31-03-2026, 12:44 PM
दुष्यंत वेर्मा का जासूस मनीष वो फोटो ले कर हर जगह छान-बीन कर रहा था।"अरे साहब,ये आदमी तो कुछ दिन पहले तक मेरे से माल ले जाता था,पर इधर अचानक गायब हो गया है। मेरे को भी इसकी तलाश है।" मैत्री की पेशकश.
"तुझे क्यू? तेरे ग्राहक कम हो गये हैं क्या?" मनीष शहर के एक पहुँचे हुए ड्रग डीलर से बात कर रहा था।
"नही सर,उपरवाले के करम से धंधा मस्त चल रहा है। पर बात क्या है ना कि ये साला नशेड़ी लगता नही था। मुझे शुरू मे शक़ था,फिर लगा कि नया-नया शौक चढ़ा होगा पट्ठे को। पर जब ये गायब हो गया तो मुझे पूरा यकीन हो गया कि ये साला मुझसे माल खरीद कर आगे ज़्यादा दाम मे बेचता होगा। मा कसम! बहनचोद,मिल जाए तो साले की ऐसी-तैसी कर दूँगा।"
"ठीक है,कर देना ऐसी-तैसी। पर उस वक़्त ज़रा मेरा भी ख़याल रखना,मैं भी इस से मिलना चाहता हू।" उसने उसे 1000 का नोट पकड़ाया।
"ओके,सर।" सलाम ठोंक कर वो डीलर चलता बना।
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बॅंगलुर के उस बदनाम इलाक़े की उस तंग गली मे जब्बार और कल्लन चले जा रहे थे। यहा दिन के एक से 2 बजे भी सूरज की रोशनी बड़ी मुश्किल से आ रही थी। दोनो एक बड़े ख़स्ता हाल कमरे के आगे रुके। उस के दरवाज़े पे एक काफ़ी पुराना ज़ंक लगा ताला लगा था। कल्लन ने एक झटके मे उस ताले को तोड़ दिया। अंदर चारो तरफ धूल और गंदगी थी। लगता था मानो इस कमरे मे बरसो से कोई इंसान नही आया था। कमरे मे एक अजीब सी बदबू फैली थी और परिंदो ने यहा अपने घोंसले बना लिए थे।
"ये जगह ठीक लगती है। काम होने के बाद हम जब तक यहा से निकलेंगे तब तक के लिए हमारा राज़ यहा महफूज़ रहेगा।"
"हा,आज रात ही काम ख़तम कर कल सवेरे यहा से निकल चलेंगे।" कल्लन ने बाहर आकर कमरे पे एक नया ताला लगा दिया। गली से निकल कर मेईन रोड तक आते हुए उनपर किसी ने कोई खास ध्यान नही दिया। ऐसे लोग यहा हमेशा ही घूमते नज़र आते थे। मैत्री की रचना.
"आज रात, बस, आज रात राजा की बर्बादी का आगाज़ हो जाएगा।" जब्बार ने कार मे बैठते हुए अपने आप से कहा। वहा से निकल दोनो अपने-अपने होटेल्स पहुँचे और चेकआउट कर दिया। मलिका भी अपने होटेल से निकल चुकी थी। बेस्कॉम की वो वॅन कवर लगा कर एक होटेल की बेसमेंट पार्किंग मे खड़ी कर दी गयी थी। तीनो शहर मे अलग-अलग घूम कर अपना वक़्त काटने लगे और रात का इंतेज़ार करने लगे।
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बने रहिये............
"तुझे क्यू? तेरे ग्राहक कम हो गये हैं क्या?" मनीष शहर के एक पहुँचे हुए ड्रग डीलर से बात कर रहा था।
"नही सर,उपरवाले के करम से धंधा मस्त चल रहा है। पर बात क्या है ना कि ये साला नशेड़ी लगता नही था। मुझे शुरू मे शक़ था,फिर लगा कि नया-नया शौक चढ़ा होगा पट्ठे को। पर जब ये गायब हो गया तो मुझे पूरा यकीन हो गया कि ये साला मुझसे माल खरीद कर आगे ज़्यादा दाम मे बेचता होगा। मा कसम! बहनचोद,मिल जाए तो साले की ऐसी-तैसी कर दूँगा।"
"ठीक है,कर देना ऐसी-तैसी। पर उस वक़्त ज़रा मेरा भी ख़याल रखना,मैं भी इस से मिलना चाहता हू।" उसने उसे 1000 का नोट पकड़ाया।
"ओके,सर।" सलाम ठोंक कर वो डीलर चलता बना।
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बॅंगलुर के उस बदनाम इलाक़े की उस तंग गली मे जब्बार और कल्लन चले जा रहे थे। यहा दिन के एक से 2 बजे भी सूरज की रोशनी बड़ी मुश्किल से आ रही थी। दोनो एक बड़े ख़स्ता हाल कमरे के आगे रुके। उस के दरवाज़े पे एक काफ़ी पुराना ज़ंक लगा ताला लगा था। कल्लन ने एक झटके मे उस ताले को तोड़ दिया। अंदर चारो तरफ धूल और गंदगी थी। लगता था मानो इस कमरे मे बरसो से कोई इंसान नही आया था। कमरे मे एक अजीब सी बदबू फैली थी और परिंदो ने यहा अपने घोंसले बना लिए थे।
"ये जगह ठीक लगती है। काम होने के बाद हम जब तक यहा से निकलेंगे तब तक के लिए हमारा राज़ यहा महफूज़ रहेगा।"
"हा,आज रात ही काम ख़तम कर कल सवेरे यहा से निकल चलेंगे।" कल्लन ने बाहर आकर कमरे पे एक नया ताला लगा दिया। गली से निकल कर मेईन रोड तक आते हुए उनपर किसी ने कोई खास ध्यान नही दिया। ऐसे लोग यहा हमेशा ही घूमते नज़र आते थे। मैत्री की रचना.
"आज रात, बस, आज रात राजा की बर्बादी का आगाज़ हो जाएगा।" जब्बार ने कार मे बैठते हुए अपने आप से कहा। वहा से निकल दोनो अपने-अपने होटेल्स पहुँचे और चेकआउट कर दिया। मलिका भी अपने होटेल से निकल चुकी थी। बेस्कॉम की वो वॅन कवर लगा कर एक होटेल की बेसमेंट पार्किंग मे खड़ी कर दी गयी थी। तीनो शहर मे अलग-अलग घूम कर अपना वक़्त काटने लगे और रात का इंतेज़ार करने लगे।
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बने रहिये............


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