13-04-2026, 12:28 PM
रात का सन्नाटा और अंधेरे की जुर्रत--3
शेर ने चूसते हुए ही अपना एक हाथ नीचे की ओर बढ़ाया। उसने मीरा की वह नीली थोंग, जो पहले ही नीचे सरक चुकी थी, उसे पूरी तरह पैरों से बाहर निकाल दिया। अब मीरा का वह सबसे निजी हिस्सा शेर की नग्न मर्दानगी के सामने बिल्कुल नंगा था। शेर ने सामने देखा, दो गुलाबी लब जो भीगे हुए थे, उनके बीच में एक गुलाबी कली थी जो कांप रही थी।
शेर: "साली चोरनी... देख तो सही, तू कितनी गीली हो चुकी है! मेमसाब तो शर्म से मर रही थीं, पर तू तो यहाँ सैलाब बहा रही है। कितनी गुलाबी दिख रही है, बिल्कुल तेरे ऊपरी लबों की तरह। क्या मेरी मेमसाहब की भी तेरे जैसी ही होगी?"
"काश मैं कभी देख पाता," शेर ने झूठ बोलते हुए कहा, क्योंकि वह उन्हें तब देख चुका था जब उसने मेमसाहब को नहाते हुए देखा था और तब भी, जब वह नशे की हालत में गहरी नींद में सो रही थीं।
शेर यह सब जानबूझकर कर रहा था, ताकि बाद में मीरा को इस बात का अहसास हो कि शेर उसके शरीर के हर अंग को देखना चाहता है। मीरा उस वक्त दवाओं के असर के कारण बेहद भ्रमित और उत्तेजित स्थिति में थी।
शेर ने बिना कोई देरी किए अपनी लुंगी के बाहर झांकते हुए अपने उस 7 इंच के सख्त और फड़कते हुए लंड को मीरा की उस भीगी हुई चूत पर ज़ोर से दबा दिया।
जैसे ही शेर के उस तपते हुए अंग का स्पर्श मीरा की कोमल और रसीली खाल से हुआ, मीरा के मुँह से कपड़े के भीतर एक गूँजती हुई कराह निकली। दवा के असर में डूबी उसकी योनि ने उस सख्त दबाव का स्वागत किया, और वह अनजाने में ही अपनी जाँघें शेर के उस मोटे अंग के इर्द-गिर्द कसने लगी।
शेर [आंतरिक संवाद]: 'तड़पिए मेमसाब! आपका ये सती-सावित्री वाला जिस्म आज इस 'कुत्ते' के लंड के नीचे पिस रहा है। आज ये 'चोरनी' वाला खेल आपकी इज़्ज़त की धज्जियाँ उड़ा देगा, आज देखता हूँ आपका सरताज के लिए प्यार।'
अंधेरे गलियारे में अब मीरा की चीखों और शेर की दरिंदगी की गूँज सुनाई दे रही थी। शेर अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था। उसने अपना 7 इंच का वह सख्त और तपता हुआ लट्ठा मीरा की गीली और गुलाबी चूत के मुहाने पर टिका दिया और उसे ऊपर-नीचे रगड़ना शुरू किया। कभी ऊपर, कभी नीचे, हर रगड़ के साथ मीरा की सिसकी निकल रही थी।
जैसे ही शेर के उस मोटे लंड की रगड़ मीरा की कोमल और रसीली खाल से हुई, मीरा के पूरे बदन में एक ऐसा करंट दौड़ा जिसने उसके दिमाग को सुन्न कर दिया। दवा का ज़हर अब उसे जन्नत और जहन्नुम के बीच के किसी मोड़ पर खड़ा कर चुका था।
शेर: (एक हिंसक और भारी आवाज़ में, मीरा की रगड़ का आनंद लेते हुए) "उफ़... साली चोरनी! तू है तो बड़ी मस्त। तेरी हर चीज़ क़यामत की है... बिल्कुल मेरी मीरा मेमसाब जैसी!"
शेर ने अपना एक हाथ नीचे बढ़ाकर मीरा के उन नंगे और पसीने से भीगे गांड़ को अपनी मुट्ठी में भींच लिया, जबकि दूसरा हाथ उसके एक सख्त स्तन को मरोड़ रहा था। वह मीरा को पीछे से दीवार पर सटाकर उसे अपनी मर्दानगी के नीचे कुचल रहा था।
शेर: "पर मेमसाब... उन्हें तो मैं सिर्फ दूर से ही देख सकता हूँ। उन्हें छूने की तो मैं सपने में भी नहीं सोच सकता, आखिर सती-सावित्री जो हैं वो! साक्षात् देवी! पर तू... तू तो एक नीच चोरनी है। और एक चोरनी की इस सुलगती चूत को तो मैं आज छोड़ूँगा नहीं... आज तो तुझे जी भर के चोद ही दूँगा!"
मीरा का बदन उस रगड़ के नीचे पागलों की तरह तड़प रहा था। आँखों पर बंधी पट्टी आंसुओं से भीग चुकी थी, पर उसकी योनि से बहता वह रसीला सैलाब शेर के अंग को और भी ज़्यादा चिकना बना रहा था। शेर की हर रगड़ के साथ मीरा के मुँह से कपड़े के भीतर ही एक गूँजती हुई कराह निकल रही थी।
मीरा [आंतरिक संवाद - दवा का वहशी असर]: 'नहीं... आह! ये क्या हो रहा है? ये रगड़... ये मुझे जला रही है! मैं सरताज की पत्नी हूँ… मैं उनसे प्यार करती हूँ… पर क्यों मेरा ये जिस्म इतना तड़प रहा है? क्यों मुझे मज़ा आ रहा है? आह... शेर! और ज़ोर से... क्या मैं चाहती हूँ कि वह मुझे बर्बाद कर दे!'
शेर ने महसूस किया कि मीरा का बदन अब विरोध करने के बजाय उसके झटकों के साथ लय मिला रहा है। उसने अपनी कमर को एक ज़ोरदार धक्का दिया, जिससे उसके लंड की नोक मीरा की गहराई के मुहाने को खरोंचती हुई गुज़री।
शेर [आंतरिक संवाद]: 'तड़पिए मेमसाब! आपकी ये सती-सावित्री वाली शान आज इस अँधेरे में धूल चाट रही है। आपकी ये चूत अब इस 'वफादार' के लंड की गुलाम हो चुकी है। आज ये 'चोरनी' वाला खेल आपको उस मुकाम पर ले जाएगा जहाँ से आप कभी वापस नहीं लौट पाएंगी।'
शेर ने अब अपना हाथ मीरा की जांघों के बीच से निकाला और उसके नितम्बों को और भी ज़ोर से ऊपर की ओर उठाया, ताकि वह अपनी मर्दानगी का पूरा वज़न उस गुलाबी दरार पर डाल सके।
लेकिन ठीक उसी पल, मीरा के धुंधले पड़ते होश के किसी कोने में सरताज का चेहरा चमक उठा। उसकी वफ़ादारी, उसका प्यार और उसकी इज़्ज़त ने एक आखिरी बार उसके अंतर्मन में शोर मचाया।
मीरा का दिमाग चिल्ला उठा—'नहीं! मैं सरताज की पत्नी हूँ। मैं उससे प्यार करती हूँ। वह मेरा सब कुछ है। मैं इस दरिंदे को खुद को अपवित्र नहीं करने दे सकती!'
इस संकल्प ने मीरा के भीतर सोई हुई सारी शक्ति को एक ज्वालामुखी की तरह जगा दिया। दवा के नशे और पीछे बंधे हाथों की बेबसी के बावजूद, उसने अपनी पूरी ताकत बटोरी और एक ज़ोरदार झटका देकर शेर को पीछे धकेला।
शेर अभी संभल भी नहीं पाया था कि मीरा ने अपना दाहिना पैर पूरी ताकत से ऊपर उठाया। मीरा की आँखें बंद थीं, पर वह अंदाज़े से अपना पैर चला रही थी। निशाना शेर का लंड था और आखिरकार मीरा की लात शेर के उस नग्न और उभरे हुए लंड पर जा पड़ी।
शेर: "आआआह!"
एक भयानक और दर्दनाक चीख शेर के हलक से निकली। वह दर्द के मारे दोहरा हो गया, उसका वह ७ इंच का घमंड अब टूटकर बिखर रहा था। मीरा रुकी नहीं; नफरत और अपनी इज़्ज़त बचाने की आग ने उसे और भी हिंसक बना दिया था। उसने एक के बाद एक दो-तीन और वार किए।
इस बार उसके भारी प्रहार सीधा शेर के अंडकोषों (बॉल्स) पर लगे।
शेर: "उफ़... "
शेर की आवाज़ घुट गई। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। वह असहनीय दर्द की लहरों में डूबने लगा। उसकी जाँघें काँपने लगीं और अगले ही पल वह फर्श पर ढेर हो गया। दर्द इतना भीषण था कि शेर का शरीर उस झटके को बर्दाश्त नहीं कर पाया और वह वहीं बेहोश हो गया।
गलियारा एक बार फिर खामोश हो गया। मीरा हाँफ रही थी, उसकी आँखों पर अभी भी पट्टी बंधी थी और हाथ पीछे बंधे थे, लेकिन उसके पैरों के पास वह दरिंदा अब बेजान पड़ा था।
मीरा के बदन में अभी भी वह सुलगती हुई दवा और खौफ का मिला-जुला नशा दौड़ रहा था। उसने कांपते हाथों और पूरी ताकत लगाकर अपनी पीठ के पीछे बंधी लुंगी की गांठों को ढीला किया। जैसे ही उसके हाथ आजाद हुए, उसने अपनी आंखों से वह काली पट्टी हटाई और मुँह में ठुंसे हुए कपड़े को बाहर फेंक दिया।
उसने जल्दी-जल्दी अपना अस्त-व्यस्त नाइटगाउन ठीक किया। उसकी सांसें अभी भी बेकाबू थीं और पूरा जिस्म पसीने से भीगा हुआ था।
उधर फर्श पर पड़ा शेर धीरे-धीरे होश में आ रहा था। उसकी जांघों के बीच अभी भी असहनीय दर्द की लहरें उठ रही थीं, पर उसका शातिर दिमाग अब खतरे को भांप चुका था। उसे पता था कि अगर मीरा ने सिक्युरिटी को फोन कर दिया या सरताज को सब बता दिया, तो उसका अंत निश्चित है। उसे अपना खेल बचाने के लिए आखिरी चाल चलनी थी।
शेर: (दर्द में कराहते हुए, धीमी आवाज़ में) "आह... साली चोरनी! तू क्या सोचती है... कि मुझे मार कर भाग जाएगी? मैं... मैं तुझे इस घर से बाहर नहीं जाने दूँगा। तूने हमारे घर में चोरी की... और मुझे बहकाने की कोशिश की..."
मीरा वहीं पत्थर की बुत बनकर खड़ी रह गई। शेर के ये शब्द उसके कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरे।
मीरा [मन ही मन - सदमे में]: 'ये... ये क्या कह रहा है? ये अभी भी मुझे चोरनी ही समझ रहा है? इसका मतलब... इसे सच में नहीं पता कि ये मैं हूँ! ये... ये जघन्य अपराध, ये उस चोरनी के साथ कर रहा था, अपनी 'सती-सावित्री' मेमसाब के साथ नहीं।'
मीरा का दिमाग चकराने लगा। उसे शेर की वे बातें याद आईं कि वह मेमसाब को छूने की सोच भी नहीं सकता। उसके मन में डर और उलझन का एक पहाड़ टूट पड़ा।
मीरा [आंतरिक संवाद]: 'अगर मैं सरताज को ये सब बताऊँगी, तो क्या होगा? अगर सिक्युरिटी आई और शेर ने कबूलनामे में ये कह दिया कि वो 'चोरनी' (जो असल में मैं थी) कितनी उत्तेजित थी... तो सरताज को क्या मुँह दिखाऊँगी? सरताज क्या सोचेंगे कि उनकी पत्नी एक नौकर के स्पर्श पर इतनी गीली कैसे हो गई? मेरी इज़्ज़त... मेरी पवित्रता... सब मिट्टी में मिल जाएगी।'
शेर ने बड़ी चालाकी से मीरा को अपराधी और लाचार महसूस करा दिया था। मीरा ने तय किया कि इस ज़िल्लत को यहीं दफन कर देना ही बेहतर है। उसने शेर की ओर एक नफरत भरी नज़र डाली और बिना कुछ बोले तेज़ी से अपने कमरे की तरफ भाग गई।
कमरे में पहुँचते ही उसने अंदर से कुंडी चढ़ाई। उसका पूरा वजूद अभी भी उस वहशी रगड़ को महसूस कर रहा था। उसने फौरन अपनी अलमारी खोली और वे दाग़दार कपड़े उतारकर फेंक दिए। उसने नए कपड़े पहने और बिस्तर पर दुबक कर बैठ गई, इस उम्मीद में कि यह भयानक रात एक बुरा सपना बनकर खत्म हो जाए।
गलियारे में पड़ा शेर, जो अभी तक दर्द का नाटक कर रहा था, धीरे से अपनी आँखों का कोना खोलकर मुस्कुराया।
शेर [मन ही मन, शैतानी मुस्कान के साथ]: 'डर गई मेमसाब! आपकी ये 'सती-सावित्री' वाली इज़्ज़त ही अब आपकी बेड़ी बन गई है। आप ये बात कभी किसी को नहीं बता पाएंगी।'
शेर एक मंझा हुआ खिलाड़ी था। उसने महसूस किया कि अब दर्द का नाटक करने से ज़्यादा ज़रूरी यह साबित करना है कि घर में वाकई कोई चोर घुसा था। यही एक रास्ता था जिससे वह मीरा की नज़रों में 'वफ़ादार' बना रह सकता था और अपनी घिनौनी हरकत को एक 'गलतफ़हमी' का नाम दे सकता था।
उसने अपनी लुंगी बाँधी और गलियारे में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना शुरू कर दिया।
शेर: (ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हुए) "चोर! चोर! रुक साले... कहाँ भाग रहा है? मेमसाब! दरवाज़ा बंद रखिएगा, घर में कोई घुस आया है! चोर... पकड़ो!"
शेर ने जानबूझकर घर के पिछले दरवाज़े को ज़ोर से पटका ताकि ऐसा लगे कि कोई बाहर भागा है। फिर वह हाँफते हुए मीरा के बेडरूम के दरवाज़े पर पहुँचा और ज़ोर-ज़ोर से कुंडी खटखटाने लगा।
शेर: (घबराहट का नाटक करते हुए) "मेमसाब! मेमसाब, दरवाज़ा खोलिए! आप ठीक तो हैं न? एक चोर किचन के रास्ते अंदर आ गया था। मैंने उसे पकड़ने की कोशिश की, पर साले ने मेरे... मेरे नाजुक अंगों पर वार कर दिया और भाग निकला। मेमसाब, जल्दी बोलिए!"
कमरे के अंदर मीरा का कलेजा मुँह को आ रहा था। वह अभी-अभी कपड़े बदल कर बिस्तर पर बैठी ही थी कि शेर की आवाज़ ने उसे दहला दिया।
मीरा [मन ही मन]: 'उसने जिस तरह मुझे 'चोरनी' कहा था... और अब वो बाहर चोर-चोर चिल्ला रहा है। इसका मतलब शेर जो कर रहा था वह चोरनी के साथ कर रहा था, तभी तो वह मुझे बाहर बुला रहा है।'
मीरा ने हिम्मत जुटाई, अपने चेहरे को थोड़ा सुखाया और कांपते हाथों से दरवाज़ा खोला।
मीरा: (डर और बनावटी हैरानी के साथ) "क्या हुआ शेर? इतना शोर क्यों मचा रहे हो? कौन सा चोर?"
शेर दरवाज़े के बाहर घुटनों के बल बैठा था, हाथ अपनी जांघों के बीच दबाए हुए, चेहरे पर दर्द और वफ़ादारी का मिला-जुला अभिनय।
शेर: (कराहते हुए) "मेमसाब... एक औरत थी, साफ़ काला कपड़ा पहने हुए। मुझे लगा कि कोई चोरनी है, मैंने उसे अंधेरे में दबोच लिया था। पर वो बड़ी चालाक निकली… उसने मुझ पर हमला किया और पिछले दरवाज़े से भाग गई। मुझे... मुझे बहुत चोट लगी है मेमसाब, पर शुक्र है आप सही-सलामत हैं।"
शेर ने अपनी नज़रों को नीचा रखा, जैसे वह मेमसाब की आँखों में देखने की हिम्मत न कर पा रहा हो।
शेर [आंतरिक संवाद]: 'देख रही हैं मेमसाब? ये होता है शातिर दिमाग। अब आप चाहकर भी मुझ पर उंगली नहीं उठा सकती हैं। अब हम दोनों के बीच एक राज़ है—वो 'काली चोरनी'। आप जानती हैं कि वो आप थीं, और मैं नाटक कर रहा हूँ कि वो कोई और थी। अब देखते हैं आप सरताज साहब को क्या बताती हैं।'
मीरा चुपचाप उसे देख रही थी। उसके मन में नफ़रत और राहत का एक अजीब संगम था। वह राहत महसूस कर रही थी कि शेर उसे पहचान नहीं पाया।
शेर ने अपनी बिछाई हुई बिसात पर आखिरी और सबसे खतरनाक मोहरा चला। मीरा के सामने ही उसने अपनी जेब से फोन निकाला और कांपते हाथों से सरताज को मिला दिया। उसका चेहरा दर्द से पीला पड़ रहा था, पर उसकी आवाज़ में एक वफादार सिपाही की फिक्र थी।
शेर: (फोन पर, रोने जैसी आवाज़ में) "साहब... जल्दी घर आइए साहब! बहुत अनर्थ हो गया... एक चोरनी घर के अंदर घुस आई थी। मेमसाब बेडरूम में थीं, शुक्र है वो सलामत हैं... पर वो साले पहरेदार बाहर सो रहे थे।"
मीरा वहीं खड़ी शेर को देख रही थी। शेर ने जिस सफाई से 'चोरनी' की कहानी बुनी और अपनी चोट को बहादुरी का तमगा दिया, मीरा को एक पल के लिए यकीन होने लगा कि शायद शेर वाकई उसे नहीं पहचान पाया था।
मीरा [आंतरिक संवाद]: 'इसका मतलब... शेर ने वाकई मुझे नहीं पहचाना! उसने जिस तरह मुझे अंधेरे में दबोचा, मुँह पर कपड़ा ठूँसा और आँखों पर पट्टी बाँधी... वह वाकई किसी अनजान चोरनी को पकड़ने के लिए था। उसने तो चेहरा देखा ही नहीं! तभी तो वह सरताज को इतनी बेबाकी से सब बता रहा है। वह तो बेचारा अपनी जान पर खेलकर 'चोर' पकड़ने की कोशिश कर रहा था।'
शेर: (सरताज से, फोन पर जारी रखते हुए) "साहब, मैंने उसे किचन के पास दबोच लिया था। बहुत देर तक उसे काबू में रखने की कोशिश की, पर वो बहुत शातिर थी। उसने अंधेरे का फायदा उठाकर मेरे... मेरे नाजुक अंगों पर ज़ोरदार वार कर दिया। मैं बेसुध होकर गिर पड़ा साहब... और वो भाग निकली। मैं उसे पकड़ नहीं पाया, मुझे माफ़ कर दीजिए!"
फोन रखते ही 15 मिनट के भीतर सरताज की गाड़ी की चीख बाहर सुनाई दी। सरताज अपनी सर्विस रिवॉल्वर लिए अंदर की तरफ भागा।
सरताज: (दहाड़ते हुए) "मीरा! मीरा कहाँ हो तुम?"
मीरा कमरे से बाहर आई, उसका चेहरा अभी भी सफेद था। सरताज ने दौड़कर उसे अपनी बाहों में भर लिया।
सरताज: "तुम ठीक तो हो न? किसी ने तुम्हें छुआ तो नहीं?"
मीरा: (धीमी आवाज़ में) "मैं ठीक हूँ... मैं तो कमरे के अंदर ही थी। शेर ने... शेर ने उसे रोकने की कोशिश की।"
सरताज का गुस्सा अब बाहर तैनात गार्ड्स पर फूटा। वह बाहर गया और उनकी वर्दी का कॉलर पकड़कर उन्हें झकझोर दिया।
सरताज: "हरामज़ादों! तुम यहाँ ड्यूटी पर थे या अपनी मौत का इंतज़ार कर रहे थे? एक औरत घर के अंदर घुस गई, मेरे नौकर को ज़ख़्मी कर दिया और तुम लोगों को भनक तक नहीं लगी? अगर मेरी पत्नी को खरोंच भी आती तो तुम्हारी लाशें यहीं बिछा देता!"
गार्ड 1: "साहब... हमें तो कोई नज़र नहीं आया। हम गेट पर ही थे।"
सरताज: "तो क्या वो आसमान से टपकी थी? कल के कल तुम दोनों सस्पेंड हो। मुझे इस घर के चारों तरफ कल सुबह तक नया सिक्योरिटी घेरा चाहिए!"
सरताज वापस अंदर आया और फर्श पर तड़प रहे शेर के पास पहुँचा। उसने बड़े गर्व से शेर के कंधे पर हाथ रखा।
सरताज: "शेर... तूने आज जो किया है, वो कोई मामूली नौकर नहीं कर सकता। तूने अपनी इज़्ज़त और जान की परवाह किए बिना मेरे घर की गरिमा बचाई है। मुझे तुझ पर गर्व है।"
शेर ने मीरा की तरफ एक 'मासूम' नज़र डाली, जिसने मीरा के मन में बचे-कुचे 1% शक को भी खत्म कर दिया।
शेर: (कराहते हुए) "नहीं साहब... मेरा फर्ज था। बस दुख इस बात का है कि वो रांडी चोरनी भाग गई। पर शुक्र है मेमसाब को उसने छुआ तक नहीं।"
मीरा ने एक गहरी और राहत भरी साँस ली। उसे अब पूरा विश्वास हो गया था कि शेर की नीयत साफ़ थी, बस वह 'गलतफहमी' का शिकार हो गया था।
शेर [मन ही मन]: 'आज तो मज़ा आ गया, चाहे वहाँ चोट लगी है, पर जो मज़ा मीरा मैडम की वो आहें और सिसकियां सुनके आ रहा था, उसका कोई जवाब नहीं। सोते वक़्त जब टच किया था तो सरताज का नाम ले रही थीं, पर आज तो उनको पता था कि ये मैं हूँ, फिर भी चीखें निकलीं। जब बाद में आराम से सोचेंगी कि क्या हुआ था, तो शर्म से ही मर जाएँगी। उन्हें लगेगा कि वो मुझे चाहती हैं।'
Deepak Kapoor
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