29-03-2026, 12:40 PM
दोपहर का वक़्त था और मेनका राजासाहब के ऑफीस चेम्बर मे उनकी चेर के बगल मे खड़ी उन्हे कोई फाइल दिखा रही थी। फाइल देखते-देखते राजासाहब ने अपना बाया हाथ उसकी कमर पे लगा दिया और उसकी गांड सहलाने लगे। मैत्री की पेशकश।
"क्या कर रहे हो? कोई देख लेगा।",वो अलग होने के लिए छटपटाने लगी तो राजासाहब ने अपनी पकड़ और मज़बूत कर दी," प्लीज़! छोडो ना।",मेनका को बहुत डर लग रहा था,कही कोई आ गया तो ग़ज़ब हो जाएगा, लेने के देने पद सकते है और बेकार में इस मजे के माहोल की गांड लग जायेगी, और उसके ससुर तो बिल्कुल पागल हो गये थे।
"यश,प्लीज़! अभी नही! ऊऊओ...ऊऊहह..!",राजासाहब ने उसे वैसे ही चेर पे बैठ हुए पकड़ कर अपनी तरफ घुमा कर उसके पेट मे अपना मुँह घुसा दिया था।
"आ....आआहह...! प्लीज़....छ्च..हहोड़ो नाअ....कोई आ...ना... जा...आए..."।राजासाहब उसकी नाभि मे अपनी जीभ फिरा रहे थे और उसके चिकने पेट को भी चूम रहे थे।उन्होने अपने हाथ उसकी पीठ से सरका कर नीचे उसकी गांड को सहलाना शुरू कर दिया तो मेनका उनके बाल पकड़ उन्हे अपने से अलग करने लगी। उसकी चूत गीली हो रही थी पर उसे बहुत डर भी लग रहा था।
तभी दरवाज़े पे दस्तक हुई तो वो छितक कर उनसे अलग हो अपनी साडी ठीक कर फाइल पढ़ने लगी। राजासाहब ने भी अपने बाल ठीक किए,"कम इन।"
"अरे आप हैं सेशाद्री साहब! आपको नॉक करने की क्या ज़रूरत है।",उन्होने एक बहुत हल्की सी शरारती मुस्कान अपनी बहू की तरफ फेंकी जिसे सेशाद्री नही देख पाए। मेनका ने गुस्से से उन्हे देखा और फिर से फाइल पढ़ने लगी।
"क्या हुआ कुँवारानी? आप परेशान लग रही हैं। तबीयत तो ठीक है ना?",सेशाद्री मेनका से मुखातिब हुए।
"नही अंकल, तबीयत थोड़ी गड़बड़ लग रही है"
"अरे,तब आप यहा क्या कर रही हैं? आपको तो घर जाकर आराम करना चाहिए। सर,मैं ग़लत तो नही कह रहा।"
"नही,सेशाद्री साहब।" मैत्री की रचना।
"तो मैं घर जाऊं?",मेनका ने बड़ी मासूमियत से अपने ससुर से पूचछा।
"हा,हा! बिल्कुल।"
"ओके",मेनका ऑफीस के दरवाज़े की ओर बढ़ गयी औरदरवाज़े पे पहुँच कर सेशाद्री की पीठ के उपर से अपने ससुर को मुँह चिढ़ा दिया। राजासाहब को मन ही मन सेशाद्री पे बहुत गुस्सा आ रहा था। अगर वो अभी नही आता तो वो मेनका को अभी चोद रहे होते। पर अब क्या किया जा सकता था। वो मन मार कर सेशाद्री के लाए पेपर्स पढ़ने लगे।
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बने रहिये दोस्तों...............
मैत्री.
"क्या कर रहे हो? कोई देख लेगा।",वो अलग होने के लिए छटपटाने लगी तो राजासाहब ने अपनी पकड़ और मज़बूत कर दी," प्लीज़! छोडो ना।",मेनका को बहुत डर लग रहा था,कही कोई आ गया तो ग़ज़ब हो जाएगा, लेने के देने पद सकते है और बेकार में इस मजे के माहोल की गांड लग जायेगी, और उसके ससुर तो बिल्कुल पागल हो गये थे।
"यश,प्लीज़! अभी नही! ऊऊओ...ऊऊहह..!",राजासाहब ने उसे वैसे ही चेर पे बैठ हुए पकड़ कर अपनी तरफ घुमा कर उसके पेट मे अपना मुँह घुसा दिया था।
"आ....आआहह...! प्लीज़....छ्च..हहोड़ो नाअ....कोई आ...ना... जा...आए..."।राजासाहब उसकी नाभि मे अपनी जीभ फिरा रहे थे और उसके चिकने पेट को भी चूम रहे थे।उन्होने अपने हाथ उसकी पीठ से सरका कर नीचे उसकी गांड को सहलाना शुरू कर दिया तो मेनका उनके बाल पकड़ उन्हे अपने से अलग करने लगी। उसकी चूत गीली हो रही थी पर उसे बहुत डर भी लग रहा था।
तभी दरवाज़े पे दस्तक हुई तो वो छितक कर उनसे अलग हो अपनी साडी ठीक कर फाइल पढ़ने लगी। राजासाहब ने भी अपने बाल ठीक किए,"कम इन।"
"अरे आप हैं सेशाद्री साहब! आपको नॉक करने की क्या ज़रूरत है।",उन्होने एक बहुत हल्की सी शरारती मुस्कान अपनी बहू की तरफ फेंकी जिसे सेशाद्री नही देख पाए। मेनका ने गुस्से से उन्हे देखा और फिर से फाइल पढ़ने लगी।
"क्या हुआ कुँवारानी? आप परेशान लग रही हैं। तबीयत तो ठीक है ना?",सेशाद्री मेनका से मुखातिब हुए।
"नही अंकल, तबीयत थोड़ी गड़बड़ लग रही है"
"अरे,तब आप यहा क्या कर रही हैं? आपको तो घर जाकर आराम करना चाहिए। सर,मैं ग़लत तो नही कह रहा।"
"नही,सेशाद्री साहब।" मैत्री की रचना।
"तो मैं घर जाऊं?",मेनका ने बड़ी मासूमियत से अपने ससुर से पूचछा।
"हा,हा! बिल्कुल।"
"ओके",मेनका ऑफीस के दरवाज़े की ओर बढ़ गयी औरदरवाज़े पे पहुँच कर सेशाद्री की पीठ के उपर से अपने ससुर को मुँह चिढ़ा दिया। राजासाहब को मन ही मन सेशाद्री पे बहुत गुस्सा आ रहा था। अगर वो अभी नही आता तो वो मेनका को अभी चोद रहे होते। पर अब क्या किया जा सकता था। वो मन मार कर सेशाद्री के लाए पेपर्स पढ़ने लगे।
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बने रहिये दोस्तों...............
मैत्री.


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