23-03-2026, 06:51 AM
करीम ने एक आखिरी बार उन लाल हो चुके कूल्हों पर अपने दांत गड़ाए और झटके से पीछे हट गया।
अनीता का पूरा बदन गुस्से और खौफ के मारे थरथरा रहा था। उसने बदहवासी में अपनी पैंटी और सलवार को ऊपर खींचा और कांपते हाथों से नाड़ा बाँधने लगी। करीम की उस नीच हरकत और राज की मौजूदगी के बावजूद की गई इस दरिंदगी ने अनीता के भीतर की सारी मर्यादा को आग लगा दी थी।
जैसे ही वह काउंटर के पीछे से बाहर निकली, उसने मुड़कर करीम की आँखों में देखा—उन आँखों में प्रतिशोध और नफरत का उबाल था।
अनीता (दाँत पीसते हुए, फुसफुसाकर गाली देते हुए): "कुत्ते की औलाद! तेरी हिम्मत कैसे हुई... तू एक नीच और गंदा जानवर है करीम। तू सोच रहा है कि तू मुझे अपनी उंगलियों पर नचा लेगा? तेरी इस काली औकात को मैं कल सड़क पर ला दूँगी। हरामखोर, तूने आज जो किया है, उसकी कीमत तू अपनी खाल उधड़वा कर चुकाएगा!"
करीम ने उस गाली को सुनकर भी कोई बुरा नहीं माना, बल्कि एक ठंडी हंसी हंसी।
करीम (अपनी लुंगी संभालते हुए): "गाली दे लीजिए मालकिन... जितना ज़हर उगलना है, उगल दीजिए। पर याद रखियेगा, अभी थोड़ी देर पहले यही 'कुत्ता' आपकी उस सुडौल गाँड को चाट रहा था और आप मजे में सिसक रही थीं। ज़बान से गाली दे रही हैं, पर ई आपका गोरा बदन तो अभी भी हमारे इसी काले फौलाद के लिए तड़प रहा है।"
अनीता ने उसे एक आखिरी नफरत भरी नज़र से देखा और तेज़ी से डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ गई, क्योंकि राज के जूतों की आवाज़ अब बिल्कुल करीब आ चुकी थी। उसका चेहरा तमतमाया हुआ था और उसके भारी वक्ष अभी भी तेज़ साँसों के साथ सूट के अंदर ऊपर-नीचे हो रहे थे।
राज जैसे ही रसोई में दाखिल हुआ, उसने देखा कि अनीता काउंटर के पास खड़ी होकर तेज़ी से पानी पी रही है।
अनीता ने गिलास नीचे रखा और राज की ओर मुड़ी। उसे अपनी जांघों के बीच करीम की लार की नमी अभी भी महसूस हो रही थी, जो उसे उसकी 'गुलामी' की याद दिला रही थी।
रात के खाने की मेज़ सजी हुई थी। राज थके हुए मगर खुश लग रहे थे। अनीता उनके सामने बैठी थी, कोशिश कर रही थी कि सब कुछ सामान्य लगे।
करीम हाथ में तौलिया लिए कोने में खड़ा था, जैसे एक वफादार नौकर हो।
राज (सूप पीते हुए): "अनीता, आज तुम कुछ थकी हुई लग रही हो? और ये हाई-नेक सूट? आज तो गर्मी काफी थी ना?"
अनीता (घबराकर, सूप के चम्मच से खेलते हुए): "वो... बस राज, हल्का सा जुकाम महसूस हो रहा था, तो सोचा कि खुद को ढक कर रखूँ।"
उसी वक्त करीम पानी का जग लेकर मेज़ के पास आया। उसने जानबूझकर राज के गिलास में पानी भरते हुए अपनी नज़रें अनीता के चेहरे पर गड़ा दीं।
करीम (राज से, मगर देख अनीता को रहा था): "साहब, मालकिन आज दिन भर बहुत मेहनत की हैं। लगता है रसोई की गर्मी उन्हें चढ़ गयी है। हमने तो कहा था कि आराम कीजिये, पर मालकिन तो 'गहराई' तक काम करने में विश्वास रखती हैं।"
अनीता के हाथ से चम्मच छूटते-छूटते बचा। 'गहराई' शब्द को करीम ने जिस लहज़े में कहा था, उसका मतलब सिर्फ अनीता समझ रही थी।
राज (हँसते हुए): "अरे करीम, तुम तो जानते ही हो मेमसाहब को, जब तक काम परफेक्ट न हो, इन्हें चैन नहीं आता।"
करीम (एक कुटिल मुस्कान के साथ अनीता की आँखों में झाँकते हुए): "जी साहब, वही तो हम देख रहे थे। आज मालकिन ने जो सीखा है, वो ज़िंदगी भर याद रहेगा। है ना मालकिन?"
अनीता की जांघों के बीच फिर से वही तीखा दर्द उभर आया। उसे महसूस हो रहा था कि मेज़ के नीचे करीम की नज़रों का वजन उसके शरीर को फिर से नंगा कर रहा है। उसे राज के सामने अपनी बेइज्जती महसूस हो रही थी, मगर वह कुछ कह नहीं पा रही थी।
राज: "करीम, तुम जाओ अब। हम बाकी देख लेंगे।"
करीम (जाते-जाते, मुड़कर एक आखिरी बार अनीता को देखते हुए): "ठीक है साहब। मालकिन, अगर रात में किसी 'चीज़' की ज़रूरत हो... दर्द-वर्द ज़्यादा हो, तो बुला लीजियेगा। हम जाग रहे हैं।"
करीम के बाहर निकलते ही अनीता को लगा जैसे उसके फेफड़ों में हवा वापस आई हो। मगर उसे पता था कि राज के बिस्तर पर लेटे हुए भी, उसकी कोख में करीम के उस १० इंच के लंड की टीस अभी बाकी थी।
अनीता का पूरा बदन गुस्से और खौफ के मारे थरथरा रहा था। उसने बदहवासी में अपनी पैंटी और सलवार को ऊपर खींचा और कांपते हाथों से नाड़ा बाँधने लगी। करीम की उस नीच हरकत और राज की मौजूदगी के बावजूद की गई इस दरिंदगी ने अनीता के भीतर की सारी मर्यादा को आग लगा दी थी।
जैसे ही वह काउंटर के पीछे से बाहर निकली, उसने मुड़कर करीम की आँखों में देखा—उन आँखों में प्रतिशोध और नफरत का उबाल था।
अनीता (दाँत पीसते हुए, फुसफुसाकर गाली देते हुए): "कुत्ते की औलाद! तेरी हिम्मत कैसे हुई... तू एक नीच और गंदा जानवर है करीम। तू सोच रहा है कि तू मुझे अपनी उंगलियों पर नचा लेगा? तेरी इस काली औकात को मैं कल सड़क पर ला दूँगी। हरामखोर, तूने आज जो किया है, उसकी कीमत तू अपनी खाल उधड़वा कर चुकाएगा!"
करीम ने उस गाली को सुनकर भी कोई बुरा नहीं माना, बल्कि एक ठंडी हंसी हंसी।
करीम (अपनी लुंगी संभालते हुए): "गाली दे लीजिए मालकिन... जितना ज़हर उगलना है, उगल दीजिए। पर याद रखियेगा, अभी थोड़ी देर पहले यही 'कुत्ता' आपकी उस सुडौल गाँड को चाट रहा था और आप मजे में सिसक रही थीं। ज़बान से गाली दे रही हैं, पर ई आपका गोरा बदन तो अभी भी हमारे इसी काले फौलाद के लिए तड़प रहा है।"
अनीता ने उसे एक आखिरी नफरत भरी नज़र से देखा और तेज़ी से डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ गई, क्योंकि राज के जूतों की आवाज़ अब बिल्कुल करीब आ चुकी थी। उसका चेहरा तमतमाया हुआ था और उसके भारी वक्ष अभी भी तेज़ साँसों के साथ सूट के अंदर ऊपर-नीचे हो रहे थे।
राज जैसे ही रसोई में दाखिल हुआ, उसने देखा कि अनीता काउंटर के पास खड़ी होकर तेज़ी से पानी पी रही है।
अनीता ने गिलास नीचे रखा और राज की ओर मुड़ी। उसे अपनी जांघों के बीच करीम की लार की नमी अभी भी महसूस हो रही थी, जो उसे उसकी 'गुलामी' की याद दिला रही थी।
रात के खाने की मेज़ सजी हुई थी। राज थके हुए मगर खुश लग रहे थे। अनीता उनके सामने बैठी थी, कोशिश कर रही थी कि सब कुछ सामान्य लगे।
करीम हाथ में तौलिया लिए कोने में खड़ा था, जैसे एक वफादार नौकर हो।
राज (सूप पीते हुए): "अनीता, आज तुम कुछ थकी हुई लग रही हो? और ये हाई-नेक सूट? आज तो गर्मी काफी थी ना?"
अनीता (घबराकर, सूप के चम्मच से खेलते हुए): "वो... बस राज, हल्का सा जुकाम महसूस हो रहा था, तो सोचा कि खुद को ढक कर रखूँ।"
उसी वक्त करीम पानी का जग लेकर मेज़ के पास आया। उसने जानबूझकर राज के गिलास में पानी भरते हुए अपनी नज़रें अनीता के चेहरे पर गड़ा दीं।
करीम (राज से, मगर देख अनीता को रहा था): "साहब, मालकिन आज दिन भर बहुत मेहनत की हैं। लगता है रसोई की गर्मी उन्हें चढ़ गयी है। हमने तो कहा था कि आराम कीजिये, पर मालकिन तो 'गहराई' तक काम करने में विश्वास रखती हैं।"
अनीता के हाथ से चम्मच छूटते-छूटते बचा। 'गहराई' शब्द को करीम ने जिस लहज़े में कहा था, उसका मतलब सिर्फ अनीता समझ रही थी।
राज (हँसते हुए): "अरे करीम, तुम तो जानते ही हो मेमसाहब को, जब तक काम परफेक्ट न हो, इन्हें चैन नहीं आता।"
करीम (एक कुटिल मुस्कान के साथ अनीता की आँखों में झाँकते हुए): "जी साहब, वही तो हम देख रहे थे। आज मालकिन ने जो सीखा है, वो ज़िंदगी भर याद रहेगा। है ना मालकिन?"
अनीता की जांघों के बीच फिर से वही तीखा दर्द उभर आया। उसे महसूस हो रहा था कि मेज़ के नीचे करीम की नज़रों का वजन उसके शरीर को फिर से नंगा कर रहा है। उसे राज के सामने अपनी बेइज्जती महसूस हो रही थी, मगर वह कुछ कह नहीं पा रही थी।
राज: "करीम, तुम जाओ अब। हम बाकी देख लेंगे।"
करीम (जाते-जाते, मुड़कर एक आखिरी बार अनीता को देखते हुए): "ठीक है साहब। मालकिन, अगर रात में किसी 'चीज़' की ज़रूरत हो... दर्द-वर्द ज़्यादा हो, तो बुला लीजियेगा। हम जाग रहे हैं।"
करीम के बाहर निकलते ही अनीता को लगा जैसे उसके फेफड़ों में हवा वापस आई हो। मगर उसे पता था कि राज के बिस्तर पर लेटे हुए भी, उसकी कोख में करीम के उस १० इंच के लंड की टीस अभी बाकी थी।
Deepak Kapoor
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