01-04-2026, 10:33 PM
(This post was last modified: 02-04-2026, 08:10 PM by The_Writer. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
रणधीर बाबू की करतूतें और एक प्रतिद्वंदी का उदय!
करीब १०-१२ दिन बीत गए हैं.
पिछली घटना को हुए.....
आशा की नौकरी लग गई है कॉलेज में --- नॉन टीचिंग स्टाफ कम रिजर्व्ड टीचर के रूप में --- कभी कोई टीचर नहीं आ पाए तो उसके जगह आशा क्लास ले लेती. हालाँकि रणधीर बाबू के पास आप्शन तो था, आशा को नर्सरी या जूनियर क्लासेज में टीचर नियुक्त करने का पर इससे होता यह कि वह आशा को हर वक़्त अपने पास नहीं पाता. नॉन टीचिंग स्टाफ बनाने से वह जब चाहे आशा को अपने कमरे में बुला सकता है और जो जी में आए कर सकता है. आशा तो वैसे भी पहले ही सरेंडर कर चुकी है --- मौखिक और लिखित --- दोनों रूपों में; --- इसलिए उसकी ओर से रणधीर बाबू को रत्ती भर की चिंता नहीं थी और आशा के अलावा जितनी भी लेडी टीचर्स हैं कॉलेज में; उन सबको रणधीर बाबू बहुत अच्छे से महीनों और सालों तक भोग चुके हैं! रणधीर बाबू के कॉलेज में काम करना अपने आप में एक गर्व की बात है जो हर किसी के भाग्य में नहीं होता. इसके अलावा भी, रणधीर बाबू उन सबको समय - समय पर इन्क्रीमेंट, हॉलीडेज, और दूसरे सुविधाएँ देते रहते हैं.
इसलिए, कोई भी बात चाहे कितनी भी गंभीर क्यों न हो, इतनी सुविधाओं वाले कॉलेज को छोड़कर जाना किसी से बनता नहीं था. साथ ही, रणधीर बाबू जैसे व्यक्ति का हाथ सिर पर होने से, दैनिक जीवन में भी किसी को अधिकांश समय कभी किसी चीज़ / बात पर झँझट नहीं होती थी.
शहर के पुरुष शिक्षकों के बीच रणधीर बाबू का अच्छा-खासा रसूख है, जिसका मुख्य कारण उनका मज़बूत नेटवर्क है. स्थानीय गुंडों से लेकर ऊँचे रसूख वाले मंत्रियों, सिक्युरिटी अधिकारियों और नामी वकीलों के साथ उनका उठना-बैठना जगज़ाहिर है. समाज में उनकी छवि एक बेहद प्रभावशाली और संपन्न व्यवसायी की है, लेकिन पर्दे के पीछे उन्हें एक ऐसे ज़िद्दी और रईस इंसान के रूप में जाना जाता है जो अपने हित साधने के लिए किसी भी हद तक जाने का माद्दा रखते हैं.
खुद को हरेक दिशा, हरेक कोण से पूरी तरह सुरक्षित कर रखे हैं ये रणधीर बाबू….
आम इंसान जिस कानून से डरता है,
रणधीर बाबू का उसी के साथ उठना बैठना है!
जो उसका (रणधीर बाबू) साथ दिया --- उसका वारा न्यारा!
और विरोधियों का हाल ऐसा था कि उनके मन में विरोध का विचार आने से पहले ही रणधीर बाबू की पहुँच और ताकत का एहसास उन्हें चुप करा देता था. अगर किसी ने भूल से कदम उठा लिया, तो उसकी आवाज़ और वजूद दोनों को इस तरह ख़त्म कर दिया जाता था कि वह हमेशा के लिए एक मिसाल बन जाए.
लेकिन उनका व्यक्तित्व सिर्फ़ खौफ़ तक सीमित नहीं था। रणधीर बाबू अपने वफादारों के लिए एक अभेद्य ढाल थे. उनके खास लोगों को कभी निराशा नहीं मिलती थी— चाहे मामला किसी बड़े अस्पताल का ख़र्चा उठाने का हो, नौकरी दिलवाने का, कहीं एडमिशन करवाने का, या फिर तत्काल नगद (कैश) सहायता का.
वह जानते थे कि वफ़ादारी कीमत माँगती है, और वह उस कीमत को खुले हाथ से चुकाते थे. अगर किसी शागिर्द ने किसी ज़रूरी काम के लिए एक लाख रुपए की माँग की, तो रणधीर बाबू बिना किसी सवाल के उसे दो लाख थमा देते थे— ऐसी दरियादिली जिसमें हिसाब-किताब की गुंजाइश नहीं होती थी. उनके किसी भी ख़ास आदमी के परिवार पर अगर कोई संकट आता, जैसे कि अस्पताल का बिल, तो रणधीर बाबू को पता चलते ही वह डॉक्टर के बिल से लेकर दवाईयों के बिल तक चुपचाप चुका देते थे, ताकि उनके 'अपने' लोग हमेशा उन पर पूरी तरह निर्भर रहें.
रणधीर बाबू को आलीशान पार्टियों का बड़ा शौक है.
अक्सर उनके यहाँ महफ़िलें सजती रहती हैं—और ये कोई आम पार्टियाँ नहीं होतीं, बल्कि शहर के रसूखदारों का जमावड़ा होती हैं.
इन महफ़िलों में कानून के रक्षक हों या सत्ता के गलियारों में बैठने वाले मंत्री और नेता, हर कोई अपनी हाजिरी लगाना अपना सौभाग्य समझता है.
वहाँ शराब, शबाब, संगीत और लजीज पकवानों का दौर बेखौफ चलता है.
इन सब आयोजनों का खर्च जब रणधीर बाबू की जेब से निकलता है, तो वह आँकड़ा हजारों में नहीं होता.
खर्च लाखों में पहुँच जाता है, जिसे रणधीर बाबू बड़े इत्मीनान और शान से चुकाते हैं.
अब जिस शख्स के हाथ शासन और प्रशासन की नब्ज पर हों, उसे भला किसका और किस बात का डर होगा?
------
इन्हीं दस - बारह दिनों में कई बार छू चुके हैं आशा को रणधीर बाबू --- और जाहिर ही है की केवल छूने तक खुद को सीमित नहीं रखा है उन्होंने --- अपने रूम में बुला कर बेरहमी से चूचियों को मसलना, देर तक निप्पल को चूसना, नर्म, फ्लेवर वाले लिपस्टिक लगे होंठों को चूसते रहना --- टेबल के नीचे घुटनों के बल बैठा कर लंड चुसवाना.... ये सब करवाए – किए बिना तो जैसे रणधीर बाबू को न दिन में चैन मिलता और न ही रातों को नींद आती.
हद तो तब होती जब रणधीर बाबू घंटों आशा को अपनी गोद में बैठाए, मेज़ पर रखे ज़रूरी फाइल्स के काम निपटाते और बीच – बीच में दूसरे हाथ से ब्लाउज़ के सारे हुक खोल कर उसके नर्म, गदराये, बड़ी - बड़ी चूचियों को पल्लू के नीचे से दम भर दबाते रहते.
'उनका मानना था कि इससे उनको अपना स्ट्रेस कम करने में मदद मिलती है.'
और अगर इतने में कोई लेडी स्टाफ़ / लेडी टीचर किसी काम से कमरे में आने के लिए बाहर से नॉक करती तो आशा को बिना गोद से उतारे ही स्टाफ़/टीचर को अंदर आने की परमिशन देते और उनके सामने भी आशा की चूचियों के साथ - साथ जिस्म के दूसरे हिस्सों से खेलते रहते.
बेचारी लेडी स्टाफ़ मारे शर्म के कुछ कह नहीं पाती और…..
यही हालत आशा की भी होती.
शर्म – ओ – ह्या से उसका चेहरा लाल होना और हल्के दर्द में एक तेज़; लेकिन धीमी सिसकारी लेना हवसी बुढ़ऊ को बहुत अच्छा लगता है और यही कारण है कि जब आशा को गोद में, बाएँ जांघ पर बैठा कर बाएँ हाथ से --- पल्लू के नीचे से --- बाईं चूची के साथ खेलते हुए मेज़ पर रखी फ़ाइलों पर दस्तख़त या कुछ और कर रहे होते और अगर तभी कोई लेडी स्टाफ़ आ जाए रूम में तो उसके सामने आ कर खड़े या बैठते ही बुढ़ऊ अपनी
बाएँ हाथ की तर्जनी अंगुली और अँगूठे को अपनी थूक से थोड़ा भिगोते और दोबारा पल्लू के नीचे ले जाकर उसकी बायीं चूची के निप्पल को ट्रेस करते और निप्पल हाथ में आते ही अंगुली और अंगूठे से उसे पकड़ कर ज़ोर से मसलते हुए आगे की ओर खींचते ---
और हर बार ऐसा करते ही,
आशा भी दर्द के मारे ज़ोर से कराह उठती….
शुरू - शुरू में तो लेडी स्टाफ़ चौंक जाती कि ‘अरे, क्या हुआ?!’
पर मामला समझ में आते ही शर्म वाली हँसी रोकने के असफ़ल प्रयास में बगलें झाँकने लगती….
पर धीरे - धीरे ये आम बात हो गई….
रोज़ ही कोई न कोई लेडी स्टाफ़ रूम में आती,
रोज़ ही आशा, रणधीर बाबू की गोद में बैठी हुई पाई जाती,
और रोज़ ही लेडी स्टाफ़ के सामने ही,
रणधीर बाबू, तर्जनी ऊँगली और अंगूठे पर थूक लगाते ---
और,
फिर, उसी ऊँगली और अंगूठे के बीच दबा कर निप्पल को मसलते हुए आगे की ओर खींचने लगते,
और;
हमेशा की ही तरह, हर बार आशा दर्द से एक मीठी आर्तनाद कर उठती !
और फ़िर,
दोनों ही --- लेडी स्टाफ़ --- जो कोई भी हो --- वो और आशा मारे शर्म के एक दूसरे से आँखें मिलाने से तब तक बचने की कोशिश करती जब तक वो लेडी स्टाफ़ वहीं पास किसी कुर्सी पे बैठ कर अपने काम खत्म कर रही होती.
उसके जाते ही आशा थोड़ा गुस्सा और थोड़ी शिकायत के मिले - जुले भाव चेहरे पे लिए रणधीर बाबू की ओर देखती और रणधीर बाबू एक गन्दी हँसी हँसते हुए उसकी चूचियों से खेलते हुए उसके चेहरे और होंठों को चूमने – चूसने लगते और कभी बहुत मूड में आ गए तो डीप बैक से झाँकती उसकी पीठ पर काट देते!
धीरे - धीरे कुछ लेडी टीचर को यह बात खटकने लगी की हालाँकि रणधीर बाबू ने उन लोगों के साथ भी काफ़ी मौज किये हैं; पर आख़िर ये आशा नाम की बला में ऐसी क्या ख़ास बात है जो रणधीर बाबू हमेशा --- सुबह – शाम उसके साथ चिपके रहते हैं.
उसकी खूबसूरती में तो खैर कोई शक था ही नहीं,
ऊपर से सलीके से ढला हुआ उसका व्यक्तित्व किसी को भी सम्मोहित कर ले…
यही वो आकर्षण था जो रणधीर बाबू जैसे रसूखदार आदमी को भी कमजोर कर सकता था—वही रणधीर, जो अब तक लोगों पर हुकूमत करना जानते थे, आज खुद किसी के वशीभूत होने की कगार पर थे.
आखिर जो शख्स दूसरों को अपनी उंगलियों पर नचाने का माहिर हो, वह इस एक औरत के पीछे अपना वजूद भुलाए क्यों फिर रहा था?
निश्चित ही इसके पीछे कोई गहरा राज था—पर वह था क्या?
वहाँ मौजूद महिला अध्यापिकाओं के लिए यह पहेली सुलझाना नामुमकिन था. रणधीर बाबू, जो अब तक हर सुंदर चेहरे को बस एक जीत की तरह देखते आए थे, पहली बार आशा के व्यक्तित्व के सामने हार मान चुके थे. ऐसा लगता था जैसे उस एक के लिए उन्होंने अपनी पूरी दुनिया दांव पर लगा दी हो.
आशा के कॉलेज ज्वाइन करने के बाद से ही शायद ही रणधीर बाबू ने किसी और औरत के बारे में शायद ही सोचा होगा --- ये और बात है कि रणधीर बाबू के द्वारा कॉलेज के गैलरी या लॉबी में चलते वक़्त कोई लेडी टीचर मिल जाए तो उसके होंठों पर किस करना --- या बूब्स मसल देना या फ़िर पिछवाड़े पर ‘ठास !’ से एक थप्पड़ रसीद देना; ये सब बहुत कॉमन था और चलता ही रहता था और आगे भी न जाने कितने ही दिनों तक चलता रहेगा.
उन्हीं टीचर में एक है मिसेस शालिनी --- कॉलेज में बहुत पहले से टीचर पोस्ट पर पोस्टेड है, पर उम्र में आशा से छोटी है --- चौंतीस साल की --- चूचियाँ उसकी आशा जैसी तो नहीं पर फिर भी अच्छी है.--- गोल पिछवाड़ा --- आशा के तुलना में पतली कमर --- उसके जैसी दूध सी गोरी भी नहीं पर रंग फ़िर भी साफ़ है --- दोनों गालों पर दो-तीन पिम्पल्स हैं --- अधिकांश वो सलवार कुर्ती ही पहनती है --- कुछ ख़ास मौकों पर ही साड़ी पहनना होता है उसका.
शालिनी को यह बात खटक रही थी कि रणधीर बाबू का ध्यान अब उससे हटकर कहीं और जा रहा था, जबकि अब तक वह उनकी ख़ास हुआ करती थी.
उस रंगीन मिज़ाज बुड्ढे से उसे किसी तरह के प्रेम की कोई उम्मीद नहीं थी, न ही कभी रखी थी.
पर जाने क्यों, रणधीर बाबू की यह बेरुखी उसे भीतर से बेचैन कर गई थी। यह किसी और के लिए नहीं, बल्कि अपनी अहमियत के कम होने का डर था.
आशा से उसे कोई लेना-देना नहीं था, पर अगर रणधीर बाबू का ध्यान हमेशा के लिए आशा पर टिक गया, तो शालिनी का क्या होगा?
उसने तुरंत फैसला किया: वह धीरे-धीरे आशा के करीब आएगी, उसके कमज़ोर रगों को तलाशेगी और उन्हें मोहरे की तरह इस्तेमाल करेगी.
उसका लक्ष्य साफ़ था—या तो आशा को कॉलेज से हटाकर किनारे लगा दे, या फिर किसी भी कीमत पर रणधीर बाबू के दिल-ओ-दिमाग में अपनी जगह वापस बना ले.
जारी है.....
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करीब १०-१२ दिन बीत गए हैं.
पिछली घटना को हुए.....
आशा की नौकरी लग गई है कॉलेज में --- नॉन टीचिंग स्टाफ कम रिजर्व्ड टीचर के रूप में --- कभी कोई टीचर नहीं आ पाए तो उसके जगह आशा क्लास ले लेती. हालाँकि रणधीर बाबू के पास आप्शन तो था, आशा को नर्सरी या जूनियर क्लासेज में टीचर नियुक्त करने का पर इससे होता यह कि वह आशा को हर वक़्त अपने पास नहीं पाता. नॉन टीचिंग स्टाफ बनाने से वह जब चाहे आशा को अपने कमरे में बुला सकता है और जो जी में आए कर सकता है. आशा तो वैसे भी पहले ही सरेंडर कर चुकी है --- मौखिक और लिखित --- दोनों रूपों में; --- इसलिए उसकी ओर से रणधीर बाबू को रत्ती भर की चिंता नहीं थी और आशा के अलावा जितनी भी लेडी टीचर्स हैं कॉलेज में; उन सबको रणधीर बाबू बहुत अच्छे से महीनों और सालों तक भोग चुके हैं! रणधीर बाबू के कॉलेज में काम करना अपने आप में एक गर्व की बात है जो हर किसी के भाग्य में नहीं होता. इसके अलावा भी, रणधीर बाबू उन सबको समय - समय पर इन्क्रीमेंट, हॉलीडेज, और दूसरे सुविधाएँ देते रहते हैं.
इसलिए, कोई भी बात चाहे कितनी भी गंभीर क्यों न हो, इतनी सुविधाओं वाले कॉलेज को छोड़कर जाना किसी से बनता नहीं था. साथ ही, रणधीर बाबू जैसे व्यक्ति का हाथ सिर पर होने से, दैनिक जीवन में भी किसी को अधिकांश समय कभी किसी चीज़ / बात पर झँझट नहीं होती थी.
शहर के पुरुष शिक्षकों के बीच रणधीर बाबू का अच्छा-खासा रसूख है, जिसका मुख्य कारण उनका मज़बूत नेटवर्क है. स्थानीय गुंडों से लेकर ऊँचे रसूख वाले मंत्रियों, सिक्युरिटी अधिकारियों और नामी वकीलों के साथ उनका उठना-बैठना जगज़ाहिर है. समाज में उनकी छवि एक बेहद प्रभावशाली और संपन्न व्यवसायी की है, लेकिन पर्दे के पीछे उन्हें एक ऐसे ज़िद्दी और रईस इंसान के रूप में जाना जाता है जो अपने हित साधने के लिए किसी भी हद तक जाने का माद्दा रखते हैं.
खुद को हरेक दिशा, हरेक कोण से पूरी तरह सुरक्षित कर रखे हैं ये रणधीर बाबू….
आम इंसान जिस कानून से डरता है,
रणधीर बाबू का उसी के साथ उठना बैठना है!
जो उसका (रणधीर बाबू) साथ दिया --- उसका वारा न्यारा!
और विरोधियों का हाल ऐसा था कि उनके मन में विरोध का विचार आने से पहले ही रणधीर बाबू की पहुँच और ताकत का एहसास उन्हें चुप करा देता था. अगर किसी ने भूल से कदम उठा लिया, तो उसकी आवाज़ और वजूद दोनों को इस तरह ख़त्म कर दिया जाता था कि वह हमेशा के लिए एक मिसाल बन जाए.
लेकिन उनका व्यक्तित्व सिर्फ़ खौफ़ तक सीमित नहीं था। रणधीर बाबू अपने वफादारों के लिए एक अभेद्य ढाल थे. उनके खास लोगों को कभी निराशा नहीं मिलती थी— चाहे मामला किसी बड़े अस्पताल का ख़र्चा उठाने का हो, नौकरी दिलवाने का, कहीं एडमिशन करवाने का, या फिर तत्काल नगद (कैश) सहायता का.
वह जानते थे कि वफ़ादारी कीमत माँगती है, और वह उस कीमत को खुले हाथ से चुकाते थे. अगर किसी शागिर्द ने किसी ज़रूरी काम के लिए एक लाख रुपए की माँग की, तो रणधीर बाबू बिना किसी सवाल के उसे दो लाख थमा देते थे— ऐसी दरियादिली जिसमें हिसाब-किताब की गुंजाइश नहीं होती थी. उनके किसी भी ख़ास आदमी के परिवार पर अगर कोई संकट आता, जैसे कि अस्पताल का बिल, तो रणधीर बाबू को पता चलते ही वह डॉक्टर के बिल से लेकर दवाईयों के बिल तक चुपचाप चुका देते थे, ताकि उनके 'अपने' लोग हमेशा उन पर पूरी तरह निर्भर रहें.
रणधीर बाबू को आलीशान पार्टियों का बड़ा शौक है.
अक्सर उनके यहाँ महफ़िलें सजती रहती हैं—और ये कोई आम पार्टियाँ नहीं होतीं, बल्कि शहर के रसूखदारों का जमावड़ा होती हैं.
इन महफ़िलों में कानून के रक्षक हों या सत्ता के गलियारों में बैठने वाले मंत्री और नेता, हर कोई अपनी हाजिरी लगाना अपना सौभाग्य समझता है.
वहाँ शराब, शबाब, संगीत और लजीज पकवानों का दौर बेखौफ चलता है.
इन सब आयोजनों का खर्च जब रणधीर बाबू की जेब से निकलता है, तो वह आँकड़ा हजारों में नहीं होता.
खर्च लाखों में पहुँच जाता है, जिसे रणधीर बाबू बड़े इत्मीनान और शान से चुकाते हैं.
अब जिस शख्स के हाथ शासन और प्रशासन की नब्ज पर हों, उसे भला किसका और किस बात का डर होगा?
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इन्हीं दस - बारह दिनों में कई बार छू चुके हैं आशा को रणधीर बाबू --- और जाहिर ही है की केवल छूने तक खुद को सीमित नहीं रखा है उन्होंने --- अपने रूम में बुला कर बेरहमी से चूचियों को मसलना, देर तक निप्पल को चूसना, नर्म, फ्लेवर वाले लिपस्टिक लगे होंठों को चूसते रहना --- टेबल के नीचे घुटनों के बल बैठा कर लंड चुसवाना.... ये सब करवाए – किए बिना तो जैसे रणधीर बाबू को न दिन में चैन मिलता और न ही रातों को नींद आती.
हद तो तब होती जब रणधीर बाबू घंटों आशा को अपनी गोद में बैठाए, मेज़ पर रखे ज़रूरी फाइल्स के काम निपटाते और बीच – बीच में दूसरे हाथ से ब्लाउज़ के सारे हुक खोल कर उसके नर्म, गदराये, बड़ी - बड़ी चूचियों को पल्लू के नीचे से दम भर दबाते रहते.
'उनका मानना था कि इससे उनको अपना स्ट्रेस कम करने में मदद मिलती है.'
और अगर इतने में कोई लेडी स्टाफ़ / लेडी टीचर किसी काम से कमरे में आने के लिए बाहर से नॉक करती तो आशा को बिना गोद से उतारे ही स्टाफ़/टीचर को अंदर आने की परमिशन देते और उनके सामने भी आशा की चूचियों के साथ - साथ जिस्म के दूसरे हिस्सों से खेलते रहते.
बेचारी लेडी स्टाफ़ मारे शर्म के कुछ कह नहीं पाती और…..
यही हालत आशा की भी होती.
शर्म – ओ – ह्या से उसका चेहरा लाल होना और हल्के दर्द में एक तेज़; लेकिन धीमी सिसकारी लेना हवसी बुढ़ऊ को बहुत अच्छा लगता है और यही कारण है कि जब आशा को गोद में, बाएँ जांघ पर बैठा कर बाएँ हाथ से --- पल्लू के नीचे से --- बाईं चूची के साथ खेलते हुए मेज़ पर रखी फ़ाइलों पर दस्तख़त या कुछ और कर रहे होते और अगर तभी कोई लेडी स्टाफ़ आ जाए रूम में तो उसके सामने आ कर खड़े या बैठते ही बुढ़ऊ अपनी
बाएँ हाथ की तर्जनी अंगुली और अँगूठे को अपनी थूक से थोड़ा भिगोते और दोबारा पल्लू के नीचे ले जाकर उसकी बायीं चूची के निप्पल को ट्रेस करते और निप्पल हाथ में आते ही अंगुली और अंगूठे से उसे पकड़ कर ज़ोर से मसलते हुए आगे की ओर खींचते ---
और हर बार ऐसा करते ही,
आशा भी दर्द के मारे ज़ोर से कराह उठती….
शुरू - शुरू में तो लेडी स्टाफ़ चौंक जाती कि ‘अरे, क्या हुआ?!’
पर मामला समझ में आते ही शर्म वाली हँसी रोकने के असफ़ल प्रयास में बगलें झाँकने लगती….
पर धीरे - धीरे ये आम बात हो गई….
रोज़ ही कोई न कोई लेडी स्टाफ़ रूम में आती,
रोज़ ही आशा, रणधीर बाबू की गोद में बैठी हुई पाई जाती,
और रोज़ ही लेडी स्टाफ़ के सामने ही,
रणधीर बाबू, तर्जनी ऊँगली और अंगूठे पर थूक लगाते ---
और,
फिर, उसी ऊँगली और अंगूठे के बीच दबा कर निप्पल को मसलते हुए आगे की ओर खींचने लगते,
और;
हमेशा की ही तरह, हर बार आशा दर्द से एक मीठी आर्तनाद कर उठती !
और फ़िर,
दोनों ही --- लेडी स्टाफ़ --- जो कोई भी हो --- वो और आशा मारे शर्म के एक दूसरे से आँखें मिलाने से तब तक बचने की कोशिश करती जब तक वो लेडी स्टाफ़ वहीं पास किसी कुर्सी पे बैठ कर अपने काम खत्म कर रही होती.
उसके जाते ही आशा थोड़ा गुस्सा और थोड़ी शिकायत के मिले - जुले भाव चेहरे पे लिए रणधीर बाबू की ओर देखती और रणधीर बाबू एक गन्दी हँसी हँसते हुए उसकी चूचियों से खेलते हुए उसके चेहरे और होंठों को चूमने – चूसने लगते और कभी बहुत मूड में आ गए तो डीप बैक से झाँकती उसकी पीठ पर काट देते!
धीरे - धीरे कुछ लेडी टीचर को यह बात खटकने लगी की हालाँकि रणधीर बाबू ने उन लोगों के साथ भी काफ़ी मौज किये हैं; पर आख़िर ये आशा नाम की बला में ऐसी क्या ख़ास बात है जो रणधीर बाबू हमेशा --- सुबह – शाम उसके साथ चिपके रहते हैं.
उसकी खूबसूरती में तो खैर कोई शक था ही नहीं,
ऊपर से सलीके से ढला हुआ उसका व्यक्तित्व किसी को भी सम्मोहित कर ले…
यही वो आकर्षण था जो रणधीर बाबू जैसे रसूखदार आदमी को भी कमजोर कर सकता था—वही रणधीर, जो अब तक लोगों पर हुकूमत करना जानते थे, आज खुद किसी के वशीभूत होने की कगार पर थे.
आखिर जो शख्स दूसरों को अपनी उंगलियों पर नचाने का माहिर हो, वह इस एक औरत के पीछे अपना वजूद भुलाए क्यों फिर रहा था?
निश्चित ही इसके पीछे कोई गहरा राज था—पर वह था क्या?
वहाँ मौजूद महिला अध्यापिकाओं के लिए यह पहेली सुलझाना नामुमकिन था. रणधीर बाबू, जो अब तक हर सुंदर चेहरे को बस एक जीत की तरह देखते आए थे, पहली बार आशा के व्यक्तित्व के सामने हार मान चुके थे. ऐसा लगता था जैसे उस एक के लिए उन्होंने अपनी पूरी दुनिया दांव पर लगा दी हो.
आशा के कॉलेज ज्वाइन करने के बाद से ही शायद ही रणधीर बाबू ने किसी और औरत के बारे में शायद ही सोचा होगा --- ये और बात है कि रणधीर बाबू के द्वारा कॉलेज के गैलरी या लॉबी में चलते वक़्त कोई लेडी टीचर मिल जाए तो उसके होंठों पर किस करना --- या बूब्स मसल देना या फ़िर पिछवाड़े पर ‘ठास !’ से एक थप्पड़ रसीद देना; ये सब बहुत कॉमन था और चलता ही रहता था और आगे भी न जाने कितने ही दिनों तक चलता रहेगा.
उन्हीं टीचर में एक है मिसेस शालिनी --- कॉलेज में बहुत पहले से टीचर पोस्ट पर पोस्टेड है, पर उम्र में आशा से छोटी है --- चौंतीस साल की --- चूचियाँ उसकी आशा जैसी तो नहीं पर फिर भी अच्छी है.--- गोल पिछवाड़ा --- आशा के तुलना में पतली कमर --- उसके जैसी दूध सी गोरी भी नहीं पर रंग फ़िर भी साफ़ है --- दोनों गालों पर दो-तीन पिम्पल्स हैं --- अधिकांश वो सलवार कुर्ती ही पहनती है --- कुछ ख़ास मौकों पर ही साड़ी पहनना होता है उसका.
शालिनी को यह बात खटक रही थी कि रणधीर बाबू का ध्यान अब उससे हटकर कहीं और जा रहा था, जबकि अब तक वह उनकी ख़ास हुआ करती थी.
उस रंगीन मिज़ाज बुड्ढे से उसे किसी तरह के प्रेम की कोई उम्मीद नहीं थी, न ही कभी रखी थी.
पर जाने क्यों, रणधीर बाबू की यह बेरुखी उसे भीतर से बेचैन कर गई थी। यह किसी और के लिए नहीं, बल्कि अपनी अहमियत के कम होने का डर था.
आशा से उसे कोई लेना-देना नहीं था, पर अगर रणधीर बाबू का ध्यान हमेशा के लिए आशा पर टिक गया, तो शालिनी का क्या होगा?
उसने तुरंत फैसला किया: वह धीरे-धीरे आशा के करीब आएगी, उसके कमज़ोर रगों को तलाशेगी और उन्हें मोहरे की तरह इस्तेमाल करेगी.
उसका लक्ष्य साफ़ था—या तो आशा को कॉलेज से हटाकर किनारे लगा दे, या फिर किसी भी कीमत पर रणधीर बाबू के दिल-ओ-दिमाग में अपनी जगह वापस बना ले.
जारी है.....
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