02-04-2026, 03:34 PM
नेहा मेरे सीने पर सिर टिकाए लेटी थी।
उसकी आवाज़ धीमी थी... लेकिन हर शब्द मेरे दिमाग में चाकू की तरह घुस रहा था।
वो बता रही थी... कैसे उसने बूढ़ा आदमी के लुंड को पकड़ा... कैसे हिलाया... कैसे आखिरी बूँदें दीवार पर गिराईं... कैसे उसका हाथ गीला हो गया...।
मेरा दिमाग... मान नहीं पा रहा था।
ये... नेहा?
मेरी नेहा?
जो घर में इतनी साफ-सुथरी... इतनी घरेलू... इतनी "ऑर्थोडॉक्स" लगती है... वो इतनी गंदी... इतनी मेस्सी... इतनी बेबाक हो सकती है?
उसने कभी... मेरे साथ ऐसा नहीं किया।
कभी मेरे लुंड को पेशाब करते हुए नहीं पकड़ा।
लेकिन... आज... वो सब बता रही है।
और... मैं... पागल हो रहा हूँ।
मेरा लुंड... रॉक हार्ड हो चुका था।
शॉर्ट्स में... दर्द करने लगा।
फड़क रहा था... जैसे बाहर निकलने को बेताब हो।
मैं... उसकी बातें सुनकर... और ज्यादा एक्साइटेड हो रहा था।
उसकी वो शरारती आवाज़... वो पुरानी यादों वाली मुस्कान... वो गंदी डिटेल्स... सब कुछ... मुझे पागल कर रहा था।
अचानक... सवाल मुँह से निकल गया—वो सवाल जो शुरुआत से दिमाग में घूम रहा था।
"नेहा... वो... उसका... मुझसे बड़ा था?"
वो एक पल के लिए रुक गई।
उसकी उँगलियाँ मेरे लुंड पर रुक गईं।
वो मेरी तरफ मुड़ी।
उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकीं।
फिर... वो धीरे से मुस्कुराई—एक प्यारी, समझदार मुस्कान।
"बेबी... ये कैसा सवाल है?"
उसकी आवाज़ में हल्की हिचकिचाहट थी।
वो जानती थी... मैं ये सवाल पूछूँगा।
वो जानती थी... ये सवाल मेरे मन में कितनी देर से घूम रहा है।
वो नहीं चाहती थी... मुझे हर्ट करना।
लेकिन... मैं... रोक नहीं पाया।
"बताओ... मैं जानना चाहता हूँ।
सब कुछ जानना चाहता हूँ।
प्लीज़... सच बताओ।"
वो मेरी आँखों में देखती रही।
एक लंबा पल।
फिर... धीरे से बोली—आवाज़ में बहुत प्यार... बहुत समझ।
"हाँ... वो बड़ा था।
मैसिव।
तुम जानते हो... पहाड़ी इलाके में... बहुत फिजिकल लेबर करना पड़ता है।
ट्रैवल एजेंसी... सुबह जल्दी उठना... भारी सामान उठाना... लंबी ड्राइविंग... सब कुछ।
उसका बदन... बहुत स्ट्रॉन्ग था।
और... वो... दिखता था।"
वो रुकी।
उसने मेरे गाल पर हाथ फेरा।
उसकी उँगलियाँ मेरे होंठों पर।
"लेकिन बेबी... ये तुम्हारी गलती नहीं है।
तुम... मेरे लिए परफेक्ट हो।
उसकी आवाज़ में... वो पिटी थी।
वो पिटी... जो मैंने पहले भी सुनी थी।
पिछले रिलेशनशिप्स में... कई बार।
जब लड़कियाँ... मेरे साइज़ के बारे में बात करती थीं... या तुलना करती थीं... वो पिटी वाली टोन।
"तुम अच्छे हो... साइज़ मैटर नहीं करता..."
ये शब्द... दिल को चीर देते थे।
मुझे पता था... वो मुझे हर्ट नहीं करना चाहती।
वो... सच में कोशिश कर रही थी... मुझे कंसोल करने की।
लेकिन... वो पिटी... वो समझ... वो "तुम्हारी गलती नहीं है" वाली फीलिंग... सब कुछ... मुझे अंदर से हर्ट कर रहा था।
मैंने चेहरा नहीं बदला।
मुस्कुराने की कोशिश की।
आँखें बंद नहीं कीं।
उसे देखता रहा।
लेकिन... अंदर... कुछ टूट रहा था।
थोड़ा सा... लेकिन बहुत गहरा।
उसकी उँगलियाँ अब मेरे बालों में धीरे-धीरे खेल रही थीं।
उसकी आवाज़ फिर से शुरू हुई—धीमी, लेकिन साफ़... जैसे वो सब कुछ फिर से जी रही हो।
"उस घटना के बाद... हम बहुत सावधान हो गए।
अंकल ने सख्ती से कहा—'ये सब खत्म।'
वो बहुत गुस्से में था... खुद पर... और थोड़ा मुझ पर भी।
कहा—'ये गलत है... हम दोनों के लिए बहुत बड़ा रिस्क है।
मेरा परिवार... तुम्हारा परिवार... हमारा समाज... सब कुछ बर्बाद हो सकता है।'
मैं... बहुत हर्ट हुई थी।
बहुत रोई थी।
रात को... अकेले में... बहुत रोई।
लेकिन... मैं समझ गई थी... इस रिलेशनशिप का कोई फ्यूचर नहीं है।
कभी नहीं था।
तो... मैंने भी... उसे मान लिया।"
वो रुकी।
उसकी साँसें थोड़ी भारी हो गईं।
फिर... जारी रखा—
"मैंने अपनी बेस्ट फ्रेंड से बात की।
डिटेल्स में नहीं... बस आइडिया।
कहा—'मुझे एक लड़का पसंद है... और... वो बड़ा है।'
वो बहुत गुस्सा हो गई।
मुझे डाँटा... जैसे कोई बड़ी बहन डाँटती है।
कहा—'पागल हो गई हो?
तुम्हारी उम्र में... ऐसे रिस्क मत लो।
तुम्हारा फ्यूचर... तुम्हारी पढ़ाई... तुम्हारी जिंदगी... सब बर्बाद हो जाएगा।
उसकी बातें... मेरे दिमाग को थोड़ा क्लियर कर गईं।
मैंने सोचा... शायद वो सही है।
तो... मैंने भी दूरी बना ली।
धीरे-धीरे... बातें कम हुईं।
फिर... बिल्कुल बंद हो गईं।
और... वो सब... खत्म हो गया।"
लेकिन... मैं... पूरी तरह खत्म नहीं कर पाई।
कभी-कभी... कार में... मैं उसके लुंड को पजामा के ऊपर से छू लेती थी।
मज़ाक में... शरारत में।
वो मुस्कुराता था... लेकिन रुकने को कहता था।
कभी... वो पेशाब करते हुए... मैं उसे देखती रहती थी।
उसकी आँखें... मेरी तरफ आतीं... और वो... शायद जानबूझकर... थोड़ा सा दिखाता था।
लेकिन... कभी आगे नहीं बढ़ा।
वो जानता था... ये छोटा शहर है।
एक छोटी सी अफवाह... जंगल की आग की तरह फैल जाती है।
हमारे लिए... बहुत बड़ा खतरा था।
तो... वो हमेशा रुक जाता था।
और... मैं भी... मजबूरन रुक जाती थी।"
मैंने एक पल के लिए रुककर सैम की आँखों में देखा।
उसकी आँखें... बहुत गहरी थीं।
वो सुन रहा था... बहुत ध्यान से।
मैंने उसके लुंड को थोड़ा और टाइट पकड़ा।
धीरे से सहलाया।
"फिर... मेरे एग्जाम हुए।
मैंने अच्छा किया।
सिलेक्शन हो गया।
कॉलेज शहर में शिफ्ट हो गया—बहुत दूर।
अंकल अब नहीं आता था।
कार पूल खत्म हो गया।
6 महीने बीत गए।
मैंने नए दोस्त बनाए।
नए लड़के... नए ग्रुप... नई ज़िंदगी।
लेकिन... किसी भी लड़के में... वो आकर्षण नहीं था।
कोई भी... वैसा नहीं था।
जैसे अंकल था।
उसकी वो इज्ज़त... वो कंट्रोल... वो प्यार... वो सब... मेरे दिमाग में रह गया।
कॉलेज के लड़के... बहुत फास्ट थे... बहुत जल्दी आगे बढ़ना चाहते थे।
मुझे... वो अच्छा नहीं लगता था।
छुट्टियाँ खत्म हो रही थीं।
मैं घर में बैग पैक कर रही थी।
पापा ने कैब बुक की थी—कॉलेज तक का सफर लंबा था, 5-6 घंटे।
मैंने सोचा... कोई लोकल ड्राइवर होगा।
बैग उठाया... बाहर निकली।
गेट पर कैब खड़ी थी।
ड्राइवर की तरफ देखा... और दिल एक झटके से धड़क गया।
अंकल।
8-9 महीने बाद... पहली बार।
वो वही था—वही चेहरा... वही आँखें... वही मुस्कान जो कभी मेरी साँसें रोक देती थी।
वो मुझे देखकर रुक गया।
उसकी आँखें भी चौड़ी हो गईं।
एक पल... हम दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।
मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़
पहले आधे घंटे... पूरी खामोशी।
शहर की सीमा पार हो गई थी।
घर की गलियाँ... बाज़ार... लोग... सब पीछे छूट गए थे।
अब सिर्फ़ हाईवे था... पेड़... और दूर-दूर तक फैली खामोशी।
मैं पिछली सीट पर बैठी थी।
शर्ट के बटन... एक खुले।
ड्राइव कर रहा था।
रियर व्यू मिरर में उसकी आँखें बार-बार मुझ पर टिक रही थीं।
वो देख रहा था—मेरी आँखें... मेरी स्माइल
मैं मुस्कुरा रही थी।
बहुत हल्की... बहुत जानबूझकर।
मैं जानती थी... वो क्या चाहता है।
मैं भी... जानती थी... मैं क्या चाहती हूँ।
लेकिन... साथ ही... ये गलत था।
मैंने इसे भुला दिया था।
7-8 महीने में... मैंने खुद को बहुत संभाल लिया था।
नई ज़िंदगी... नए दोस्त... नई पढ़ाई... सब अच्छा चल रहा था।
फिर से... ये सब शुरू करना... सब बर्बाद कर सकता था।
फिर... उसने सन्नाटा तोड़ा।
आवाज़ में वो पुरानी वाली गर्माहट... और थोड़ा सा डर।
"कैसी हो?"
मैंने हल्के से मुस्कुराकर जवाब दिया—
"गुड।"
वो रियर व्यू में मुझे देखता रहा।
फिर... मिरर को थोड़ा एडजस्ट किया।
अब... उसकी नज़र... मेरी चेस्ट पर थी।
शर्ट के खुले बटन से... मेरी चेस्ट की हल्की झलक।
वो बोला—आवाज़ में वो पुरानी वाली चाहत—
"तुम... बहुत अच्छी लग रही हो... डेवलप हो गई हो।"
मैंने नोटिस किया।
मिरर का एंगल... जानबूझकर बदला हुआ था।
वो मेरी चेस्ट देख रहा था।
मैंने मुस्कुराई।
पहली बार... वो खुद इनिशिएट कर रहा था।
शायद... शहर पीछे छूट गया था।
शायद... अब वो सोच रहा था... ये उसकी आखिरी चांस है।
शायद... अब वो डर कम था।
या... शायद... वो भी... उतना ही चाहता था... जितना मैं चाहती थी।
मैं पिछली सीट पर बैठी रही—स्कर्ट थोड़ी ऊपर, लेकिन पैर बंद।
मैंने जानबूझकर कोई रिस्पॉन्स नहीं दिया।
न मुस्कुराई... न बात की... न आँख मिलाई।
शायद... मैं खुद को समझा रही थी।
"ये गलत है... अब नहीं... अब सब ठीक चल रहा है... मत करो कोई सिली बिज़नेस।"
मैंने सोचा... अगर मैं इग्नोर करूँगी... तो वो भी कुछ नहीं बोलेगा।
रियर व्यू मिरर में मुझे देखता रहा।
उसकी आँखें... मेरी आँखों से मिलती रहीं... लेकिन मैंने नज़रें फेर लीं।
वो समझ गया था... मैं इंटरेस्ट नहीं दिखा रही।
न चिटचैट... न फ्लर्ट... न कुछ।
फिर... उसने कार साइड में रोकी।
एक सुनसान जगह... हाईवे के किनारे... कोई नहीं।
वो बाहर निकला।
कार के कोने में खड़ा हो गया।
ज़िप नीचे की।
लुंड बाहर निकाला।
पेशाब करने लगा।
पूरी तरह ओपन... मेरी तरफ।
वो जानता था... मैं देख रही हूँ।
रियर व्यू से... या सीधे खिड़की से।
ये... उसका आखिरी मास्टर स्ट्रोक था।
एक आखिरी कोशिश... मुझे तड़पाने की... मुझे याद दिलाने की... कि वो अभी भी वही है।
मैंने देखा।
उसका लुंड... बड़ा... सख्त... पेशाब करते हुए भी थोड़ा उभरा हुआ।
मेरी चूत... फिर से गीली हो गई।
बहुत गीली।
मैंने मुस्कुरा दिया—हल्का सा... लेकिन जानबूझकर।
वो पेशाब खत्म करके हाथ धोया।
बीड़ी सुलगाई।
एक कश लिया।
फिर... वापस ड्राइवर सीट पर आया।
और... सरप्राइज।
मैं... पहले से ही फ्रंट सीट पर थी।
पैसेंजर सीट पर... उसके बगल में।
उसका चेहरा... खुशी से चमक उठा।
उसकी आँखें... चमक रही थीं।
वो समझ गया... मैं तैयार हूँ।
वो रुका नहीं।
झुका... मेरी तरफ।
उसके होंठ मेरे होंठों के पास आए।
मैंने विरोध नहीं किया।
हमारे होंठ मिले।
पहला किस... बहुत धीमा... बहुत नरम।
फिर... गहरा।
बहुत लंबा... बहुत इंटेंस।
उसकी जीभ मेरी जीभ से मिली।
उसका स्वाद... बीड़ी का हल्का कड़वाहट... लेकिन वो सब... मुझे और पागल कर रहा था।
मैंने उसके गले में हाथ डाल दिया।
उसे और करीब खींचा।
हम... कुछ देर तक... ऐसे ही रहे।
किस करते हुए... एक-दूसरे के शरीर को महसूस करते हुए।
उसके हाथ मेरी चेस्ट पर थे—धीरे से मसलते हुए... मेरे निप्पल्स को उँगलियों से छूते हुए।
मैंने अपनी जीभ उसके मुँह में और गहराई से डाली।
उसकी जीभ मेरी जीभ से खेल रही थी।
स्वीट... गरम... बहुत इंटेंस।
उसका एक हाथ मेरी मेरी जींस पर।
उसने मेरी पुसी को जींस के ऊपर से रगड़ा।
हल्का-सा दबाव... सर्कल... फिर और दबाव।
मैं सिहर रही थी... कराह रही थी उसके मुँह में।
मेरा हाथ... उसकी पैंट की ज़िप पर।
नीचे की।
उसका लुंड बाहर आया—सख्त... गरम... फड़कता हुआ।
मैंने उसे पकड़ा।
उसकी स्किन... मेरी उँगलियों में।
ऊपर-नीचे... धीरे से... फिर तेज़।
सब कुछ... पैशन में।
बिना एक शब्द... बिना प्लानिंग... बस... वो पल... वो चाहत।
तभी... एक लंबा ट्रक का हॉर्न बजा।
बहुत तेज़... बहुत करीब।
ट्रक पास से गुज़रा।
मैंने महसूस किया... वो ड्राइवर हमें देख रहा था।
हम... गले लगे हुए... किस करते हुए... उसकी उँगलियाँ मेरी जींस पर... मेरा हाथ उसके लुंड पर।
ट्रक ड्राइवर ने हॉर्न मारा—शायद एक्साइटमेंट में... शायद मज़ाक में।
हम... झटके से अलग हुए।
किस टूटा।
हम दोनों... एक-दूसरे की तरफ देखते रहे।
साँसें तेज़।
चेहरा लाल।
फिर... मैंने हल्के से हँसकर कहा—
"तुमने... पेशाब के बाद... हिलाया नहीं... देखो... आखिरी बूँद... मेरे हाथ में लग गई... सब गंदा हो गया।"
वो मेरी तरफ देखा।
फिर... हँस पड़ा।
एक गहरी, थकी हुई, लेकिन खुश हँसी।
"तुम... कभी नहीं बदलती.. "
मैंने उसके गाल पर हल्का-सा थप्पड़ मारा—प्यार से।
ड्राइवर सीट पर बैठ गया।
वो थोड़ा थका हुआ लग रहा था... लेकिन उसकी आँखें अभी भी चमक रही थीं।
कार अभी भी ओपन थी—खिड़कियाँ नीचे... कोई कवर नहीं।
कभी भी कोई कार गुज़र सकती थी... कोई ट्रक... कोई लोकल... और सब देख सकता था।
ये... सेफ नहीं था।
लेकिन... उस पल में... मुझे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।
मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
साँसें तेज़ थीं।
शरीर... गरम... बहुत गरम।
मैं... दूसरे लेवल की हॉर्नीनेस पर थी।
सब कुछ... गंदा लगने के बजाय... मुझे किक दे रहा था।
मैंने अपना हाथ उसके सामने किया।
दो उँगलियाँ... अभी भी गीली... उसके पेशाब से... और थोड़ा सा मेरा स्पर्श।
मैंने उसे दिखाया।
वो बोतल उठाने लगा—साइड में रखी पानी की बोतल।
मेरे हाथ धोने के लिए।
लेकिन... मैंने उसे रोक लिया।
उसकी आँखों में देखा।
फिर... धीरे से... अपनी उँगलियाँ अपने मुँह के पास ले गई।
उसे देखते हुए... एक उँगली... जीभ पर रखी।
चाट ली।
नमकीन... गरम... थोड़ा कड़वा।
फिर... दूसरी उँगली... पूरी तरह जीभ से साफ़ की।
सब... मेरे मुँह में।
मुझे देखता रह गया।
उसकी आँखें चौड़ी हो गईं।
जैसे... वो किसी फिल्म में हो।
XXXXX
नेहा रुक गई।
उसकी उँगलियाँ मेरे लुंड पर रुक गईं।
वो मेरी तरफ मुड़ी
उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकी हुईं थीं—उत्सुक, थोड़ा डरी हुई, लेकिन बहुत गहरी।
वो कहानी में पहुँच चुकी थी उस पल तक... जहाँ उसने अंकल के पेशाब की आखिरी बूँदें अपने हाथ पर लीं... और फिर... उँगलियाँ मुँह में डालकर चाट लीं।
पहली बार... किसी मर्द का पेशाब... टेस्ट किया।
नमकीन... गरम... थोड़ा कड़वा।
वो रुकी।
मुझे देखा।
उसकी साँसें थोड़ी तेज़ थीं।
वो मेरी रिएक्शन का इंतज़ार कर रही थी।
मैं... बस उसे देखता रहा।
मेरा दिमाग... मान नहीं पा रहा था।
मेरी नेहा... इतनी क्लीन... इतनी सेक्सी... इतनी घरेलू... वो इतनी नास्ती... इतनी मेस्सी... इतनी बेबाक कैसे हो सकती है?
मैंने कभी सोचा भी नहीं था... वो ऐसा कुछ कर सकती है।
पेशाब... चाटना... बिना घबराए... बिना शर्माए।
और... वो सब... मुझे... बहुत एक्साइट कर रहा था।
मेरा लुंड... पहले से ही रॉक हार्ड था।
अब... और सख्त हो गया।
दर्द करने लगा।
फड़क रहा था... जैसे बाहर निकलने को बेताब हो।
नेहा ने मेरी आँखों में देखा।
उसने धीरे से पूछा—आवाज़ में थोड़ी हिचकिचाहट... थोड़ी डर—
"सैम... तुम... ठीक हो?
तुम्हें... बुरा लगा?"
मैंने उसके बालों में हाथ फेरा।
उसकी आँखों में देखा।
उसकी आवाज़ धीमी थी... लेकिन हर शब्द मेरे दिमाग में चाकू की तरह घुस रहा था।
वो बता रही थी... कैसे उसने बूढ़ा आदमी के लुंड को पकड़ा... कैसे हिलाया... कैसे आखिरी बूँदें दीवार पर गिराईं... कैसे उसका हाथ गीला हो गया...।
मेरा दिमाग... मान नहीं पा रहा था।
ये... नेहा?
मेरी नेहा?
जो घर में इतनी साफ-सुथरी... इतनी घरेलू... इतनी "ऑर्थोडॉक्स" लगती है... वो इतनी गंदी... इतनी मेस्सी... इतनी बेबाक हो सकती है?
उसने कभी... मेरे साथ ऐसा नहीं किया।
कभी मेरे लुंड को पेशाब करते हुए नहीं पकड़ा।
लेकिन... आज... वो सब बता रही है।
और... मैं... पागल हो रहा हूँ।
मेरा लुंड... रॉक हार्ड हो चुका था।
शॉर्ट्स में... दर्द करने लगा।
फड़क रहा था... जैसे बाहर निकलने को बेताब हो।
मैं... उसकी बातें सुनकर... और ज्यादा एक्साइटेड हो रहा था।
उसकी वो शरारती आवाज़... वो पुरानी यादों वाली मुस्कान... वो गंदी डिटेल्स... सब कुछ... मुझे पागल कर रहा था।
अचानक... सवाल मुँह से निकल गया—वो सवाल जो शुरुआत से दिमाग में घूम रहा था।
"नेहा... वो... उसका... मुझसे बड़ा था?"
वो एक पल के लिए रुक गई।
उसकी उँगलियाँ मेरे लुंड पर रुक गईं।
वो मेरी तरफ मुड़ी।
उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकीं।
फिर... वो धीरे से मुस्कुराई—एक प्यारी, समझदार मुस्कान।
"बेबी... ये कैसा सवाल है?"
उसकी आवाज़ में हल्की हिचकिचाहट थी।
वो जानती थी... मैं ये सवाल पूछूँगा।
वो जानती थी... ये सवाल मेरे मन में कितनी देर से घूम रहा है।
वो नहीं चाहती थी... मुझे हर्ट करना।
लेकिन... मैं... रोक नहीं पाया।
"बताओ... मैं जानना चाहता हूँ।
सब कुछ जानना चाहता हूँ।
प्लीज़... सच बताओ।"
वो मेरी आँखों में देखती रही।
एक लंबा पल।
फिर... धीरे से बोली—आवाज़ में बहुत प्यार... बहुत समझ।
"हाँ... वो बड़ा था।
मैसिव।
तुम जानते हो... पहाड़ी इलाके में... बहुत फिजिकल लेबर करना पड़ता है।
ट्रैवल एजेंसी... सुबह जल्दी उठना... भारी सामान उठाना... लंबी ड्राइविंग... सब कुछ।
उसका बदन... बहुत स्ट्रॉन्ग था।
और... वो... दिखता था।"
वो रुकी।
उसने मेरे गाल पर हाथ फेरा।
उसकी उँगलियाँ मेरे होंठों पर।
"लेकिन बेबी... ये तुम्हारी गलती नहीं है।
तुम... मेरे लिए परफेक्ट हो।
उसकी आवाज़ में... वो पिटी थी।
वो पिटी... जो मैंने पहले भी सुनी थी।
पिछले रिलेशनशिप्स में... कई बार।
जब लड़कियाँ... मेरे साइज़ के बारे में बात करती थीं... या तुलना करती थीं... वो पिटी वाली टोन।
"तुम अच्छे हो... साइज़ मैटर नहीं करता..."
ये शब्द... दिल को चीर देते थे।
मुझे पता था... वो मुझे हर्ट नहीं करना चाहती।
वो... सच में कोशिश कर रही थी... मुझे कंसोल करने की।
लेकिन... वो पिटी... वो समझ... वो "तुम्हारी गलती नहीं है" वाली फीलिंग... सब कुछ... मुझे अंदर से हर्ट कर रहा था।
मैंने चेहरा नहीं बदला।
मुस्कुराने की कोशिश की।
आँखें बंद नहीं कीं।
उसे देखता रहा।
लेकिन... अंदर... कुछ टूट रहा था।
थोड़ा सा... लेकिन बहुत गहरा।
उसकी उँगलियाँ अब मेरे बालों में धीरे-धीरे खेल रही थीं।
उसकी आवाज़ फिर से शुरू हुई—धीमी, लेकिन साफ़... जैसे वो सब कुछ फिर से जी रही हो।
"उस घटना के बाद... हम बहुत सावधान हो गए।
अंकल ने सख्ती से कहा—'ये सब खत्म।'
वो बहुत गुस्से में था... खुद पर... और थोड़ा मुझ पर भी।
कहा—'ये गलत है... हम दोनों के लिए बहुत बड़ा रिस्क है।
मेरा परिवार... तुम्हारा परिवार... हमारा समाज... सब कुछ बर्बाद हो सकता है।'
मैं... बहुत हर्ट हुई थी।
बहुत रोई थी।
रात को... अकेले में... बहुत रोई।
लेकिन... मैं समझ गई थी... इस रिलेशनशिप का कोई फ्यूचर नहीं है।
कभी नहीं था।
तो... मैंने भी... उसे मान लिया।"
वो रुकी।
उसकी साँसें थोड़ी भारी हो गईं।
फिर... जारी रखा—
"मैंने अपनी बेस्ट फ्रेंड से बात की।
डिटेल्स में नहीं... बस आइडिया।
कहा—'मुझे एक लड़का पसंद है... और... वो बड़ा है।'
वो बहुत गुस्सा हो गई।
मुझे डाँटा... जैसे कोई बड़ी बहन डाँटती है।
कहा—'पागल हो गई हो?
तुम्हारी उम्र में... ऐसे रिस्क मत लो।
तुम्हारा फ्यूचर... तुम्हारी पढ़ाई... तुम्हारी जिंदगी... सब बर्बाद हो जाएगा।
उसकी बातें... मेरे दिमाग को थोड़ा क्लियर कर गईं।
मैंने सोचा... शायद वो सही है।
तो... मैंने भी दूरी बना ली।
धीरे-धीरे... बातें कम हुईं।
फिर... बिल्कुल बंद हो गईं।
और... वो सब... खत्म हो गया।"
लेकिन... मैं... पूरी तरह खत्म नहीं कर पाई।
कभी-कभी... कार में... मैं उसके लुंड को पजामा के ऊपर से छू लेती थी।
मज़ाक में... शरारत में।
वो मुस्कुराता था... लेकिन रुकने को कहता था।
कभी... वो पेशाब करते हुए... मैं उसे देखती रहती थी।
उसकी आँखें... मेरी तरफ आतीं... और वो... शायद जानबूझकर... थोड़ा सा दिखाता था।
लेकिन... कभी आगे नहीं बढ़ा।
वो जानता था... ये छोटा शहर है।
एक छोटी सी अफवाह... जंगल की आग की तरह फैल जाती है।
हमारे लिए... बहुत बड़ा खतरा था।
तो... वो हमेशा रुक जाता था।
और... मैं भी... मजबूरन रुक जाती थी।"
मैंने एक पल के लिए रुककर सैम की आँखों में देखा।
उसकी आँखें... बहुत गहरी थीं।
वो सुन रहा था... बहुत ध्यान से।
मैंने उसके लुंड को थोड़ा और टाइट पकड़ा।
धीरे से सहलाया।
"फिर... मेरे एग्जाम हुए।
मैंने अच्छा किया।
सिलेक्शन हो गया।
कॉलेज शहर में शिफ्ट हो गया—बहुत दूर।
अंकल अब नहीं आता था।
कार पूल खत्म हो गया।
6 महीने बीत गए।
मैंने नए दोस्त बनाए।
नए लड़के... नए ग्रुप... नई ज़िंदगी।
लेकिन... किसी भी लड़के में... वो आकर्षण नहीं था।
कोई भी... वैसा नहीं था।
जैसे अंकल था।
उसकी वो इज्ज़त... वो कंट्रोल... वो प्यार... वो सब... मेरे दिमाग में रह गया।
कॉलेज के लड़के... बहुत फास्ट थे... बहुत जल्दी आगे बढ़ना चाहते थे।
मुझे... वो अच्छा नहीं लगता था।
छुट्टियाँ खत्म हो रही थीं।
मैं घर में बैग पैक कर रही थी।
पापा ने कैब बुक की थी—कॉलेज तक का सफर लंबा था, 5-6 घंटे।
मैंने सोचा... कोई लोकल ड्राइवर होगा।
बैग उठाया... बाहर निकली।
गेट पर कैब खड़ी थी।
ड्राइवर की तरफ देखा... और दिल एक झटके से धड़क गया।
अंकल।
8-9 महीने बाद... पहली बार।
वो वही था—वही चेहरा... वही आँखें... वही मुस्कान जो कभी मेरी साँसें रोक देती थी।
वो मुझे देखकर रुक गया।
उसकी आँखें भी चौड़ी हो गईं।
एक पल... हम दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।
मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़
पहले आधे घंटे... पूरी खामोशी।
शहर की सीमा पार हो गई थी।
घर की गलियाँ... बाज़ार... लोग... सब पीछे छूट गए थे।
अब सिर्फ़ हाईवे था... पेड़... और दूर-दूर तक फैली खामोशी।
मैं पिछली सीट पर बैठी थी।
शर्ट के बटन... एक खुले।
ड्राइव कर रहा था।
रियर व्यू मिरर में उसकी आँखें बार-बार मुझ पर टिक रही थीं।
वो देख रहा था—मेरी आँखें... मेरी स्माइल
मैं मुस्कुरा रही थी।
बहुत हल्की... बहुत जानबूझकर।
मैं जानती थी... वो क्या चाहता है।
मैं भी... जानती थी... मैं क्या चाहती हूँ।
लेकिन... साथ ही... ये गलत था।
मैंने इसे भुला दिया था।
7-8 महीने में... मैंने खुद को बहुत संभाल लिया था।
नई ज़िंदगी... नए दोस्त... नई पढ़ाई... सब अच्छा चल रहा था।
फिर से... ये सब शुरू करना... सब बर्बाद कर सकता था।
फिर... उसने सन्नाटा तोड़ा।
आवाज़ में वो पुरानी वाली गर्माहट... और थोड़ा सा डर।
"कैसी हो?"
मैंने हल्के से मुस्कुराकर जवाब दिया—
"गुड।"
वो रियर व्यू में मुझे देखता रहा।
फिर... मिरर को थोड़ा एडजस्ट किया।
अब... उसकी नज़र... मेरी चेस्ट पर थी।
शर्ट के खुले बटन से... मेरी चेस्ट की हल्की झलक।
वो बोला—आवाज़ में वो पुरानी वाली चाहत—
"तुम... बहुत अच्छी लग रही हो... डेवलप हो गई हो।"
मैंने नोटिस किया।
मिरर का एंगल... जानबूझकर बदला हुआ था।
वो मेरी चेस्ट देख रहा था।
मैंने मुस्कुराई।
पहली बार... वो खुद इनिशिएट कर रहा था।
शायद... शहर पीछे छूट गया था।
शायद... अब वो सोच रहा था... ये उसकी आखिरी चांस है।
शायद... अब वो डर कम था।
या... शायद... वो भी... उतना ही चाहता था... जितना मैं चाहती थी।
मैं पिछली सीट पर बैठी रही—स्कर्ट थोड़ी ऊपर, लेकिन पैर बंद।
मैंने जानबूझकर कोई रिस्पॉन्स नहीं दिया।
न मुस्कुराई... न बात की... न आँख मिलाई।
शायद... मैं खुद को समझा रही थी।
"ये गलत है... अब नहीं... अब सब ठीक चल रहा है... मत करो कोई सिली बिज़नेस।"
मैंने सोचा... अगर मैं इग्नोर करूँगी... तो वो भी कुछ नहीं बोलेगा।
रियर व्यू मिरर में मुझे देखता रहा।
उसकी आँखें... मेरी आँखों से मिलती रहीं... लेकिन मैंने नज़रें फेर लीं।
वो समझ गया था... मैं इंटरेस्ट नहीं दिखा रही।
न चिटचैट... न फ्लर्ट... न कुछ।
फिर... उसने कार साइड में रोकी।
एक सुनसान जगह... हाईवे के किनारे... कोई नहीं।
वो बाहर निकला।
कार के कोने में खड़ा हो गया।
ज़िप नीचे की।
लुंड बाहर निकाला।
पेशाब करने लगा।
पूरी तरह ओपन... मेरी तरफ।
वो जानता था... मैं देख रही हूँ।
रियर व्यू से... या सीधे खिड़की से।
ये... उसका आखिरी मास्टर स्ट्रोक था।
एक आखिरी कोशिश... मुझे तड़पाने की... मुझे याद दिलाने की... कि वो अभी भी वही है।
मैंने देखा।
उसका लुंड... बड़ा... सख्त... पेशाब करते हुए भी थोड़ा उभरा हुआ।
मेरी चूत... फिर से गीली हो गई।
बहुत गीली।
मैंने मुस्कुरा दिया—हल्का सा... लेकिन जानबूझकर।
वो पेशाब खत्म करके हाथ धोया।
बीड़ी सुलगाई।
एक कश लिया।
फिर... वापस ड्राइवर सीट पर आया।
और... सरप्राइज।
मैं... पहले से ही फ्रंट सीट पर थी।
पैसेंजर सीट पर... उसके बगल में।
उसका चेहरा... खुशी से चमक उठा।
उसकी आँखें... चमक रही थीं।
वो समझ गया... मैं तैयार हूँ।
वो रुका नहीं।
झुका... मेरी तरफ।
उसके होंठ मेरे होंठों के पास आए।
मैंने विरोध नहीं किया।
हमारे होंठ मिले।
पहला किस... बहुत धीमा... बहुत नरम।
फिर... गहरा।
बहुत लंबा... बहुत इंटेंस।
उसकी जीभ मेरी जीभ से मिली।
उसका स्वाद... बीड़ी का हल्का कड़वाहट... लेकिन वो सब... मुझे और पागल कर रहा था।
मैंने उसके गले में हाथ डाल दिया।
उसे और करीब खींचा।
हम... कुछ देर तक... ऐसे ही रहे।
किस करते हुए... एक-दूसरे के शरीर को महसूस करते हुए।
उसके हाथ मेरी चेस्ट पर थे—धीरे से मसलते हुए... मेरे निप्पल्स को उँगलियों से छूते हुए।
मैंने अपनी जीभ उसके मुँह में और गहराई से डाली।
उसकी जीभ मेरी जीभ से खेल रही थी।
स्वीट... गरम... बहुत इंटेंस।
उसका एक हाथ मेरी मेरी जींस पर।
उसने मेरी पुसी को जींस के ऊपर से रगड़ा।
हल्का-सा दबाव... सर्कल... फिर और दबाव।
मैं सिहर रही थी... कराह रही थी उसके मुँह में।
मेरा हाथ... उसकी पैंट की ज़िप पर।
नीचे की।
उसका लुंड बाहर आया—सख्त... गरम... फड़कता हुआ।
मैंने उसे पकड़ा।
उसकी स्किन... मेरी उँगलियों में।
ऊपर-नीचे... धीरे से... फिर तेज़।
सब कुछ... पैशन में।
बिना एक शब्द... बिना प्लानिंग... बस... वो पल... वो चाहत।
तभी... एक लंबा ट्रक का हॉर्न बजा।
बहुत तेज़... बहुत करीब।
ट्रक पास से गुज़रा।
मैंने महसूस किया... वो ड्राइवर हमें देख रहा था।
हम... गले लगे हुए... किस करते हुए... उसकी उँगलियाँ मेरी जींस पर... मेरा हाथ उसके लुंड पर।
ट्रक ड्राइवर ने हॉर्न मारा—शायद एक्साइटमेंट में... शायद मज़ाक में।
हम... झटके से अलग हुए।
किस टूटा।
हम दोनों... एक-दूसरे की तरफ देखते रहे।
साँसें तेज़।
चेहरा लाल।
फिर... मैंने हल्के से हँसकर कहा—
"तुमने... पेशाब के बाद... हिलाया नहीं... देखो... आखिरी बूँद... मेरे हाथ में लग गई... सब गंदा हो गया।"
वो मेरी तरफ देखा।
फिर... हँस पड़ा।
एक गहरी, थकी हुई, लेकिन खुश हँसी।
"तुम... कभी नहीं बदलती.. "
मैंने उसके गाल पर हल्का-सा थप्पड़ मारा—प्यार से।
ड्राइवर सीट पर बैठ गया।
वो थोड़ा थका हुआ लग रहा था... लेकिन उसकी आँखें अभी भी चमक रही थीं।
कार अभी भी ओपन थी—खिड़कियाँ नीचे... कोई कवर नहीं।
कभी भी कोई कार गुज़र सकती थी... कोई ट्रक... कोई लोकल... और सब देख सकता था।
ये... सेफ नहीं था।
लेकिन... उस पल में... मुझे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।
मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
साँसें तेज़ थीं।
शरीर... गरम... बहुत गरम।
मैं... दूसरे लेवल की हॉर्नीनेस पर थी।
सब कुछ... गंदा लगने के बजाय... मुझे किक दे रहा था।
मैंने अपना हाथ उसके सामने किया।
दो उँगलियाँ... अभी भी गीली... उसके पेशाब से... और थोड़ा सा मेरा स्पर्श।
मैंने उसे दिखाया।
वो बोतल उठाने लगा—साइड में रखी पानी की बोतल।
मेरे हाथ धोने के लिए।
लेकिन... मैंने उसे रोक लिया।
उसकी आँखों में देखा।
फिर... धीरे से... अपनी उँगलियाँ अपने मुँह के पास ले गई।
उसे देखते हुए... एक उँगली... जीभ पर रखी।
चाट ली।
नमकीन... गरम... थोड़ा कड़वा।
फिर... दूसरी उँगली... पूरी तरह जीभ से साफ़ की।
सब... मेरे मुँह में।
मुझे देखता रह गया।
उसकी आँखें चौड़ी हो गईं।
जैसे... वो किसी फिल्म में हो।
XXXXX
नेहा रुक गई।
उसकी उँगलियाँ मेरे लुंड पर रुक गईं।
वो मेरी तरफ मुड़ी
उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकी हुईं थीं—उत्सुक, थोड़ा डरी हुई, लेकिन बहुत गहरी।
वो कहानी में पहुँच चुकी थी उस पल तक... जहाँ उसने अंकल के पेशाब की आखिरी बूँदें अपने हाथ पर लीं... और फिर... उँगलियाँ मुँह में डालकर चाट लीं।
पहली बार... किसी मर्द का पेशाब... टेस्ट किया।
नमकीन... गरम... थोड़ा कड़वा।
वो रुकी।
मुझे देखा।
उसकी साँसें थोड़ी तेज़ थीं।
वो मेरी रिएक्शन का इंतज़ार कर रही थी।
मैं... बस उसे देखता रहा।
मेरा दिमाग... मान नहीं पा रहा था।
मेरी नेहा... इतनी क्लीन... इतनी सेक्सी... इतनी घरेलू... वो इतनी नास्ती... इतनी मेस्सी... इतनी बेबाक कैसे हो सकती है?
मैंने कभी सोचा भी नहीं था... वो ऐसा कुछ कर सकती है।
पेशाब... चाटना... बिना घबराए... बिना शर्माए।
और... वो सब... मुझे... बहुत एक्साइट कर रहा था।
मेरा लुंड... पहले से ही रॉक हार्ड था।
अब... और सख्त हो गया।
दर्द करने लगा।
फड़क रहा था... जैसे बाहर निकलने को बेताब हो।
नेहा ने मेरी आँखों में देखा।
उसने धीरे से पूछा—आवाज़ में थोड़ी हिचकिचाहट... थोड़ी डर—
"सैम... तुम... ठीक हो?
तुम्हें... बुरा लगा?"
मैंने उसके बालों में हाथ फेरा।
उसकी आँखों में देखा।


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