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Adultery एक रंडी की दास्तान-The story of a corporate whore
#9
"मतलब साफ़ है, मैडम," कूरियर वाला मुस्कुराया, उसके दाँत चमक रहे थे। "मेने रात में आपका रेट पूछा था, याद है? आज मैं आपको एक ख़ास डील दे रहा हूँ। अभी, यहीं। काम के बाद, या काम के दौरान... आपकी मर्ज़ी।" उसकी नज़रें चैताली के भरे हुए वक्ष पर टिक गईं, फिर उसकी कमर पर, जो साड़ी के भीतर से भी एक आकर्षक वक्र बना रही थी।

चैताली की आँखें दहशत से फैल गईं। वह चारों ओर देखने लगी। शुक्र है कि लॉबी में कोई और नहीं था। उसकी ज़िंदगी एक ऐसे चौराहे पर खड़ी थी जहाँ से कोई वापसी नहीं थी। अगर यह आदमी हंगामा कर देता, तो उसकी नौकरी, उसकी इज़्ज़त, सब कुछ मिट्टी में मिल जाता। उसके बेटे आदित्य की पढ़ाई, घर का खर्च, सब कुछ इसी नौकरी पर टिका था। और आदित्य... वह उसका बेटा कम और उसका बिज़नेस पार्टनर ज़्यादा था। वही तो उसे रात के अँधेरे में धकेलता था, "माँ, आज कम कमाई हुई है।" उसकी आँखों में एक पल के लिए आदित्य का चेहरा घूम गया, फिर उस भयावह वास्तविकता का डर जिसने उसे जकड़ लिया था।

"यहाँ नहीं," चैताली ने फुसफुसाया, जैसे उसकी आवाज़ उसके गले में फँस गई हो। "यह दफ़्तर है।"

"तो फिर कहाँ?" कूरियर वाला अपनी जगह से नहीं हिला। उसकी आँखों में दृढ़ता थी, एक शिकारी की नज़र। "मुझे पता है यहाँ खाली कमरे होते हैं। आपको पता है, मैडम। आप तो यहाँ काम करती हैं।"

चैताली ने एक गहरी साँस ली, जैसे हवा उसके फेफड़ों में पहुँच ही नहीं रही थी। उसे पता था कि उसे क्या करना होगा। यह उसकी नियति थी। उसकी ज़िंदगी एक ऐसी दलदल बन चुकी थी जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं था। उसने अपनी पलकें झुकाईं, उसकी आँखों में एक अजीब सी हार थी।

"ठीक है," उसने कहा, उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि कूरियर वाले को शायद झुकना पड़ा उसे सुनने के लिए। "लेकिन जल्दी। और किसी को पता नहीं चलना चाहिए।"

कूरियर वाले के चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान फैल गई। उसकी आँखों में विजय की चमक थी। "ज़रूर, मैडम। आप जैसा कहें।"

चैताली अपनी कुर्सी से उठी। उसकी साड़ी की सिलवटें उसके शरीर पर हल्की सी सरसराहट पैदा कर रही थीं। उसने अपने बालों को पीछे धकेला, उसके हाथ हल्के से काँप रहे थे। उसने अपने कंप्यूटर को स्लीप मोड पर डाला, जैसे यह सिर्फ़ एक सामान्य विराम था। उसने लिफ़्ट की ओर इशारा किया।

"अंदर आओ," उसने कहा, उसकी आवाज़ अब थोड़ी स्थिर थी, लेकिन उसमें एक अजीब सी कठोरता थी, जैसे वह खुद को किसी चीज़ के लिए तैयार कर रही थी।

कूरियर वाला उसके पीछे-पीछे चला। लिफ़्ट के भीतर की चुप्पी असहनीय थी। चैताली ने अपनी नज़रें लिफ़्ट के दरवाज़े पर टिका दीं, जैसे वह किसी और दुनिया में जाने वाली हो। उसकी साँसें अभी भी तेज़ थीं, लेकिन उसने खुद को शांत करने की कोशिश की। यह सब उसके लिए नया नहीं था, बस जगह और समय गलत थे।

लिफ़्ट छठी मंज़िल पर रुकी। दरवाज़े खुले, और चैताली बाहर निकली। यह मंज़िल आमतौर पर खाली रहती थी, क्योंकि यहाँ नए एक्सटेंशन के लिए जगह बनाई गई थी। गलियारा शांत और अँधेरा था, केवल इमरजेंसी लाइट्स की हल्की रोशनी थी। हवा में पेंट और नए फ़र्नीचर की हल्की गंध थी।

"इधर आओ," चैताली ने फुसफुसाया, एक कोने की ओर इशारा करते हुए जहाँ एक दरवाज़ा था। उस दरवाज़े पर 'प्रोजेक्ट फ़्यूचर' का साइन लगा था, लेकिन भीतर कोई काम नहीं चल रहा था। यह एक एक्सेस-कंट्रोल्ड कमरा था, जिसका कार्ड उसके पास था।

उसने अपना एक्सेस कार्ड निकाला और दरवाज़े पर स्वाइप किया। एक हल्की बीप हुई और दरवाज़ा खुला। भीतर एक बड़ा, खाली कमरा था। बीच में एक बड़ी, साफ़ मेज़ रखी थी, जिस पर अभी कोई कंप्यूटर या कागज़ात नहीं थे। कमरे में हल्की सी रोशनी थी, जो खिड़की से छनकर आ रही थी। हवा ठंडी थी, और एक अजीब सी खामोशी थी जो चैताली के दिल की धड़कनों को और तेज़ कर रही थी।

कूरियर वाला कमरे में दाखिल हुआ, उसकी आँखें चमक रही थीं। उसने दरवाज़ा बंद कर दिया, जिससे एक हल्की सी क्लिक की आवाज़ आई, जो चैताली के कानों में हथौड़े की तरह गूँजी।

"वाह," उसने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी उत्तेजना थी। "यह तो ख़ास जगह है। कोई नहीं आएगा यहाँ।"

चैताली ने अपनी साड़ी के पल्लू को कसकर पकड़ा। उसकी आँखों में एक पल के लिए डर, फिर एक अजीब सी बेबसी दिखाई दी। उसने अपनी नज़रें मेज़ पर डालीं, जो इतनी साफ़ थी, इतनी निर्दोष। उस पर अब एक दाग़ लगने वाला था।
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RE: एक रंडी की दास्तान - by MohdIqbal - 07-04-2026, 01:17 AM



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