मेरे बेटे हो।"
"तो क्या हुआ?" कौशिक ने कहा, उसकी आँखें अब और भी ज़्यादा चमकदार थीं। "तुमने ही तो कहा कि प्यार जताने का तरीका है। क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करती?"
मौशुमी को लगा जैसे वह एक गहरे कुएँ में गिर रही हो। उसके बेटे की बातें उसके दिल को छू रही थीं, लेकिन उसके दिमाग को डरा रही थीं। उसे पता था कि यह गलत है, यह बहुत गलत है, लेकिन उसके शरीर में एक अजीब सी इच्छा जागृत हो रही थी, एक ऐसी इच्छा जिसे वह वर्षों से दबाए हुए थी।
कौशिक ने मौशुमी के हाथ को और कसकर पकड़ा, और धीरे से उसे अपने करीब खींचा। मौशुमी ने कोई प्रतिरोध नहीं किया। उसका शरीर भारी था, लेकिन वह अपने बेटे की ओर झुक गई। कौशिक ने अपना दूसरा हाथ मौशुमी के गाल पर रखा। उसका स्पर्श गर्म और नरम था।
"माँ," कौशिक, "मैं बस समझना चाहता हूँ।"
मौशुमी की आँखें बंद हो गईं। उसे महसूस हुआ कि उसके होंठ काँप रहे हैं। उसे पता था कि यह एक गलती थी, एक भयानक गलती, लेकिन वह खुद को रोक नहीं पा रही थी। उसके शरीर में एक अजीब सी गर्मी दौड़ रही थी, एक ऐसी गर्मी जो उसे पिघला रही थी।


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