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Adultery एक रंडी की दास्तान-The story of a corporate whore
#8
गुरुग्राम की चमचमाती वातिका रियल एस्टेट की लॉबी में दोपहर का वक्त था। चैताली घोष ने अपनी गहरी नीली साड़ी को सहजता से संभाला। साड़ी की किनारी पर सुनहरे तारों का बारीक काम था, जो उसके सांवले रंग पर खूब फब रहा था। उसकी 38-34-42 की सुडौल काया साड़ी के भीतर से भी स्पष्ट झलक रही थी, हर चाल में एक धीमी, लचकदार गति। रिसेप्शन डेस्क के पीछे बैठी वह अपने कंप्यूटर स्क्रीन पर नज़रें गड़ाए थी, लेकिन उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। बाहर की दुनिया में उसका एक दूसरा ही जीवन था, एक ऐसा जीवन जो इस वातानुकूलित दफ्तर की दीवारों के भीतर बिल्कुल छिपा हुआ था।

काँच के दरवाज़े से एक कूरियर वाला अंदर आया। उसके कंधे पर एक बड़ा सा बैग था, और हाथ में कागज़ात का एक पुलिंदा। उसकी आँखें लॉबी में घूमती हुई सीधे चैताली पर आकर टिक गईं। एक पल के लिए उसकी चाल धीमी हुई, फिर उसने एक मुस्कान दी, जिसमें कुछ ज़्यादा ही पहचान थी। चैताली ने सिर उठाया, उसकी आँखें कूरियर वाले की आँखों से मिलीं। एक ठंडी सिहरन उसकी रीढ़ की हड्डी में दौड़ गई। उस आदमी की आँखों में कुछ ऐसा था जो उसे बहुत अच्छी तरह से पता था। यह वही नज़र थी, वही पहचान जो उसे रात के अँधेरे में सड़कों पर मिलती थी।

कूरियर वाला डेस्क के पास आकर खड़ा हो गया। उसने कागज़ात आगे बढ़ाए। "मैडम, साइन कर दीजिए," उसकी आवाज़ में एक अजीब सी घुटी हुई सी पहचान थी।

चैताली ने पेन लिया, उसका हाथ हल्का सा काँपा। उसने ध्यान से कूरियर वाले के चेहरे को देखा। एक पल के लिए उसने खुद को दिलासा देने की कोशिश की कि यह उसकी कल्पना है, कि वह सिर्फ़ एक कूरियर वाला है। लेकिन उसकी आँखों में कोई शक नहीं था। वह उसे पहचान गया था।

"आपने मुझे पहचाना नहीं, मैडम?" कूरियर वाले ने अपनी आवाज़ को और धीमा किया, जैसे कोई राज़ खोल रहा हो। उसकी आँखों में एक शरारती चमक थी। "कल रात... सेक्टर चौदह की गली में। आपकी ड्रैस थोड़ी अलग थी, पर आपकी चाल... वो मैं कभी नहीं भूल सकता।"

चैताली के शरीर में खून जम सा गया। उसके कानों में गरम हवा का एक झोंका लगा, जैसे किसी ने उसके सबसे गहरे राज़ को सरेआम कर दिया हो। उसका चेहरा फीका पड़ गया। उसने पेन मेज़ पर रखा।

"आप... आप क्या कह रहे हैं?" उसकी आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई, इतनी धीमी कि वह खुद भी मुश्किल से सुन पाई।

कूरियर वाला थोड़ा और झुक गया, उसकी आँखों में एक भूखी चमक थी। "मैं जानता हूँ, मैडम। आप बहुत ख़ूबसूरत हैं। और आज आप साड़ी में तो और भी गज़ब ढा रही हैं।" उसने अपनी आवाज़ में एक हल्की सी फुर्ती लाई, "आज रात का इंतज़ार क्यों करना? यहाँ भी तो हो सकता है, नहीं?"
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RE: एक रंडी की दास्तान - by MohdIqbal - 06-04-2026, 10:26 PM



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