29-03-2026, 03:03 PM
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Part - 4
सुनीता का संयुक्त परिवार एक दो मंजिले माकन मैं रहता था | घर मैं कोई आंगन न होने के कारण एक मंजिल की आवाज दूसरी मंजिल तक नहीं जा पाती थी। ग्राउंड फ्लोर पर बाकी परिवार रहता था, जबकि पहली मंज़िल पर सुनीता और आरव के कमरे थे। प्रत्येक मंज़िल पर दो दो बाथरूम थे, भारतीय स्टाइल के स्क्वॉट टॉयलेट सीट वाले, जहाँ पानी का मग और बाल्टी हमेशा रखी रहती थी। लेकिन उस दिन, एक साधारण सी सुबह, उसकी ज़िंदगी की सबसे हवस भरी कहानी शुरू होने वाली थी।
सुबह के करीब सात बजे थे। सूरज की किरणें पहली मंज़िल की खिड़कियों से छनकर आ रही थीं। सुनीता, अपनी लाल सूती साड़ी में लिपटी, बाथरूम से जल्दी-जल्दी निकली। उसकी साड़ी का पल्लू हल्का-सा गीला था, उसकी चूचियाँ, जो टाइट ब्लाउज़ में कसी हुई थीं, हर कदम पर हिल रही थीं, और उसकी गाँड का उभार साड़ी के नीचे लहरा रहा था। वो जल्दी में थी, शायद रसोई में चूल्हा जलाने की तैयारी में। उसने आरव को देखा, जो अपने कमरे से निकलकर बाथरूम की ओर जा रहा था, और बोली, "बेटा, जल्दी कर, मैं नाश्ता तैयार कर रही हु, जल्दी नीचे आ जाना।" उसकी आवाज़ में ममता थी, लेकिन आरव की नज़रें उसकी चूचियों पर टिक गईं, और उसका लंड उसके लोअर में हल्का-सा तन गया।
आरव, अपने नीले लोअर और काली टी-शर्ट में, बाथरूम में दाखिल हुआ। दरवाज़ा बंद करते ही उसे कुछ अजीब सा महसूस हुआ। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। हवा में एक तीखी, मादक खुशबू थी, जो उसकी नाक में घुसी और उसके लंड को और सख़्त कर दिया। हवा में अभी भी सुनिता की मौजूदगी का एक गर्म, नशीला अहसास था, हल्की सी खुशबू, उसकी त्वचा की मादक गंध। बस कुछ सेकंड पहले सुनिता यहाँ से निकली थी। आरव ने टॉयलेट की तरफ कदम बढ़ाया और टॉयलेट सीट की ओर देखा, उसका दिल धड़कने लगा, और उसकी साँसें थम गईं। टॉयलेट सीट फ्लश नहीं थी। नीचे, टॉयलेट सीट के तल में, सुनीता का ताज़ा पेशाब चमक रही था, हल्की पिली, गर्म, जिसकी सतह पर नन्हे हवा के बुलबुले तैर रहे थे। उसकी चूत का पानी, जो शायद जल्दी में सुनिता फ्लश करना भूल गई थी। उसकी पेशाब ताजी, गर्म, पवित्र — वहाँ शांत पड़ी थी, मानो उसकी देह का कोई गुप्त अमृत हो।और उसकी गंध इतनी तीखी थी कि आरव का लंड उसके लोअर में फड़कने लगा।
उन्नीस साल का आरव, जो जवानी की आग में जल रहा था, इस दृश्य से अंदर तक हिल गया। आरव की साँसें तेज़ हो गईं। उसका लंड अब पूरी तरह तन चुका था, और उसका लोअर सामने से उभर रहा था। सुनिता - उसकी चाची, उसकी ममतामयी हुस्न की मलिका - उसकी पेशाब, उसका यह अमृत जैसा प्रसाद आरव सामने था। उसकी नज़रें उस सुनहरे अमृत पर ठहर गईं। बुलबुले, जो धीरे-धीरे फट रहे थे, मानो सुनिता की साँसों की तरह जीवंत थे। यह नज़ारा इतना अंतरंग था कि आरव की रगों में बिजली दौड़ गई। उसका लंड धीरे-धीरे तनने लगा, उसकी जींस में उभार साफ़ दिख रहा था।
वह एक कदम और पास आया, उसकी आँखें उस पेशाब पर जमी थीं। यह सुनिता की चूत से निकला था—उसकी नरम, गर्म चूत, जिसके बारे में वह रातों को सपने देखता था। उसने कल्पना की कि सुनिता यहाँ थी, उसकी साड़ी ऊँची उठी हुई, उसकी गोरी जाँघें खुली हुई, और उसकी चूत से यह सुनहरा रस टपक रहा था। उसकी चूत कैसी होगी? शायद गुलाबी, शायद गीली, उसकी झाँटें काली और घनी, जो उसकी देह की गर्मी को और बढ़ाती होंगी। आरव का दिमाग़ घूम गया। यह पेशाब उसकी चूत का अमृत था, उसकी देह का सबसे पवित्र अमृत। उसने एक गहरी साँस ली, और सुनिता की खुशबू उसके फेफड़ों में समा गई। उसका लंड अब पूरी तरह तन चुका था, उसकी जींस में दर्द होने लगा। वह सोच रहा था कि यह पेशाब कितना कीमती है। यह सुनिता की देह का रस था, उसकी चूत की गर्मी, उसकी पवित्रता। उसने अपने होंठों को गीला किया, और एक अजीब सी लालसा उसके मन में जागी। वह इस पेशाब को चखना चाहता था। वह जानना चाहता था कि सुनिता का स्वाद कैसा होगा। क्या यह नमकीन होगा? क्या यह गर्म होगा? क्या यह उसकी चूत की मिठास को अपने में समेटे होगा?


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