10-04-2026, 03:33 PM
पार्ट--13
गतान्क से आगे.....................
पिक्चर ख़त्म होने ही वाली थी,"पूजा!",मनीष अपनी गर्लफ्रेंड को बाहों मे भरे हुए उसके कान मे फुसफुसाया।
"ह्म्म!"
"वो 3 रो नीचे सेंटर कॉर्नर वाली सीट पे ब्लॅक शर्ट वाला इंसान दिख रहा है?"
"कौन? वो जो हस रहा है?",पूजा ने मनीष के आगोश मे ही गर्दन घुमा कर देखा।
"हा,वही।"
"कौन है वो?"
"एक क्रिमिनल जिसकी मैं तलाश कर रहा था। आज इसे पकड़ने मे मेरी हेल्प करोगी?"
"ये भी कोई पुच्छने की बात है। क्या करना है?"
"मैं अभी निकल कर पार्किंग से बाइक निकलता हू वरना बाद मे बहुत भीड़ हो जाएगी और ये कही हमसे बच के ना निकल जाए। तुम उस से कुछ दूरी पे रह उसके पीछे-पीछे निकलना और देखना कि वो किस तरफ जाता है। अगर पार्किंग की ओर आता है तो मुझे फोन करना, नही तो बस इसके पीछे सावधानी से चलती जाना। मैं बाइक लेकर बाहर मैं गेट पे मिलूँगा।"
"ठीक है।"
मनीष हॉल से निकल भागता हुआ पार्किंग की ओर जा रहा था कि उसका मोबाइल बजा,"हेलो।"
"मनीष, मैं अमीन। किट लाया हू।"
"वेरी गुड यार। इधर पार्किंग मे आजा।" मैत्री की पेशकश.
थोड़ी ही देर बाद एक बेल्ट-बॅग जिसमे एक नाइलॉन की रस्सी,एक हथकड़ी,एक क्लॉथ नॅपकिन और ई क्लॉरोफॉर्म की शीशी उसके हाथों मे थी। यही वो किट थी जिसे मनीष ने अपने गले मे लटका लिया और बाइक स्टार्ट कर तुरंत मैं गेट पे पहुँचा। इतनी देर मे शो ख़त्म हो गया था और सारी भीड़ हलके से बाहर जा रही थी। गेट पे उसे पूजा दिखी,"मनीष,वो देखो उधर। वो उस ऑटो मे बैठ रहा है।", वो उसके पीछे बैठ गयी और मनीष ने बाइक कल्लन के ऑटो के पीछे लगा दी।
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राजासाहब मेनका के साथ उसके मायके से ग्यारह बजे राजपुरा पहुँचे और सीधा ऑफीस गये। अपने चेंबर मे उन्होने अपनी बहू को हमेशा की तरह बाहों मे भर कर चूमना शुरू कर दिया और उसने भी हमेशा की तरह घबरा कर उनसे छूटने की कोशिश।
"अफ...तुम बिल्कुल पागल हो! किसी दिन कोई हमे ज़रूर देख लेगा।",उसने उनके बाल पकड़ उनका चेहरा अपनी गर्दन से अलग किया।
"तुम बेकार मे इतना डरती हो। कुछ नही होगा।",उनके हाथ उसकी नंगी कमर को सहला रहे थे। "घबराव मत। अभी हमारे पास वक़्त नही है,शहर जाना है अपने वकील से मिलने। कुछ ज़रूरी काम है।"
"क्या...? फिर से जा रहे हो।",मेनका ने गुस्से से पूछा।
"लो,अभी तो हमे अलग कर रही थी और अब जा रहे हैं तो नाराज़ हो रही हो।"
"हम तो यहा ऑफीस मे मना करते हैं। घर पे थोड़े ही ना रोकते हैं।",उसने उनके सीने पे सर रख दिया।
राजासाहब हँसे और उसका चेहरा अपने हाथों मे ले उसके रसीले होंठ चूमने लगे। थोड़ी देर तक दोनो एक दूसरे को चूमते रहे, फिर राजासाहब ने उसके होठो को आज़ाद किया,"अच्छा,अब चलते हैं।"
"जल्दी आना।"
"ओके।"
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जब दुष्यंत वर्मा का फोन राजासाहब के पास आया तो वो अपने वकील को अपनी नयी वसीयत जिसमे उन्होने अपना सब कुछ मेनका के नाम कर दिया था,लिखवा रहे थे।
"यार,यश! तेरे कहे मुताबिक केवल मनीष उसके पीछे है। मैं उसकी मदद के लिए किसी और को नही भेज रहा हू। ऐसे काम मे बहुत ख़तरा होता है। तुम कहो तो मैं कुछ और लोगो को भी इस काम पे लगा देता हू।"
"नही,दुष्यंत,ऐसा नही करना। फ़िक्र मत करो,मनीष को मैं किसी भी तरह के ख़तरे मे नही पड़ने दूँगा। तुम मुझे उसका नंबर दो, मैं उस से बात कर के आगे की प्लॅनिंग करता हूँ।" मैत्री की रचना.
"ओके,यश,ये ले उसका नंबर।"
कल्लन का ऑटो एक ट्रॅफिक सिग्नल पर खड़ा था। उसके दो गाड़ियाँ पीछे मनीष और पूजा भी बाइक पे थे,"पूजा,तुम यहा से ऑटो लेकर घर चली जाओ। पता नही ये आदमी कहा जा रहा है।आगे ख़तरा भी हो सकता है।"
"मनीष,मुझे बहुत डर लग रहा है। मैं तुम्हारे साथ ही रहूंगी।"
"बात समझो,पूजा,मुझे कुछ नही होगा। तुम घर जाओ। मैं तुम्हे फोन करूँगा। चलो, वो देखो वो ऑटो खाली है...जाओ।"
"मनीष।"
"मुझे कुछ नही होगा,डार्लिंग,फ़िक्र मत करो,देखो बत्ती हरी होने वाली है। चलो जल्दी से वो ऑटो पकड़ो।"
"ठीक है। मैं तुम्हारे फोन का इंतेज़ार करूँगी।"
*************
बने रहिये........................
गतान्क से आगे.....................
पिक्चर ख़त्म होने ही वाली थी,"पूजा!",मनीष अपनी गर्लफ्रेंड को बाहों मे भरे हुए उसके कान मे फुसफुसाया।
"ह्म्म!"
"वो 3 रो नीचे सेंटर कॉर्नर वाली सीट पे ब्लॅक शर्ट वाला इंसान दिख रहा है?"
"कौन? वो जो हस रहा है?",पूजा ने मनीष के आगोश मे ही गर्दन घुमा कर देखा।
"हा,वही।"
"कौन है वो?"
"एक क्रिमिनल जिसकी मैं तलाश कर रहा था। आज इसे पकड़ने मे मेरी हेल्प करोगी?"
"ये भी कोई पुच्छने की बात है। क्या करना है?"
"मैं अभी निकल कर पार्किंग से बाइक निकलता हू वरना बाद मे बहुत भीड़ हो जाएगी और ये कही हमसे बच के ना निकल जाए। तुम उस से कुछ दूरी पे रह उसके पीछे-पीछे निकलना और देखना कि वो किस तरफ जाता है। अगर पार्किंग की ओर आता है तो मुझे फोन करना, नही तो बस इसके पीछे सावधानी से चलती जाना। मैं बाइक लेकर बाहर मैं गेट पे मिलूँगा।"
"ठीक है।"
मनीष हॉल से निकल भागता हुआ पार्किंग की ओर जा रहा था कि उसका मोबाइल बजा,"हेलो।"
"मनीष, मैं अमीन। किट लाया हू।"
"वेरी गुड यार। इधर पार्किंग मे आजा।" मैत्री की पेशकश.
थोड़ी ही देर बाद एक बेल्ट-बॅग जिसमे एक नाइलॉन की रस्सी,एक हथकड़ी,एक क्लॉथ नॅपकिन और ई क्लॉरोफॉर्म की शीशी उसके हाथों मे थी। यही वो किट थी जिसे मनीष ने अपने गले मे लटका लिया और बाइक स्टार्ट कर तुरंत मैं गेट पे पहुँचा। इतनी देर मे शो ख़त्म हो गया था और सारी भीड़ हलके से बाहर जा रही थी। गेट पे उसे पूजा दिखी,"मनीष,वो देखो उधर। वो उस ऑटो मे बैठ रहा है।", वो उसके पीछे बैठ गयी और मनीष ने बाइक कल्लन के ऑटो के पीछे लगा दी।
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राजासाहब मेनका के साथ उसके मायके से ग्यारह बजे राजपुरा पहुँचे और सीधा ऑफीस गये। अपने चेंबर मे उन्होने अपनी बहू को हमेशा की तरह बाहों मे भर कर चूमना शुरू कर दिया और उसने भी हमेशा की तरह घबरा कर उनसे छूटने की कोशिश।
"अफ...तुम बिल्कुल पागल हो! किसी दिन कोई हमे ज़रूर देख लेगा।",उसने उनके बाल पकड़ उनका चेहरा अपनी गर्दन से अलग किया।
"तुम बेकार मे इतना डरती हो। कुछ नही होगा।",उनके हाथ उसकी नंगी कमर को सहला रहे थे। "घबराव मत। अभी हमारे पास वक़्त नही है,शहर जाना है अपने वकील से मिलने। कुछ ज़रूरी काम है।"
"क्या...? फिर से जा रहे हो।",मेनका ने गुस्से से पूछा।
"लो,अभी तो हमे अलग कर रही थी और अब जा रहे हैं तो नाराज़ हो रही हो।"
"हम तो यहा ऑफीस मे मना करते हैं। घर पे थोड़े ही ना रोकते हैं।",उसने उनके सीने पे सर रख दिया।
राजासाहब हँसे और उसका चेहरा अपने हाथों मे ले उसके रसीले होंठ चूमने लगे। थोड़ी देर तक दोनो एक दूसरे को चूमते रहे, फिर राजासाहब ने उसके होठो को आज़ाद किया,"अच्छा,अब चलते हैं।"
"जल्दी आना।"
"ओके।"
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जब दुष्यंत वर्मा का फोन राजासाहब के पास आया तो वो अपने वकील को अपनी नयी वसीयत जिसमे उन्होने अपना सब कुछ मेनका के नाम कर दिया था,लिखवा रहे थे।
"यार,यश! तेरे कहे मुताबिक केवल मनीष उसके पीछे है। मैं उसकी मदद के लिए किसी और को नही भेज रहा हू। ऐसे काम मे बहुत ख़तरा होता है। तुम कहो तो मैं कुछ और लोगो को भी इस काम पे लगा देता हू।"
"नही,दुष्यंत,ऐसा नही करना। फ़िक्र मत करो,मनीष को मैं किसी भी तरह के ख़तरे मे नही पड़ने दूँगा। तुम मुझे उसका नंबर दो, मैं उस से बात कर के आगे की प्लॅनिंग करता हूँ।" मैत्री की रचना.
"ओके,यश,ये ले उसका नंबर।"
कल्लन का ऑटो एक ट्रॅफिक सिग्नल पर खड़ा था। उसके दो गाड़ियाँ पीछे मनीष और पूजा भी बाइक पे थे,"पूजा,तुम यहा से ऑटो लेकर घर चली जाओ। पता नही ये आदमी कहा जा रहा है।आगे ख़तरा भी हो सकता है।"
"मनीष,मुझे बहुत डर लग रहा है। मैं तुम्हारे साथ ही रहूंगी।"
"बात समझो,पूजा,मुझे कुछ नही होगा। तुम घर जाओ। मैं तुम्हे फोन करूँगा। चलो, वो देखो वो ऑटो खाली है...जाओ।"
"मनीष।"
"मुझे कुछ नही होगा,डार्लिंग,फ़िक्र मत करो,देखो बत्ती हरी होने वाली है। चलो जल्दी से वो ऑटो पकड़ो।"
"ठीक है। मैं तुम्हारे फोन का इंतेज़ार करूँगी।"
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बने रहिये........................


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