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Adultery अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play)
करीम का दुस्साहस
 
रात के सन्नाटे में बेडरूम का माहौल बेहद शांत था, लेकिन अनीता के भीतर तूफानों का रेला चल रहा था। राज गहरी नींद में सो चुके थे, उनका हाथ अनीता की कमर पर बहुत ही कोमलता से रखा हुआ था। यह वही हाथ था जिसने उसे हमेशा सुरक्षा और सम्मान का अहसास कराया था।

 
उसकी आँखें अंधेरे में छत को घूर रही थीं। उसे अपनी जांघों के बीच अब भी वह भारीपन और जलन महसूस हो रही थी, जो करीम की दी हुई थी।

 
अनीता (मन ही मन, गुस्से और नफरत में): "उस कमीने की हिम्मत कैसे हुई? एक नौकर... जिसकी औकात मेरे जूतों के बराबर है, उसने आज मुझे रसोई में दीवार से सटाकर मेरी देह को ऐसे रौंदा जैसे मैं उसकी कोई रखैल होऊं। 'बेटी' कहता है और हाथ वहां डालता है जहाँ हाथ लगाने की इजाज़त सिर्फ राज को है। वह इतना निडर कैसे हो गया? उसे राज का खौफ क्यों नहीं है? वह जानबूझकर राज के सामने ऐसी बातें करता है जैसे वह मुझे अपने इशारों पर नचा रहा हो। मुझे उसे कल ही इस घर से धक्के मारकर निकालना होगा।"

 
अनीता ने गुस्से में अपनी मुट्ठी कसी। उसे करीम की वह वहशी मुस्कान और उसकी '१० इंच की फौलाद' वाली बात याद आई, तो उसका खून खौल उठा। उसे लगा कि करीम ने न सिर्फ उसके बदन का, बल्कि उसकी रईसी और उसके गर्व का भी अपमान किया है।

 
लेकिन तभी, एक दूसरा एहसास उसके मन के किसी कोने से सिर उठाने लगा। एक ऐसा सवाल, जिससे वह डर रही थी।

 
अनीता (एक गहरी और भारी सांस लेते हुए): "पर... जब वह मुझे काउंटर के पीछे ले गया... जब उसने मेरी पैंटी नीचे गिराई और अपनी जुबान मेरी गाँड पर फिराई... तो मैंने उसे ज़ोर से धक्का क्यों नहीं दिया? मैं चिल्ला सकती थी, मैं राज को आवाज़ दे सकती थी। पर मैं पत्थर की तरह वहीं जमी रही। क्यों? क्या मुझे उसके उस स्पर्श में मज़ा आ रहा था? क्या मेरा बदन उस जानवर की हवस का भूखा हो गया है?"

उसे याद आया कि कैसे करीम की दाढ़ी उसकी कोमल त्वचा को कुरेद रही थी और कैसे उसकी जुबान का वह गीलापन उसे मदहोश कर रहा था। उस वक्त उसके मन में खौफ तो था, पर उस खौफ के साथ-साथ एक ऐसी बिजली दौड़ रही थी जो राज के बरसों के प्यार में कभी महसूस नहीं हुई थी।

 
अनीता (खुद से जूझते हुए): "नहीं! यह सच नहीं हो सकता। मैं राज से प्यार करती हूँ। करीम का वह स्पर्श तो गंदा है, वह तो दरिंदगी है। पर फिर क्यों... फिर क्यों जब उसने मेरे स्तनों को अपने मुंह में भरा, तो मैंने खुद उसे अपनी छाती में भींच लिया? क्या मैं वाकई उसकी गुलाम बनती जा रही हूँ? क्या मुझे उसकी वह बेबाकी और उसका वह ज़बरदस्ती करना अच्छा लग रहा है?"

 
अनीता ने करवट बदली और राज की तरफ देखा। राज का चेहरा कितना शांत और मासूम लग रहा था। दूसरी तरफ, उसे कोठरी में लेटे उस काले, मज़बूत और वहशी करीम का ख्याल आया, जो शायद इस वक्त अंधेरे में बीड़ी पीते हुए उसी के बारे में सोच रहा होगा।

 
उसे अपनी योनि में फिर से एक नमी महसूस हुई। उसका बदन गद्दारी कर रहा था। दिमाग नफरत की आग में जल रहा था, पर जिस्म करीम के अगले प्रहार के लिए फिर से तैयार हो रहा था।

 
अनीता ने तकिये को कसकर पकड़ लिया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह करीम के उस १० इंच के ज़हर को अपनी रगों से कैसे निकाले, जिसने उसकी रातों की नींद और उसका चैन छीन लिया था।
 
 -------------

 
अगली सुबह की धूप खिड़कियों से छनकर डाइनिंग टेबल पर बिखर रही थी। राज अखबार पढ़ने में मशगूल थे, जबकि अनीता पीले रंग के साटन नाइटगाउन में उनके सामने बैठी थी। वह रेशमी कपड़ा उसके बदन से चिपक कर उसके सुडौल उभारों और कमर की ढलान को बखूबी नुमाया कर रहा था। रात भर की कशमकश के बाद उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे, जो उसकी रातों की बेचैनी की गवाही दे रहे थे।

 
तभी रसोई से करीम हाथ में नाश्ते की ट्रे लिए बाहर निकला। उसकी नज़रें सबसे पहले अनीता के उस पीले गाउन पर टिकीं, जो उसकी गोरी रंगत पर कहर ढा रहा था।

राज (अखबार से नज़रें हटाते हुए): "करीम, आज नाश्ते में क्या है? और ज़रा कॉफी कड़क बनाना"

 
करीम (अपनी ढीठ नज़रें अनीता के सीने पर टिकाते हुए): "जी साहब, आज तो सब कुछ 'ताज़ा' और 'गरम' है। हमने खास तौर पर मालकिन की पसंद का ख्याल रखा है।"

 
करीम जैसे ही अनीता के पास झुका, उसके बदन से वही तीखी गंध—पसीने और बीड़ी का मिला-जुला अहसास—अनीता के नथुनों से टकराया। अनीता का दिल ज़ोर से धड़का। उसे याद आया कि कैसे इसी गंध वाले शख्स ने कल उसकी अस्मत के साथ खिलवाड़ किया था।

 
करीम (धीरे से, सिर्फ अनीता को सुनाई दे ऐसी आवाज़ में): "पीला रंग आप पर बहुत जंच रहा है बेटी... पर ई साटन का कपड़ा बड़ा फिसलन भरा होता है, जैसे कल आपकी जांघें फिसल रही थी।"

 
अनीता का चेहरा तमतमा उठा। उसने गुस्से में राज की ओर देखा, पर राज तो अपने फोन पर कुछ देखने में व्यस्त थे। करीम की इस हिमाकत ने उसे अंदर तक झकझोर दिया। वह चाहती थी कि उसे ज़ोरदार तमाचा जड़े, पर उसके शब्द उसके गले में ही घुटकर रह गए।

 
अनीता (कांपती आवाज़ में): "करीम, तुम अपनी हदें भूल रहे हो। अपना काम करो और यहाँ से जाओ।"

 
करीम ने एक कुटिल हंसी और प्लेट रखते वक्त जानबूझकर अपनी उंगलियां अनीता की कलाई पर रगड़ दीं। उस छुअन ने अनीता के बदन में फिर से वही नफरत और हवस की मिली-जुली बिजली दौड़ा दी।

 
करीम ने झुककर अनीता के कप में कॉफी डाली, और इस बार उसका चेहरा अनीता के कान के इतना करीब था कि उसकी गर्म साँसें अनीता की गर्दन को भिगो रही थीं।

 
करीम (फुसफुसाते हुए): "रात को जब राज भैया सो रहे थे, तब आप जाग रही थीं ना? हम जानते हैं... क्योंकि ई साटन के नीचे आपकी धड़कनें अभी भी उस १० इंच के इंतज़ार में तेज़ हैं।"

 
डाइनिंग टेबल पर राज फोन पर किसी से ऊंची आवाज में बात करने में मशगूल था। अनीता ने अपने नाश्ते की खाली प्लेट और कप उठाए और रसोई की ओर चल दी। उसका साटन का पीला नाइटगाउन उसके चलने के साथ उसकी टांगों से लिपट रहा था, जो रसोई की मद्धम रोशनी में चमक रहा था।

 
जैसे ही अनीता रसोई में दाखिल हुई, उसे लगा कि रसोई खाली है। सिंक के पास पहुँचकर उसने बर्तन रखने के लिए हाथ बढ़ाया।

 
अचानक, करीम अंधेरे कोने से निकलकर उसके सामने आ गया। अनीता का दिल एक पल के लिए थम गया। करीम ने उसे सिंक और काउंटर के बीच घेर लिया था। वह इतना करीब था कि अनीता उसके बदन की गर्मी महसूस कर सकती थी।

 
करीम (अपनी काली, भूखी आँखों से अनीता को घूरते हुए): "उफ़... बेटी! ई पीला गाउन ... कसम खुदा की। जी चाहता है कि अभी इसी सिंक के पास तुम्हें अपनी जांघों पर बिठाकर पूरा निचोड़ लूँ।"

 
करीम ने अपने दोनों मजबूत हाथों को अनीता के साटन के गाउन के ऊपर से उसके कूल्हों पर टिका दिया। वह चाहती थी कि उसे ज़ोर से धक्का दे, पर उसके शब्द उसके गले में ही घुटकर रह गए।

 
बाहर से राज की आवाज़ आ रही थी, "हाँ, हाँ… डील पक्की है। मैं शाम तक पेपर भेज दूँगा।"

 
अनीता को लगा कि राज किसी भी पल रसोई में आ सकते हैं। उसने घबराहट में करीम के कंधे को पीछे धकेलने की कोशिश की।

 
अनीता (कांपती और फुसफुसाती आवाज़ में): "करीम, हटो! राज बाहर हैं। अगर उन्होंने देख लिया तो सब खत्म हो जाएगा!"

 
करीम ने एक कुटिल हंसी और अपनी पकड़ मज़बूत कर ली। उसने अपना चेहरा अनीता के कान के इतने करीब लाया कि उसकी गर्म साँसें अनीता की गर्दन को भिगो रही थीं।

करीम (फुसफुसाते हुए, अपनी उंगलियों से साटन के कपड़े को मरोड़ते हुए): "राज भैया तो डील पक्की कर रहे हैं बेटी... पर असली डील तो यहाँ पक्की हो रही है। देखो तो, कइसे ई साटन के नीचे तुम्हारी धड़कनें तेज़ हो रही हैं।"

 
उसने बहुत आहिस्ता से अपने दोनों भारी हाथ अनीता की पतली कमर पर टिकाए और उसे सिंक के ठंडे स्लैब की ओर थोड़ा और झुका दिया।

 
करीम के हाथ अब कमर से ऊपर की ओर रेंगने लगे। साटन का वह चिकना कपड़ा उसकी हथेलियों के नीचे सरक रहा था। उसने बहुत ही धीमेपन से अपने हाथों को अनीता के पुष्ट स्तनों पर टिकाया। उसकी उंगलियाँ साटन के ऊपर से ही उन मखमली उभारों को सांचे की तरह ढालने लगीं।

 
अनीता ने महसूस किया कि उसके स्तनों की चोटियाँ करीम के स्पर्श मात्र से सख्त होकर कपड़े को चीर देने पर आमादा थीं।

 
करीम यहीं नहीं रुका। उसने अपने भारी कूल्हों को अनीता की उन गोरी गाँड के बीच पूरी ताकत से सटा दिया। साटन की पतली परत के पीछे से अनीता को करीम के उस १० इंच के सख्त और तने हुए लंड का दबाव महसूस हुआ, जो उसकी गाँड की दरार में धंसा हुआ था।

 
अनीता (सिसकते हुए, बहुत धीमी आवाज़ में): "करीम... राज... राज यहीं हैं... छोड़ो मुझे... उह्ह!"

 
लेकिन उसके शब्द उसके जिस्म की गवाही के उलट थे। वह करीम को धक्का देने के बजाय, अनजाने में अपने कूल्हों को पीछे की ओर धकेल रही थी ताकि उस सख्त उभार को और गहराई से महसूस कर सके।

 
करीम ने उसके गले पर अपनी ज़ुबान का जादू और तेज़ कर दिया। वह कभी उसे चाटता है, तो कभी अपने दांतों से हल्का सा कुरेदता है। उसके हाथ अब अनीता के स्तनों को पूरी मुट्ठी में भरकर धीरे-धीरे मसल रहे थे, जैसे वह साटन के अंदर छुपी उस मलाई को पूरी तरह निचोड़ लेना चाहता हो।

करीम (हवस भरी फुसफुसाहट में): "देखो तो मालकिन... ज़बान मना कर रही है, पर ई गाँड कइसे हमारे इस लंड को रास्ता दे रही है। साटन के ऊपर से ही इतना नशा है, तो जब ई कपड़ा हटेगा... तब का मंज़र होगा।"

 
अनीता का दम फूल रहा था। एक तरफ बाहर राज की आवाज़ थी—और यहाँ रसोई के एकांत में, वह एक जानवर के चंगुल में फंसी थी, जो बहुत ही धीमी और ज़हरीली रफ्तार से उसे अपनी गुलामी की ओर ले जा रहा था।

 
रसोई की हवा अब भारी हो चुकी थी। बाहर राज की आवाज़ अभी भी फोन पर गूँज रही थी, "नहीं, उसे आज ही कोरियर करना होगा…"

 
राज की आवाज़ की उस ओट में, करीम ने अपनी बड़ी उंगलियाँ अनीता के पीले साटन नाइटगाउन के कॉलर के पास फँसाईं और उन्हें आहिस्ता से अंदर की ओर सरका दिया। जैसे ही उसकी उंगलियों ने अनीता के उन दूधिया सफेद और नंगे स्तनों को छुआ, अनीता के पूरे बदन में बिजली का एक ऐसा झटका लगा कि उसके घुटने काँप गए।

 
करीम ने अब किसी कपड़े की रुकावट के बिना, अपने उन भारी हाथों से अनीता के पुष्ट उभारों को अपनी हथेलियों में भर लिया। स्किन-टू-स्किन स्पर्श का वह अहसास इतना तीखा था कि अनीता की आँखें मुँद गईं। करीम ने अपनी हथेलियों से उन मखमली गोलों को पूरी ताक़त से भींचा और अपनी उंगलियों से उन सख्त और गुलाबी चोटियों को मरोड़ना शुरू किया।

 
करीम (अपनी गरम साँसें अनीता के कान में फूंकते हुए): "उफ़... ई असली माल है। साटन के ऊपर से तो बस झांकी थी, असली जन्नत तो इन नंगे पहाड़ों में छिपी है। देखो तो, कइसे ई चूचियाँ हमारे हाथों में समाने के लिए तड़प रही हैं।"

 
अनीता का दम फूल रहा था, वह डर और मजे के बीच झूल रही थी। तभी करीम ने उसे और ज़ोर से सिंक की ओर दबाया।

करीम (हुक्म देते हुए): "चुपचाप खड़ी रहो... और अपनी नज़रें उस तरफ रखो जहाँ राज भैया बैठे हैं। देखते रहिए अपने उस जेंटलमैन पति को, जबकि यहाँ आपका ई रईस बदन इस काले नौकर की हवस की आग में पिघल रहा है।"

 
अनीता ने बदहवासी में अपनी गर्दन घुमाकर डाइनिंग टेबल की ओर देखा। राज की पीठ उनकी तरफ थी। वह बेखबर थे कि उनकी पत्नी का नग्न सौन्दर्य इस वक्त एक नौकर के हाथों में खिलौना बना हुआ है।

 
करीम अब घुटनों के बल नीचे बैठ गया। उसने बहुत ही बेरहमी से उस पीले गाउन को एक तरफ सरकाया, जिससे अनीता की वे चिकनी, गोरी और नंगी जांघें पूरी तरह बेपर्दा हो गईं। करीम ने अपनी आँखें उन हाथीदांत जैसी जांघों पर टिका दीं। उसने इंतज़ार नहीं किया और अपनी गीली ज़ुबान बाहर निकालकर अनीता की नंगी जांघों पर फेर दी।

 
वह उसे बिल्कुल वैसे ही चाट रहा था जैसे कोई आइसक्रीम को पिघलने से पहले चटखारे लेकर खाता है। उसकी ज़ुबान अनीता के घुटनों से शुरू होकर धीरे-धीरे ऊपर उस गुलाबी कली की ओर बढ़ रही थी, जहाँ साटन का कपड़ा अब भी अटका हुआ था।

 
करीम (जांघों को चूमते और चाटते हुए, दबी आवाज़ में): "कितनी ठंडी और मीठी हैं ई जांघें... जैसे कोई मलाई की सिल्ली हो। राज भैया तो बस इन्हें सहलाते होंगे, पर ई करीम तो इन्हें कच्चा चबा जाना चाहता है। देखिए तो मालकिन, कइसे आपकी ई गोरी त्वचा हमारे थूक से चमक रही है।"

 
उसने एक जांघ को अपनी लार से पूरी तरह भिगोने के बाद अपनी ज़ुबान का रुख दूसरी गोरी और रेशमी जांघ की ओर कर दिया। अनीता की साँसें तेज़ हो चुकी थीं, उसकी आँखों के सामने डाइनिंग टेबल पर बैठे राज का धुंधला सा अक्स था, जो अभी भी फोन पर किसी फाइल की बात कर रहे थे।

 
करीम के मज़बूत और काले हाथों ने अब ऊपर रेंगते हुए अनीता के सुडौल कूल्हों को अपनी गिरफ्त में ले लिया। साटन के उस पीले गाउन के नीचे, करीम की उंगलियों ने अनीता की पीली रेशमी पैंटी के किनारों को ढूँढ लिया। जैसे ही उसने उन किनारों को छुआ, उसे महसूस हुआ कि वह कपड़ा अनीता के बदन के 'कामुक रस' से पूरी तरह गीला हो चुका था।

करीम ने एक कुटिल और ज़हरीली मुस्कान के साथ उन गीली पैंटियों को धीरे-धीरे नीचे की ओर छीलना शुरू किया। अनीता ने विरोध में अपनी टांगें सटाने की कोशिश की, पर करीम ने अपनी ताकत के दम पर उन्हें और फैला दिया।

 
जैसे ही वह रेशमी कपड़ा घुटनों तक उतरा, करीम की भूखी निगाहें अनीता की उस बेदाग, चिकनी और साफ चूत पर जा टिकीं। वह गुलाबी कली रसोई की रोशनी में थरथरा रही थी, जैसे किसी शिकारी के सामने कोई मासूम शिकार बेबस खड़ा हो।

 
करीम (मन ही मन, एक वहशी चमक के साथ): "राज भैया... आप लगे रहिए फोन पर, अपनी फाइलों और डील्स की दुनिया में खोए रहिए। आपको क्या पता कि यहाँ आपकी मालकिन की ई ठंडी और मीठी मलाई को ई काला करीम कइसे चटखारे लेकर चाटने जा रहा है। असली 'डील' तो ई कोठरी वाले नौकर के मुँह में है।"

 
करीम को अनीता को इस लाचारी और ज़िल्लत वाली स्थिति में डालने में एक अजीब सा आनंद मिल रहा था। उसे मज़ा आ रहा था कि कैसे एक रईस औरत, अपने पति की मौजूदगी में, एक नौकर के सामने अपनी गरिमा खो चुकी है।

 
उसने अपना चेहरा उस गुलाबी दरार के बिल्कुल करीब लाया। उसकी गर्म और भारी साँसें अनीता की उस कोमल जगह को सहला रही थीं, जिससे अनीता का पूरा बदन कांप उठा।

 
करीम (फुसफुसाते हुए, नीचे से अनीता की आँखों में झाँकते हुए): "देखिए मालकिन... राज भैया अभी भी फोन पर हैं। अगर हम यहाँ अपनी ज़ुबान का जादू दिखाएँ, तो क्या आप अपनी आवाज़ रोक पाएँगी? ई जो आपका रस बह रहा है ना, ई चीख-चीख कर कह रहा है कि आपको राज भैया की कोमलता नहीं, इस काले कुत्ते की दरिंदगी चाहिए।"

 
अनीता ने काउंटर को इतनी ज़ोर से जकड़ लिया कि उसके साटन के गाउन में बल पड़ गए। उसे महसूस हो रहा था कि करीम की ज़ुबान अब उसकी उस गीली गहराई को चखने के लिए बस एक इंच की दूरी पर थी, जबकि बाहर राज के जूतों की आवाज़ डाइनिंग चेयर से उठने की आहट दे रही थी।
 
 
जैसे ही डाइनिंग टेबल की कुर्सी के खिसकने की आवाज़ आई, अनीता का कलेजा मुंह को आ गया। राज फोन कान से हटाकर रसोई की ओर कदम बढ़ाने ही वाले थे। डर और घबराहट के मारे अनीता का पूरा बदन पसीने से तर हो गया। उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर नीचे झुके हुए करीम के मज़बूत कंधों को पीछे धकेलने की कोशिश की।

 
अनीता (कांपती हुई फुसफुसाहट में): "करीम... हटो! वो आ रहे हैं... खुदा के लिए हटो! सब बर्बाद हो जाएगा!"

 
करीम एक पल के लिए पीछे हटा, उसकी आँखों में एक शैतानी चमक थी। लेकिन किस्मत का खेल देखिए—जैसे ही राज रसोई की दहलीज के करीब पहुँचे, उनके हाथ में मौजूद फोन फिर से ज़ोर-ज़ोर से बज उठा। राज ठिठक गए। उन्होंने स्क्रीन देखी और बड़बड़ाए, "धत् तेरे की... फिर से मिस्टर खन्ना का फोन!"

 
राज ने कदम पीछे खींचे और फिर से फोन कान से लगा लिया, "हाँ खन्ना जी, बोलिए... नहीं-नहीं, मैं अभी घर पर ही हूँ।"

 
राज का ध्यान भटकते ही करीम की दरिंदगी ने सारी सीमाएं लांघ दीं। उसने अनीता को संभलने का एक मौका भी नहीं दिया। उसने झपट्टे मारकर अनीता की कमर को फिर से जकड़ा और उसे सिंक के काउंटर पर और पीछे की ओर झुका दिया।

 
अनीता के विरोध को अनसुना करते हुए, करीम ने अपनी गीली और खुरदरी ज़ुबान सीधे अनीता की उस नग्न और थरथराती हुई चूत के भीतर गाड़ दी।

 
अनीता के मुँह से एक तीखी सिसकी निकलने ही वाली थी कि उसने अपनी मुट्ठी अपने मुँह में ठूँस ली। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। बाहर उसका पति ज़ोर-ज़ोर से बातें कर रहा था और यहाँ सिंक के नीचे, एक नौकर उसकी यौवन की गहराई को अपनी लार से भिगो रहा था।

करीम के दोनों भारी हाथ अब अनीता की उन  गोरी और नंगी गाँड पर जम चुके थे। उसने अपनी उंगलियों को उन मांसल कूल्हों की गहराई में धँसा दिया, जैसे वह अनीता के बदन के एक-एक रेशे पर अपनी मुहर लगा देना चाहता हो।

 
करीम (चूत को चाटते हुए, मन ही मन): "राज भैया... आप अपनी कागज़ी डील्स में उलझे रहिए। यहाँ इस रईस मलाई का असली स्वाद तो ई काला करीम ले रहा है। देखिए तो, कइसे आपकी मेमसाहब हमारी ज़ुबान के एक-एक प्रहार पर मछली की तरह तड़प रही हैं।"
 

करीम की ज़ुबान अब अनीता की उस गुलाबी कली को पागलों की तरह कुरेद रही थी। अनीता को महसूस हो रहा था कि उसकी जांघों के बीच से 'कामुक रस' का एक और फव्वारा फूट पड़ा है, जो करीम के चेहरे और दाढ़ी को भिगो रहा था। वह चाहकर भी खुद को हिला नहीं पा रही थी; खौफ और बेपनाह हवस का यह संगम उसे अंदर तक तोड़ रहा था।

 
करीम को इस बात में एक क्रूर मज़ा  आ रहा था कि राज बस चंद कदमों की दूरी पर थे, और वह उनकी पत्नी को एक जानवर की तरह भोग रहा था।

 
रसोई की हवा अब अनीता की भारी सांत्वनाओं और करीम की दबी हुई वहशी साँसों से बोझिल हो चुकी थी। बाहर राज का स्वर अभी भी गूँज रहा था, "खन्ना जी, पाँच परसेंट का मार्जिन तो बहुत ज़्यादा है, कुछ तो रियायत कीजिए..."

 
राज की व्यापारिक बातें अनीता के कानों में पड़ रही थीं, लेकिन उसका पूरा वजूद इस वक्त सिंक के नीचे उस काले साये की गिरफ्त में था। करीम की ज़ुबान का वह गीला और खुरदरा प्रहार अनीता की उस गुलाबी दरार के भीतर किसी नश्तर की तरह उतर रहा था। अनीता ने काउंटर के किनारों को इतनी ज़ोर से जकड़ा कि उसके साटन के गाउन में खिंचाव के निशान पड़ गए।

 
करीम के हाथ अब अनीता की नंगी गाँड के मांसल उभारों को बेरहमी से भींच रहे थे। उसकी उंगलियाँ उन गोरे कूल्हों की गहराई में धँसकर उन्हें मरोड़ रही थीं। अनीता को महसूस हो रहा था कि उसका पूरा बदन एक अजीब सी गुलामी  की ओर खिंचा चला जा रहा है।

अनीता (मन ही मन, टूटते हुए): "हे भगवान... राज बस दो कदम दूर हैं... और मैं... मैं इस जानवर की ज़ुबान के जादू में पिघल रही हूँ। मुझे इसे हटाना चाहिए, पर मेरी जांघें... मेरी जांघें तो और फैलती जा रही हैं। क्या मैं इतनी गिर चुकी हूँ? क्या मुझे इस नीच नौकर की दरिंदगी में ही असली सुख मिल रहा है?"

 
करीम को अनीता की इस मानसिक कशमकश का पूरा अंदाज़ा था। उसने अपनी ज़ुबान की रफ़्तार और तेज़ कर दी। वह कभी अनीता की उस सिक्त कली को अपने होंठों से चूसता, तो कभी अपनी ज़ुबान को एक तेज़ धार की तरह उसकी गहराई में ऊपर-नीचे फिराता।

 
तभी बाहर राज ने कहा, "ठीक है खन्ना जी, मैं अभी फाइल लेकर आता हूँ, फिर बात करते हैं।"

 
कुर्सी के दोबारा खिसकने की आवाज़ आई। राज का फोन कट चुका था। अनीता का दिल किसी ज़ख़्मी परिंदे की तरह धड़कने लगा। उसने बदहवासी में करीम के सिर को अपनी चूत से अलग करने की कोशिश की।

 
अनीता (फुसफुसाते हुए, आँखों में खौफ लिए): "करीम! बस करो... वो आ रहे हैं! हटो वरना अनर्थ हो जाएगा!"

 
करीम ने एक आखिरी बार अनीता की उस गीली गहराई को पूरी ताक़त से चाटा और फिर एक झटके में अपनी ज़ुबान बाहर निकाली। उसने अपनी लार से भीगा चेहरा ऊपर उठाया और अनीता की आँखों में झाँका। उसकी नज़रों में एक विजेता का गुरूर था।

 
करीम (बहुत ही दबी और ज़हरीली आवाज़ में): "जाइए मालकिन... राज भैया इंतज़ार कर रहे हैं। पर याद रखिएगा, आपकी ई गुलाबी चूत पर अभी भी इस काले करीम के थूक का लेप लगा है। जब राज भैया आपको छुएंगे, तो आपको हमारा ई १० इंच का लंड याद आएगा।"

 
करीम फुर्ती से पीछे हटा और अपनी लुंगी संभालते हुए अँधेरे कोने में दुबक गया। अनीता ने कांपते हाथों से अपनी गीली पैंटी और साटन के गाउन को ठीक किया। उसका पूरा शरीर थरथरा रहा था।
जैसे ही राज रसोई की दहलीज पर पहुँचे, उन्होंने देखा कि अनीता सिंक की ओर पीठ किए खड़ी है।

 
राज (आवाज़ देते हुए): "अनीता? तुम अभी तक यहीं हो? वह फाइल मिल नहीं रही, ज़रा मेरी मदद करोगी?"

 
अनीता झटके से मुड़ी। उसके बाल बिखरे थे और उसकी साँसें अभी भी सामान्य नहीं हुई थीं। उसने अपनी जांघों के बीच उस गीलेपन और जलन को महसूस किया, जो चीख-चीख कर उसकी बेवफाई की गवाही दे रहे थे।
 
Deepak Kapoor
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RE: अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play) - by Deepak.kapoor - 05-04-2026, 12:34 PM



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