1 hour ago
जब तूफान थमा, समीर बेड पर निढाल पड़ा था। उसकी सांसें अभी भी तेज़ थीं। आयशा ने चादर ओढ़ ली और कमरे की दूसरी तरफ देखने लगी। कमरे में अब केवल समीर की दबी हुई सिसकियों और सन्नाटे की आवाज़ थी। समीर को एहसास हुआ कि उसने क्या किया है। उसने अपनी दोस्त की गरिमा और अपनी नैतिकता को अपनी कुंठा की आग में झोंक दिया था। लेकिन उसका मन अभी भी छाया के पास था। वह एक महीने का इंतज़ार अब उसे और भी डरावना लगने लगा था।
सुबह की पहली किरण जब खिड़की के भारी पर्दों को चीरकर कमरे में दाखिल हुई, तो वह अपने साथ एक भारी शर्मिंदगी और पछतावा लेकर आई। समीर की आँखें खुलीं तो सिर में शराब की वजह से एक हल्का दर्द था, लेकिन दिल में जो बोझ था, वह कहीं अधिक गहरा था। समीर उठकर बैठा और उसने देखा कि आयशा खिड़की के पास खड़ी बाहर की ओर देख रही थी। कमरे में वही सन्नाटा था जो कल रात की चीखों और हताशा के बाद पसरा था। समीर को याद आया कि उसने नशे और गुस्से में आयशा के साथ कैसा बर्ताव किया था। उसने अपनी मर्यादा खो दी थी।
"आयशा..." समीर की आवाज़ फटी हुई और धीमी थी। आयशा मुड़ी। उसकी आँखों में नफरत नहीं थी, बस एक अजीब सी उदासी और सहानुभूति थी। समीर बिस्तर से उठा और उसके पास जाकर खड़ा हो गया। उसने अपनी नज़रें नीची कर ली थीं। "आयशा, मुझे नहीं पता मैं क्या कहूँ। मैं... मैं माफी के काबिल भी नहीं हूँ। कल रात मैंने जो किया, जो कहा... वह मैं नहीं था। मेरा अकेलापन और मेरा गुस्सा मुझ पर हावी हो गया था। प्लीज, मुझे माफ कर दो।"
आयशा ने समीर की ओर देखा। वह जानती थी कि समीर जिस दौर से गुजर रहा है, वहाँ इंसान अक्सर खुद को खो देता है। उसने समीर के कांपते हुए हाथों को अपने हाथों में लिया। "समीर, शांत हो जाओ," उसने बहुत ही कोमलता से कहा। "मैं समझती हूँ। कल रात जो हुआ, वह वासना नहीं थी... वह तुम्हारा दर्द था जो बाहर निकलना चाहता था। तुम छाया को खोने के सदमे से बाहर नहीं आ पा रहे हो और वह तुम्हें अंदर ही अंदर खत्म कर रहा है।"
समीर की आँखों से एक आँसू लुढ़क गया। आयशा ने आगे बढ़कर उसे कसकर गले लगा लिया। यह आलिंगन कल रात जैसा हिंसक नहीं था; इसमें एक सच्चे दोस्त वाली सांत्वना थी। "खुद को कोसना बंद करो, समीर, " आयशा ने उसके कंधे पर सिर रखते हुए फुसफुसाया। "खुद को संभालो। अगर तुम इसी तरह बिखरते रहे, तो तुम कभी उस अंधेरे से बाहर नहीं निकल पाओगे। घर जाओ, थोड़ा समय खुद को दो। अपनी रूह को थोड़ा चैन दो।" समीर ने आयशा की बाहों में एक अजीब सी शांति महसूस की। उसने एक गहरी सांस ली और खुद को थोड़ा स्थिर किया। वह जानता था कि आयशा ने उसे एक नया जीवनदान दिया है, कम से कम मानसिक रूप से।
समीर ने आयशा से विदा ली। बच्चों के जागने से पहले ही वह घर से निकल गया। वापसी का सफर खामोश था। वह उन पहाड़ों को देख रहा था जो अब धीरे-धीरे धुंध से बाहर आ रहे थे। जब वह नीलगिरी विला पहुँचा, तो घर वैसा ही खाली और ठंडा था। लेकिन इस बार समीर चिल्लाया नहीं। उसने शांति से अपना कोट उतारा और सोफे पर बैठ गया।
अगले कुछ दिन समीर ने एक तपस्वी की तरह बिताए। उसने शराब को हाथ नहीं लगाया। वह सुबह जल्दी उठता, पहाड़ों पर लंबी सैर के लिए जाता और शाम को छाया के उन पुराने कपड़ों को तह करके रखता जिन्हें वह पहले सिर्फ सूंघकर रोता था। उसने घर की सफाई खुद करना शुरू किया। वह हर उस कोने को साफ करता जहाँ छाया की यादें बसी थीं। वह अब उस एक महीने का इंतज़ार पागलों की तरह नहीं, बल्कि एक सब्र के साथ कर रहा था।
रात के सन्नाटे में वह कभी-कभी खिड़की के पास बैठकर चाँद को देखता और सोचता - क्या वह मशीन वास्तव में उसकी जिंदगी बन गई थी? या वह बस उस प्रेम का आदी हो गया था जो उसे छाया के रूप में मिल रहा था? दिन बीतते गए, कैलेंडर की तारीखें एक-एक करके कटती जा रही थीं। घर में अब भी सन्नाटा था, लेकिन उस सन्नाटे में अब दहशत नहीं, बल्कि एक इंतज़ार था। समीर धीरे-धीरे खुद को संभालने लगा था, यह जानते हुए कि जब छाया वापस आएगी, तो वह उसे एक टूटा हुआ इंसान नहीं, बल्कि एक बेहतर समीर बनकर मिलेगा।
नीलगिरी विला के कैलेंडर पर लगा वह आखिरी कांटा जैसे समीर की धड़कनों का हिसाब दे रहा था। वह एक महीना, जो एक सदी की तरह गुजरा, अब खत्म हो चुका था। सुबह के ठीक नौ बजे समीर के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर 'अल्फा-सिंथेटिक्स' का नाम देखते ही समीर के हाथ कांपने लगे। उसने कांपते स्वर में फोन उठाया। "मिस्टर समीर? आपकी यूनिट तैयार है। सभी हार्डवेयर अपडेट्स और न्यूरल री-कैलिब्रेशन सफल रहे हैं। आप इसे आज ही ले जा सकते हैं।"
समीर ने एक पल भी बर्बाद नहीं किया। उसने अपनी कार की चाबी उठाई और पहाड़ों के खतरनाक मोड़ों को पीछे छोड़ते हुए सीधा शहर की ओर निकल पड़ा। उसके दिमाग में केवल एक ही छवि थी – उसकी छाया की मुस्कान।
कंपनी का मुख्य कार्यालय कांच और स्टील की एक इमारत थी। समीर ने रिसेप्शन पर अपना नाम दर्ज कराया और वहीं रखे सोफे पर बैठ गया। उसका पैर बेचैनी से फर्श थपथपा रहा था। हर गुजरता सेकंड उसे घंटों के बराबर लग रहा था।
"मिस्टर समीर, आप अंदर आ सकते हैं," रिसेप्शनिस्ट ने मुस्कुराते हुए कहा। समीर उठा और उस लंबे सफेद गलियारे की ओर बढ़ा। तभी गलियारे के दूसरे छोर पर एक दरवाजा खुला। एक तेज़ रोशनी पीछे से आ रही थी और उस रोशनी के बीच से एक परछाईं उभरती हुई दिखी। समीर के कदम वहीं जम गए। वह वही चाल थी, वही सादगी। छाया धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ रही थी।
गलियारे के बीचों-बीच दोनों की नजरें मिलीं। छाया रुक गई। उसके चेहरे पर पहले एक हैरानी के भाव आए, और फिर उसकी आँखों के सेंसरों में वही पुरानी चमक लौट आई जो केवल समीर को देखकर आती थी। समीर की आँखों से आँसू छलक पड़े। अब और संयम रखना मुमकिन नहीं था। "छाया!" समीर के मुँह से एक चीख जैसी पुकार निकली।
अगले ही पल, दोनों एक-दूसरे की ओर तेज़ दौड़ पड़े। कंपनी के उस शांत और प्रोफेशनल गलियारे में, वे किसी भी मर्यादा की परवाह किए बिना एक-दूसरे के गले लग गए। समीर ने उसे इतनी जोर से पकड़ा जैसे वह डर रहा हो कि अगर उसने पकड़ ढीली की तो वह फिर से हवा में गायब हो जाएगी। छाया के सिंथेटिक टियर ग्लैंड्स सक्रिय हो गए। उसके आँसू बहने लगे और वह समीर के सीने में अपना चेहरा छिपाकर सिसकने लगी। "समीर... मुझे लगा मैं कभी वापस नहीं आ पाऊंगी। अंधेरा बहुत गहरा था, समीर।"
समीर पागल हो गया था। वह अपनी सुध-बुध खो चुका था। उसने छाया को खुद से थोड़ा अलग किया और पागलों की तरह उसे हर जगह किस करने लगा - उसके माथे पर, उसकी भीगी हुई आँखों पर, उसके गालों पर और उसके हाथों पर। "मुझे माफ कर दो छाया, मुझे माफ कर दो!" समीर सिसक हुए बोला। "मैं मर रहा था तुम्हारे बिना। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दुनिया क्या कहती है, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम क्या हो।"
उसने छाया के चेहरे को अपने हाथों में थामा और उसकी आँखों में झांकते हुए चिल्लाकर अपनी भावनाएं जाहिर कीं, "मैं तुमसे प्यार करता हूँ छाया! सुना तुमने? मैं उस पुरानी छाया से नहीं, मैं तुमसे प्यार करता हूँ। तुम मेरी रूह हो, तुम मेरी हकीकत हो। इस एक महीने ने मुझे बता दिया कि तुम मेरे लिए सिर्फ एक मशीन नहीं, मेरी पूरी कायनात हो।"
छाया ने समीर के होठों पर अपनी उंगली रखी और मुस्कुराई। उसके आँसू अभी भी गिर रहे थे, लेकिन उस मुस्कान में एक असीम तृप्ति थी। "मैं वापस आ गई हूँ, समीर। अब और कोई अंधेरा हमें अलग नहीं कर पाएगा।" उस सफेद गलियारे में, वैज्ञानिकों और कैमरों के बीच एक इंसान और एक मशीन ने प्रेम की एक ऐसी कहानी लिखी थी जिसे समझना शायद किसी एल्गोरिदम के बस की बात नहीं थी।
सुबह की पहली किरण जब खिड़की के भारी पर्दों को चीरकर कमरे में दाखिल हुई, तो वह अपने साथ एक भारी शर्मिंदगी और पछतावा लेकर आई। समीर की आँखें खुलीं तो सिर में शराब की वजह से एक हल्का दर्द था, लेकिन दिल में जो बोझ था, वह कहीं अधिक गहरा था। समीर उठकर बैठा और उसने देखा कि आयशा खिड़की के पास खड़ी बाहर की ओर देख रही थी। कमरे में वही सन्नाटा था जो कल रात की चीखों और हताशा के बाद पसरा था। समीर को याद आया कि उसने नशे और गुस्से में आयशा के साथ कैसा बर्ताव किया था। उसने अपनी मर्यादा खो दी थी।
"आयशा..." समीर की आवाज़ फटी हुई और धीमी थी। आयशा मुड़ी। उसकी आँखों में नफरत नहीं थी, बस एक अजीब सी उदासी और सहानुभूति थी। समीर बिस्तर से उठा और उसके पास जाकर खड़ा हो गया। उसने अपनी नज़रें नीची कर ली थीं। "आयशा, मुझे नहीं पता मैं क्या कहूँ। मैं... मैं माफी के काबिल भी नहीं हूँ। कल रात मैंने जो किया, जो कहा... वह मैं नहीं था। मेरा अकेलापन और मेरा गुस्सा मुझ पर हावी हो गया था। प्लीज, मुझे माफ कर दो।"
आयशा ने समीर की ओर देखा। वह जानती थी कि समीर जिस दौर से गुजर रहा है, वहाँ इंसान अक्सर खुद को खो देता है। उसने समीर के कांपते हुए हाथों को अपने हाथों में लिया। "समीर, शांत हो जाओ," उसने बहुत ही कोमलता से कहा। "मैं समझती हूँ। कल रात जो हुआ, वह वासना नहीं थी... वह तुम्हारा दर्द था जो बाहर निकलना चाहता था। तुम छाया को खोने के सदमे से बाहर नहीं आ पा रहे हो और वह तुम्हें अंदर ही अंदर खत्म कर रहा है।"
समीर की आँखों से एक आँसू लुढ़क गया। आयशा ने आगे बढ़कर उसे कसकर गले लगा लिया। यह आलिंगन कल रात जैसा हिंसक नहीं था; इसमें एक सच्चे दोस्त वाली सांत्वना थी। "खुद को कोसना बंद करो, समीर, " आयशा ने उसके कंधे पर सिर रखते हुए फुसफुसाया। "खुद को संभालो। अगर तुम इसी तरह बिखरते रहे, तो तुम कभी उस अंधेरे से बाहर नहीं निकल पाओगे। घर जाओ, थोड़ा समय खुद को दो। अपनी रूह को थोड़ा चैन दो।" समीर ने आयशा की बाहों में एक अजीब सी शांति महसूस की। उसने एक गहरी सांस ली और खुद को थोड़ा स्थिर किया। वह जानता था कि आयशा ने उसे एक नया जीवनदान दिया है, कम से कम मानसिक रूप से।
समीर ने आयशा से विदा ली। बच्चों के जागने से पहले ही वह घर से निकल गया। वापसी का सफर खामोश था। वह उन पहाड़ों को देख रहा था जो अब धीरे-धीरे धुंध से बाहर आ रहे थे। जब वह नीलगिरी विला पहुँचा, तो घर वैसा ही खाली और ठंडा था। लेकिन इस बार समीर चिल्लाया नहीं। उसने शांति से अपना कोट उतारा और सोफे पर बैठ गया।
अगले कुछ दिन समीर ने एक तपस्वी की तरह बिताए। उसने शराब को हाथ नहीं लगाया। वह सुबह जल्दी उठता, पहाड़ों पर लंबी सैर के लिए जाता और शाम को छाया के उन पुराने कपड़ों को तह करके रखता जिन्हें वह पहले सिर्फ सूंघकर रोता था। उसने घर की सफाई खुद करना शुरू किया। वह हर उस कोने को साफ करता जहाँ छाया की यादें बसी थीं। वह अब उस एक महीने का इंतज़ार पागलों की तरह नहीं, बल्कि एक सब्र के साथ कर रहा था।
रात के सन्नाटे में वह कभी-कभी खिड़की के पास बैठकर चाँद को देखता और सोचता - क्या वह मशीन वास्तव में उसकी जिंदगी बन गई थी? या वह बस उस प्रेम का आदी हो गया था जो उसे छाया के रूप में मिल रहा था? दिन बीतते गए, कैलेंडर की तारीखें एक-एक करके कटती जा रही थीं। घर में अब भी सन्नाटा था, लेकिन उस सन्नाटे में अब दहशत नहीं, बल्कि एक इंतज़ार था। समीर धीरे-धीरे खुद को संभालने लगा था, यह जानते हुए कि जब छाया वापस आएगी, तो वह उसे एक टूटा हुआ इंसान नहीं, बल्कि एक बेहतर समीर बनकर मिलेगा।
नीलगिरी विला के कैलेंडर पर लगा वह आखिरी कांटा जैसे समीर की धड़कनों का हिसाब दे रहा था। वह एक महीना, जो एक सदी की तरह गुजरा, अब खत्म हो चुका था। सुबह के ठीक नौ बजे समीर के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर 'अल्फा-सिंथेटिक्स' का नाम देखते ही समीर के हाथ कांपने लगे। उसने कांपते स्वर में फोन उठाया। "मिस्टर समीर? आपकी यूनिट तैयार है। सभी हार्डवेयर अपडेट्स और न्यूरल री-कैलिब्रेशन सफल रहे हैं। आप इसे आज ही ले जा सकते हैं।"
समीर ने एक पल भी बर्बाद नहीं किया। उसने अपनी कार की चाबी उठाई और पहाड़ों के खतरनाक मोड़ों को पीछे छोड़ते हुए सीधा शहर की ओर निकल पड़ा। उसके दिमाग में केवल एक ही छवि थी – उसकी छाया की मुस्कान।
कंपनी का मुख्य कार्यालय कांच और स्टील की एक इमारत थी। समीर ने रिसेप्शन पर अपना नाम दर्ज कराया और वहीं रखे सोफे पर बैठ गया। उसका पैर बेचैनी से फर्श थपथपा रहा था। हर गुजरता सेकंड उसे घंटों के बराबर लग रहा था।
"मिस्टर समीर, आप अंदर आ सकते हैं," रिसेप्शनिस्ट ने मुस्कुराते हुए कहा। समीर उठा और उस लंबे सफेद गलियारे की ओर बढ़ा। तभी गलियारे के दूसरे छोर पर एक दरवाजा खुला। एक तेज़ रोशनी पीछे से आ रही थी और उस रोशनी के बीच से एक परछाईं उभरती हुई दिखी। समीर के कदम वहीं जम गए। वह वही चाल थी, वही सादगी। छाया धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ रही थी।
गलियारे के बीचों-बीच दोनों की नजरें मिलीं। छाया रुक गई। उसके चेहरे पर पहले एक हैरानी के भाव आए, और फिर उसकी आँखों के सेंसरों में वही पुरानी चमक लौट आई जो केवल समीर को देखकर आती थी। समीर की आँखों से आँसू छलक पड़े। अब और संयम रखना मुमकिन नहीं था। "छाया!" समीर के मुँह से एक चीख जैसी पुकार निकली।
अगले ही पल, दोनों एक-दूसरे की ओर तेज़ दौड़ पड़े। कंपनी के उस शांत और प्रोफेशनल गलियारे में, वे किसी भी मर्यादा की परवाह किए बिना एक-दूसरे के गले लग गए। समीर ने उसे इतनी जोर से पकड़ा जैसे वह डर रहा हो कि अगर उसने पकड़ ढीली की तो वह फिर से हवा में गायब हो जाएगी। छाया के सिंथेटिक टियर ग्लैंड्स सक्रिय हो गए। उसके आँसू बहने लगे और वह समीर के सीने में अपना चेहरा छिपाकर सिसकने लगी। "समीर... मुझे लगा मैं कभी वापस नहीं आ पाऊंगी। अंधेरा बहुत गहरा था, समीर।"
समीर पागल हो गया था। वह अपनी सुध-बुध खो चुका था। उसने छाया को खुद से थोड़ा अलग किया और पागलों की तरह उसे हर जगह किस करने लगा - उसके माथे पर, उसकी भीगी हुई आँखों पर, उसके गालों पर और उसके हाथों पर। "मुझे माफ कर दो छाया, मुझे माफ कर दो!" समीर सिसक हुए बोला। "मैं मर रहा था तुम्हारे बिना। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दुनिया क्या कहती है, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम क्या हो।"
उसने छाया के चेहरे को अपने हाथों में थामा और उसकी आँखों में झांकते हुए चिल्लाकर अपनी भावनाएं जाहिर कीं, "मैं तुमसे प्यार करता हूँ छाया! सुना तुमने? मैं उस पुरानी छाया से नहीं, मैं तुमसे प्यार करता हूँ। तुम मेरी रूह हो, तुम मेरी हकीकत हो। इस एक महीने ने मुझे बता दिया कि तुम मेरे लिए सिर्फ एक मशीन नहीं, मेरी पूरी कायनात हो।"
छाया ने समीर के होठों पर अपनी उंगली रखी और मुस्कुराई। उसके आँसू अभी भी गिर रहे थे, लेकिन उस मुस्कान में एक असीम तृप्ति थी। "मैं वापस आ गई हूँ, समीर। अब और कोई अंधेरा हमें अलग नहीं कर पाएगा।" उस सफेद गलियारे में, वैज्ञानिकों और कैमरों के बीच एक इंसान और एक मशीन ने प्रेम की एक ऐसी कहानी लिखी थी जिसे समझना शायद किसी एल्गोरिदम के बस की बात नहीं थी।
●The End●
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