07-04-2026, 12:45 AM
अंतर्मन की हलचल
शालिनी आईने में आशा के चेहरे के उतार-चढ़ाव को ताड़ रही थी. उसने बात आगे बढ़ाई,
"दीदी, आज जल्दी आ गई आप?"
आशा कॉलेज के गलियारे में जब दाखिल हुई, तो सन्नाटा अभी टूटा नहीं था. वह समय से पूरे बीस मिनट पहले पहुँच चुकी थी. नीर को उसकी कक्षा में सुरक्षित बिठाने के बाद, उसने एक लंबी साँस ली. कॉलेज का वातावरण शांत था, पर उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी थी. उसे रह-रहकर रणधीर बाबू का ख्याल आ रहा था—उनकी पारखी नज़रें और अनुशासन के प्रति उनका मोह. आशा को लगा कि आज उसे खुद को थोड़ा और सलीके से, थोड़ा और निखार कर पेश करना चाहिए.
उसने मन ही मन एक से दस तक गिनती गिनी, खुद को शांत किया और लेडीज़ वॉशरुम की ओर कदम बढ़ा दिए. रणधीर बाबू की पसंद का लोहा मानना पड़ता था—सफेद चमकती टाइल्स, आलीशान वॉशबेसिन और हवा में तैरती विदेशी रूम फ्रेशनर की मद्धम खुशबू. वहाँ की मद्धम रोशनी चेहरे की रंगत को और उभार देती थी.
पर यहाँ आशा का एक 'सीक्रेट' था. एक ऐसा राज, जो उसने अब तक रणधीर बाबू और दुनिया की नज़रों से छुपा रखा था. घर से निकलते वक्त वह मर्यादा की बेड़ियों में बंधी होती, लेकिन कॉलेज पहुँचते ही वह उस अजीब सी आज़ादी की तलाश में वॉशरुम भागती. वह जल्दी से अपनी ब्रा उतारकर बैग में रख लेती—मानो सीने पर लदे किसी बोझ को उतारकर वह खुद को मुक्त कर रही हो. और इस बात की आदत रणधीर बाबू के आदेश ने ही लगाई थी. आज भी उसने जैसे ही हुक्स खोले और अपनी उस 'आज़ादी' को महसूस किया, तभी दरवाज़ा खुला और शालिनी अंदर दाखिल हुई.
और ऐसा होते ही दोनों ओर से 'ठिठक गए कदम, थम गईं साँसें!' वाला सीन ऑन हो गया....
आशा का दिल ज़ोर से धड़का. उसने बिजली की फुर्ती से साड़ी का पल्लू सीने पर समेटा. चेहरा डर और झिझक से लाल हो उठा. पल्लू के भीतर ही भीतर कांपती उँगलियों से वह ब्लाउज के हुक्स टटोलने लगी.
शालिनी भी दरवाज़े पर ही जम गई थी. उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह आशा को इस हालत में देखेगी. एक पल की अवाक चुप्पी के बाद, शालिनी की आँखों में एक चमक कौंधी. उसके होंठों पर एक रहस्यमयी, दबी हुई मुस्कान तैर गई. उसकी 'अवांछित प्रतिद्वंद्वी' आज उसके सामने निहत्थी खड़ी थी. शालिनी के दिमाग में शरारत और दाँव-पेच की एक लहर दौड़ गई.
उसने बड़ी सहजता से मुस्कुराते हुए कहा, "गुड मॉर्निंग दीदी," और आईने के सामने जाकर अपने बालों को संवारने का ढोंग करने लगी.
आशा ने भी एक फीकी मुस्कान के साथ जवाब दिया, पर उसका पूरा ध्यान अपनी उँगलियों पर था जो बेतरतीब ढंग से ब्लाउज के हुक्स बंद करने की जद्दोजहद कर रही थीं.
शालिनी आईने में आशा के चेहरे के उतार-चढ़ाव को ताड़ रही थी. उसने बात आगे बढ़ाई,
"दीदी, आज जल्दी आ गई आप?"
"हाँ शालिनी, वो गाड़ी आज जल्दी मिल गई थी तो..." आशा का वाक्य अधूरा रह गया. उसका ध्यान अपनी प्लेट्स ठीक करने में था.
नारंगी साड़ी और मैचिंग ब्लाउज में आशा का गोरा बदन आज कुंदन की तरह दमक रहा था. वह वाकई आज अनुपम सुंदरी लग रही थी. खुद आशा भी आईने में अपनी इस छवि पर मुग्ध थी—उसके चेहरे की भोली सुंदरता और काया का आकर्षण किसी को भी मदहोश करने के लिए काफी था.
तभी, शालिनी के मन में कुछ 'नटखट' सा विचार आया. एक ऐसा विचार जिसने खुद शालिनी के भीतर एक सिहरन पैदा कर दी. वह दबे पाँव आशा के बिल्कुल पीछे जाकर खड़ी हो गई.
आशा को अपनी पीठ पर किसी की गर्म मौजूदगी का एहसास हुआ. इससे पहले कि वह पलटती, उसने आईने में देखा. शालिनी ठीक उसके पीछे थी. दोनों की निगाहें आईने में टकराईं. शालिनी के चेहरे पर एक ऐसी शरारत थी जैसे किसी बच्चे को उसका मनपसंद खिलौना मिल गया हो.
शालिनी इतनी करीब थी कि उसकी सांसों की गर्मी आशा के कंधों पर महसूस हो रही थी. उसका वक्षस्थल आशा की नंगी पीठ को लगभग छू रहा था... आशा के डीप 'यू' कट ब्लाउज से उजागर उसकी बेदाग, रेशमी पीठ पर शालिनी की नज़रें टिक गई थीं. आशा की ज़ुबान जैसे तालू से चिपक गई. एक अजीब सा सस्पेंस हवा में तैरने लगा.
आशा ने बड़ी मुश्किल से गले में अटके शब्दों को बाहर निकाला,
"क्या हुआ...?"
शालिनी ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी गर्दन को धीरे से हिलाया—जैसे वह किसी गहरे सम्मोहन में हो. हवा भारी हो गई थी, और दिल की धड़कनें साफ़ सुनाई दे रही थीं.
तभी, शालिनी ने अपनी एक कोमल उंगली उठाई और बहुत ही आहिस्ते से आशा की नंगी पीठ पर रख दी.
वह स्पर्श हल्का था, पर उसका असर बिजली की कड़क जैसा था. आशा के शरीर में एक सिहरन की लहर ऊपर से नीचे तक दौड़ गई. उसकी आँखों की पुतलियाँ फैल गईं और एक ठंडी आह उसके होंठों को छूकर गुज़र गई. उस पल, वॉशरुम की उस शांत रोशनी में, दो औरतों के बीच, जो आपस में प्रतिद्वंदी भी हैं, एक ऐसा मौन संवाद शुरू हुआ, जो शब्दों का मोहताज नहीं था.
जारी है……
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