25-03-2026, 11:12 PM
(This post was last modified: 25-03-2026, 11:14 PM by The_Writer. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
‘पास’ हो गई!
हिलाते - हिलाते बहुत देर हो गई --- लंड अब और भी ज़्यादा अकड़ गया --- हिलाते समय आशा की हाथों की चूड़ियों से आती ‘छन छन’ की आवाज़ माहौल को और भी गरम करने लगी. वीर्य की धार कभी भी फूट सकती है और रणधीर बाबू अपना कीमती वीर्य बूंदों को यूँ ही वेस्ट नहीं जाने देना चाहते इसलिए उन्होंने एक हल्के थप्पड़ से अपने लंड पर से आशा का हाथ हटाया और आगे हो कर उसके होंठों से अपने लंड का छूअन कर दिया. आशा भीषण रूप से बिदकी, कसमसाई, कातर दृष्टि से रणधीर बाबू की ओर देखी पर बुढ़ऊ अपना सारा होश बहुत पहले ही अपने लंड के सुपाड़े में डाल चुका था. इसलिए सोचने - समझने का काम फिलहाल उन्होंने अपने लंड पर छोड़ रखा था और लंड आशा के मुँह में घुसने के लिए बुरी तरह से तत्पर था.
आशा नर्वस हो कर ज़रा मुस्कुराई और ऐसा दिखाने की कोशिश की कि;
उसे भी अब थोड़ा - थोड़ा इस खेल में मज़ा आ रहा है....
..... और पूरे मन से रणधीर बाबू का मुठ मारने में खुद को व्यस्त दिखाने का भी भरपूर प्रयास की.
पर रणधीर बाबू इतने में खुश होने वालों में से नहीं....
आशा के हाथ में एक और थप्पड़ मारते हुए थोड़ी कड़क आवाज़ में कहा,
“एनफ विथ द हैंड्स, स्लट..!”
और इतना कहते हुए एक झटके में जोर का प्रेशर देते हुए आशा के मुँह में लंड का प्रवेश कर दिया!
“आह..अह्हह्म्मप्प्फ्ह....”
इतनी ही आवाज़ निकली आशा की...
कुछ सेकंड लंड को वैसे ही रहने दिया मुँह में;
थोड़ा सा निकाला,
फ़िर एक और तगड़ा झटका देते हुए लंड को आधे से ज़्यादा उतार दिया उस बेचारी एक बच्चे की माँ के गले में...
मारे दर्द के आशा तड़प उठी --- साँस लेना तो दूर; उतने मोटे तगड़े लंड को मुँह में रखने के लिए होंठों को ज़्यादा फ़ैला भी नहीं पा रही बेचारी --- और इधर रणधीर बाबू हवस में अँधा होकर तेज़ और ताकतवर झटके देने लगे किस्मत की मारी आशा के मुँह में. बुढ़ऊ की शक्ल ओ सूरत बता रही थी कि आज इस रांड के हल्की, गुलाबी-गोरे मुखरे को बेरहमी से चोद डालना चाहते हैं.
“आःह्हह्ह्ह्ह.... ऊम्म्म्हह आप्फ्ह्हह्हह्म्म्म.....”
जबकि रणधीर बाबू मस्ती में डूबे ज़ोरों से आहें भर रहे थे,
“ओह्ह्ह्हsssss --- आह्ह्हssssssssss.... यssसsss आsssशाsssss --- ओह्ह्हssss यसsssssss --- टेssक ssइटssss --- टेक इट ssss डीपssss --- मोर --- मोर --- इनसाइडsss यूsssss --- ओह्ह्ह फ़कssssss….!!”
इधर आशा,
“आह्ह्हह्म्म्मप्फ्हssssss आह्ह्हह्म्म्मप्प्फ्हह्ह्हsssssssss... गूंss गूंsss गूंsss गूंsss गूंsssss गूंssss ह्ह्ह्हह्हsss ह्ह्ह्हह गोंss गोंss गोंss गोंsss गोंsss म्म्फ्हह्हss म्म्म्मप्प्फ्हह्हssss” …..
…….. के मुँह के किनारों से लार टपकने लगा --- टपकने क्या, समझिए बहने लगा.
रणधीर बाबू चूचियों को मसलना छोड़ कर आशा के सिर के पीछे हाथ रख अपनी तरफ़ धकेलते और ठीक उसी समय, अपने कमर को जोर से आगे की ओर झटकते --- इस तरह बेचारी आशा बचने के लिए अपना मुँह हटाती भी तो कैसे??
“आह्ह्हह्म्म्मप्फ्हssss आह्ह्हह्म्म्मssssप्प्फ्हह्ह्हsss ... गूंsss गूंsss गूंssss गूंssss गूंssss गूंsss ह्ह्ह्हह्हsssss”
“आह्ह्हह्म्म्मप्फ्हssss आह्ह्हह्म्म्मप्प्फ्हह्ह्ह.ssss.. गोंss गोंss गोंsss गोंsss गोंsssss ........ म्म्फ्हह्हssss म्म्म्मप्प्फ्हह्हssssssssss”
“आह्ह्हह्म्म्मप्फ्ह गूं गूं गूंssssssss गूं गूं गूं ह्ह्ह्हह्हssssss ह्ह्ह्हहsssss ...... आह्ह्हssssssह्म्म्मप्प्फ्हह्ह्हssssssssssss ....... गोंsss गों ss गोंssss गोंsss गों sssss …. म्म्फ्हह्ह म्म्म्मप्प्फ्हह्हssssss”
इसी तरह घपाघप आशा के मुँह को करीब पंद्रह मिनट तक चोदते-चोदते आख़िरकार ठरकी बुड्ढा अपने क्लाइमेक्स पर पहुँच ही गया!
‘फ़फ़’ से ढेर सारा वीर्य उगला उनके औज़ार ने. आशा का मुँह पूरा भर गया --- रत्ती भर की भी जगह न बची. बुढ़ऊ ने इतना वीर्य निकाला कि थोड़ा सा निगल लेने के सिवा और कोई चारा न था और बाकी तो आशा के कुछ भी सोचने-समझने से पहले ही गले के नीचे उतर गया. नमकीन स्वाद ने आशा के मुँह का जायका पूरी तरह से बिगाड़ दिया. उससे अधिक उम्र के एक खूंसट ठरकी बुड्ढे का काला गन्दा लंड को मुँह में लेना और फ़िर उसका वीर्यपान करना --- इस अनुभव ने कड़वाहट से भर दिया उसे – बचे वीर्य को उगलने का प्रयास करते हुए खाँसने लगी --- हरेक कतरे को निकाल बाहर करना चाहती थी.
इधर बुड्ढे ने दो-तीन सफ़ेद कागज़ उसकी ओर बढ़ा कर साफ़ कर लेने को बोला --- साथ ही अपना वाशरूम भी दिखाया --- आशा दौड़ कर अंदर घुस गई और रणधीर बाबू बड़े प्रेम से एक अखबार के पन्ने से अपने लंड को पोंछते हुए अपनी कुर्सी पर बैठ गए... अंदर ही अंदर अपनी पहली सफलता पर बेहद प्रसन्न मन से मुस्कुराने लगे.
करीब दस मिनट बाद आशा निकली --- कपड़े सही कर ली थी उसने. बाल जो कि रणधीर बाबू के उसके सिर को पकड़ने के वजह से अस्त-व्यस्त हो गए थे; उन्हें भी ठीक कर ली थी. वाशरूम से सीधे निकलकर मेज के सामने कुर्सी पर बैठ गई.
“आशा, दैट वाज़ औसम !! .... आई लव्ड एव्री सेकंड ऑफ़ इट --- थैंक्स!” बुढ़ऊ पूरे बेशर्मी के साथ आशा के चेहरे पर नज़रें टिकाए रखा.
आशा कुछ नहीं बोली, चुपचाप बैठी रही.... नज़रें नीचे किए.
रणधीर बाबू भी उसके जवाब का इंतज़ार किए बिना बोले,
“एक और बात, अच्छे से सुनो, समझो, और दिमाग में बैठा लो --- आज के बाद , हर दिन, कॉलेज बिना ब्रा पहन के आया करोगी --- ओके? और हाँ, कल ही अपने बेटे का फॉर्म और ज़रूरी डाक्यूमेंट्स लेती आना और अगर ले आई हो तो यहीं रख दो, मैं बाद में देख लूँगा. कल से तुम्हारी जॉइनिंग पक्का.”
“और बेटे का एडमिशन?”
“परसों से… कॉलेज ले आना.”
यह सुनते ही आशा को अपने कानों पर यकीं नहीं हुआ --- आश्चर्य से रणधीर बाबू की ओर देखी --- उनके चेहरे पर एक सहमति वाली मुस्कान देख कर उसकी आँखें छलक आईं...
रुंधे स्वर में बोली,
“थैंक्यू सो मच सर.”
रणधीर बाबू होंठों पर एक कमीनी मुस्कान लिए बोले,
“ओके, ओके... एनफ ऑफ़ थैंक्स --- यू मे गो नाओ. पर जाने से पहले एक छोटा सा काम और करो.”
आशा सवालिया नज़रों से उनकी ओर देखी....
“अभी जो ब्रा पहनी हुई हो उसे खोलकर यहाँ रख जाओ!”
आशा जल्दी से वाशरूम में घुस गई. रणधीर बाबू का फ़िर कोई नया आदेश न आ जाए यह सोच कर जल्दी से ब्रा उतर कर; कपड़ों को ठीक कर के बाहर निकली. उसे बाहर निकलते देखते ही रणधीर बाबू ने अपना बाँया हाथ आगे बढ़ा दिया --- आशा ने इशारा समझ कर ब्रा उनकी हथेली पर रख दी और फिर बिना बुढ़ऊ की ओर देखे अपना बैग उठाई और जाने लगी --- दरवाज़े तक पहुँची ही थी कि रणधीर बाबू की आवाज़ आई,
“एक और बात.... आज तुम्हारा फर्स्ट टाइम था क्या --- आई मीन टेकिंग माय थिंग इनटू योर माउथ?!” बड़ी बेशर्मी से सवाल दागा बुड्डे ने.
आशा पीछे देखे बिना बोली,
“यस सर!”
इतना बोलकर तेज़ी से दरवाज़ा खोलकर चली गई.
इधर रणधीर बाबू हैरान --- साफ़ सुनकर भी यकीन नहीं हो रहा --- मानो उनका दिमाग यकीन करना ही नहीं चाह रहा.
आखिर एक शादीशुदा, उच्च घर की, संस्कारी, सुशिक्षित महिला का वर्जिन मुँह चोदा है उन्होंने आज --- न जानते हुए ही सही --- पर चोदा तो ---- और एक तरह से देखा जाए तो उन्होंने आज एक ऐसी ही महिला को अपना लंड चूसा कर उसके शर्म – ओ – ह्या, हिचक, झिझक, बेबसी और ऐसे ही बहुत सी बाधाओं का बाँध तोड़ दिया! जो आगे जाकर बहुत काम आने वाला है.
“आह्ह्ह!!”
एक आह निकली रणधीर बाबू के मुँह से और हाथ में पकड़े आशा की मुलायम क्रीम कलर की ब्रा को पागलों की तरह नाक और मुँह से लगा कर उसका गंध सूँघने और चूमने लगे.
जारी रहेगा.....
..............................................
हिलाते - हिलाते बहुत देर हो गई --- लंड अब और भी ज़्यादा अकड़ गया --- हिलाते समय आशा की हाथों की चूड़ियों से आती ‘छन छन’ की आवाज़ माहौल को और भी गरम करने लगी. वीर्य की धार कभी भी फूट सकती है और रणधीर बाबू अपना कीमती वीर्य बूंदों को यूँ ही वेस्ट नहीं जाने देना चाहते इसलिए उन्होंने एक हल्के थप्पड़ से अपने लंड पर से आशा का हाथ हटाया और आगे हो कर उसके होंठों से अपने लंड का छूअन कर दिया. आशा भीषण रूप से बिदकी, कसमसाई, कातर दृष्टि से रणधीर बाबू की ओर देखी पर बुढ़ऊ अपना सारा होश बहुत पहले ही अपने लंड के सुपाड़े में डाल चुका था. इसलिए सोचने - समझने का काम फिलहाल उन्होंने अपने लंड पर छोड़ रखा था और लंड आशा के मुँह में घुसने के लिए बुरी तरह से तत्पर था.
आशा नर्वस हो कर ज़रा मुस्कुराई और ऐसा दिखाने की कोशिश की कि;
उसे भी अब थोड़ा - थोड़ा इस खेल में मज़ा आ रहा है....
..... और पूरे मन से रणधीर बाबू का मुठ मारने में खुद को व्यस्त दिखाने का भी भरपूर प्रयास की.
पर रणधीर बाबू इतने में खुश होने वालों में से नहीं....
आशा के हाथ में एक और थप्पड़ मारते हुए थोड़ी कड़क आवाज़ में कहा,
“एनफ विथ द हैंड्स, स्लट..!”
और इतना कहते हुए एक झटके में जोर का प्रेशर देते हुए आशा के मुँह में लंड का प्रवेश कर दिया!
“आह..अह्हह्म्मप्प्फ्ह....”
इतनी ही आवाज़ निकली आशा की...
कुछ सेकंड लंड को वैसे ही रहने दिया मुँह में;
थोड़ा सा निकाला,
फ़िर एक और तगड़ा झटका देते हुए लंड को आधे से ज़्यादा उतार दिया उस बेचारी एक बच्चे की माँ के गले में...
मारे दर्द के आशा तड़प उठी --- साँस लेना तो दूर; उतने मोटे तगड़े लंड को मुँह में रखने के लिए होंठों को ज़्यादा फ़ैला भी नहीं पा रही बेचारी --- और इधर रणधीर बाबू हवस में अँधा होकर तेज़ और ताकतवर झटके देने लगे किस्मत की मारी आशा के मुँह में. बुढ़ऊ की शक्ल ओ सूरत बता रही थी कि आज इस रांड के हल्की, गुलाबी-गोरे मुखरे को बेरहमी से चोद डालना चाहते हैं.
“आःह्हह्ह्ह्ह.... ऊम्म्म्हह आप्फ्ह्हह्हह्म्म्म.....”
जबकि रणधीर बाबू मस्ती में डूबे ज़ोरों से आहें भर रहे थे,
“ओह्ह्ह्हsssss --- आह्ह्हssssssssss.... यssसsss आsssशाsssss --- ओह्ह्हssss यसsssssss --- टेssक ssइटssss --- टेक इट ssss डीपssss --- मोर --- मोर --- इनसाइडsss यूsssss --- ओह्ह्ह फ़कssssss….!!”
इधर आशा,
“आह्ह्हह्म्म्मप्फ्हssssss आह्ह्हह्म्म्मप्प्फ्हह्ह्हsssssssss... गूंss गूंsss गूंsss गूंsss गूंsssss गूंssss ह्ह्ह्हह्हsss ह्ह्ह्हह गोंss गोंss गोंss गोंsss गोंsss म्म्फ्हह्हss म्म्म्मप्प्फ्हह्हssss” …..
…….. के मुँह के किनारों से लार टपकने लगा --- टपकने क्या, समझिए बहने लगा.
रणधीर बाबू चूचियों को मसलना छोड़ कर आशा के सिर के पीछे हाथ रख अपनी तरफ़ धकेलते और ठीक उसी समय, अपने कमर को जोर से आगे की ओर झटकते --- इस तरह बेचारी आशा बचने के लिए अपना मुँह हटाती भी तो कैसे??
“आह्ह्हह्म्म्मप्फ्हssss आह्ह्हह्म्म्मssssप्प्फ्हह्ह्हsss ... गूंsss गूंsss गूंssss गूंssss गूंssss गूंsss ह्ह्ह्हह्हsssss”
“आह्ह्हह्म्म्मप्फ्हssss आह्ह्हह्म्म्मप्प्फ्हह्ह्ह.ssss.. गोंss गोंss गोंsss गोंsss गोंsssss ........ म्म्फ्हह्हssss म्म्म्मप्प्फ्हह्हssssssssss”
“आह्ह्हह्म्म्मप्फ्ह गूं गूं गूंssssssss गूं गूं गूं ह्ह्ह्हह्हssssss ह्ह्ह्हहsssss ...... आह्ह्हssssssह्म्म्मप्प्फ्हह्ह्हssssssssssss ....... गोंsss गों ss गोंssss गोंsss गों sssss …. म्म्फ्हह्ह म्म्म्मप्प्फ्हह्हssssss”
इसी तरह घपाघप आशा के मुँह को करीब पंद्रह मिनट तक चोदते-चोदते आख़िरकार ठरकी बुड्ढा अपने क्लाइमेक्स पर पहुँच ही गया!
‘फ़फ़’ से ढेर सारा वीर्य उगला उनके औज़ार ने. आशा का मुँह पूरा भर गया --- रत्ती भर की भी जगह न बची. बुढ़ऊ ने इतना वीर्य निकाला कि थोड़ा सा निगल लेने के सिवा और कोई चारा न था और बाकी तो आशा के कुछ भी सोचने-समझने से पहले ही गले के नीचे उतर गया. नमकीन स्वाद ने आशा के मुँह का जायका पूरी तरह से बिगाड़ दिया. उससे अधिक उम्र के एक खूंसट ठरकी बुड्ढे का काला गन्दा लंड को मुँह में लेना और फ़िर उसका वीर्यपान करना --- इस अनुभव ने कड़वाहट से भर दिया उसे – बचे वीर्य को उगलने का प्रयास करते हुए खाँसने लगी --- हरेक कतरे को निकाल बाहर करना चाहती थी.
इधर बुड्ढे ने दो-तीन सफ़ेद कागज़ उसकी ओर बढ़ा कर साफ़ कर लेने को बोला --- साथ ही अपना वाशरूम भी दिखाया --- आशा दौड़ कर अंदर घुस गई और रणधीर बाबू बड़े प्रेम से एक अखबार के पन्ने से अपने लंड को पोंछते हुए अपनी कुर्सी पर बैठ गए... अंदर ही अंदर अपनी पहली सफलता पर बेहद प्रसन्न मन से मुस्कुराने लगे.
करीब दस मिनट बाद आशा निकली --- कपड़े सही कर ली थी उसने. बाल जो कि रणधीर बाबू के उसके सिर को पकड़ने के वजह से अस्त-व्यस्त हो गए थे; उन्हें भी ठीक कर ली थी. वाशरूम से सीधे निकलकर मेज के सामने कुर्सी पर बैठ गई.
“आशा, दैट वाज़ औसम !! .... आई लव्ड एव्री सेकंड ऑफ़ इट --- थैंक्स!” बुढ़ऊ पूरे बेशर्मी के साथ आशा के चेहरे पर नज़रें टिकाए रखा.
आशा कुछ नहीं बोली, चुपचाप बैठी रही.... नज़रें नीचे किए.
रणधीर बाबू भी उसके जवाब का इंतज़ार किए बिना बोले,
“एक और बात, अच्छे से सुनो, समझो, और दिमाग में बैठा लो --- आज के बाद , हर दिन, कॉलेज बिना ब्रा पहन के आया करोगी --- ओके? और हाँ, कल ही अपने बेटे का फॉर्म और ज़रूरी डाक्यूमेंट्स लेती आना और अगर ले आई हो तो यहीं रख दो, मैं बाद में देख लूँगा. कल से तुम्हारी जॉइनिंग पक्का.”
“और बेटे का एडमिशन?”
“परसों से… कॉलेज ले आना.”
यह सुनते ही आशा को अपने कानों पर यकीं नहीं हुआ --- आश्चर्य से रणधीर बाबू की ओर देखी --- उनके चेहरे पर एक सहमति वाली मुस्कान देख कर उसकी आँखें छलक आईं...
रुंधे स्वर में बोली,
“थैंक्यू सो मच सर.”
रणधीर बाबू होंठों पर एक कमीनी मुस्कान लिए बोले,
“ओके, ओके... एनफ ऑफ़ थैंक्स --- यू मे गो नाओ. पर जाने से पहले एक छोटा सा काम और करो.”
आशा सवालिया नज़रों से उनकी ओर देखी....
“अभी जो ब्रा पहनी हुई हो उसे खोलकर यहाँ रख जाओ!”
आशा जल्दी से वाशरूम में घुस गई. रणधीर बाबू का फ़िर कोई नया आदेश न आ जाए यह सोच कर जल्दी से ब्रा उतर कर; कपड़ों को ठीक कर के बाहर निकली. उसे बाहर निकलते देखते ही रणधीर बाबू ने अपना बाँया हाथ आगे बढ़ा दिया --- आशा ने इशारा समझ कर ब्रा उनकी हथेली पर रख दी और फिर बिना बुढ़ऊ की ओर देखे अपना बैग उठाई और जाने लगी --- दरवाज़े तक पहुँची ही थी कि रणधीर बाबू की आवाज़ आई,
“एक और बात.... आज तुम्हारा फर्स्ट टाइम था क्या --- आई मीन टेकिंग माय थिंग इनटू योर माउथ?!” बड़ी बेशर्मी से सवाल दागा बुड्डे ने.
आशा पीछे देखे बिना बोली,
“यस सर!”
इतना बोलकर तेज़ी से दरवाज़ा खोलकर चली गई.
इधर रणधीर बाबू हैरान --- साफ़ सुनकर भी यकीन नहीं हो रहा --- मानो उनका दिमाग यकीन करना ही नहीं चाह रहा.
आखिर एक शादीशुदा, उच्च घर की, संस्कारी, सुशिक्षित महिला का वर्जिन मुँह चोदा है उन्होंने आज --- न जानते हुए ही सही --- पर चोदा तो ---- और एक तरह से देखा जाए तो उन्होंने आज एक ऐसी ही महिला को अपना लंड चूसा कर उसके शर्म – ओ – ह्या, हिचक, झिझक, बेबसी और ऐसे ही बहुत सी बाधाओं का बाँध तोड़ दिया! जो आगे जाकर बहुत काम आने वाला है.
“आह्ह्ह!!”
एक आह निकली रणधीर बाबू के मुँह से और हाथ में पकड़े आशा की मुलायम क्रीम कलर की ब्रा को पागलों की तरह नाक और मुँह से लगा कर उसका गंध सूँघने और चूमने लगे.
जारी रहेगा.....
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