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Adultery खुशबू : गोल्ड डिगर हाउसवाइफ
..…...................भाग 3...............

मेरा नाम खुशबू है। 30 साल। फिगर 36-28-38 – छाती इतनी भरी कि कुर्ती के बटन पर हमेशा खिंचाव रहता है, कमर पतली, हिप्स गोल और स्कर्ट में परफेक्ट लगती हुं। गोरी स्किन, लंबे बाल जो हमेशा रबड़ में बंधे रहते हैं, और आँखें जो मेरी सारी गुप्त बेचैनी छिपा नहीं पातीं। मैं एक मीडियम साइज़ की प्राइवेट कंपनी में सीनियर डायरेक्टर हूँ। मेरा बॉस – श्री सिन्हा – 55 साल के। लंबे कद, फिट बॉडी, सूट में हमेशा शार्प लगते हैं, गहरी आवाज़, और वो नज़रें जो मीटिंग में भी मेरी तरफ ठहर जाती हैं। लेकिन उनकी आँखों में कुछ ऐसा है जो मुझे हर मीटिंग के बाद रातों को जगाता रहता है।
शुरू में सब प्रोफेशनल था। रिपोर्ट्स, मीटिंग्स, ओवरटाइम। लेकिन धीरे-धीरे चीज़ें बदल गईं। लेट नाइट मीटिंग्स में वो मेरे पास ज्यादा देर तक खड़े रहते। "खुशबू... ये प्रेजेंटेशन बहुत अच्छा है" कहकर उनकी उँगलियाँ मेरी कमर पर हल्के सा टच हो जातीं। मैं सिहर जाती, लेकिन कुछ कहती नहीं। वो भी कुछ नहीं कहते। बस नज़रें टकराती हैं और वो हल्के से मुस्कुरा देते हैं।

एक शाम की बात है। ऑफिस में लेट हो गया था। 9:30 बज चुके थे। ज्यादातर लोग चले गए थे। मैं अपनी डेस्क पर रिपोर्ट फाइनल कर रही थी। लाइट्स कम हो चुकी थीं – सिर्फ मेरी और श्री सिन्हा के केबिन की लाइट जल रही थी। वो अचानक मेरे पास आए। कोई आवाज़ नहीं। बस मेरे पीछे खड़े हो गए। इतने पास कि उनकी साँस मेरे कंधे पर लग रही थी। गर्म, भारी। मेरी साँस थम गई। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था – इतनी तेज़ कि ऑफिस की खामोशी में भी सुनाई दे रहा था।
वो बोले नहीं। बस खड़े रहे। उनकी साँस मेरे कान पर। फिर धीरे से बोले, "खुशबू... आज तुम... बहुत सुंदर लग रही हो।"
मेरा गला सूख गया। मैंने कुछ कहा नहीं। वो और पास आए। अब कोई जगह नहीं बची। उनकी साँस मेरे गर्दन पर। "ये कुर्ती... तुम पर कितनी अच्छी लग रही है।"
मैं सिहर उठी। "सर..." आवाज़ निकली नहीं सही से। वो नाम बोलते ही tension और बढ़ गई। उनका हाथ धीरे से मेरी कमर पर गया – सिर्फ छुआ। वो स्पर्श... जैसे आग लग गई। मैंने हटाया नहीं। हटा नहीं पाई। उनकी उँगलियाँ कमर पर फिसलीं – बहुत धीरे, बहुत नरम। कुर्ती के नीचे से छुआ। मेरी छाती पर हल्का स्पर्श। दबाया नहीं। बस महसूस किया। मेरी सिसकी निकल गई – बिना आवाज़ के। पूरा बदन काँप रहा था। साँस रुक-रुक कर आ रही थी।
वो मेरे कान के पास और करीब आए। "खुशबू... मैं जानता हूँ ये गलत है... मैं तुम्हारा बॉस हूँ... लेकिन जब से तुम ऑफिस में आई हो... मैं तुम्हें देखता ही रह जाता हूँ। तुम्हारा ये फिगर... 36-28-38... मेरे दिमाग में रहता है।"
मैंने फुसफुसाया, "सर... कोई देख लेगा... ऑफिस में..." लेकिन मेरी आवाज़ में मना करने की ताकत नहीं थी। अंदर से कुछ पिघल रहा था। डर, शर्म, और वो निषिद्ध चाहत।
उनका हाथ मेरी कमर पर रुक गया। हल्का दबाव। मैं आँखें बंद कर लीं। उनकी साँस मेरे गाल पर। होंठ इतने पास कि बस छूने वाले थे। लेकिन छुए नहीं। वो silence... इतना गहरा, इतना तीव्र कि ऑफिस की AC की आवाज़ भी दूर लग रही थी। हर सेकंड में दिल धड़कता, साँस थमती, बदन सिहरता। tension इतनी intense कि मेरी आँखों में आँसू आ गए। डर था – कोई स्टाफ आ जाएगा, कोई कैमरा कैच कर लेगा – लेकिन चाहत भी उतनी ही तेज़।
फिर बाहर से लिफ्ट की आवाज़ आई – कोई क्लीनर आ रहा था।
वो पीछे हट गए। एक कदम। बस एक कदम। मैंने कुर्ती ठीक किया। चेहरा गरम, साँसें तेज़। वो मुस्कुराए – वो मुस्कान जो अब मेरे दिल में उतर चुकी थी। "रिपोर्ट... कल सुबह देख लूँगा। घर जाओ।"
मैंने सिर हिलाया। कुछ बोली नहीं। वो चले गए। मैं वहीं बैठी रही, काँपती हुई। रात भर नींद नहीं आई। मन में बस वो स्पर्श, वो साँस, वो silence।
अब हर शाम, हर मीटिंग के बाद, हर लिफ्ट में वो tension। कभी हाथ ब्रश होता है, कभी नज़रें टकराती हैं, कभी अकेले में "खुशबू... अच्छा काम" कहते हुए कमर छू जाते हैं। स्पर्श कभी पूरा नहीं होते – लेकिन tension हर बार और तीव्र। साँसें थमती हैं। दिल कान में गूँजता है। हम रुकते हैं – हमेशा रुकते हैं। लेकिन मन चीखता है "बस एक बार... और करीब... बस एक बार..."।
ये गुप्त रोमांस... ऑफिस की दीवारों के अंदर छिपा, डरावना, मीठा, निषिद्ध लेकिन इतना लाजवाब जो आज भी जारी है है।

अगले दिन ऑफिस का माहौल बदला-बदला सा था। रात की उस घटना के बाद मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कि मैं श्री सिन्हा की आँखों में आँखें डालकर देख सकूँ। मैं अपनी डेस्क पर सिर झुकाए काम कर रही थी, लेकिन मेरा पूरा ध्यान उनके केबिन के दरवाजे पर था।
दोपहर के वक्त इंटरकॉम की घंटी बजी। मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
"खुशबू, जरा केबिन में आओ। एक कॉन्फिडेंशियल फाइल डिस्कस करनी है," सर की वही भारी और मखमली आवाज़।
मैं अपनी कुर्ती ठीक करते हुए उनके केबिन में दाखिल हुई। उन्होंने अंदर से दरवाजा लॉक नहीं किया, लेकिन उसे बस हल्का सा सटा दिया। वह अपनी बड़ी सी रिवॉल्विंग चेयर पर बैठे थे, चश्मा हटाकर मुझे देख रहे थे।
"बैठो," उन्होंने सामने वाली कुर्सी की तरफ इशारा किया।
जैसे ही मैं बैठी, उन्होंने एक फाइल मेरी तरफ सरकाई। "इस प्रोजेक्ट के लिए हमें इस संडे को ऑफिस आना पड़ सकता है। सिर्फ तुम और मैं।"
'सिर्फ तुम और मैं'—इन शब्दों ने मेरे पेट में अजीब सी खलबली मचा दी। मैंने फाइल की तरफ देखा, लेकिन अक्षर धुंधले लग रहे थे। अचानक वह अपनी कुर्सी से उठे और घूमकर मेरे ठीक पीछे आकर खड़े हो गए।

उनकी मौजूदगी की गर्मी मुझे अपनी पीठ पर महसूस हो रही थी। उन्होंने झुककर अपना एक हाथ टेबल पर रखा और दूसरा हाथ... बहुत धीरे से मेरे कंधे पर। उनकी उँगलियाँ मेरे बन (bun) से निकले छोटे बालों के साथ खेलने लगीं।
"कल रात तुम बहुत जल्दी चली गई थीं," उन्होंने मेरे कान के पास फुसफुसाया।

मेरी साँसें फिर से बेकाबू होने लगीं। "सर... काम खत्म हो गया था..." मेरी आवाज़ काँप रही थी।
"काम तो कभी खत्म नहीं होता, खुशबू," कहते हुए उन्होंने अपना हाथ नीचे की तरफ सरकाया। उनकी हथेली मेरी पीठ के बीचों-बीच रुकी, जहाँ मेरी कुर्ती का कपड़ा सबसे ज्यादा खिंचा हुआ था। उन्होंने वहाँ हल्का सा दबाव बनाया।
मैं कुर्सी पर जमी रह गई। डर था कि कोई भी शीशे के दरवाजे के बाहर से देख सकता है, लेकिन वह रिस्क ही जैसे मेरे शरीर में बिजली दौड़ा रहा था। उन्होंने अपना चेहरा मेरे गले के पास झुकाया और एक लंबी गहरी साँस ली।
"तुम्हारी परफ्यूम... या शायद ये तुम्हारी अपनी खुशबू है... मुझे पागल कर रही है।"
तभी बाहर किसी के ज़ोर से बात करने की आवाज़ आई। वह फ़ौरन सीधे खड़े हो गए और अपनी चेयर पर वापस जा बैठे, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
"ठीक है, इस फाइल को कल तक तैयार कर लेना," उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा ताकि बाहर सुनाई दे।
मैं काँपते पैरों से बाहर निकली। संडे का इंतज़ार अब एक मीठे खौफ जैसा लग रहा था। खाली ऑफिस, बंद कमरे और सिन्हा सर। क्या मैं खुद को रोक पाऊँगी?
, रविवार का दिन आया। पूरा ऑफिस सन्नाटे में डूबा था। बाहर की तपती धूप और अंदर की ठंडी AC की हवा के बीच एक अजीब सा विरोधाभास था—ठीक वैसा ही जैसा मेरे मन के अंदर चल रहा था। डर और बेताबी का संगम।
संडे: खाली ऑफिस और गहराता सन्नाटा
मैं ऑफिस पहुँची। आज मैंने जानबूझकर एक गहरी नीली (Navy Blue) रंग की फॉर्मल कुर्ती पहनी थी, जिसका गला थोड़ा छोटा था पर फिटिंग इतनी सटीक कि मेरी छाती का उभार और कमर का मोड़ साफ झलक रहा था। जैसे ही मैंने सिन्हा सर के केबिन का दरवाजा खटखटाया, अंदर से उनकी भारी आवाज़ आई, "आ जाओ।"

वो आज सूट में नहीं थे। उन्होंने शर्ट की आस्तीनें ऊपर चढ़ा रखी थीं और ऊपर के दो बटन खुले थे। मुझे देखते ही उनकी आँखों में एक चमक सी आ गई।
"बैठो, खुशबू। मैंने कॉफी मंगवाई है," उन्होंने कहा।
हम काम करने लगे, लेकिन फाइलें तो बस एक बहाना थीं। टेबल के नीचे से जब भी उनकी नज़रें मेरी कुर्ती के बटनों पर टिकतीं, मुझे महसूस होता कि बटन कभी भी टूट सकते हैं। माहौल में बिजली सी दौड़ रही थी।
अचानक, लैपटॉप की स्क्रीन पर इशारा करते हुए वो मेरे पास आए। इस बार वो रुके नहीं। उन्होंने अपना हाथ मेरी कुर्सी के हत्थे पर रखा और दूसरा हाथ सीधे मेरी कमर के उस कर्व पर, जहाँ से स्कर्ट या पजामी शुरू होती है।
"खुशबू... आज कोई नहीं है यहाँ। न स्टाफ, न कैमरे की फिक्र," उन्होंने मेरे कान के पास फुसफुसाया। उनकी गर्म साँसें मेरे गले को भिगो रही थीं।
उन्होंने अपनी उँगलियाँ मेरी कमर पर थोड़ी और मजबूती से टिका दीं। "तुम्हें अंदाजा नहीं है कि इस सादगी में तुम कितनी कयामत लगती हो।"
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे लगा वो भी इसे सुन सकते हैं। मैंने धीरे से पीछे मुड़कर उनकी तरफ देखा। उनके चेहरे पर वही जानलेवा मुस्कान थी।
""सर... हमें काम पूरा करना चाहिए," मैंने कमजोर आवाज़ में कहा, लेकिन मेरा हाथ खुद-ब-खुद उनकी शर्ट की बाजू को छूने लगा।
वो और करीब आए। अब हमारे बीच कागज के एक टुकड़े जितनी भी जगह नहीं बची थी। उन्होंने मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया। उनकी अँगूठी का ठंडा अहसास और उनके हाथों की गर्माहट... एक अद्भुत विरोधाभास था।
तभी, गलियारे में किसी के चलने की आहट सुनाई दी—शायद गार्ड राउंड पर था।
हम दोनों एक पल के लिए जम गए। वो पीछे नहीं हटे, बस मेरी आँखों में गहराई से देखते रहे, जैसे कह रहे हों—'अगली बार कोई नहीं रोक पाएगा।'
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RE: खुशबू : गोल्ड डिगर हाउसवाइफ - by Dhamakaindia108 - 4 hours ago



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