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अध्याय 2
रात के दस बज रहे थे। ट्रेन की पीली डिम लाइटों ने डिब्बे के भीतर एक धुंधला और कामुक सा माहौल बना दिया था। सोने की तैयारी हो रही थी, और अम्मी अपनी नीचे वाली बर्थ पर अपना बैग टटोल रही थीं। नानी पहले ही चादर ओढ़कर सुस्ताने लगी थीं।
अम्मी ने बैग से अपनी नीले रंग की रेशमी नाइटगाउन निकाली। अम्मी ने उसे हाथ में लिया, तो उनके दूधिया सफेद हाथ उस नीले रंग के साथ एक गजब का कंट्रास्ट बना रहे थे। वह रात के इस पहर में भी बला की खूबसूरत लग रही थीं।
अम्मी: (धीरे से, नकाब को संभालते हुए) "साहिल... बेटा, सुन तो?"
मैं: (लेटे-लेटे, आवाज़ में थोड़ा आलस भरते हुए) "जी अम्मी, क्या बात है? अब तो सोने का वक्त है।"
अम्मी: (अपनी नाइटगाउन की तरफ इशारा करते हुए) "मुझे कपड़े बदलने हैं... वॉशरूम तक चलना पड़ेगा। पर मुझे बहुत डर लग रहा है। वो स्टेशन वाले लोग... मैंने देखा है, वो अभी भी वहीं गेट के पास खड़े बीड़ी पी रहे हैं।"
मैं: (थोड़ा हिचकिचाते हुए, एक टीनएजर की तरह) "अरे अम्मी, आप भी न! अब मैं क्या साथ चलूँ? लोग देखेंगे तो क्या सोचेंगे कि इतना बड़ा लड़का अपनी अम्मी को कपड़े बदलवाने ले जा रहा है? आप नानी को बोल लो।"
अम्मी: (आँखों में गहरी मिन्नत और थोड़ा डर समेटे) "नहीं बेटा, नानी थक गई हैं। और वो लोग... उनकी नज़रें बहुत गंदी हैं। तू बस दरवाज़े के बाहर खड़ा रह जाना, मुझे लगेगा कि तू पास है तो सुकून रहेगा। प्लीज, मेरा प्यारा बेटा है न?"
अम्मी का वह नर्म और शहद जैसा लहजा सुनकर मेरा सारा विरोध पिघल गया। मुझे अंदर ही अंदर एक अजीब सा गर्व महसूस हुआ कि मेरी इतनी हसीन अम्मी खुद को सुरक्षित रखने के लिए मेरे सहारे की तलाश में हैं।
मैं: (नीचे उतरते हुए) "ठीक है, चलिए। घबराइए मत, मैं हूँ न।"
अम्मी के चेहरे पर एक राहत भरी मुस्कान आई। वह आगे बढ़ीं और मैं उनके पीछे। गलियारे के तंग रास्ते में जब वह चल रही थीं, तो उनका ढीला-ढाला काला अबाया उनके सुडौल कूल्हों की हरकत के साथ लहरा रहा था। उनकी चमेली की भीनी खुशबू उस बंद गलियारे में एक नशा सा घोल रही थी।
जैसे ही हम वॉशरूम के करीब पहुँचे। वही हट्टे-कट्टे लोग, जिन्होंने स्टेशन पर अम्मी को छेड़ा था, गेट के पास झुंड बनाकर खड़े बीड़ी पी रहे थे। बीड़ी का कड़वा धुआँ और उनकी दरिंदा नज़रें जैसे ही अम्मी पर पड़ीं, वे आपस में फुसफुसाने लगे। उनकी आँखें अम्मी के हाथ में दबी उस नीली सिल्क की नाइटगाउन को देख रही थीं, जैसे वे अंदाज़ा लगा रहे हों कि उस अबाया के नीचे क्या-क्या छिपा है।
अम्मी ने डर के मारे मेरा हाथ ज़ोर से पकड़ लिया। उनके नर्म और गर्म पंजों की पकड़ मेरे जिस्म में एक करंट की तरह दौड़ी। उन्होंने खुद को मेरे और करीब कर लिया, जिससे उनका उभरा हुआ सीना मेरी बाँह से रगड़ खाने लगा। उस पल, मुझे अपनी मर्दानगी का अहसास हुआ और साथ ही अम्मी के उस कातिलाना बदन की छुअन ने मेरे दिल की धड़कनें बेकाबू कर दीं। मैंने उन लोगों को घूरकर देखा और अम्मी को वॉशरूम के दरवाज़े तक ले गया।
जैसे ही अम्मी ने वॉशरूम का भारी लोहे का दरवाज़ा खोला, अंदर से आती एक तेज़ और सड़ांध भरी बदबू ने उनका स्वागत किया। सफ़ाई की कमी और फिनाइल की तीखी गंध ने उनके चेहरे पर शिकन ला दी। अम्मी हमेशा से नज़ाकत और सफ़ाई की आदी रही थीं, और ट्रेन के उस गंदे टॉयलेट को देखकर उनकी आँखों में घिन और बेबसी साफ झलक रही थी।
उन्होंने अपनी नाक पर नाइटगाउन रखा और अंदर की तंग जगह का मुआयना किया। वहाँ न तो कपड़े टांगने की कोई साफ जगह थी और न ही हुक पर भरोसा किया जा सकता था। वह वापस मुड़ीं और मेरी आँखों में झांकते हुए धीरे से फुसफुसायीं।
अम्मी: (नाक सिकोड़ते हुए) "उफ़, साहिल... कितनी गंदी जगह है! यहाँ तो अपना बैग या कपड़े रखना भी मुश्किल है। सब गीला और गंदा पड़ा है।"
मैं: (उनकी परेशानी समझते हुए) "हाँ अम्मी, ट्रेन के टॉयलेट ऐसे ही होते हैं। आप जल्दी से बदल लीजिए, मैं बाहर ही खड़ा हूँ।"
अम्मी: (हिचकिचाते हुए, अपनी नीली सिल्क की नाइटगाउन मेरी तरफ बढ़ाते हुए) "बेटा, तू ज़रा ये पकड़। मैं अंदर जाकर पहले अपना अबाया उतारती हूँ, फिर तू मुझे ये पकड़ा देना। यहाँ कहीं भी रखने की जगह नहीं है, मेरा नया गाउन गंदा हो जाएगा।"
मैंने अम्मी के हाथ से वह नीला रेशमी कपड़ा थाम लिया। उस सिल्क की छुअन इतनी नर्म और चिकनी थी, जैसे अम्मी की अपनी त्वचा।
मुझे अच्छी तरह याद था कि आज सफर के लिए अम्मी ने अबाया के नीचे अपना वह खूबसूरत पीला सूट पहना था। वह सूट काफी तंग था और उसके बाजू नहीं थे—एक स्लीवलेस फिटिंग वाला कुर्ता जो उनके बदन से चिपक कर उनके हर कर्व को उभार देता था।
जैसे ही अम्मी ने दरवाज़ा आधा बंद किया और अंदर की कुंडी लगाई, मुझे अहसास हुआ कि कुछ ही पलों में वह उस भारी काले अबाया को उतार देंगी और उनके उस दूधिया सफेद बदन पर सिर्फ वह तंग पीला कपड़ा रह जाएगा।
मेरे हाथ में उनका नाइटगाउन था। अम्मी अंदर थीं, और मैं बाहर खड़ा उस बंद दरवाज़े के पीछे होने वाली हर सरसराहट को महसूस कर रहा था। मुझे पता था कि जब वह हाथ बाहर निकालेंगी, तो उनके नंगे और गोरे कंधे उस पीले कपड़े के कंट्रास्ट में किसी बिजली की तरह चमकेंगे।
पास खड़े वही आवारा लोग अभी भी तिरछी नज़रों से हमें देख रहे थे, पर मेरा पूरा ध्यान उस दरवाज़े की दरार पर था, जहाँ से अम्मी की गर्माहट और उनकी साँसों की आवाज़ मुझ तक पहुँच रही थी।
ट्रेन ने अचानक एक ज़ोरदार झटका लिया, ठीक उसी पल जब अम्मी ने अपना काला अबाया उतारकर दरवाज़े की कुंडी हल्की सी खोली थी। उनका इरादा बस इतना था कि वह एक हाथ बाहर निकालकर मुझे अबाया पकड़ा दें और मुझसे वह नीली सिल्क की नाइटगाउन ले लें। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।
उस झटके से दरवाज़ा अम्मी के हाथ से छूट गया और पूरी तरह पीछे की ओर खुल गया। अंदर का नज़ारा बिजली की तरह उन आवारा लोगों और मेरी आँखों के सामने कौंध गया।
अबाया के बिना, अम्मी उस तंग और स्लीवलेस पीले सूट में किसी जलपरी की तरह लग रही थीं। वह कुर्ता उनके बदन से इस कदर चिपका था कि उनके जिस्म का हर उतार-चढ़ाव नुमाया हो रहा था। उस चटक पीले रंग के साथ उनकी दूधिया सफेद त्वचा का कंट्रास्ट इतना तीखा था कि देखने वाले की आँखें चुंधिया जाएँ। उनके गोरे, सुडौल और नंगे कंधे रोशनी में संगमरमर की तरह चमक रहे थे।
चूँकि उन्होंने दुपट्टा नहीं लिया था, उनके गर्व से भरे पुष्ट स्तन उस तंग कपड़े के नीचे अपनी पूरी गोलाई और उभार के साथ साफ़ नज़र आ रहे थे। उनकी पतली कमर और वहाँ से नीचे की ओर बढ़ते चौड़े कूल्हों के कर्व ने एक ऐसी कामुक लय बनाई थी जिसे देखकर कोई भी अपना आपा खो दे। उनके मखमली और गोरे हाथ हवा में आधे खुले हुए थे, और उनके चेहरे पर अचानक आई उस आफत की वजह से गहरी दहशत थी।
वहाँ खड़े उन रऊडी लोगों की आँखों में जैसे हवस का लावा उबल पड़ा। अम्मी की उस नूरानी और कामुक छवि को अचानक अपने सामने पाकर वे अपनी औकात भूल गए।
उनमें से एक हट्टा-कट्टा शख्स, जो बीड़ी पी रहा था, आगे बढ़ा और अम्मी के उस बेपर्दा हुस्न को अपनी गंदी नज़रों से ऊपर से नीचे तक चाटते हुए बड़े भद्दे लहजे में बोला:
"वाह भाई! क्या माल छिपा रखा था काली चादर में... मैडम, अकेले-अकेले बड़ी मुश्किल हो रही होगी। कहो तो अंदर आकर चेंज करने में आपकी थोड़ी मदद कर दें?"
उसकी बात सुनकर पीछे खड़े उसके साथियों ने ज़ोरदार ठहाका लगाया और एक ने लंबी सीटी बजाई। उनकी वह भद्दी हँसी और सीटियाँ उस खामोश गलियारे में ज़हर की तरह घुल गईं। अम्मी का गोरा चेहरा शर्म और खौफ से एकदम लाल पड़ गया। वह अपने दोनों हाथों से अपने भरे हुए सीने को ढंकने की कोशिश करने लगीं, लेकिन उस छोटे से बाथरूम में उनकी बेबसी साफ़ दिख रही थी।
मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे कान में गरम तेल डाल दिया हो। मेरी अम्मी, जो मेरी नज़र में पवित्रता की मूरत थीं, उनके उस कातिलाना और सेक्सी रूप का इस तरह सरेआम मज़ाक उड़ते देख मेरा खून खौल उठा। एक तरफ तो अम्मी के उस अर्धनग्न और मोहक बदन की छुअन और दृश्य ने मेरे टीनएज दिमाग में एक करंट पैदा कर दिया था, और दूसरी तरफ उन लोगों की ज़ुबान ने मेरी मर्दानगी को ललकारा था।
मेरा खून खौल उठा था। उन बदतमीजों की सीटी और वह भद्दा जुमला मेरे कानों में शीशे की तरह चुभ रहा था। मैंने जैसे ही अपनी मुट्ठियाँ भींचीं और उन दरिंदों की तरफ एक कदम बढ़ाया, अम्मी ने फुर्ती से अपना गोरा और रेशमी हाथ बाहर निकाला और मेरी बाजू थाम ली।
अम्मी: (धीमी और कांपती हुई आवाज़ में) "साहिल... नहीं बेटा! पागल मत बन। तू चुपचाप यहाँ खड़ा रह, बस।"
उनकी आँखों में गहरी दहशत थी। उन्होंने जल्दी से अपना काला अबाया मेरे हाथों में थमाया और बदले में अपनी नीली सिल्क की नाइटगाउन मुझसे ले ली। वह इतनी डरी हुई थीं कि उन्हें होश ही नहीं था कि वह किस हाल में सबके सामने खड़ी हैं। जैसे ही वह मुड़ीं ताकि वापस उस तंग बाथरूम में जाकर दरवाज़ा बंद कर सकें, उन्होंने अनजाने में उन आवारा लोगों को अपनी खूबसूरती का वह हिस्सा दिखा दिया जिसे अब तक सिर्फ अबाया के काले पर्दे ने छुपा रखा था।
जैसे ही अम्मी मुड़ीं, उस तंग पीले सूट का पिछला हिस्सा पूरी तरह नुमाया हो गया। उस कुर्ते की गर्दन पीछे से बहुत गहरी थी, जो उनकी दूधिया सफेद और चिकनी पीठ को लगभग आधा नंगा कर रही थी। उनकी रीढ़ की हड्डी के पास की वह गहरी ढलान और उस पर चमकता पसीना किसी भी मर्द का ईमान डगमगा देने के लिए काफी था।
लेकिन असली कयामत तो नीचे थी। वह पीला सूट उनके सुडौल कूल्हों पर इस कदर चिपका हुआ था कि उनकी गाँड का हर उतार-चढ़ाव साफ़ नज़र आ रहा था। चलते वक्त जब उनके कदम डगमगाए, तो उनके उन मखमली और पुष्ट नितंबों में एक ऐसी लचक पैदा हुई जिसे देखकर वहाँ खड़े उन रऊडी लड़कों की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह नंगी गोरी पीठ और उसके नीचे उस पीले कपड़े में कैद वह कातिलाना उभार... वह नज़ारा किसी के भी ज़हन में आग लगाने के लिए काफी था।
उनमें से एक ने अपनी बीड़ी का धुआँ हवा में छोड़ते हुए एक और गंदी आवाज़ निकाली।
"उफ़... पीछे का मंज़र तो सामने से भी ज़्यादा ज़ालिम है! यार, ऐसी 'जन्नत' तो मैंने आज तक नहीं देखी।"
अम्मी ने हड़बड़ी में दरवाज़ा बंद किया। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे अपनी पसलियों में उसकी चोट महसूस हो रही थी। एक तरफ उन लोगों की बदज़ुबानी पर मेरा गुस्सा और दूसरी तरफ अपनी ही अम्मी के उस बेपनाह सेक्सी और छुपे हुए रूप का साक्षात दर्शन—मैं एक ऐसे भंवर में फँस गया था जहाँ 'पाप' और 'हकीकत' के बीच की लकीर धुंधली होती जा रही थी।
बाथरूम के अंदर से कपड़ों की सरसराहट की आवाज़ आ रही थी, और मैं बाहर खड़ा उनके उस दूधिया बदन और उस गहरी गर्दन वाले पीले सूट की यादों से जूझ रहा था।
माहौल पल भर में तनावपूर्ण से खौफनाक हो गया। उन आवारा लड़कों की टोलियों ने बड़ी चालाकी से घेराबंदी कर ली थी। दो लड़के मेरे दाएं-बाएं आकर खड़े हो गए, जिससे मैं उनके बीच सैंडविच की तरह फंस गया। उनमें से एक, जिसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और मुँह से बीड़ी की बदबू आ रही थी, उसने बड़े हक के साथ अपना हाथ मेरे कंधे पर रख दिया—जैसे हम पुराने दोस्त हों।
उसने अपना मुँह मेरे कान के बिल्कुल करीब लाया और अपनी आवाज़ को इतना धीमा रखा कि सिर्फ मैं सुन सकूँ। उसकी आवाज़ में एक नशीली और गंदी तारीफ घुली हुई थी।
"अबे ओ छोटे... सच बता, ये तेरी अम्मी ही हैं? कसम खुदा की, कोई देख ले तो यकीन न करे। जिस तरह का इनका दूधिया बदन है और वो पीला तंग कुर्ता, ये तो 25 की भी नहीं लगतीं। ऐसी कयामत चीज़ घर में छुपाकर रखी है तूने?"
उसकी बातों ने मेरे ज़हन में एक साथ कई भावनाओं का विस्फोट कर दिया—एक तरफ अम्मी के उस कातिलाना हुस्न का सरेआम ज़िक्र सुनकर मुझे घिन आ रही थी, तो दूसरी तरफ उनकी सेक्सी इमेज का यह खौफनाक सच मुझे अंदर तक हिला रहा था।
तभी मेरी नज़र गैलरी के दूसरे छोर पर पड़ी। दो और लड़के वहाँ दीवार से टिक कर खड़े हो गए थे, उन्होंने हमारा रास्ता पूरी तरह ब्लॉक कर दिया था। अब न तो कोई उधर से आ सकता था और न ही हम वहाँ से भाग सकते थे। नानी अपनी सीट पर सो रही थीं और इस खतरे से बिल्कुल बेखबर थीं।
अचानक मुझे अपनी सुरक्षा की भी उतनी ही फिक्र होने लगी जितनी अम्मी की। मैं सिर्फ एक कॉलेज जाने वाला पतला-दुबला लड़का था, और वे चार हट्टे-कट्टे रऊडी लड़के थे। मुझे समझ आ गया कि वे सिर्फ अम्मी के उस मखमली बदन को निहारने नहीं आए थे, उनके इरादे बहुत खतरनाक थे।
बाथरूम के अंदर से अम्मी के कपड़ों की सरसराहट आ रही थी। मुझे अहसास हुआ कि जब वह उस नीली सिल्क की नाइटगाउन में बाहर निकलेंगी, तो वह उन भेड़ियों के लिए और भी आसान शिकार बन जाएँगी। उस रेशमी और पारदर्शी कपड़े में उनके भरे हुए सीने और चौड़े कूल्हों का उभार उन लोगों को और भी पागल कर देगा।
मेरी हथेलियाँ पसीने से भीग गई थीं। मैं उन दो लड़कों के बीच फंसा हुआ था, और सामने खड़े दो और लड़के मुस्कुराते हुए मुझे देख रहे थे, जैसे वे किसी बड़ी वारदात की तैयारी में हों। उस बंद और घुटन भरी गैलरी में, अम्मी की सुरक्षा अब पूरी तरह मेरी हिम्मत और समझदारी पर टिकी थी, पर मेरा खुद का दिल खौफ और एक अजीब सी उत्तेजना के बीच बुरी तरह धड़क रहा था।
"देख छोटे, हम बस मैडम से थोड़ी जान-पहचान करना चाहते हैं, तू बीच में मत आना," कंधे पर हाथ रखे हुए शख्स ने दबाब बढ़ाते हुए कहा।
अम्मी को अब किसी भी पल बाहर आना था, और मुझे पता था कि उनका वह गोरा हुस्न इन चार भूखे भेड़ियों के सामने तमाशा बनने वाला है। क्या मैं अपनी अम्मी की इज़्ज़त बचा पाऊँगा? या उनकी वह कातिलाना खूबसूरती हमें किसी बड़ी मुसीबत में झोंक देगी?
Deepak Kapoor
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