Today, 06:39 AM
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एक ऑटो रिक्शा उसके पास आकर रुका। ड्राइवर ने अपनी गर्दन बाहर निकालकर उसे देखा। उसकी आंखें, चैताली के शरीर पर टिकीं, एक पल के लिए ठहर गईं। चैताली ने एक हल्की, बनावटी मुस्कान दी।
"कहां चलोगी, मैडम?" ड्राइवर की आवाज़ में एक अजीब सी ललक थी।
"जहां ले जाना चाहो," चैताली ने धीमे से कहा, उसकी आवाज़ में एक थकी हुई सी मिठास थी।
ड्राइवर ने अपनी मूछों पर हाथ फेरा। "आजकल धंधा मंदा है, मैडम।"
"मंदा है तो क्या हुआ? आज तो होगा ही," चैताली ने थोड़ा आगे झुककर कहा, उसकी मम्मे टॉप के नीचे और भी स्पष्ट दिख रही थी।
ड्राइवर ने एक गहरी सांस ली। "कितने लोग हो?"
"मैं अकेली ही काफी हूं," चैताली ने अपनी उंगलियों से उसके हाथ पर हल्का सा स्पर्श किया।
ड्राइवर ने एक पल सोचा, फिर दरवाजा खोला। "बैठो। आज का धंधा तुम्हारे साथ ही कर लेंगे।"
चैताली ऑटो में बैठ गई। ऑटो ने एक सुनसान गली में प्रवेश किया, जहां रात के अंधेरे में सिर्फ इक्का-दुक्का स्ट्रीट लाइटें जल रही थीं। ऑटो एक खाली प्लॉट के पास रुका। ड्राइवर ने इंजन बंद किया।
"यहां क्यों रुके?" चैताली ने पूछा, उसकी आवाज़ में थोड़ी घबराहट थी।
"अकेली जगह है। कोई देखेगा नहीं," ड्राइवर ने कहा, उसकी आंखें चमक रही थीं।
चैताली ने एक गहरी सांस ली। यह सब उसे पता था। उसने अपनी स्कर्ट को थोड़ा ऊपर खींचा। "तो बताओ, क्या चाहिए?"
ड्राइवर ने अपने पैंट की ज़िप खोली। "बस यही।"


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