11-04-2026, 01:13 PM
पार्ट--14
गतान्क से आगे।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
होटेल के बाहर मनीष राजासाहब के साथ उनकी कार मे बैठा उन्हे अपनी किट दिखा रहा था। "और ये क्लॉरोफॉर्म है सर जिसके सहारे हम टारगेट को बेहोश कर अपने क़ब्ज़े मे ले सकते हैं।"
"तुम लोगो को ये सब इस्तेमाल करने की क़ानूनी इजाज़त है या नही?"
"नही,सर,पर इस जैसे लोगो को पकड़ने के लिए ये सब उसे करना पड़ता है।",मनीष मुस्कुराया। मैत्री की पेशकश[b]।[/b]
"वो देखिए सर,दोनो बाहर आ रहे हैं, मैं अपनी बाइक पे जाता हू।",मनीष दरवाज़ा खोल कर तेज़ी से अपनी बाइक पे चला गया,उसकी किट वही कार मे छूट गयी थी।
कल्लन और मलिका फिर से उसकी कार मे बैठ कर चल पड़े और उनके पीछे-पीछे राजासाहब और मनीष। अब उनकी कार शहर से बाहर जाने वाले रास्ते पे भाग रही थी। राजासाहब ने ड्राइव करते हुए मेनका को फोन लगाया,शाम हो चुकी थी और वो उनका इंतेज़ार कर रही होगी। उन्हे पता नही था कि इस आदमी को पकड़ने मे उन्हे कितना समय लगेगा, "हेलो, हम यशवीर बोल रहे हैं। आज रात हम वापस नही आएँगे।"
"ये क्या बात हुई! मैं यहा तुम्हारा इंतेज़ार कर रही हूँ और तुम हो कि...बस! आख़िर ऐसा कौन सा काम है वकील साहब से?"
"अरे बाबा, आ गया है ऐसा कुछ काम। नाराज़ मत हो, कल सवेरे हम तुम्हारे पास पहुँच जाएँगे। ठीक है! चलो बाइ!"
उन्होने बात करते हुए भी अपनी निगाह उस कार से नही हटाई थी। एक लेफ्ट टर्न लेते ही वो एक धार्मिक जुलूस मे जा फँसे। मलिका की कार उस जुलूस के रोड पे आने से पहले ही निकल चुकी थी। राजासाहब ने फुर्ती से अपनी कार एक साइड की गली मे घुसा दी पर मनीष इतना फुर्तीला नही था। थोड़ी ही देर मे राजासाहब गलियो से होते हुए वापस मैं रोड पे थे। उन्होने कार तेज़ी से आगे बढ़ाते हुए उस कार को ढूँढना शुरू किया। करीब 3-4 मिनिट के बाद उन्हे वो कार नज़र आ गयी और वो उसके पीछे लग गये।
मनीष ने जैसे-तैसे उस जाम से बाइक निकली पर जैसे ही स्पीड बढाई,बाइक झटके खा के रुक गयी,"शिट! बहनचोद,अब इसे क्या हुआ?",उसने झट से उतर कर बाइक चेक की पर वो फिर भी स्टार्ट नही हुई। उसने तुरंत राजासाहब को फोन मिलाया,"सर,पहले तो जाम मे फँस गया और अब मेरी बाइक खराब हो गयी है। आप कहा पहुँच गये?"
राजासाहब के दिमाग़ ने तेज़ी से काम किया,आज जब्बार का ये आदमी उनके हाथ मरने वाला था और वो नही चाहते थे कि इस बात का कोई गवाह हो।
"मनीष,लगता है वो हमारे हाथ से निकल गया। उस जुलूस की वजह से हमने उन्हे खो दिया। तुम परेशान मत हो,अपनी बाइक ठीक करवा के वापस लौट जाओ। हम भी वापस जा रहे हैं,पर तुम्हारी जितनी भी तारीफ की जाए कम है,बेटे। तुमने कमाल का काम किया था पर शायद उसकी किस्मत उसके साथ है जो वो आज हमारे हाथ नही लगा।" मैत्री की रचना[b]।[/b]
"थॅंक्स,सर,पर अगर वो पकड़ मे आ जाता तब मुझे चैन मिलता।"
"कोई बात नही। चलो,अब फोन काट ते हैं। हम ड्राइव कर रहे हैं।"
"ओके,सर।"
मलिका की कार अब शहर से बाहर एक ऐसे इलाक़े मे आ गयी थी जो बहुत कम बसा हुआ था। वहा बस इक्का-दुक्का मकान थे और कुछ तो अभी बन ही रहे थे। कोई भी ऐसा घर नही लग रहा था जहा कि पूरा परिवार रहता हो। कार जिस रास्ते पे जा रही थी उसके एक तरफ बस खाली मैदान था और दूसरी तरफ बस 2 मकान थे और दोनो के बीच करीब 1/2 किमी का फासला था। मलिका की कार अब रोड के आख़िर मे दूसरे मकान के सामने रुक गयी,यही कल्लन का ठिकाना था।
**********************
बने रहिये दोस्तों.......................
गतान्क से आगे।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
होटेल के बाहर मनीष राजासाहब के साथ उनकी कार मे बैठा उन्हे अपनी किट दिखा रहा था। "और ये क्लॉरोफॉर्म है सर जिसके सहारे हम टारगेट को बेहोश कर अपने क़ब्ज़े मे ले सकते हैं।"
"तुम लोगो को ये सब इस्तेमाल करने की क़ानूनी इजाज़त है या नही?"
"नही,सर,पर इस जैसे लोगो को पकड़ने के लिए ये सब उसे करना पड़ता है।",मनीष मुस्कुराया। मैत्री की पेशकश[b]।[/b]
"वो देखिए सर,दोनो बाहर आ रहे हैं, मैं अपनी बाइक पे जाता हू।",मनीष दरवाज़ा खोल कर तेज़ी से अपनी बाइक पे चला गया,उसकी किट वही कार मे छूट गयी थी।
कल्लन और मलिका फिर से उसकी कार मे बैठ कर चल पड़े और उनके पीछे-पीछे राजासाहब और मनीष। अब उनकी कार शहर से बाहर जाने वाले रास्ते पे भाग रही थी। राजासाहब ने ड्राइव करते हुए मेनका को फोन लगाया,शाम हो चुकी थी और वो उनका इंतेज़ार कर रही होगी। उन्हे पता नही था कि इस आदमी को पकड़ने मे उन्हे कितना समय लगेगा, "हेलो, हम यशवीर बोल रहे हैं। आज रात हम वापस नही आएँगे।"
"ये क्या बात हुई! मैं यहा तुम्हारा इंतेज़ार कर रही हूँ और तुम हो कि...बस! आख़िर ऐसा कौन सा काम है वकील साहब से?"
"अरे बाबा, आ गया है ऐसा कुछ काम। नाराज़ मत हो, कल सवेरे हम तुम्हारे पास पहुँच जाएँगे। ठीक है! चलो बाइ!"
उन्होने बात करते हुए भी अपनी निगाह उस कार से नही हटाई थी। एक लेफ्ट टर्न लेते ही वो एक धार्मिक जुलूस मे जा फँसे। मलिका की कार उस जुलूस के रोड पे आने से पहले ही निकल चुकी थी। राजासाहब ने फुर्ती से अपनी कार एक साइड की गली मे घुसा दी पर मनीष इतना फुर्तीला नही था। थोड़ी ही देर मे राजासाहब गलियो से होते हुए वापस मैं रोड पे थे। उन्होने कार तेज़ी से आगे बढ़ाते हुए उस कार को ढूँढना शुरू किया। करीब 3-4 मिनिट के बाद उन्हे वो कार नज़र आ गयी और वो उसके पीछे लग गये।
मनीष ने जैसे-तैसे उस जाम से बाइक निकली पर जैसे ही स्पीड बढाई,बाइक झटके खा के रुक गयी,"शिट! बहनचोद,अब इसे क्या हुआ?",उसने झट से उतर कर बाइक चेक की पर वो फिर भी स्टार्ट नही हुई। उसने तुरंत राजासाहब को फोन मिलाया,"सर,पहले तो जाम मे फँस गया और अब मेरी बाइक खराब हो गयी है। आप कहा पहुँच गये?"
राजासाहब के दिमाग़ ने तेज़ी से काम किया,आज जब्बार का ये आदमी उनके हाथ मरने वाला था और वो नही चाहते थे कि इस बात का कोई गवाह हो।
"मनीष,लगता है वो हमारे हाथ से निकल गया। उस जुलूस की वजह से हमने उन्हे खो दिया। तुम परेशान मत हो,अपनी बाइक ठीक करवा के वापस लौट जाओ। हम भी वापस जा रहे हैं,पर तुम्हारी जितनी भी तारीफ की जाए कम है,बेटे। तुमने कमाल का काम किया था पर शायद उसकी किस्मत उसके साथ है जो वो आज हमारे हाथ नही लगा।" मैत्री की रचना[b]।[/b]
"थॅंक्स,सर,पर अगर वो पकड़ मे आ जाता तब मुझे चैन मिलता।"
"कोई बात नही। चलो,अब फोन काट ते हैं। हम ड्राइव कर रहे हैं।"
"ओके,सर।"
मलिका की कार अब शहर से बाहर एक ऐसे इलाक़े मे आ गयी थी जो बहुत कम बसा हुआ था। वहा बस इक्का-दुक्का मकान थे और कुछ तो अभी बन ही रहे थे। कोई भी ऐसा घर नही लग रहा था जहा कि पूरा परिवार रहता हो। कार जिस रास्ते पे जा रही थी उसके एक तरफ बस खाली मैदान था और दूसरी तरफ बस 2 मकान थे और दोनो के बीच करीब 1/2 किमी का फासला था। मलिका की कार अब रोड के आख़िर मे दूसरे मकान के सामने रुक गयी,यही कल्लन का ठिकाना था।
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बने रहिये दोस्तों.......................


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