12-04-2026, 05:42 PM
राजासाहब की मौत की खबर सुनकर तो जब्बार खुशी से पागल हो गया था। उसने सोचा भी ना था कि बिना उसके कुछ किए तक़दीर उसे ऐसा तोहफा देगी। इस वक़्त वो मलिका के साथ कार ड्राइव करता हुआ शंकारगर्ह नाम की जगह से शहर आ रहा था। शंकारगर्ह से शहर का रास्त एक जंगल से होकर गुज़रता था। आमतौर पे लोग शाम ढलने के बाद उस रास्ते का इस्तेमाल नही करते थे बल्कि थोड़ा घूम कर हाइवे से शहर जाते थे। पर जब्बार को इन सब बातों की कोई फ़िक्र नही थी। ठीक भी था,गुंडे कब से गुंडों से डरने लगे! इस वक़्त शाम के 8 बज रहे थे।
तभी ज़ोर की आवाज़ हुई और जब्बार ने ब्रेक लगाया। उसकी कार का कोई टाइयर पंक्चर हुआ था। "धत्त तेरे की, भेन्चोद!",वो कार से नीचे उतरा और उसके उतरते ही दो नक़ाबपोश किनारे की झाड़ियो से निकल कर आ खड़े हुए। उनमे से एक ने जब्बार को पीछे से पकड़ कर उसकी गर्दन पे चाकू रख दिया और दूसरे ने मलिका को कार से खींच कर उतार दिया।
"सालो,,क्या चाहिए तुम्हे?पैसे? तो लो और निकलो, चुतियो।"
"चुप बहनचोद!पहले हम इस माल को लूटेंगे फिर तेरे पैसों के बारे मे सोचेंगे। चल!",उसने मलिका की तरफ इशारा किया और दोनो लुटेरे जब्बार और मलिका को झाड़ियो मे खींच जंगल मे ले गये। एक मलिका को गिरा उस पर सवार हो उसके कपड़े नोचने लगा तो मलिका चिल्लाने लगी। दूसरे ने एक रस्सी से जब्बार को बाँध दिया और अपने दोस्त के साथ मलिका को नंगी करने मे जुट गया।
तभी झाड़ियों को चीर वहा एक और इंसान पहुँचा। उसने दोनो गुंडों को एक-एक हाथ से पकड़ा और मलिका के उपर से खींच लिया। वो एक सरदार था और उसने उनसे अकेले ही लड़ना शुरू कर दिया। मलिका जैसे ही गुंडों के चंगुल से छूटी तो वो भाग कर जब्बार के पास पहुँची और उसके बंधन खोल दिए। अब जब्बार भी उस सरदार के साथ मिल उन गुंडों की पिटाई करने लगा। थोड़ी ही देर मे गुंडे वहा से रफूचक्कर हो गये।
"शुक्रिया।",जब्बार हाँफ रहा था।
"ये तो मेरा फ़र्ज़ था। बंदे को रविजितसिंग सोढी कहते हैं।",उस सरदार ने अपनी साँस संभालते हुए जब्बार से हाथ मिलाया। वो कोई 50 साल के आसपास की उम्र वाला लंबी कद-काठी का इंसान था।
"मैं जब्बारसिंग हूँ।"
"आप दोनो मेरे साथ चलिए। शहर से पहले मेरा फार्महाउस है। रात वही गुज़ारिए।",उसने अपने कोट से मलिका के फटे कपड़ो से नुमाया हो रहे जिस्म को ढँक दिया।
"आपको खामखा तकलीफ़ होगी।"
"बिल्कुल भी नही। आइए,बैठिए। और अपनी कार की चिंता मत करिए। अभी थोड़ी देर मे अपने ड्राइवर और नौकरों से इसे मंगवा लेंगे।"
कोई एक घंटे बाद दोनो रविजितसिंग सोढी के साथ उसके फार्महाउस के ड्रॉयिंग रूम मे बैठे थे,मलिका एक कमरे मे आराम कर रही थी।
"तो आप क्या करते हैं,जब्बार साहब?",उसने विस्की का एक ग्लास बढ़ाया।
"मैं प्रॉपर्टी डीलर हू।और आप?",जब्बार ने ग्लास लेते हुए पूछा।
"मैं तो एनआरआइ हू। जमैका मे मेरा बिज़नेस है।",पेग ख़त्म कर वो दुबारा अपना ग्लास भर रहा था।
थोड़ी ही देर मे दोनो शराब के नशे मे खुल कर बातें करने लगे।
***************
आज के लिए बस यही तक दोस्तों. फिर मिलेंगे एक नए अध्याय के साथ.
तब तक के लिए मैत्री तरफ से जय भारत.
तभी ज़ोर की आवाज़ हुई और जब्बार ने ब्रेक लगाया। उसकी कार का कोई टाइयर पंक्चर हुआ था। "धत्त तेरे की, भेन्चोद!",वो कार से नीचे उतरा और उसके उतरते ही दो नक़ाबपोश किनारे की झाड़ियो से निकल कर आ खड़े हुए। उनमे से एक ने जब्बार को पीछे से पकड़ कर उसकी गर्दन पे चाकू रख दिया और दूसरे ने मलिका को कार से खींच कर उतार दिया।
"सालो,,क्या चाहिए तुम्हे?पैसे? तो लो और निकलो, चुतियो।"
"चुप बहनचोद!पहले हम इस माल को लूटेंगे फिर तेरे पैसों के बारे मे सोचेंगे। चल!",उसने मलिका की तरफ इशारा किया और दोनो लुटेरे जब्बार और मलिका को झाड़ियो मे खींच जंगल मे ले गये। एक मलिका को गिरा उस पर सवार हो उसके कपड़े नोचने लगा तो मलिका चिल्लाने लगी। दूसरे ने एक रस्सी से जब्बार को बाँध दिया और अपने दोस्त के साथ मलिका को नंगी करने मे जुट गया।
तभी झाड़ियों को चीर वहा एक और इंसान पहुँचा। उसने दोनो गुंडों को एक-एक हाथ से पकड़ा और मलिका के उपर से खींच लिया। वो एक सरदार था और उसने उनसे अकेले ही लड़ना शुरू कर दिया। मलिका जैसे ही गुंडों के चंगुल से छूटी तो वो भाग कर जब्बार के पास पहुँची और उसके बंधन खोल दिए। अब जब्बार भी उस सरदार के साथ मिल उन गुंडों की पिटाई करने लगा। थोड़ी ही देर मे गुंडे वहा से रफूचक्कर हो गये।
"शुक्रिया।",जब्बार हाँफ रहा था।
"ये तो मेरा फ़र्ज़ था। बंदे को रविजितसिंग सोढी कहते हैं।",उस सरदार ने अपनी साँस संभालते हुए जब्बार से हाथ मिलाया। वो कोई 50 साल के आसपास की उम्र वाला लंबी कद-काठी का इंसान था।
"मैं जब्बारसिंग हूँ।"
"आप दोनो मेरे साथ चलिए। शहर से पहले मेरा फार्महाउस है। रात वही गुज़ारिए।",उसने अपने कोट से मलिका के फटे कपड़ो से नुमाया हो रहे जिस्म को ढँक दिया।
"आपको खामखा तकलीफ़ होगी।"
"बिल्कुल भी नही। आइए,बैठिए। और अपनी कार की चिंता मत करिए। अभी थोड़ी देर मे अपने ड्राइवर और नौकरों से इसे मंगवा लेंगे।"
कोई एक घंटे बाद दोनो रविजितसिंग सोढी के साथ उसके फार्महाउस के ड्रॉयिंग रूम मे बैठे थे,मलिका एक कमरे मे आराम कर रही थी।
"तो आप क्या करते हैं,जब्बार साहब?",उसने विस्की का एक ग्लास बढ़ाया।
"मैं प्रॉपर्टी डीलर हू।और आप?",जब्बार ने ग्लास लेते हुए पूछा।
"मैं तो एनआरआइ हू। जमैका मे मेरा बिज़नेस है।",पेग ख़त्म कर वो दुबारा अपना ग्लास भर रहा था।
थोड़ी ही देर मे दोनो शराब के नशे मे खुल कर बातें करने लगे।
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आज के लिए बस यही तक दोस्तों. फिर मिलेंगे एक नए अध्याय के साथ.
तब तक के लिए मैत्री तरफ से जय भारत.


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