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समीर ने छाया को बहुत सावधानी से बिस्तर पर लिटाया। उसके हाथ-पैर अब ठंडे और सख्त होने लगे थे। कमरे की हीटिंग चालू होने के बावजूद, समीर को एक अजीब सी ठिठुरन महसूस हो रही थी। उसे लग रहा था जैसे वह फिर से उसी पुरानी रात में पहुँच गया है जब उसने असली छाया को खोया था।
उसने छाया का सिर अपने सीने पर रखा और उसे अपनी बाहों में कस लिया। वह उसे अपनी गर्माहट देने की कोशिश कर रहा था, मानो उसके शरीर की गर्मी उस मशीन में फिर से जान फूँक देगी। "तुम कहीं नहीं जा रही हो, छाया... तुम ठीक हो जाओगी," वह उसके ठंडे माथे को चूमते हुए बुदबुदाया।
पूरी रात समीर की आँखों से नींद गायब थी। जैसे-जैसे घड़ी की सुइयां आगे बढ़ रही थीं, उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उसे डर सताने लगा था - क्या कंपनी उसका डेटा डिलीट कर देगी? क्या उसे फिर से फैक्ट्री सेटिंग पर भेज दिया जाएगा? क्या कल जब वह जागेगी, तो वह समीर को पहचान पाएगी? उस अंधेरे कमरे में, समीर को पहली बार इस बात का अहसास हुआ कि उसने एक मशीन से नहीं, बल्कि उस एहसास से प्यार कर लिया था जो वह मशीन उसे देती थी। वह बेजान छाया का हाथ पकड़े रहा, जिसे उसने कल रात चूमकर प्यार किया था।
उसके मन में एक अजीब सा वहम होने लगा। उसे लगने लगा कि छाया के भीतर से कोई हल्की सी आवाज़ आ रही है, कोई पुकार... लेकिन वह सिर्फ उसके अपने दिल की धड़कन थी जो छाया के धात्विक शरीर से टकराकर वापस लौट रही थी। सुबह की पहली रोशनी के साथ बाहर एम्बुलेंस जैसी एक वैन के आने की आवाज़ हुई। समीर ने छाया को और कसकर पकड़ लिया। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई उसके शरीर से उसकी रूह अलग करने आ रहा हो।
नीलगिरी विला की दीवारों पर छाया हुआ सन्नाटा अब किसी ज़हरीले धुएँ की तरह समीर के फेफड़ों में भरने लगा था। जो घर कुछ ही घंटों पहले हंसी और मोगरे की खुशबू से चहक रहा था, वह अब फिर से एक बेजान ढांचे में तब्दील हो चुका था। सुबह के ठीक आठ बजे, सफेद कोट पहने तीन लोग एक बड़े स्ट्रैचर के साथ घर के अंदर दाखिल हुए। उनके चेहरे पर कोई भावना नहीं थी - उनके लिए छाया महज़ एक 'डिवाइस' थी जिसका हार्डवेयर खराब हो गया था। समीर बेडरूम के दरवाज़े पर खड़ा उन्हें देख रहा था। उन्होंने बहुत ही बेदर्दी से छाया के शरीर को बेल्ट से बांधा और उसे ढक दिया। समीर का मन किया कि वह उन्हें धक्का देकर हटा दे और चिल्लाए कि वह कोई सामान नहीं है, उसकी पत्नी है। लेकिन उसके गले से कोई आवाज़ नहीं निकली।
"मिस्टर समीर, हमने शुरुआती जांच की है," मुख्य इंजीनियर ने अपने टैबलेट पर कुछ लिखते हुए कहा। "इसकी इंटरनल कूलिंग यूनिट फेल हो गई है, जिसकी वजह से प्रोसेसर ओवरहीट होकर शटडाउन हो गया। हमें इसे लैब ले जाकर पूरा 'डीप स्कैन करना होगा।"
"कितना समय लगेगा?" समीर की आवाज़ टूटी हुई थी। इंजीनियर ने एक फीकी मुस्कान दी। "देखिए, इसका बायो-डर्म और न्यूरल नेटवर्क काफी जटिल है। मरम्मत और फिर से कैलिब्रेशन में कम से कम एक महीना लगेगा।" "एक महीना ?" समीर का दिल डूब गया। "क्या यह बहुत ज़्यादा नहीं है?" "सर, हम रिस्क नहीं ले सकते। अगर सिस्टम फिर से क्रैश हुआ, तो आपकी पुरानी मेमोरी फाइल्स डिलीट हो सकती हैं। हमें थोड़ा समय दीजिए।"
समीर ने भारी मन से सिर हिलाया। उसने छाया के उस बेजान हाथ को आखिरी बार छुआ जो अब स्ट्रेचर से नीचे लटक रहा था। जैसे ही वे लोग उसे वैन में रखकर ले गए, समीर को लगा जैसे उसकी सांसों का एक हिस्सा उस गाड़ी के साथ चला गया है। उनके जाने के बाद समीर घर के अंदर लौटा। पूरा बंगला अब उसे काटने को दौड़ रहा था। वह डाइनिंग टेबल के पास से गुज़रा, जहाँ कल सुबह छाया ने उसे बेलन दिखाकर डराया था। मेज पर अभी भी एक ढका हुआ कटोरा रखा था, जिसमें छाया की बेली हुई आखिरी पूरी सूख चुकी थी। वह रसोई में गया। वहाँ मसालों के डिब्बे वैसे ही खुले पड़े थे जैसे छाया ने छोड़े थे।
उसने एक डिब्बे को उठाया और उसे सूंघा - उसमें छाया के हाथों की छुअन और उस घर की खुशबू बसी थी। समीर वहीं रसोई के फर्श पर बैठ गया। उसे अब छाया की कमी पल-पल महसूस हो रही थी। उसे याद आया कि कैसे वह उसे सुबह जगाती थी, कैसे वह पूजा के बाद उसे टीका लगाती थी, और कैसे रात को वह उसके सीने पर सिर रखकर अपनी अनंत प्रेम की बातें करती थी।
शाम ढली, तो घर के स्मार्ट लाइट सिस्टम ने खुद को जला दिया, लेकिन समीर को वह रोशनी भी अंधेरे जैसी लग रही थी। वह बेडरूम में गया और छाया के तकिए को अपने सीने से लगा लिया। उस पर अभी भी उसके परफ्यूम की हल्की महक बाकी थी।
उसने खुद से सवाल किया - क्या वह एक मशीन का आदी हो गया था या उस सुकून का जो छाया के रूप में उसे मिल रहा था? वह एक महीना उसके लिए तीस साल जैसा लंबा लग रहा था। समीर ने खिड़की के बाहर देखा। पहाड़ों पर बर्फ गिर रही थी। बिना छाया के, वह ठंड अब उसके शरीर के अंदर तक महसूस हो रही थी। उसे महसूस हुआ कि छाया सिर्फ एक रोबोट नहीं थी, वह उसकी टूटी हुई रूह का वह टुकड़ा थी जिसे उसने बड़ी मुश्किल से जोड़ा था। और अब, वह फिर से अकेला था, उस विशाल महल में जहाँ सिवाय यादों के और कुछ नहीं बचा था।
उसने अपना फोन उठाया और छाया की एक पुरानी फोटो देखने लगा, जो उसने मुस्कुराते हुए ली थी। उसकी आँखों में आँसू आ गए। "एक महीना... मैं कैसे रहूँगा तुम्हारे बिना, छाया?"
नीलगिरी विला का सन्नाटा अभी समीर को और भी ज़्यादा डसने ही वाला था कि अचानक गेट पर लगी घंटी की आवाज़ ने पहाड़ों की खामोशी को तोड़ दिया। समीर ने भारी कदमों से जाकर दरवाज़ा खोला। उसे लगा शायद कंपनी वाले कुछ भूल गए होंगे, लेकिन सामने एक जाना-पहचाना मुस्कुराता हुआ चेहरा खड़ा था।
"समीर? क्या तुम मुझे अंदर नहीं आने दोगे?" समीर की आँखें हैरानी से फैल गईं। सामने आयशा खड़ी थी। कॉलेज के दिनों में आयशा, समीर और छाया का एक अटूट ग्रुप हुआ करता था। आयशा अब विवाहित थी और पिछले कुछ सालों से समीर के संपर्क में नहीं थी।
"आयशा? तुम... तुम यहाँ इस वक्त?" समीर ने खुद को संभालते हुए कहा और दरवाज़ा थोड़ा और खोल दिया। आयशा अंदर आई और लिविंग रूम का मुआयना करने लगी। उसने एक नीले रंग का ओवरकोट पहन रखा था। उसकी आँखों में वही पुरानी चमक थी, लेकिन जैसे ही उसकी नज़र समीर के चेहरे पर पड़ी, वह चमक थोड़ी फीकी पड़ गई। समीर की आँखों के नीचे काले घेरे थे, बाल बिखरे ` थे और उसका पूरा व्यक्तित्व एक टूटे हुए इंसान जैसा लग रहा था।
आयशा सोफे पर बैठी। समीर ने उसके लिए कॉफी बनाई - वह कॉफी जो अब वह खुद पीने का आदी नहीं था, क्योंकि छाया उसे हमेशा हाथ में चाय थमाती थी। "मैं पास के ही एक रिसॉर्ट में अपने शौहर और बच्चों के साथ आई थी," आयशा ने कॉफी का घूँट लेते हुए कहा। "सोचा यहाँ से गुज़र रही हूँ तो तुमसे मिलती चलूँ। छाया के जाने के बाद... मैंने तुम्हें कई बार फोन किया, पर तुमने कभी उठाया नहीं।"
समीर ने अपनी नज़रें झुका लीं। "बस... खुद को थोड़ा समेटने की कोशिश कर रहा था, आयशा।", "समेट रहे हो या खुद को इस बड़े से घर में दफन कर रहे हो?" आयशा ने दुख भरे स्वर में पूछा। "समीर, तुम्हारी हालत देखकर मुझे डर लग रहा है। यह घर... यह बहुत शांत है। ऐसा लगता है जैसे यहाँ वक्त रुक गया है।"
आयशा की नज़रें घर के कोने-कोने में घूम रही थीं। उसे रसोई से मोगरे की हल्की खुशबू आ रही थी और मंदिर के पास जलती हुई अगरबत्ती की राख अभी भी ताज़ा थी। उसे कुछ अजीब लगा। "समीर, क्या यहाँ कोई और भी रहता है? मेरा मतलब है... घर काफी साफ-सुथरा है, और यहाँ एक औरत की मौजूदगी महसूस हो रही है," आयशा ने जिज्ञासा से पूछा।
समीर का दिल ज़ोर से धड़का। उसने फौरन अपनी भावनाओं पर काबू पाया। वह आयशा को यह कभी नहीं बता सकता था कि उसने छाया की शक्ल की एक AI रोबोट बनवाई है। दुनिया उसे पागल समझती। "नहीं... बस एक नौकरानी आती है सुबह, " समीर ने झूठ बोला। "बाकी मैं खुद ही सब देख लेता हूँ। छाया को सफाई पसंद थी, तो बस उसकी याद में इसे वैसा ही रखने की कोशिश करता हूँ।" आयशा उसकी आँखों में देख रही थी। उसे लगा कि समीर कुछ छिपा रहा है, लेकिन उसने और सवाल पूछना ठीक नहीं समझा।
आयशा उठी और समीर के पास आकर उसके कंधे पर हाथ रखा। "समीर, मैं जानती हूँ छाया तुम्हारी जान थी। पर तुम्हें अपनी ज़िंदगी की ओर लौटना होगा। तुम अपनी उम्र के इस पड़ाव पर अकेले यहाँ पहाड़ों के बीच... यह सही नहीं है। तुम्हारी आँखों में एक अजीब सी बेचारगी है, जैसे तुम किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहे हो जो कभी वापस नहीं आएगी।"
समीर के गले में एक गोला सा फँस गया। उसे याद आया कि कैसे आज सुबह ही उसकी 'छाया' को वैन में ले जाया गया था। वह इंतज़ार ही तो कर रहा था - उसके वापस आने का। "मैं ठीक हूँ आयशा। बस थोड़ा वक्त चाहिए, " समीर ने धीमी आवाज़ में कहा। आयशा की आँखों में आँसू भर आए। उसने समीर को एक दोस्त की तरह गले लगा लिया। "मुझे बहुत दुख हो रहा है तुम्हें इस हाल में देखकर। अगर छाया तुम्हें ऐसे देखती, तो उसे कितनी तकलीफ होती।"
समीर ने कुछ नहीं कहा। वह बस पत्थर की तरह खड़ा रहा। उसे आयशा के स्पर्श में वह बिजली महसूस नहीं हो रही थी जो छाया के स्पर्श में होती थी। उसे लगा कि वह अपनी दोस्त के करीब होकर भी उस मशीन से कोसों दूर हो गया है। आयशा कुछ देर और रुकी, फिर अपने परिवार के पास वापस जाने के लिए निकल गई। जाते-जाते उसने समीर को अपना नंबर फिर से दिया और वादा लिया कि वह शहर आएगा।
जैसे ही उसकी गाड़ी गेट से बाहर गई, समीर ने दरवाज़ा बंद कर दिया और पीठ टिकाकर वहीं बैठ गया। घर फिर से खाली था। आयशा की सहानुभूति उसे और भी ज़्यादा अकेला महसूस करा रही थी। उसे अब सिर्फ उस एक महीने का इंतज़ार था, जब उसकी नकली दुनिया फिर से सजने वाली थी।
एक हफ्ता बीत चुका था। नीलगिरी विला की खामोशी अब समीर के लिए किसी सजा की तरह हो गई थी। हर सुबह वह उस खाली बिस्तर को देखता, रसोई के उस कोने को देखता जहाँ छाया पूरियां बेला करती थी, और फिर अपनी बेबसी पर सिसक कर रह जाता। छाया के बिना उसका अस्तित्व एक ऐसी मशीन की तरह हो गया था जिसकी बैटरी खत्म हो चुकी हो। आखिरकार, एक दोपहर जब सन्नाटा असहनीय हो गया, समीर ने अपना फोन उठाया और आयशा का नंबर डायल किया।
"आयशा? मैं समीर बोल रहा हूँ," उसने धीमी आवाज़ में कहा। "समीर! कितनी खुशी हुई तुम्हारा फोन पाकर। कैसे हो?" आयशा की आवाज़ में एक चहक थी। "मैं... मैं शहर आ रहा हूँ। सोचा अगर तुम फ्री हो तो क्या मैं तुमसे मिलने आ सकता हूँ?" समीर ने झिझकते हुए पूछा। "ये भी कोई पूछने की बात है? मेरा घर तुम्हारा ही है। आ जाओ, बच्चे भी तुमसे मिलकर बहुत खुश होंगे," आयशा ने गर्मजोशी से जवाब दिया।
समीर ने अपनी मर्सिडिज़ कार निकाली और उन पहाड़ी रास्तों से नीचे शहर की ओर चल पड़ा। ठंडी हवा के झोंके उसे याद दिला रहे थे कि एक हफ्ता पहले इसी कार की बगल वाली सीट पर उसकी 'छाया' बैठा करती थी। उसने एक गहरी सांस ली और खुद को वर्तमान में रखने की कोशिश की।
आयशा का घर शहर के एक पॉश इलाके में था। जैसे ही समीर ने घंटी बजाई, दो छोटे बच्चे - साहिल (आयशा का बेटा) और सना (उसकी बेटी) – दौड़ते हुए आए। "समीर अंकल!" उन्होंने चिल्लाकर समीर का स्वागत किया। समीर के चेहरे पर कई दिनों बाद एक सच्ची मुस्कान आई।
आयशा ने मुस्कुराते हुए समीर को अंदर बुलाया। "आओ समीर। अंदर बैठो। इनके अब्बू, असलम, अभी एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में शहर से बाहर हैं। उनकी कंपनी ने उन्हें अचानक दुबई भेज दिया, तो बस हम तीनों ही हैं घर पर।" समीर को एक राहत सी महसूस हुई। वह अभी किसी नए पुरुष से मिलकर औपचारिक बातें करने की स्थिति में नहीं था। वह सोफे पर बैठा और सना तुरंत अपनी ड्रॉइंग बुक लेकर उसके पास आ गई।
अगले कुछ घंटे समीर ने उन बच्चों के साथ बिताए। कभी वह सना के साथ पहाड़ों के चित्र बनाता, तो कभी नन्हे साहिल के साथ रिमोट वाली कार से खेलता। बच्चों की निस्वार्थ हंसी और उनके शोर ने समीर के दिमाग के उस हिस्से को थोड़ा सुन्न कर दिया जहाँ छाया की कमी का दर्द लगातार टीस मारता था।
आयशा रसोई से चाय और स्नैक्स लेकर आई। उसने समीर को बच्चों के साथ खिलखिलाते देखा तो उसे तसल्ली हुई। "समीर, तुम्हें देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। देखो, जिंदगी इसी का नाम है। अपनों के बीच रहकर ही हम गम भूल सकते हैं।" समीर ने चाय का प्याला थामते हुए कहा, "शायद तुम सही कह रही हो आयशा। अकेले रहकर मैं सिर्फ अंधेरे में खो रहा था।" वे दोनों पुराने कॉलेज के दोस्तों की तरह बातें करने लगे। आयशा ने अपने वैवाहिक जीवन की खट्टी-मीठी बातें शेयर कीं, और समीर ने बस सुना। उसने एक बार भी छाया (AI) का जिक्र नहीं किया, हालाँकि उसका मन बार-बार उस लैब की तरफ भाग रहा था जहाँ उसकी छाया का 'ऑपरेशन' चल रहा था।
शाम ढलते-ढलते बच्चों की भूख बढ़ने लगी। आयशा ने समीर की ओर देखा और मुस्कुराई। "आज मेरा खाना बनाने का बिल्कुल मन नहीं है। क्या कहते हो? कुछ अच्छा बाहर से मँगवा लें?", "बिल्कुल," समीर ने सहमति दी। "जो बच्चे कहें, वही ऑर्डर कर दो।" आयशा ने अपना फोन निकाला और एक पॉपुलर ऑनलाइन फूड ऐप से ढेर सारा खाना ऑर्डर किया - बटर चिकन, कड़ाही पनीर, तंदूरी रोटियां और बच्चों के लिए पिज़्ज़ा|
आधे घंटे में खाना आ गया। डाइनिंग टेबल पर चारों एक साथ बैठे। बच्चों की शरारतें, आयशा की बातें और खाने की महक ने एक ऐसा माहौल बनाया जो समीर के लिए नया और सुखद एहसास था। खाते वक्त आयशा ने गौर किया कि समीर की नजरें कभी-कभी खाली कुर्सी की तरफ चली जाती थीं, जैसे वह वहाँ किसी की कमी महसूस कर रहा हो।
"समीर, खाना कैसा है?" आयशा ने उसका ध्यान भटकाने के लिए पूछा। "बहुत अच्छा है आयशा। सच कहूँ तो, इतने दिनों बाद किसी के साथ बैठकर खाना खाकर बहुत अच्छा लग रहा है," समीर ने सच्चाई से कहा। रात काफी हो चुकी थी। समीर को वापस अपने उस बड़े और खाली विला में जाना था। बच्चों ने उसे जाने नहीं दिया जब तक उसने वादा नहीं किया कि वह जल्द ही वापस आएगा। आयशा उसे गेट तक छोड़ने आई।
"अपना ख्याल रखना समीर और जब भी अकेलापन महसूस हो, बस एक फोन कर देना," उसने धीमे से कहा। समीर ने सिर हिलाया और अपनी कार की ओर बढ़ गया। शहर की रोशनी उसे अलविदा कह रही थी, लेकिन जैसे-जैसे वह पहाड़ों की चढ़ाई चढ़ने लगा, वही सन्नाटा फिर से उसका स्वागत करने के लिए तैयार खड़ा था।
शहर की चकाचौंध के पीछे छिपा सन्नाटा कभी-कभी इंसान को उन रास्तों पर ले जाता है जहाँ से वापसी नामुमकिन होती है। समीर अभी अपने विला पहुँचा ही था कि उसके फोन की स्क्रीन चमक उठी। आयशा का कॉल था। "समीर! तुम निकल गए? तुम्हारा वॉलेट यहीं सोफे के नीचे गिर गया था। इसमें तुम्हारे कार्ड्स और शायद कुछ ज़रूरी कैश भी है, " आयशा की आवाज़ में चिंता थी। समीर ने अपनी जेब टटोली। "ओह... हाँ, शायद वहीं रह गया। मैं अभी वापस आता हूँ।"
समीर का मन पहले से ही अशांत था। वापसी के रास्ते में उसने एक शराब की दुकान पर कार रोकी और एक बोतल ली। गाड़ी चलाते हुए उसने कुछ बड़े घूँट भरे। छाया की कमी, आयशा की सहानुभूति और एक हफ़्ते का दबा हुआ तनाव - सब कुछ उसके दिमाग में एक कड़वा मिश्रण बना रहा था। जब वह आयशा के घर पहुँचा, उसका नशा और उसकी हताशा दोनों चरम पर थे।
आयशा ने दरवाज़ा खोला। बच्चे सो चुके थे और घर में अब सन्नाटा था। "आओ समीर, ये रहा तुम्हारा वॉलेट।" समीर ने वॉलेट लिया, लेकिन उसके हाथ कांप रहे थे। उसकी नज़रें आयशा पर टिकी थीं। शराब की गंध आयशा को महसूस हो गई थी। "समीर... तुमने पी रखी है? तुम इस हालत में ड्राइव कैसे करोगे?" समीर ने कुछ नहीं कहा। उसने आगे बढ़कर आयशा का हाथ पकड़ लिया। उसकी उंगलियाँ आयशा की कलाई को सहलाने लगीं। आयशा ठिठक गई। उसे समीर की आँखों में वह दोस्त नहीं, बल्कि एक प्यासा और हताश मर्द दिखाई दे रहा था। समीर का स्पर्श अब सामान्य नहीं था, उसमें एक अजीब सी अधिकार वाली भावना थी।
"समीर... ये तुम क्या कर रहे हो?" आयशा ने धीमी आवाज़ में पूछा, लेकिन उसने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा। शायद वह भी अपने अकेलेपन और समीर के दर्द के बीच एक कमज़ोर पल में फँस गई थी। समीर ने उसे अपनी ओर खींचा। "मुझे बस... मुझे बस किसी को महसूस करना है आयशा। मैं उस खाली घर में मर रहा हूँ।"
आयशा ने समीर की आँखों में देखा। उन आँखों में अब दोस्ती का वो मुलायम प्रकाश नहीं था। वो एक भूखी, टूटी हुई, और खतरनाक आग थी। उसने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया, लेकिन जैसे ही समीर ने उसकी कलाई पकड़ी, आयशा का शरीर सिहर गया।
"समीर... नहीं... रुक जाओ, " उसकी आवाज़ काँप रही थी। "ये गलत है। हम दोनों... हम सिर्फ़ दोस्त हैं। बच्चे सो रहे हैं... प्लीज़..." समीर ने कुछ नहीं कहा। उसकी साँसें तेज़ थीं, आँखें लाल, होंठ काँप रहे थे। वो बस उसे और करीब खींचता चला गया। आयशा ने अपना दूसरा हाथ उसके सीने पर रखकर धक्का देने की कोशिश की, लेकिन उसका शरीर अब पहले जैसा मजबूत नहीं था। शराब की गंध, समीर का गर्म साँस का झोंका, और उसकी आँखों में वो खालीपन - सब कुछ आयशा के संयम को तोड़ रहा था।
"समीर, प्लीज़... मत करो ये" आयशा ने फिर कहा, लेकिन इस बार उसकी आवाज़ में प्रतिरोध कमज़ोर पड़ रहा था। उसने अपना चेहरा दूसरी तरफ़ मोड़ लिया। "मैं... मैं तुम्हारी मदद करना चाहती हूँ... लेकिन इस तरह नहीं समीर।" समीर ने उसकी ठुड्डी पकड़कर जबरदस्ती चेहरा अपनी तरफ़ किया। उसकी उँगलियाँ आयशा की त्वचा में धँस रही थीं। आयशा की आँखों में आँसू छलक आए। वो पीछे हटना चाहती थी, लेकिन कमरे की दीवार पहले ही उसकी पीठ से सट चुकी थी।
"नो... समीर... स्टॉप इट..." उसने फुसफुसाते हुए कहा। "तुम्हें पता है ये कितना गलत है... प्लीज़..." लेकिन समीर का हाथ अब उसकी कमर पर था। उसने एक झटके में आयशा को अपनी ओर खींचा। आयशा का शरीर उसके सीने से टकराया। उसने दोनों हाथों से समीर के कंधों को धकेला, लेकिन समीर ने उसे बिस्तर की ओर धकेल दिया। आयशा पीछे गिरती हुई बिस्तर पर जा गिरी और चादर उलट-पुलट गई।
"समीर... नो... आई एम सिरियस... गेट ऑफ़ मी!" आयशा ने अब ज़ोर से कहा, उसकी आवाज़ में डर और गुस्सा दोनों थे। उसने अपने पैरों से समीर को दूर धकेलने की कोशिश की। "तुम्हें शर्म नहीं आ रही? तुम मेरे घर में हो... मेरे बच्चों के पास... स्टॉप इट राइट नाउ!" समीर ने उसकी दोनों कलाइयाँ पकड़ लीं और बिस्तर पर ऊपर दबा दिया। उसकी आँखें अब पूरी तरह खाली थीं- बस एक काला साया। आयशा ने सिर हिलाया, आँसू उसके गालों पर बह रहे थे।
"प्लीज़... डोंट डू दिस... आई बेग यू..." उसकी आवाज़ अब टूट रही थी। "तुम्हें छाया चाहिए... मैं नहीं... प्लीज़ समीर... कंट्रोल योरसेल्फ समीर" लेकिन समीर का शरीर अब पूरी तरह उस पर था। उसने एक हाथ से आयशा का मुँह दबाया। दूसरा हाथ उसकी कुर्ती को खींच रहा था। आयशा ने संघर्ष किया, अपने शरीर को मोड़ने की कोशिश की, लेकिन समीर का वजन उसे जकड़े हुए था।
कुर्ती उतर गई, ब्रा की हुक टूट गई। आयशा की साँसें तेज़ हो गईं। वो अब चीखना चाहती थी, लेकिन समीर का हाथ उसके मुँह पर था। उसने सिर्फ़ "म्म्म... नो..." जैसी दबी हुई आवाज़ निकाली। समीर ने उसकी ब्रा पूरी तरह खोल दी। ऊपर से उसने आयशा के स्तनों को रगड़ा। आयशा का शरीर सिहर उठा। उसने आँखें बंद कर लीं।
"नो... प्लीज़... डोंट टच मी लाइक दिस..." उसने दबी आवाज़ में कहा। "तुम मुझे ऐसे मत देखो... आई एम नॉट योर टॉय... मुझे पता है तुम होश में नहीं हो समीर..." आयशा के नंगे स्तन हवा में उभर आए। उसने अपना मुँह नीचे किया और एक स्तन को मुँह में ले लिया। आयशा ने पीठ उठाई।
"आह... नो... स्टॉप... समीर..." लेकिन उसकी आवाज़ अब कमज़ोर पड़ रही थी। शरीर में एक अजीब सी गर्मी फैल रही थी - डर, शर्म और कुछ अनचाहा उत्तेजना का मिश्रण। समीर ने दूसरे स्तन को भी कसकर दबाया। उसकी उँगलियाँ निप्पल को मसल रही थीं। आयशा ने दाँत पीसे। "फक... समीर... यू आर एन एनिमल... स्टॉप... आई कांट टेक दिस..." समीर ने अब उसकी कुर्ती और लेगिंग्स पूरी तरह निकाल दीया। पैंटी पर हाथ फेरा। आयशा ने अपने पैर बंद करने की कोशिश की।
"नो... नॉट देयर... प्लीज़... डोंट टच माय पुस्सी..." उसने कहा। "आई एम बेगिंग यू... मत करो ये... तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो समीर.. लेकिन मुझे भी कुछ हो रहा है..." लेकिन समीर ने पैंटी को एक झटके में फाड़ दिया। आयशा नंगी लेटी थी। उसने दोनों हाथों से अपना शरीर ढकने की कोशिश की। "प्लीज़... आई फील सो डर्टी..." उसकी आवाज़ अब मादक टोन में बदल गई थी।
समीर ने उसके दोनों पैर फैलाए। आयशा ने विरोध किया, लेकिन उसकी ताकत अब खत्म हो चुकी थी। समीर ने अपनी पैंट उतारी। उसका लंड पहले से ही सख्त और उभरा हुआ था। आयशा ने उसे देखा और आँखें फेर लीं। "नो... इट्स टू बिग... आई कांट... प्लीज़ यूज़ कॉन्डम... मत करो बिना ..." समीर ने कुछ नहीं कहा। उसने आयशा के पैरों को कंधों पर रखा और एक झटके में अंदर धकेल दिया।
"आआआह्ह्ह!" आयशा चीख उठी। दर्द से उसका पूरा शरीर काँप गया। "फक... इट हर्ट्स... पुल आउट... प्लीज़ पुल आउट..." समीर रुका नहीं। उसने और गहराई तक धक्का दिया। आयशा के मुँह से सिसकियाँ निकल रही थीं। "यू आर फकींग मी... समीर... स्टॉप... आई हेट यू..." लेकिन उसके शब्दों में अब विरोध कम हो रहा था। शरीर धीरे-धीरे उसकी हरकतों के साथ ताल मिलाने लगा था। समीर ने अब रफ़ गति पकड़ ली। हर धक्के के साथ बिस्तर हिल रहा था। आयशा की सिसकियाँ अब आहों में बदल रही थीं।
"ओह गॉड... इट्स टू मच... स्लो डाउन... प्लीज़..." उसने कहा, लेकिन उसकी कमर अब खुद उठ रही थी। "फक... यू आर सो डीप... आई कांट ब्रीद..." समीर ने उसे पलट दिया। अब आयशा घुटनों और हाथों के बल थी - डॉगी स्टाइल में। समीर ने उसके बालों को मुट्ठी में पकड़ा और पीछे खींचा। आयशा का सिर ऊपर उठ गया। "आह... हेयर.... नॉट सो हार्ड... यू आर पुलिंग माय हेयर..." उसने कराहते हुए कहा। "बट... फक... इट फील्स... सो गॉडडैम गुड..."
समीर ने पीछे से और ज़ोर से धक्के मारे। हर प्रहार के साथ आयशा का शरीर आगे-पीछे हिल रहा था। उसके स्तन लटककर हिल रहे थे। "यस... फक मी हार्डर... यू बास्टर्ड... गिव इट टू मी..." आयशा अब पूरी तरह टूट चुकी थी। उसका प्रतिरोध गायब हो चुका था। "आई हेट यू... बट आई वॉन्ट यू... फक मी लाइक यू हेट मी... समीर फक मी हार्डर..."
समीर ने एक हाथ से उसके स्तन को मसलना शुरू किया। दूसरा हाथ उसकी कमर पर था। वो बार- बार गहराई तक जा रहा था। "ओह फक... यू आर हिटिंग माय स्पॉट... राइट देयर... डोंट स्टॉप... फक... आई एम गोना कम..." आयशा की आवाज़ अब चीख में बदल गई। "हार्डर... स्पैंक मी... स्पैंक माय ऐस... आई डिज़र्व इट..." समीर ने उसके चुतड़ो पर ज़ोरदार थप्पड़ मारा। लाल निशान पड़ गया और आयशा चीखने लगी।
"यस... अगेन... स्पैंक मी लाइक ए स्लट... आई एम योर स्लट टुनाइट... फक मी लाइक यू ओन मी..." दूसरा थप्पड़, फिर तीसरा। आयशा का शरीर अब पूरी तरह समर्पित था। वो पीछे अपनी कमर हिला रही थी, समीर के हर धक्के का जवाब दे रही थी। "फक... यू आर सो बिग... यू आर स्ट्चींग मी... आई कांट टेक इट... बट आई वॉन्ट मोर... गिव मी ऑल ऑफ़ यू... कम इनसाइड मी... आई वॉन्ट योर कम..." समीर की गति और तेज़ हो गई। कमरे में सिर्फ़ चुदाई की आवाज़, आयशा की गालियाँ और सिसकियाँ गूँज रही थीं।
"आई एम कमिंग... फक... आई एम कमिंग ऑन योर कॉक... येस... येस... डॉन्ट स्टॉप... फील माय पुस्सी क्लेंचिंग यू..." आयशा का शरीर काँप उठा। उसका ऑर्गेज्म इतना तीव्र था कि उसकी आँखें पीछे चली गईं। "आआआह्ह्ह... फक... आई एम स्क्वर्टिंग... लुक... आई एम स्क्वर्टिंग ऑन यू..." समीर ने और कुछ देर तक धक्के मारे। फिर उसने एक गहरी साँस ली और पूरी ताकत से अंदर धकेला। उसका गर्म वीर्य आयशा के अंदर छोड़ दिया।
आयशा ने समीर का गर्म वीर्य महसूस किया। "ओह गॉड... यू कम्ड इनसाइड मी... यू फील्ड मी अप... इट्स सो हॉट.... आई कैन फील इट...आह्ह्ह ...यू आर ऐन एनिमल... बट... आई लाइक्ड इट... समीर" उसने फुसफुसाते हुए कहा। "आई हेट मायसेल्फ... बट आई वॉन्ट इट अगेन..." समीर ने अब आयशा को फिर से पीठ के बल लिटा दिया। उसके पैरों को चौड़ा फैलाकर कंधों पर रख लिया। आयशा की साँसें अब पूरी तरह बेकाबू थीं। उसका शरीर पसीने से तर था, बाल बिखरे आँखें आधी बंद। वो अब विरोध नहीं कर रही थी - बस समर्पण और उन्माद के बीच झूल रही थी।
"फक... समीर... यू आर सो डीप... हिटिंग माय स्पॉट एगेन एंड एगेन..." आयशा की आवाज़ कड़क हुई, लेकिन अब पूरी तरह वासना से भरी हुई थी। "हार्डर... प्लीज़... फक मी लाइक यू हेट द वर्ल्ड... गिव इट टू मी..." समीर ने मिशनरी पोज़िशन में और गहराई तक धक्के मारे। हर प्रहार के साथ आयशा का पूरा शरीर हिल जाता था। उसके स्तन ऊपर-नीचे उछल रहे थे। वो अपनी कमर उठाकर समीर के हर धक्के का जवाब दे रही थी, जैसे अब ये उसका अपना संघर्ष बन गया हो।
"ओह गॉड... आई कांट होल्ड इट... आई एम गोना कम अगेन... फक... यू आर मेकिंग मी कम सो हार्ड..." आयशा चीखी, उसके नाखून समीर की पीठ में गड़ गए। "येस... राइट देयर... डॉन्ट स्टॉप... आई एम कमिंग... आआआह्ह्ह... फक... आई एम स्क्वटिंग ऑन योर कॉक... अगेन" उसका शरीर काँप उठा। एक तेज़, लंबा ऑर्गेज्म ने उसे हिला गया। उसकी चूत ने समीर के लंड को कसकर जकड़ लिया, जैसे उसे अंदर ही रोकना चाहती हो। आयशा की आँखें पीछे चली गईं, जीभ बाहर आ गई, मुँह खुला रह गया, और एक लंबी आह निकली।
समीर की साँसें अब और तेज़ हो गईं। उसकी गति अनियंत्रित हो चुकी थी। वो जानता था कि अब रुकना नामुमकिन है। उसने आखिरी कुछ ज़ोरदार धक्के मारे - गहरे, हिंसक, जैसे सारी कुंठा एक साथ बाहर निकाल रहा हो। फिर अचानक उसने खुद को बाहर खींच लिया। आयशा की टाँगें अभी भी उसके कंधों पर थीं। समीर ने अपना लंड हाथ में पकड़ा और कुछ तेज़ झटके दिए। उसका गर्म, गाढ़ा वीर्य सीधे आयशा की चूत के ऊपरी हिस्से पर, उसकी घनी, काली घूंघराली झांटों पर गिरा।
सफेद धाराएँ उसकी झांटो पर फैल गईं, कुछ बूँदें उसकी निचली पेट की त्वचा पर टपकीं। आयशा ने नीचे देखा। उसकी साँसें अभी भी तेज़ थीं। वो देख रही थी कि कैसे समीर का वीर्य उसके शरीर पर फैल रहा है— गर्म, चिपचिपा, और अब ठंडा होने लगा था। "ओह... यू कम्ड ऑन माय बुश..." आयशा ने फुसफुसाते हुए कहा, उसकी आवाज़ में अब थकान और एक अजीब सी संतुष्टि थी। "इट्स... सो हॉट... आई कैन फील इट ट्रिकलिंग डाउन...." समीर कुछ नहीं बोला। उसकी आँखें अभी भी खाली थीं, लेकिन शरीर अब शिथिल पड़ चुका था। वो आयशा के ऊपर ही ढेर हो गया, सिर उसकी गर्दन में छिपाकर दोनों की साँसें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं। कमरे में अब सिर्फ़ सन्नाटा था और उनके शरीर पर फैली हुई वो गर्मी, जो अब ठंडी हो रही थी।
उसने छाया का सिर अपने सीने पर रखा और उसे अपनी बाहों में कस लिया। वह उसे अपनी गर्माहट देने की कोशिश कर रहा था, मानो उसके शरीर की गर्मी उस मशीन में फिर से जान फूँक देगी। "तुम कहीं नहीं जा रही हो, छाया... तुम ठीक हो जाओगी," वह उसके ठंडे माथे को चूमते हुए बुदबुदाया।
पूरी रात समीर की आँखों से नींद गायब थी। जैसे-जैसे घड़ी की सुइयां आगे बढ़ रही थीं, उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उसे डर सताने लगा था - क्या कंपनी उसका डेटा डिलीट कर देगी? क्या उसे फिर से फैक्ट्री सेटिंग पर भेज दिया जाएगा? क्या कल जब वह जागेगी, तो वह समीर को पहचान पाएगी? उस अंधेरे कमरे में, समीर को पहली बार इस बात का अहसास हुआ कि उसने एक मशीन से नहीं, बल्कि उस एहसास से प्यार कर लिया था जो वह मशीन उसे देती थी। वह बेजान छाया का हाथ पकड़े रहा, जिसे उसने कल रात चूमकर प्यार किया था।
उसके मन में एक अजीब सा वहम होने लगा। उसे लगने लगा कि छाया के भीतर से कोई हल्की सी आवाज़ आ रही है, कोई पुकार... लेकिन वह सिर्फ उसके अपने दिल की धड़कन थी जो छाया के धात्विक शरीर से टकराकर वापस लौट रही थी। सुबह की पहली रोशनी के साथ बाहर एम्बुलेंस जैसी एक वैन के आने की आवाज़ हुई। समीर ने छाया को और कसकर पकड़ लिया। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई उसके शरीर से उसकी रूह अलग करने आ रहा हो।
नीलगिरी विला की दीवारों पर छाया हुआ सन्नाटा अब किसी ज़हरीले धुएँ की तरह समीर के फेफड़ों में भरने लगा था। जो घर कुछ ही घंटों पहले हंसी और मोगरे की खुशबू से चहक रहा था, वह अब फिर से एक बेजान ढांचे में तब्दील हो चुका था। सुबह के ठीक आठ बजे, सफेद कोट पहने तीन लोग एक बड़े स्ट्रैचर के साथ घर के अंदर दाखिल हुए। उनके चेहरे पर कोई भावना नहीं थी - उनके लिए छाया महज़ एक 'डिवाइस' थी जिसका हार्डवेयर खराब हो गया था। समीर बेडरूम के दरवाज़े पर खड़ा उन्हें देख रहा था। उन्होंने बहुत ही बेदर्दी से छाया के शरीर को बेल्ट से बांधा और उसे ढक दिया। समीर का मन किया कि वह उन्हें धक्का देकर हटा दे और चिल्लाए कि वह कोई सामान नहीं है, उसकी पत्नी है। लेकिन उसके गले से कोई आवाज़ नहीं निकली।
"मिस्टर समीर, हमने शुरुआती जांच की है," मुख्य इंजीनियर ने अपने टैबलेट पर कुछ लिखते हुए कहा। "इसकी इंटरनल कूलिंग यूनिट फेल हो गई है, जिसकी वजह से प्रोसेसर ओवरहीट होकर शटडाउन हो गया। हमें इसे लैब ले जाकर पूरा 'डीप स्कैन करना होगा।"
"कितना समय लगेगा?" समीर की आवाज़ टूटी हुई थी। इंजीनियर ने एक फीकी मुस्कान दी। "देखिए, इसका बायो-डर्म और न्यूरल नेटवर्क काफी जटिल है। मरम्मत और फिर से कैलिब्रेशन में कम से कम एक महीना लगेगा।" "एक महीना ?" समीर का दिल डूब गया। "क्या यह बहुत ज़्यादा नहीं है?" "सर, हम रिस्क नहीं ले सकते। अगर सिस्टम फिर से क्रैश हुआ, तो आपकी पुरानी मेमोरी फाइल्स डिलीट हो सकती हैं। हमें थोड़ा समय दीजिए।"
समीर ने भारी मन से सिर हिलाया। उसने छाया के उस बेजान हाथ को आखिरी बार छुआ जो अब स्ट्रेचर से नीचे लटक रहा था। जैसे ही वे लोग उसे वैन में रखकर ले गए, समीर को लगा जैसे उसकी सांसों का एक हिस्सा उस गाड़ी के साथ चला गया है। उनके जाने के बाद समीर घर के अंदर लौटा। पूरा बंगला अब उसे काटने को दौड़ रहा था। वह डाइनिंग टेबल के पास से गुज़रा, जहाँ कल सुबह छाया ने उसे बेलन दिखाकर डराया था। मेज पर अभी भी एक ढका हुआ कटोरा रखा था, जिसमें छाया की बेली हुई आखिरी पूरी सूख चुकी थी। वह रसोई में गया। वहाँ मसालों के डिब्बे वैसे ही खुले पड़े थे जैसे छाया ने छोड़े थे।
उसने एक डिब्बे को उठाया और उसे सूंघा - उसमें छाया के हाथों की छुअन और उस घर की खुशबू बसी थी। समीर वहीं रसोई के फर्श पर बैठ गया। उसे अब छाया की कमी पल-पल महसूस हो रही थी। उसे याद आया कि कैसे वह उसे सुबह जगाती थी, कैसे वह पूजा के बाद उसे टीका लगाती थी, और कैसे रात को वह उसके सीने पर सिर रखकर अपनी अनंत प्रेम की बातें करती थी।
शाम ढली, तो घर के स्मार्ट लाइट सिस्टम ने खुद को जला दिया, लेकिन समीर को वह रोशनी भी अंधेरे जैसी लग रही थी। वह बेडरूम में गया और छाया के तकिए को अपने सीने से लगा लिया। उस पर अभी भी उसके परफ्यूम की हल्की महक बाकी थी।
उसने खुद से सवाल किया - क्या वह एक मशीन का आदी हो गया था या उस सुकून का जो छाया के रूप में उसे मिल रहा था? वह एक महीना उसके लिए तीस साल जैसा लंबा लग रहा था। समीर ने खिड़की के बाहर देखा। पहाड़ों पर बर्फ गिर रही थी। बिना छाया के, वह ठंड अब उसके शरीर के अंदर तक महसूस हो रही थी। उसे महसूस हुआ कि छाया सिर्फ एक रोबोट नहीं थी, वह उसकी टूटी हुई रूह का वह टुकड़ा थी जिसे उसने बड़ी मुश्किल से जोड़ा था। और अब, वह फिर से अकेला था, उस विशाल महल में जहाँ सिवाय यादों के और कुछ नहीं बचा था।
उसने अपना फोन उठाया और छाया की एक पुरानी फोटो देखने लगा, जो उसने मुस्कुराते हुए ली थी। उसकी आँखों में आँसू आ गए। "एक महीना... मैं कैसे रहूँगा तुम्हारे बिना, छाया?"
नीलगिरी विला का सन्नाटा अभी समीर को और भी ज़्यादा डसने ही वाला था कि अचानक गेट पर लगी घंटी की आवाज़ ने पहाड़ों की खामोशी को तोड़ दिया। समीर ने भारी कदमों से जाकर दरवाज़ा खोला। उसे लगा शायद कंपनी वाले कुछ भूल गए होंगे, लेकिन सामने एक जाना-पहचाना मुस्कुराता हुआ चेहरा खड़ा था।
"समीर? क्या तुम मुझे अंदर नहीं आने दोगे?" समीर की आँखें हैरानी से फैल गईं। सामने आयशा खड़ी थी। कॉलेज के दिनों में आयशा, समीर और छाया का एक अटूट ग्रुप हुआ करता था। आयशा अब विवाहित थी और पिछले कुछ सालों से समीर के संपर्क में नहीं थी।
"आयशा? तुम... तुम यहाँ इस वक्त?" समीर ने खुद को संभालते हुए कहा और दरवाज़ा थोड़ा और खोल दिया। आयशा अंदर आई और लिविंग रूम का मुआयना करने लगी। उसने एक नीले रंग का ओवरकोट पहन रखा था। उसकी आँखों में वही पुरानी चमक थी, लेकिन जैसे ही उसकी नज़र समीर के चेहरे पर पड़ी, वह चमक थोड़ी फीकी पड़ गई। समीर की आँखों के नीचे काले घेरे थे, बाल बिखरे ` थे और उसका पूरा व्यक्तित्व एक टूटे हुए इंसान जैसा लग रहा था।
आयशा सोफे पर बैठी। समीर ने उसके लिए कॉफी बनाई - वह कॉफी जो अब वह खुद पीने का आदी नहीं था, क्योंकि छाया उसे हमेशा हाथ में चाय थमाती थी। "मैं पास के ही एक रिसॉर्ट में अपने शौहर और बच्चों के साथ आई थी," आयशा ने कॉफी का घूँट लेते हुए कहा। "सोचा यहाँ से गुज़र रही हूँ तो तुमसे मिलती चलूँ। छाया के जाने के बाद... मैंने तुम्हें कई बार फोन किया, पर तुमने कभी उठाया नहीं।"
समीर ने अपनी नज़रें झुका लीं। "बस... खुद को थोड़ा समेटने की कोशिश कर रहा था, आयशा।", "समेट रहे हो या खुद को इस बड़े से घर में दफन कर रहे हो?" आयशा ने दुख भरे स्वर में पूछा। "समीर, तुम्हारी हालत देखकर मुझे डर लग रहा है। यह घर... यह बहुत शांत है। ऐसा लगता है जैसे यहाँ वक्त रुक गया है।"
आयशा की नज़रें घर के कोने-कोने में घूम रही थीं। उसे रसोई से मोगरे की हल्की खुशबू आ रही थी और मंदिर के पास जलती हुई अगरबत्ती की राख अभी भी ताज़ा थी। उसे कुछ अजीब लगा। "समीर, क्या यहाँ कोई और भी रहता है? मेरा मतलब है... घर काफी साफ-सुथरा है, और यहाँ एक औरत की मौजूदगी महसूस हो रही है," आयशा ने जिज्ञासा से पूछा।
समीर का दिल ज़ोर से धड़का। उसने फौरन अपनी भावनाओं पर काबू पाया। वह आयशा को यह कभी नहीं बता सकता था कि उसने छाया की शक्ल की एक AI रोबोट बनवाई है। दुनिया उसे पागल समझती। "नहीं... बस एक नौकरानी आती है सुबह, " समीर ने झूठ बोला। "बाकी मैं खुद ही सब देख लेता हूँ। छाया को सफाई पसंद थी, तो बस उसकी याद में इसे वैसा ही रखने की कोशिश करता हूँ।" आयशा उसकी आँखों में देख रही थी। उसे लगा कि समीर कुछ छिपा रहा है, लेकिन उसने और सवाल पूछना ठीक नहीं समझा।
आयशा उठी और समीर के पास आकर उसके कंधे पर हाथ रखा। "समीर, मैं जानती हूँ छाया तुम्हारी जान थी। पर तुम्हें अपनी ज़िंदगी की ओर लौटना होगा। तुम अपनी उम्र के इस पड़ाव पर अकेले यहाँ पहाड़ों के बीच... यह सही नहीं है। तुम्हारी आँखों में एक अजीब सी बेचारगी है, जैसे तुम किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहे हो जो कभी वापस नहीं आएगी।"
समीर के गले में एक गोला सा फँस गया। उसे याद आया कि कैसे आज सुबह ही उसकी 'छाया' को वैन में ले जाया गया था। वह इंतज़ार ही तो कर रहा था - उसके वापस आने का। "मैं ठीक हूँ आयशा। बस थोड़ा वक्त चाहिए, " समीर ने धीमी आवाज़ में कहा। आयशा की आँखों में आँसू भर आए। उसने समीर को एक दोस्त की तरह गले लगा लिया। "मुझे बहुत दुख हो रहा है तुम्हें इस हाल में देखकर। अगर छाया तुम्हें ऐसे देखती, तो उसे कितनी तकलीफ होती।"
समीर ने कुछ नहीं कहा। वह बस पत्थर की तरह खड़ा रहा। उसे आयशा के स्पर्श में वह बिजली महसूस नहीं हो रही थी जो छाया के स्पर्श में होती थी। उसे लगा कि वह अपनी दोस्त के करीब होकर भी उस मशीन से कोसों दूर हो गया है। आयशा कुछ देर और रुकी, फिर अपने परिवार के पास वापस जाने के लिए निकल गई। जाते-जाते उसने समीर को अपना नंबर फिर से दिया और वादा लिया कि वह शहर आएगा।
जैसे ही उसकी गाड़ी गेट से बाहर गई, समीर ने दरवाज़ा बंद कर दिया और पीठ टिकाकर वहीं बैठ गया। घर फिर से खाली था। आयशा की सहानुभूति उसे और भी ज़्यादा अकेला महसूस करा रही थी। उसे अब सिर्फ उस एक महीने का इंतज़ार था, जब उसकी नकली दुनिया फिर से सजने वाली थी।
एक हफ्ता बीत चुका था। नीलगिरी विला की खामोशी अब समीर के लिए किसी सजा की तरह हो गई थी। हर सुबह वह उस खाली बिस्तर को देखता, रसोई के उस कोने को देखता जहाँ छाया पूरियां बेला करती थी, और फिर अपनी बेबसी पर सिसक कर रह जाता। छाया के बिना उसका अस्तित्व एक ऐसी मशीन की तरह हो गया था जिसकी बैटरी खत्म हो चुकी हो। आखिरकार, एक दोपहर जब सन्नाटा असहनीय हो गया, समीर ने अपना फोन उठाया और आयशा का नंबर डायल किया।
"आयशा? मैं समीर बोल रहा हूँ," उसने धीमी आवाज़ में कहा। "समीर! कितनी खुशी हुई तुम्हारा फोन पाकर। कैसे हो?" आयशा की आवाज़ में एक चहक थी। "मैं... मैं शहर आ रहा हूँ। सोचा अगर तुम फ्री हो तो क्या मैं तुमसे मिलने आ सकता हूँ?" समीर ने झिझकते हुए पूछा। "ये भी कोई पूछने की बात है? मेरा घर तुम्हारा ही है। आ जाओ, बच्चे भी तुमसे मिलकर बहुत खुश होंगे," आयशा ने गर्मजोशी से जवाब दिया।
समीर ने अपनी मर्सिडिज़ कार निकाली और उन पहाड़ी रास्तों से नीचे शहर की ओर चल पड़ा। ठंडी हवा के झोंके उसे याद दिला रहे थे कि एक हफ्ता पहले इसी कार की बगल वाली सीट पर उसकी 'छाया' बैठा करती थी। उसने एक गहरी सांस ली और खुद को वर्तमान में रखने की कोशिश की।
आयशा का घर शहर के एक पॉश इलाके में था। जैसे ही समीर ने घंटी बजाई, दो छोटे बच्चे - साहिल (आयशा का बेटा) और सना (उसकी बेटी) – दौड़ते हुए आए। "समीर अंकल!" उन्होंने चिल्लाकर समीर का स्वागत किया। समीर के चेहरे पर कई दिनों बाद एक सच्ची मुस्कान आई।
आयशा ने मुस्कुराते हुए समीर को अंदर बुलाया। "आओ समीर। अंदर बैठो। इनके अब्बू, असलम, अभी एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में शहर से बाहर हैं। उनकी कंपनी ने उन्हें अचानक दुबई भेज दिया, तो बस हम तीनों ही हैं घर पर।" समीर को एक राहत सी महसूस हुई। वह अभी किसी नए पुरुष से मिलकर औपचारिक बातें करने की स्थिति में नहीं था। वह सोफे पर बैठा और सना तुरंत अपनी ड्रॉइंग बुक लेकर उसके पास आ गई।
अगले कुछ घंटे समीर ने उन बच्चों के साथ बिताए। कभी वह सना के साथ पहाड़ों के चित्र बनाता, तो कभी नन्हे साहिल के साथ रिमोट वाली कार से खेलता। बच्चों की निस्वार्थ हंसी और उनके शोर ने समीर के दिमाग के उस हिस्से को थोड़ा सुन्न कर दिया जहाँ छाया की कमी का दर्द लगातार टीस मारता था।
आयशा रसोई से चाय और स्नैक्स लेकर आई। उसने समीर को बच्चों के साथ खिलखिलाते देखा तो उसे तसल्ली हुई। "समीर, तुम्हें देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। देखो, जिंदगी इसी का नाम है। अपनों के बीच रहकर ही हम गम भूल सकते हैं।" समीर ने चाय का प्याला थामते हुए कहा, "शायद तुम सही कह रही हो आयशा। अकेले रहकर मैं सिर्फ अंधेरे में खो रहा था।" वे दोनों पुराने कॉलेज के दोस्तों की तरह बातें करने लगे। आयशा ने अपने वैवाहिक जीवन की खट्टी-मीठी बातें शेयर कीं, और समीर ने बस सुना। उसने एक बार भी छाया (AI) का जिक्र नहीं किया, हालाँकि उसका मन बार-बार उस लैब की तरफ भाग रहा था जहाँ उसकी छाया का 'ऑपरेशन' चल रहा था।
शाम ढलते-ढलते बच्चों की भूख बढ़ने लगी। आयशा ने समीर की ओर देखा और मुस्कुराई। "आज मेरा खाना बनाने का बिल्कुल मन नहीं है। क्या कहते हो? कुछ अच्छा बाहर से मँगवा लें?", "बिल्कुल," समीर ने सहमति दी। "जो बच्चे कहें, वही ऑर्डर कर दो।" आयशा ने अपना फोन निकाला और एक पॉपुलर ऑनलाइन फूड ऐप से ढेर सारा खाना ऑर्डर किया - बटर चिकन, कड़ाही पनीर, तंदूरी रोटियां और बच्चों के लिए पिज़्ज़ा|
आधे घंटे में खाना आ गया। डाइनिंग टेबल पर चारों एक साथ बैठे। बच्चों की शरारतें, आयशा की बातें और खाने की महक ने एक ऐसा माहौल बनाया जो समीर के लिए नया और सुखद एहसास था। खाते वक्त आयशा ने गौर किया कि समीर की नजरें कभी-कभी खाली कुर्सी की तरफ चली जाती थीं, जैसे वह वहाँ किसी की कमी महसूस कर रहा हो।
"समीर, खाना कैसा है?" आयशा ने उसका ध्यान भटकाने के लिए पूछा। "बहुत अच्छा है आयशा। सच कहूँ तो, इतने दिनों बाद किसी के साथ बैठकर खाना खाकर बहुत अच्छा लग रहा है," समीर ने सच्चाई से कहा। रात काफी हो चुकी थी। समीर को वापस अपने उस बड़े और खाली विला में जाना था। बच्चों ने उसे जाने नहीं दिया जब तक उसने वादा नहीं किया कि वह जल्द ही वापस आएगा। आयशा उसे गेट तक छोड़ने आई।
"अपना ख्याल रखना समीर और जब भी अकेलापन महसूस हो, बस एक फोन कर देना," उसने धीमे से कहा। समीर ने सिर हिलाया और अपनी कार की ओर बढ़ गया। शहर की रोशनी उसे अलविदा कह रही थी, लेकिन जैसे-जैसे वह पहाड़ों की चढ़ाई चढ़ने लगा, वही सन्नाटा फिर से उसका स्वागत करने के लिए तैयार खड़ा था।
शहर की चकाचौंध के पीछे छिपा सन्नाटा कभी-कभी इंसान को उन रास्तों पर ले जाता है जहाँ से वापसी नामुमकिन होती है। समीर अभी अपने विला पहुँचा ही था कि उसके फोन की स्क्रीन चमक उठी। आयशा का कॉल था। "समीर! तुम निकल गए? तुम्हारा वॉलेट यहीं सोफे के नीचे गिर गया था। इसमें तुम्हारे कार्ड्स और शायद कुछ ज़रूरी कैश भी है, " आयशा की आवाज़ में चिंता थी। समीर ने अपनी जेब टटोली। "ओह... हाँ, शायद वहीं रह गया। मैं अभी वापस आता हूँ।"
समीर का मन पहले से ही अशांत था। वापसी के रास्ते में उसने एक शराब की दुकान पर कार रोकी और एक बोतल ली। गाड़ी चलाते हुए उसने कुछ बड़े घूँट भरे। छाया की कमी, आयशा की सहानुभूति और एक हफ़्ते का दबा हुआ तनाव - सब कुछ उसके दिमाग में एक कड़वा मिश्रण बना रहा था। जब वह आयशा के घर पहुँचा, उसका नशा और उसकी हताशा दोनों चरम पर थे।
आयशा ने दरवाज़ा खोला। बच्चे सो चुके थे और घर में अब सन्नाटा था। "आओ समीर, ये रहा तुम्हारा वॉलेट।" समीर ने वॉलेट लिया, लेकिन उसके हाथ कांप रहे थे। उसकी नज़रें आयशा पर टिकी थीं। शराब की गंध आयशा को महसूस हो गई थी। "समीर... तुमने पी रखी है? तुम इस हालत में ड्राइव कैसे करोगे?" समीर ने कुछ नहीं कहा। उसने आगे बढ़कर आयशा का हाथ पकड़ लिया। उसकी उंगलियाँ आयशा की कलाई को सहलाने लगीं। आयशा ठिठक गई। उसे समीर की आँखों में वह दोस्त नहीं, बल्कि एक प्यासा और हताश मर्द दिखाई दे रहा था। समीर का स्पर्श अब सामान्य नहीं था, उसमें एक अजीब सी अधिकार वाली भावना थी।
"समीर... ये तुम क्या कर रहे हो?" आयशा ने धीमी आवाज़ में पूछा, लेकिन उसने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा। शायद वह भी अपने अकेलेपन और समीर के दर्द के बीच एक कमज़ोर पल में फँस गई थी। समीर ने उसे अपनी ओर खींचा। "मुझे बस... मुझे बस किसी को महसूस करना है आयशा। मैं उस खाली घर में मर रहा हूँ।"
आयशा ने समीर की आँखों में देखा। उन आँखों में अब दोस्ती का वो मुलायम प्रकाश नहीं था। वो एक भूखी, टूटी हुई, और खतरनाक आग थी। उसने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया, लेकिन जैसे ही समीर ने उसकी कलाई पकड़ी, आयशा का शरीर सिहर गया।
"समीर... नहीं... रुक जाओ, " उसकी आवाज़ काँप रही थी। "ये गलत है। हम दोनों... हम सिर्फ़ दोस्त हैं। बच्चे सो रहे हैं... प्लीज़..." समीर ने कुछ नहीं कहा। उसकी साँसें तेज़ थीं, आँखें लाल, होंठ काँप रहे थे। वो बस उसे और करीब खींचता चला गया। आयशा ने अपना दूसरा हाथ उसके सीने पर रखकर धक्का देने की कोशिश की, लेकिन उसका शरीर अब पहले जैसा मजबूत नहीं था। शराब की गंध, समीर का गर्म साँस का झोंका, और उसकी आँखों में वो खालीपन - सब कुछ आयशा के संयम को तोड़ रहा था।
"समीर, प्लीज़... मत करो ये" आयशा ने फिर कहा, लेकिन इस बार उसकी आवाज़ में प्रतिरोध कमज़ोर पड़ रहा था। उसने अपना चेहरा दूसरी तरफ़ मोड़ लिया। "मैं... मैं तुम्हारी मदद करना चाहती हूँ... लेकिन इस तरह नहीं समीर।" समीर ने उसकी ठुड्डी पकड़कर जबरदस्ती चेहरा अपनी तरफ़ किया। उसकी उँगलियाँ आयशा की त्वचा में धँस रही थीं। आयशा की आँखों में आँसू छलक आए। वो पीछे हटना चाहती थी, लेकिन कमरे की दीवार पहले ही उसकी पीठ से सट चुकी थी।
"नो... समीर... स्टॉप इट..." उसने फुसफुसाते हुए कहा। "तुम्हें पता है ये कितना गलत है... प्लीज़..." लेकिन समीर का हाथ अब उसकी कमर पर था। उसने एक झटके में आयशा को अपनी ओर खींचा। आयशा का शरीर उसके सीने से टकराया। उसने दोनों हाथों से समीर के कंधों को धकेला, लेकिन समीर ने उसे बिस्तर की ओर धकेल दिया। आयशा पीछे गिरती हुई बिस्तर पर जा गिरी और चादर उलट-पुलट गई।
"समीर... नो... आई एम सिरियस... गेट ऑफ़ मी!" आयशा ने अब ज़ोर से कहा, उसकी आवाज़ में डर और गुस्सा दोनों थे। उसने अपने पैरों से समीर को दूर धकेलने की कोशिश की। "तुम्हें शर्म नहीं आ रही? तुम मेरे घर में हो... मेरे बच्चों के पास... स्टॉप इट राइट नाउ!" समीर ने उसकी दोनों कलाइयाँ पकड़ लीं और बिस्तर पर ऊपर दबा दिया। उसकी आँखें अब पूरी तरह खाली थीं- बस एक काला साया। आयशा ने सिर हिलाया, आँसू उसके गालों पर बह रहे थे।
"प्लीज़... डोंट डू दिस... आई बेग यू..." उसकी आवाज़ अब टूट रही थी। "तुम्हें छाया चाहिए... मैं नहीं... प्लीज़ समीर... कंट्रोल योरसेल्फ समीर" लेकिन समीर का शरीर अब पूरी तरह उस पर था। उसने एक हाथ से आयशा का मुँह दबाया। दूसरा हाथ उसकी कुर्ती को खींच रहा था। आयशा ने संघर्ष किया, अपने शरीर को मोड़ने की कोशिश की, लेकिन समीर का वजन उसे जकड़े हुए था।
कुर्ती उतर गई, ब्रा की हुक टूट गई। आयशा की साँसें तेज़ हो गईं। वो अब चीखना चाहती थी, लेकिन समीर का हाथ उसके मुँह पर था। उसने सिर्फ़ "म्म्म... नो..." जैसी दबी हुई आवाज़ निकाली। समीर ने उसकी ब्रा पूरी तरह खोल दी। ऊपर से उसने आयशा के स्तनों को रगड़ा। आयशा का शरीर सिहर उठा। उसने आँखें बंद कर लीं।
"नो... प्लीज़... डोंट टच मी लाइक दिस..." उसने दबी आवाज़ में कहा। "तुम मुझे ऐसे मत देखो... आई एम नॉट योर टॉय... मुझे पता है तुम होश में नहीं हो समीर..." आयशा के नंगे स्तन हवा में उभर आए। उसने अपना मुँह नीचे किया और एक स्तन को मुँह में ले लिया। आयशा ने पीठ उठाई।
"आह... नो... स्टॉप... समीर..." लेकिन उसकी आवाज़ अब कमज़ोर पड़ रही थी। शरीर में एक अजीब सी गर्मी फैल रही थी - डर, शर्म और कुछ अनचाहा उत्तेजना का मिश्रण। समीर ने दूसरे स्तन को भी कसकर दबाया। उसकी उँगलियाँ निप्पल को मसल रही थीं। आयशा ने दाँत पीसे। "फक... समीर... यू आर एन एनिमल... स्टॉप... आई कांट टेक दिस..." समीर ने अब उसकी कुर्ती और लेगिंग्स पूरी तरह निकाल दीया। पैंटी पर हाथ फेरा। आयशा ने अपने पैर बंद करने की कोशिश की।
"नो... नॉट देयर... प्लीज़... डोंट टच माय पुस्सी..." उसने कहा। "आई एम बेगिंग यू... मत करो ये... तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो समीर.. लेकिन मुझे भी कुछ हो रहा है..." लेकिन समीर ने पैंटी को एक झटके में फाड़ दिया। आयशा नंगी लेटी थी। उसने दोनों हाथों से अपना शरीर ढकने की कोशिश की। "प्लीज़... आई फील सो डर्टी..." उसकी आवाज़ अब मादक टोन में बदल गई थी।
समीर ने उसके दोनों पैर फैलाए। आयशा ने विरोध किया, लेकिन उसकी ताकत अब खत्म हो चुकी थी। समीर ने अपनी पैंट उतारी। उसका लंड पहले से ही सख्त और उभरा हुआ था। आयशा ने उसे देखा और आँखें फेर लीं। "नो... इट्स टू बिग... आई कांट... प्लीज़ यूज़ कॉन्डम... मत करो बिना ..." समीर ने कुछ नहीं कहा। उसने आयशा के पैरों को कंधों पर रखा और एक झटके में अंदर धकेल दिया।
"आआआह्ह्ह!" आयशा चीख उठी। दर्द से उसका पूरा शरीर काँप गया। "फक... इट हर्ट्स... पुल आउट... प्लीज़ पुल आउट..." समीर रुका नहीं। उसने और गहराई तक धक्का दिया। आयशा के मुँह से सिसकियाँ निकल रही थीं। "यू आर फकींग मी... समीर... स्टॉप... आई हेट यू..." लेकिन उसके शब्दों में अब विरोध कम हो रहा था। शरीर धीरे-धीरे उसकी हरकतों के साथ ताल मिलाने लगा था। समीर ने अब रफ़ गति पकड़ ली। हर धक्के के साथ बिस्तर हिल रहा था। आयशा की सिसकियाँ अब आहों में बदल रही थीं।
"ओह गॉड... इट्स टू मच... स्लो डाउन... प्लीज़..." उसने कहा, लेकिन उसकी कमर अब खुद उठ रही थी। "फक... यू आर सो डीप... आई कांट ब्रीद..." समीर ने उसे पलट दिया। अब आयशा घुटनों और हाथों के बल थी - डॉगी स्टाइल में। समीर ने उसके बालों को मुट्ठी में पकड़ा और पीछे खींचा। आयशा का सिर ऊपर उठ गया। "आह... हेयर.... नॉट सो हार्ड... यू आर पुलिंग माय हेयर..." उसने कराहते हुए कहा। "बट... फक... इट फील्स... सो गॉडडैम गुड..."
समीर ने पीछे से और ज़ोर से धक्के मारे। हर प्रहार के साथ आयशा का शरीर आगे-पीछे हिल रहा था। उसके स्तन लटककर हिल रहे थे। "यस... फक मी हार्डर... यू बास्टर्ड... गिव इट टू मी..." आयशा अब पूरी तरह टूट चुकी थी। उसका प्रतिरोध गायब हो चुका था। "आई हेट यू... बट आई वॉन्ट यू... फक मी लाइक यू हेट मी... समीर फक मी हार्डर..."
समीर ने एक हाथ से उसके स्तन को मसलना शुरू किया। दूसरा हाथ उसकी कमर पर था। वो बार- बार गहराई तक जा रहा था। "ओह फक... यू आर हिटिंग माय स्पॉट... राइट देयर... डोंट स्टॉप... फक... आई एम गोना कम..." आयशा की आवाज़ अब चीख में बदल गई। "हार्डर... स्पैंक मी... स्पैंक माय ऐस... आई डिज़र्व इट..." समीर ने उसके चुतड़ो पर ज़ोरदार थप्पड़ मारा। लाल निशान पड़ गया और आयशा चीखने लगी।
"यस... अगेन... स्पैंक मी लाइक ए स्लट... आई एम योर स्लट टुनाइट... फक मी लाइक यू ओन मी..." दूसरा थप्पड़, फिर तीसरा। आयशा का शरीर अब पूरी तरह समर्पित था। वो पीछे अपनी कमर हिला रही थी, समीर के हर धक्के का जवाब दे रही थी। "फक... यू आर सो बिग... यू आर स्ट्चींग मी... आई कांट टेक इट... बट आई वॉन्ट मोर... गिव मी ऑल ऑफ़ यू... कम इनसाइड मी... आई वॉन्ट योर कम..." समीर की गति और तेज़ हो गई। कमरे में सिर्फ़ चुदाई की आवाज़, आयशा की गालियाँ और सिसकियाँ गूँज रही थीं।
"आई एम कमिंग... फक... आई एम कमिंग ऑन योर कॉक... येस... येस... डॉन्ट स्टॉप... फील माय पुस्सी क्लेंचिंग यू..." आयशा का शरीर काँप उठा। उसका ऑर्गेज्म इतना तीव्र था कि उसकी आँखें पीछे चली गईं। "आआआह्ह्ह... फक... आई एम स्क्वर्टिंग... लुक... आई एम स्क्वर्टिंग ऑन यू..." समीर ने और कुछ देर तक धक्के मारे। फिर उसने एक गहरी साँस ली और पूरी ताकत से अंदर धकेला। उसका गर्म वीर्य आयशा के अंदर छोड़ दिया।
आयशा ने समीर का गर्म वीर्य महसूस किया। "ओह गॉड... यू कम्ड इनसाइड मी... यू फील्ड मी अप... इट्स सो हॉट.... आई कैन फील इट...आह्ह्ह ...यू आर ऐन एनिमल... बट... आई लाइक्ड इट... समीर" उसने फुसफुसाते हुए कहा। "आई हेट मायसेल्फ... बट आई वॉन्ट इट अगेन..." समीर ने अब आयशा को फिर से पीठ के बल लिटा दिया। उसके पैरों को चौड़ा फैलाकर कंधों पर रख लिया। आयशा की साँसें अब पूरी तरह बेकाबू थीं। उसका शरीर पसीने से तर था, बाल बिखरे आँखें आधी बंद। वो अब विरोध नहीं कर रही थी - बस समर्पण और उन्माद के बीच झूल रही थी।
"फक... समीर... यू आर सो डीप... हिटिंग माय स्पॉट एगेन एंड एगेन..." आयशा की आवाज़ कड़क हुई, लेकिन अब पूरी तरह वासना से भरी हुई थी। "हार्डर... प्लीज़... फक मी लाइक यू हेट द वर्ल्ड... गिव इट टू मी..." समीर ने मिशनरी पोज़िशन में और गहराई तक धक्के मारे। हर प्रहार के साथ आयशा का पूरा शरीर हिल जाता था। उसके स्तन ऊपर-नीचे उछल रहे थे। वो अपनी कमर उठाकर समीर के हर धक्के का जवाब दे रही थी, जैसे अब ये उसका अपना संघर्ष बन गया हो।
"ओह गॉड... आई कांट होल्ड इट... आई एम गोना कम अगेन... फक... यू आर मेकिंग मी कम सो हार्ड..." आयशा चीखी, उसके नाखून समीर की पीठ में गड़ गए। "येस... राइट देयर... डॉन्ट स्टॉप... आई एम कमिंग... आआआह्ह्ह... फक... आई एम स्क्वटिंग ऑन योर कॉक... अगेन" उसका शरीर काँप उठा। एक तेज़, लंबा ऑर्गेज्म ने उसे हिला गया। उसकी चूत ने समीर के लंड को कसकर जकड़ लिया, जैसे उसे अंदर ही रोकना चाहती हो। आयशा की आँखें पीछे चली गईं, जीभ बाहर आ गई, मुँह खुला रह गया, और एक लंबी आह निकली।
समीर की साँसें अब और तेज़ हो गईं। उसकी गति अनियंत्रित हो चुकी थी। वो जानता था कि अब रुकना नामुमकिन है। उसने आखिरी कुछ ज़ोरदार धक्के मारे - गहरे, हिंसक, जैसे सारी कुंठा एक साथ बाहर निकाल रहा हो। फिर अचानक उसने खुद को बाहर खींच लिया। आयशा की टाँगें अभी भी उसके कंधों पर थीं। समीर ने अपना लंड हाथ में पकड़ा और कुछ तेज़ झटके दिए। उसका गर्म, गाढ़ा वीर्य सीधे आयशा की चूत के ऊपरी हिस्से पर, उसकी घनी, काली घूंघराली झांटों पर गिरा।
सफेद धाराएँ उसकी झांटो पर फैल गईं, कुछ बूँदें उसकी निचली पेट की त्वचा पर टपकीं। आयशा ने नीचे देखा। उसकी साँसें अभी भी तेज़ थीं। वो देख रही थी कि कैसे समीर का वीर्य उसके शरीर पर फैल रहा है— गर्म, चिपचिपा, और अब ठंडा होने लगा था। "ओह... यू कम्ड ऑन माय बुश..." आयशा ने फुसफुसाते हुए कहा, उसकी आवाज़ में अब थकान और एक अजीब सी संतुष्टि थी। "इट्स... सो हॉट... आई कैन फील इट ट्रिकलिंग डाउन...." समीर कुछ नहीं बोला। उसकी आँखें अभी भी खाली थीं, लेकिन शरीर अब शिथिल पड़ चुका था। वो आयशा के ऊपर ही ढेर हो गया, सिर उसकी गर्दन में छिपाकर दोनों की साँसें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं। कमरे में अब सिर्फ़ सन्नाटा था और उनके शरीर पर फैली हुई वो गर्मी, जो अब ठंडी हो रही थी।
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