03-04-2026, 10:38 AM
This Story is inspired By Ammi and uncle written by author Lucky2.
अध्याय 1
मैं साहिल हूँ। यह कहानी मेरी ज़िंदगी के उस मोड़ की है जब वक्त ने एक अजीब करवट ली थी। हम दिल्ली गए थे, मेरी अम्मी आयशा की कज़िन, सायमा, की शादी के लिए। सायमा अम्मी के मामा की बेटी थी, इसलिए यह एक बड़ा फैमिली इवेंट था।
घर से हम तीनों निकले थे—मैं, मेरी अम्मी, और मेरी नानी। मेरे अब्बू, फहद, को बिज़नेस के काम से रुकना पड़ा, इसलिए वह हमारे साथ नहीं आ सके। मैं कॉलेज में था, अपनी ही धुन में रहने वाला एक एवरेज सा लड़का। मीडियम हाइट, पतला सा जिस्म, और काले बाल जो अक्सर मेसी रहते थे, हवा में लहराते हुए। मेरा चेहरा अम्मी से ज़्यादा अब्बू से मिलता था। देखने में मैं मासूम लगता था, पर मेरे अंदर एक बेचैनी थी, एक तेज़ धड़कन जो हर नए तजुर्बे को तलाशती थी।
मैं साहिल हूँ, और यह वाकया मेरी अम्मी, आयशा, के उस जादुई रूप के इर्द-गिर्द बुना गया है जिसने मुझे पहली बार यह अहसास कराया कि कुदरत ने उन्हें किस कदर फुर्सत में तराशा था।
मेरी अम्मी की खूबसूरती सिर्फ एक बेटे की नज़र से ही नहीं, बल्कि किसी भी देखने वाले के लिए एक मदहोश कर देने वाला मंज़र थी। कॉलेज में होने के नाते, मैं औरों की नज़रों को पढ़ना सीख गया था, और अक्सर देखता था कि जब अम्मी कमरे में दाखिल होतीं, तो वक्त जैसे ठहर सा जाता। उनकी लंबी सुराहीदार गर्दन और उस पर टिका वह चाँद सा गोल चेहरा किसी संगमरमर की मूरत जैसा लगता था। उनकी त्वचा का रंग इतना साफ और दूधिया सफेद था कि रोशनी जैसे उनसे टकराकर वापस लौटती थी।
उस दिन उन्होंने एक महीन कपड़े का सूट पहना था, जो उनके छरहरे मगर गठावदार बदन पर इस कदर चिपका था कि उनके जिस्म का हर उभार अपनी एक अलग कहानी कह रहा था। उनकी पतली कमर जब चलने के दौरान हल्की सी बल खाती, तो उनके भरे हुए पुष्ट कूल्हे और पुष्ट सीना एक ऐसी लय पैदा करते थे जिसे अनदेखा करना नामुमकिन था। उनके काले घने बाल उनकी पीठ पर किसी नागिन की तरह लहरा रहे थे, और उनसे आती चमेली की भीनी खुशबू हवा में एक नशा सा घोल रही थी। मैं उनका बेटा था, उनसे बेइंतहा प्यार करता था, पर उस दिन मेरी आँखों में उनके लिए सिर्फ ममता नहीं, बल्कि उनकी बेपनाह खूबसूरती के लिए एक गहरी अचरज भरी कशिश थी।
मेरी अम्मी बहुत केयरिंग थीं, जिनकी दुनिया उनकी फैमिली के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। उनकी मुस्कुराहट ऐसी थी जो दिल को सुकून दे।
सफर की शुरुआत ही हंगामेदार रही। रेलवे स्टेशन पर जैसे इंसानों का समंदर उमड़ पड़ा था। अब्बू साथ नहीं थे, इसलिए नानी और अम्मी की ज़िम्मेदारी मेरे कंधों पर थी।
उस दिन सफर के लिए अम्मी ने एक ढीला-ढाला काला अबाया और चेहरे पर ब्राउन वेल (नकाब) पहना हुआ था। उनका पूरा जिस्म सिर से पैर तक ढका था। ऊपर से देखने पर सिर्फ एक स्याह साया नज़र आता, लेकिन अम्मी का वह अबाया उनकी बेपनाह खूबसूरती को छुपाने में नाकाम था।
उनका गोरा रंग अबाया के स्याह काले रंग के कॉन्ट्रास्ट में किसी जलते हुए दीये की तरह खिल उठा था। अबाया ने उनके जिस्म को ज़रूर ढका था, मगर उनके दूधिया सफेद हाथ जब अबाया की आस्तीनों से बाहर निकलते, तो काले कपड़े पर उनकी सफेदी किसी संगमरमर की तरह चमकती थी। नकाब के पीछे से उनकी बड़ी-बड़ी काली आँखें जब उठतीं, तो ऐसा लगता जैसे कोई गहरा राज़ बेपर्दा होने को हो।
चलते वक्त जब अबाया की ज़मीन चूमती हुई किनारियाँ हल्की सी ऊपर उठतीं, तो उनके नर्म और गोरे पैरों की एक छोटी सी झलक दिख जाती, जो काले अबाया के साथ एक कयामत सा कंट्रास्ट पैदा कर रही थी। वह झलक चीख-चीख कर बता रही थी कि उस काले लिबास के नीचे छिपा हुआ पूरा बदन किस कदर दूधिया और बेदाग होगा।
अबाया कितना भी ढीला क्यों न हो, जब हवा का कोई झोंका उनसे टकराता या वह मुड़तीं, तो कपड़े का खिंचाव उनके भरे हुए सीने और पुष्ट कूल्हों के कर्व को साफ़ बयां कर देता था।
जैसे ही ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी, कोच के दरवाजे पर चढ़ने वालों की एक अंधी दौड़ शुरू हो गई। स्टेशन का वह शोर-शराबा और धक्का-मुक्की किसी अनहोनी का इशारा दे रहे थे। भीड़ का फायदा उठाकर कुछ आवारा किस्म के लोग अम्मी के इर्द-गिर्द घेरा बनाने लगे। हालाँकि अम्मी उस ढीले-ढाले काले अबाया में पूरी तरह ढकी थीं, लेकिन उन भेड़ियों की भूखी नज़रें उस कपड़े के पार देख रही थीं। वे अम्मी के चलने की लय और अबाया के खिंचाव से उनके जिस्म के उतार-चढ़ाव का अंदाज़ा लगा रहे थे।
मैंने देखा कि कैसे एक हट्टे-कट्टे आदमी ने जानबूझकर अम्मी के बिल्कुल करीब आने की कोशिश की, उसकी नज़रें अम्मी के अबाया से ढके पुष्ट कूल्हों पर जमी हुई थीं। भीड़ के एक ज़ोरदार रेले ने अम्मी का संतुलन बिगाड़ दिया, और वह लड़खड़ाकर पीछे की ओर झुकीं।
"साहिल... बचा मुझे!" अम्मी की आवाज़ नकाब के पीछे से कांपती हुई और बेहद बेबस सी आई।
उसी पल, उस भीड़ का फायदा उठाकर एक गंदा हाथ बड़ी चालाकी से अम्मी के अबाया के ऊपर से ही उनकी सुडौल गाँड तक पहुँचा। उस शख्स ने कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई और अम्मी के भरे हुए कूल्हे को मजबूती से दबोचकर भींच दिया। अम्मी के मुँह से एक दबी हुई चीख निकली, वह बुरी तरह डर गईं और थरथराने लगीं। उस स्पर्श की दरिंदगी ने उन्हें अंदर तक हिला दिया था।
"साहिल!" उन्होंने दहशत में मेरा नाम पुकारा।
मेरी रगों में खून खौल उठा। मैंने पलक झपकते ही अम्मी की कमर में अपना हाथ डाला और उन्हें अपनी ओर पूरी ताक़त से खींच लिया। मेरा हाथ उनके अबाया के कपड़े के ऊपर था, लेकिन उस ढीले लिबास के नीचे से भी मुझे उनकी पतली कमर की गोलाई और उनके दहकते बदन की तपिश का साफ़ अहसास हुआ। वह खौफ के मारे मुझसे पूरी तरह चिपक गईं। उनका अबाया से ढका हुआ भारी सीना मेरी छाती से ज़ोर से सट गया था। मैं उनकी तेज़ होती धड़कनों को अपने सीने पर महसूस कर सकता था, और उस पल उनकी बेबसी ने मेरे अंदर उन्हें बचाने के एक नए जुनून को जन्म दे दिया था।
जैसे ही भीड़ का एक और रेला आया, अम्मी पूरी तरह से मुझ पर ढह गईं। उनकी पूरी देह मेरे जिस्म से इस कदर चिपकी हुई थी कि उनके और मेरे बीच हवा की भी जगह नहीं बची थी। उस पल, पहली बार मुझे अपनी अम्मी के भरे हुए सीने का स्पर्श इतनी नज़दीकी से महसूस हुआ। अबाया के कपड़े के पीछे भी उनके उरोजों की नरमी और उनका उभार मेरी छाती पर दबाव बना रहा था। वह अहसास इतना नर्म और मखमली था कि मेरे ज़हन में एक बिजली सी कौंध गई। एक बेटे के तौर पर मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था, पर उस दबाव और उनके बदन की गर्मी ने मेरे अंदर एक अजीब सी सिहरन पैदा कर दी थी।
तभी पीछे से लोगों का एक ज़ोरदार धक्का लगा, जिसने अम्मी को मेरे और करीब धकेल दिया। वह इस कदर घबरा गईं कि उन्हें लगा जैसे उनका दम घुट जाएगा। अपनी स्थिति को समझने और भीड़ के बीच रास्ता देखने की जद्दोजहद में, उन्होंने आनन-फानन में अपने चेहरे से ब्राउन नकाब हटा दिया।
जैसे ही उन्होंने नकाब हटाया, ऐसा लगा मानो काली घटाओं के पीछे से अचानक पूरा चाँद निकल आया हो। उनका वह दूधिया सफेद चेहरा, पसीने की छोटी-छोटी बूंदों से चमकता हुआ, उन गंदी नीयत वाले लोगों के सामने बेपर्दा हो गया। उनकी बड़ी-बड़ी आँखों में फैली दहशत और उनके गुलाबी लब, जो डर से कांप रहे थे, ने वहाँ मौजूद हर शख्स की साँसें थाम दीं।
स्टेशन की रोशनी में उनका चेहरा किसी दैवीय अप्सरा की तरह दमक रहा था। जो लोग अब तक सिर्फ अबाया के पीछे के जिस्म का अंदाज़ा लगा रहे थे, उनके सामने अब वह बेपनाह हुस्न साक्षात था। हर तरफ जैसे एक सन्नाटा सा छा गया, हर नज़र उनकी उस नूरानी खूबसूरती पर गड़ गई थी। अम्मी अपनी ही खूबसूरती से बेखबर, बस मेरी आँखों में अपनी जान की सलामती तलाश रही थीं, जबकि मैं उन्हें उस भीड़ की दरिंदा नज़रों से बचाने के लिए और कसकर अपने घेरे में ले चुका था।
नानी, जो उम्र के इस पड़ाव पर भी अपनी पैनी समझ रखती थीं, तुरंत ताड़ गईं कि भीड़ की आड़ में क्या गंदा खेल खेला जा रहा है। उन्होंने देखा कि कैसे अम्मी बेबस होकर मुझ पर ढह गई हैं और उनका चेहरा बेपर्दा हो चुका है। अपनी उम्र की कमज़ोरी को दरकिनार करते हुए, वह फौरन अम्मी के पीछे आकर किसी ढाल की तरह खड़ी हो गईं।
नानी की आँखों में उस वक्त ममता नहीं, बल्कि एक शेरनी जैसा गुस्सा था।
उन्होंने ज़ोरदार आवाज़ में उन आवारा लोगों को फटकारते हुए कहा:
"शर्म नहीं आती तुम लोगों को? डूब मरो कहीं! यह जो हरकतें कर रहे हो, याद रखना, तुम्हारे घर में भी माँ-बहनें और बेटियाँ होंगी। क्या उनके साथ भी यही तमाशा होते देखना चाहते हो? इंसानियत मर गई है क्या तुम सबकी?"
नानी की कड़क आवाज़ और उस फटकार में इतना दम था कि आस-पास के कुछ लोग शर्मिंदगी से नज़रें झुकाने लगे। उनका वह रौब देखकर जो हाथ अम्मी के मखमली बदन की टोह ले रहे थे, वे अचानक ठिठक कर पीछे हट गए।
नानी ने अम्मी का हाथ मज़बूती से पकड़ा और मेरी तरफ देखते हुए इशारा किया कि हम अंदर की तरफ बढ़ें। अम्मी अभी भी कांप रही थीं, उनका चेहरा मेरी छाती में छिपा हुआ था और उनके नर्म सीने का दबाव अभी भी मेरी धड़कनों को बेकाबू कर रहा था। नानी के पीछे से मोर्चा संभालने के बाद, मैंने भी पूरे ज़ोर से रास्ता बनाया और हम आखिरकार उस दरिंदा भीड़ को पीछे छोड़ते हुए ट्रेन के डिब्बे के अंदर दाखिल हो गए।
मुश्किल से हम डिब्बे के अंदर पहुँचे। अम्मी की साँसें अभी भी उखड़ी हुई थीं। जब वह अपनी सीट पर बैठीं। उनके चाँद से गोल चेहरे पर पसीने की नन्हीं बूंदें चमक रही थीं। उन्होंने अबाया को थोड़ा ढीला किया, जिससे उनकी लंबी सुराहीदार गर्दन का वह गोरा हिस्सा अबाया के काले कॉलर से उभर कर सामने आ गया।
मैं उनके सामने बैठा, उन्हें देख रहा था। मेरे मन में उनके लिए कोई गलत विचार नहीं था, पर उस भीड़ भरे हादसे और अबाया के ऊपर से हुए उन स्पर्शों ने मेरे अंदर एक अजीब सी जागरूकता भर दी थी। मुझे अहसास हुआ कि मेरी अम्मी सिर्फ मेरी अम्मी नहीं, बल्कि एक ऐसी औरत हैं जिनकी एक झलक, चाहे वह अबाया में ही क्यों न हो, ज़माने को बेताब कर देती है। उनकी वह मासूमियत और अबाया के पीछे छिपा वह कातिलाना बदन, दोनों मिलकर एक ऐसा जादू जगा रहे थे जिसने मुझे उस दिन पहली बार अपनी ही अम्मी को एक अलग नज़रिए से देखने पर मजबूर कर दिया।
अम्मी ने मेरी तरफ देखकर एक फीकी सी मुस्कान दी और कहा, "शुक्रिया साहिल, अगर तू नहीं होता तो आज पता नहीं क्या होता..."
उनकी वह शहद सी मीठी आवाज़ मेरे कानों में मिश्री की तरह घुली, और मैंने बस इतना सोचा कि मैं ता उम्र उनकी ढाल बनकर खड़ा रहूँगा।
ट्रेन की डिम लाइट और पहियों की गूँज के बीच, वह सफर मेरे वजूद में एक ऐसी हलचल मचा रहा था जिसे मैं चाहकर भी दबा नहीं पा रहा था। मैं अम्मी के बिल्कुल बगल में सटकर बैठा था। नानी खिड़की वाली सीट पर गहरी नींद में थीं, उनकी हल्की खर्राटों की आवाज़ डिब्बे के सन्नाटे में घुल रही थी।
अम्मी का वह काला ढीला-ढाला अबाया अब हमारे बीच की दूरी को मिटाने में नाकाम साबित हो रहा था। ट्रेन की हर थरथराहट और हर मोड़ पर आने वाला झटका अम्मी के नर्म और गर्म जिस्म को मेरे शरीर से ज़ोर से टकरा देता था।
जब भी ट्रेन की रफ़्तार तेज़ होती, उनका भारी और सुडौल सीना मेरी बाँह से रगड़ खाता, जिससे मुझे उस मखमली दबाव का गहरा अहसास होता। उनके जिस्म की वह आग जैसी तपिश अबाया के कपड़े को पार कर मेरे जिस्म में उतर रही थी, जिससे मेरी नसों में एक अजीब सी बेचैनी दौड़ने लगी।
अबाया की आस्तीनों से बाहर झाँकते उनके दूधिया सफेद हाथ चांदनी में और भी हसीन लग रहे थे। उनसे आती लोशन और चमेली की मिली-जुली भीनी खुशबू मेरे नथुनों से टकराकर मेरे दिमाग में एक नशा सा घोल रही थी।
"बेटा, दिल्ली में बहुत मज़ा आएगा," अम्मी ने आहिस्ता से फुसफुसाकर कहा।
उनकी वह शहद सी मीठी आवाज़ और उनके लबों की गर्माहट मेरे कान के पास महसूस हुई, जिससे मेरे रोंगटे खड़े हो गए। उनकी आँखों में शादी की खुशी थी, पर मेरी नज़रें उनके उन गुलाबी होंठों और उस लंबी सुराहीदार गर्दन पर टिक गई थीं जो नकाब हटने के बाद अब पूरी तरह नुमाया थी।
ट्रेन की एक ज़ोरदार वाइब्रेशन ने अम्मी को पूरी तरह मेरी तरफ धकेल दिया। उनका चौड़ा कूल्हा मेरी जांघ से ज़ोर से सटा और उनकी पतली कमर का झुकाव मेरे पर आ टिका। उस पल मुझे गहराई से अहसास हुआ कि मेरी अम्मी कितनी सेक्सी और दिलकश हैं। उनके बदन का हर कर्व, हर उभार एक कयामत था। मेरे अंदर कामुकता की एक तेज़ लहर उठी, जिसने मेरे दिल की धड़कनें बेकाबू कर दीं।
पर जैसे ही यह ख्याल आया, मेरे ज़हन में एक बिजली सी कौंधी। 'यह क्या सोच रहा हूँ मैं? यह गुनाह है, महापाप है!' मैंने झटके से अपनी आँखें बंद कर लीं और उस ज़हरीले मगर मीठे ख्याल को झटकने की कोशिश की।
वह मेरी अम्मी थीं, मेरी जन्नत। लेकिन उनके बदन की वह छुअन और वह खुशबू मुझे बार-बार उसी दलदल की तरफ खींच रही थी। मैंने अपना सर उनके कंधे पर टिका दिया, पर ट्रेन की हर हरकत उनके नर्म गोश्त को मुझसे रगड़ रही थी, जो मुझे बार-बार यह याद दिला रहा था कि मेरी 'जन्नत' इस दुनिया की सबसे खूबसूरत और कशिश भरी औरत है। वह रात महज़ एक सफर नहीं, बल्कि मेरे अंदर शुरू होने वाले एक नए और खतरनाक अध्याय की पहली दस्तक थी।
Deepak Kapoor
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