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Adultery अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play)
आहिस्ता-आहिस्ता बहकाना—3

 
कोठरी के भीतर पसरा हुआ वह भारी सन्नाटा अब करीम की मुकम्मल जीत की गवाही दे रहा था। अनीता के जाने के बाद भी उस तंग कमरे की सीलन भरी हवा में उसके महंगे इत्र, पसीने की तीखी गंध और उस 'मथनी' के बाद पैदा हुए कामुक रस की महक घुली हुई थी।

 
करीम अपनी पुरानी चारपाई पर चित लेटा हुआ था, उसकी बाहें सिर के नीचे दबी थीं और उसकी आँखें छत की उन टूटी हुई कड़ियों को घूर रही थीं, जैसे उनमें वह सारा मंज़र फिर से देख रहा हो।

 
उसके चेहरे पर एक वहशी और ज़हरीली मुस्कान थी।

 
करीम (मन ही मन, एक गहरी और ठंडी सांस लेते हुए):
"उफ़...आज कलेजे को ठंडक मिल गई। राज साहब... आप सोचते होंगे कि इस आलीशान बंगले के मालिक आप हैं, पर आज उस मेमसाहब के बदन का असली मालिक ई काला करीम था। आज उनके उस गोरे किले को इस मजदूर ने फतह किया है।"

 
करीम को अपनी मर्दानगी पर एक अलग ही खूँखार गुरूर महसूस हो रहा था। उसने अपने उन बड़े, काले हाथों को उठाकर गौर से देखा।
 
करीम (अपनी उंगलियों को देखते हुए):
"क्या नज़ारा था वो... जब मेरे ये काले और गंदे हाथ उनकी उन सुडौल और पुष्ट चूतियों पर जकड़े हुए थे। कहाँ वो दूध जैसा सफेद रंग और कहाँ मेरे ई काले पंजे! जब मैं उन्हें दबा रहा था, तो ऐसा लग रहा था जैसे मलाई के गोलों को मसल रहा हूँ। ई रईस औरतें... बाहर से कितनी अकड़ दिखाती हैं, पर जब मेरा ई १० इंच का लंड अंदर धंसा, तो सारी हेकड़ी धरी की धरी रह गई।"

 
करीम ने अपनी आँखों को बंद किया और उस रेशमी छुअन को याद करने लगा।
 
करीम (फुसफुसाते हुए):
"और वो जांघें... उफ़! इतनी चिकनी और बेदाग कि हाथ रखो तो फिसल जाए। हाथीदांत जैसी चमक थी उनमें। जब मैंने उन्हें फैलाकर अपना मुँह उस गुलाबी कली में गाड़ा था, तो मेमसाहब कइसे मछली की तरह तड़प रही थीं। वो गोरा पेट... वो गहरी नाभि... आज तो इस करीम ने जन्नत की एक-एक गली की सैर की है।"

 
करीम ने अपनी जांघों पर हाथ फेरा, जहाँ अब भी अनीता के बदन की गर्मी महसूस हो रही थी।
करीम (खिलखिलाकर हंसते हुए):
 
"मज़ा तो तब आया जब वो रईस मालकिन अपनी सारी रईसी और लाज-शरम भूलकर मेरे सामने घुटनों पर आ गई। 'मत जाओ करीम... मुझे पूरा कर दो... मुझे निचोड़ दो'... आह! वो लफ़्ज़ मेरे कानों में अब भी शहद की तरह घुल रहे हैं। राज साहब को तो बस ऊपरी चमक मिली है, पर आज उनकी पत्नी की रूह और हवस... दोनों ई करीम के कदमों में थी!"

 
करीम ने एक बार फिर अपनी मुट्ठी कसी, जैसे वह अब भी उन सुडौल उभारों को महसूस कर रहा हो। उसे पता था कि अब खेल बदल चुका है।

 
कोठरी की उमस और सन्नाटे में करीम की बीड़ी का सिरा किसी जलती हुई आंख की तरह सुलग रहा था। हर कश के साथ उसके चेहरे पर वह वहशी मुस्कान गहरी होती जा रही थी।

 
करीम (धुआं छोड़ते हुए और कुटिल हंसी के साथ): "राज भैया... आप तो बस फूल की पंखुड़ियों की तरह सहलाना जानते हैं। सफ़ेद कुरता पहनकर बगल में लेट जाने से औरत की रूह शांत नहीं होती। आपको क्या पता कि ई धरती जब तक फौलादी हल से ना जोती जाए, तब तक फसल लहलहाती नहीं है। आज जब मेरा वह १० इंच का काला लंड उनकी गहराइयों को चीर रहा था, तब अनीता बेटी को पता चला होगा कि असली मर्द की मार क्या होती है। आपका वह छोटा सा खिलौना तो बस उनके जिस्म को सहलाता होगा, पर आज मेरे इस प्रहार ने उनकी योनि की चूलें हिला दी हैं।"

करीम के दिमाग में उस पल का मंज़र फिर से जीवंत हो उठा जब उसने अपना सारा गर्म वीर्य अनीता के अंदर उड़ेला था। उसे वह खिंचाव याद आ रहा था जब अनीता की योनि ने उसके मोटे अंग को पागलों की तरह जकड़ लिया था।
 
करीम (उठकर बैठते हुए): "अब खेल शुरू हुआ है। अब अनीता बेटी चाहकर भी इस गरीब की कोठरी से दूर नहीं रह पाएंगी। रईस औरतों को एक बार जब इस कालेपन का चस्का लग जाता है, तो उन्हें मखमली बिस्तर पर नींद नहीं आती। अब उन्हें राज भैया के कोमल हाथ 'जनाना' लगेंगे। उन्हें तो अब ई लंड चाहिए होगा, जो अंदर तक फाड़कर रख दे।"

 
करीम ने बीड़ी का एक लंबा कश खींचा और उसकी नज़रें चादर पर पड़ीं, जहाँ अनीता के बदन का रस और उसके अपने वीर्य के धब्बे अभी भी गीले थे। उसने अपनी खुरदरी उंगलियों से उस गीलेपन को छुआ और उसे अपनी नाक के पास ले गया।

 
करीम (आंखें बंद करके मदहोशी में): "उफ़... ई खुशबू! ई रईसी और हवस का मेल है। मुझे याद आ रहा है... वो दूधिया गोरे स्तन कइसे मेरे काले सीने पर रगड़ खा रहे थे। जब मैंने उनके उन सुडौल उभारों को अपने इन सख्त हाथों में दबोचा था, तो ई मलाई जैसे नरम हिस्से मेरे पोरों के बीच कइसे सिसक रहे थे। और वो गुलाबी चोटियां... कसम खुदा की, ई करीम ने उन्हें दाँतों से काट-काट कर लाल कर दिया है। अब जब राज साहब उन्हें चूमना चाहेंगे, तो वो निशान उन्हें मेरी याद दिलाएंगे।"

 
करीम ने अपनी आँखों के सामने अनीता की उन नंगी और बेदाग जांघों का मंज़र फिर से ताज़ा किया।
 
करीम (बुदबुदाते हुए): "कितनी चिकनी और सफेद थीं वो जांघें... जैसे कोई रेशम की चादर। जब मैंने उन्हें फैलाकर अपना चेहरा वहां गाड़ा था, तो उनकी गीली और सुथरी चूत कइसे थरथरा रही थी। ई जो गोरापन उनके बदन के एक-एक कोने में भरा है ना, उसे आज मेरे कालेपन ने पूरी तरह से प्रदूषित कर दिया है। बेटी, अब तुम चाहे कितनी भी गंगा नहा लो, ई करीम का दाग अब तुम्हारी रूह से नहीं धुलेगा। तुम्हें याद आएगा कि कैसे एक काला नौकर तुम्हें अपनी जांघों पर बिठाकर घोड़ी की तरह नचा रहा था और तुम बेबस होकर रहम की भीख मांग रही थीं।"

 
करीम को अपनी गरीबी पर आज कोई मलाल नहीं था। उसे अपनी काली और मज़बूत काया पर गर्व था।
करीम (बीड़ी फेंकते हुए): "लोग कहते हैं कि पैसा सब कुछ खरीद सकता है। पर राज साहब... पैसा आज आपकी बीवी की भूख नहीं मिटा पाया। आज उसकी प्यास बुझाने के लिए आपको इसी काले करीम के लंड की शरण लेनी पड़ी। अब तो बस इंतज़ार है उस रात का, जब राज भैया सो जाएंगे और मेमसाहब लंगड़ाते हुए फिर से इसी अँधेरी कोठरी का दरवाज़ा खटखटाएंगी... क्योंकि इस १० इंच के लोहे का स्वाद अब उनकी रगों में जहर बनकर दौड़ रहा है।"

 
करीम ने चादर पर पड़े उन निशानों को एक बार फिर छुआ। उसे पता था कि कल जब अनीता रसोई में आएगी, तो उसकी झुकी हुई नज़रें और उसकी भारी साँसें चीख-चीख कर कहेंगी कि वह अब इस काले नौकर की गुलाम बन चुकी है।

 
(करीम की आँखों में अचानक एक ठंडी चमक आती है, वह अपनी परछाईं को दीवार पर देखते हुए बड़बड़ाता है)
"पर कहीं ऐसा न हो कि साहब का दिया सिंदूर फिर से इसके माथे पर भारी पड़ जाए। ई मेमसाहब लोग... बड़ा जल्दी 'गिल्ट' (पछतावा) पाल लेती हैं। अभी तो तड़प रही थी, पर हो सकता है कल उसे राज भैया के धोखे का डर सताने लगे। कहेगी—'करीम, जो हुआ उसे भूल जाओ, मुझसे दूर रहो'।"

 
(वह एक क्रूर हँसी हँसता है और अपने हाथ की मुट्ठी भींचता है)
"तब क्या करूँगा मैं? उसकी 'ना' को मान लूँना... कतई नहीं। अगर उसने इनकार किया, तो उसे मौका ही नहीं दूँगा कि वो पूरी तरह 'ना' कह पाए। ई जो १० इंच का लंड है, जब ये फिर से उसकी देह के किवाड़ तोड़ेगा, तो सारा धर्म-करम और राज साहब का प्यार धुएँ की तरह उड़ जाएगा। गुलामी एक बार शुरू हो गई, तो फिर मेमसाहब की मर्जी का कोई मोल नहीं रह जाता।"
 
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अनीता अपने बेडरूम के आलीशान मखमली बिस्तर पर लेटी हुई थी, लेकिन आज उसे यह रेशमी चादरें काँटों की तरह चुभ रही थीं। कमरे की एयर-कंडीशनिंग की ठंडक भी उसके बदन के भीतर लगी उस आग को शांत नहीं कर पा रही थी जो करीम की कोठरी में सुलगी थी। उसकी जांघों के बीच का वह तीखा दर्द उसे बार-बार उस शर्मनाक मंज़र की याद दिला रहा था।

 
अनीता (अपने चेहरे को तकिये में छिपाकर, सिसकते हुए): "हे भगवान !ये मैंने क्या कर दिया? मैं इतनी गिर कैसे सकती हूँ? एक नौकर... एक मामूली नौकर के बिस्तर पर मैं एक जानवर की तरह तड़प रही थी। राज... अगर राज को ज़रा भी भनक लग गई, तो मैं उन्हें क्या मुँह दिखाऊँगी?"

 
अनीता ने उठकर ड्रेसिंग टेबल के आईने में खुद को देखा। उसके गले और कंधों पर करीम के उन हाथों और दांतों के लाल निशान साफ़ चमक रहे थे। उसे करीम की वह गंदी हंसी याद आई जब वह राज की तुलना खुद से कर रहा था।

 
अनीता (आईने में अपनी आँखों में देखते हुए): "उस जाहिल की हिम्मत कैसे हुई राज के बारे में ऐसी बातें करने की? राज मेरा सब कुछ हैं... वो मुझसे कितना प्यार करते हैं, मेरी कितनी इज़्ज़त करते हैं। और वह काला साया... वह तो बस एक जानवर है। उसने अपनी ताकत के दम पर मुझे अपनी हवस का शिकार बनाया और मैं... मैं उसमें बहती चली गई।"

 
अनीता को वह अहसास याद आया जब करीम का १० इंच का वह भारी लंड उसके भीतर समाया था। एक पल के लिए उसके जिस्म में बिजली दौड़ गई, लेकिन तुरंत ही ग्लानि  ने उसे घेर लिया।

 
अनीता (गुस्से और नफरत में खुद से): "सिर्फ इसलिए कि उसका वह... वह हिस्सा बड़ा था, इसका मतलब यह नहीं कि वह राज से बेहतर है। राज एक इंसान हैं, एक जेंटलमैन हैं। करीम ने मुझे नीचा दिखाने की कोशिश की। उसने सोचा कि वह मुझे अपना खिलौना बना लेगा। नहीं!"

 
अनीता ने गुस्से में अपनी साड़ी का पल्लू कस लिया। उसके मन में एक दृढ़ निश्चय जन्म ले रहा था।
अनीता (दृढ़ता के साथ): "वह सिर्फ एक गलती थी... एक कमज़ोर पल। मैं करीम की कठपुतली नहीं बनूँगी। उसने सोचा होगा कि अब मैं हर रोज़ उसकी कोठरी के चक्कर लगाऊँगी, पर उसे अंदाज़ा नहीं है कि मैं कौन हूँ। मैं इस घर की मालकिन हूँ और वह सिर्फ एक नौकर है। कल से मैं उसे उसकी औकात याद दिलाऊँगी।"

 
तभी उसे याद आया कि कैसे वह करीम के सामने भीख माँग रही थी—'मुझे पूरा कर दो'। उसकी रूह काँप उठी।

 
अनीता (सिसकते हुए): "मैंने उससे भीख माँगी... ओह गॉड! वह एहसास... वह इतना ताकतवर था कि मैं अपना आपा खो बैठी थी। पर अब और नहीं। राज आज रात वापस आएँगे, मैं उनके गले लगकर अपनी इस गंदगी को धो डालूँगी। करीम ने जो बीज बोने की कोशिश की है, मैं उसे पनपने नहीं दूँगी। वह सिर्फ एक बार की भूल थी... बस एक बार की।"

 
शाम के धुंधले साये गहराने लगे थे। राज के आने का वक्त करीब था। अनीता ने खुद को आईने में देखकर आखिरी बार अपने हाई-नेक सूट को ठीक किया, ताकि उसकी गर्दन पर छपे करीम के 'दाग' दुनिया की नज़रों से छिपे रहें। लेकिन उसका मन अभी भी उस कोठरी के अंधेरे में फँसा था।

 
राज के आने से पहले, अनीता ने हिम्मत जुटाई और इंटरकॉम से करीम को रसोई में बुलाया। वह इस अध्याय को हमेशा के लिए बंद कर देना चाहती थी।

 


रसोई में आमना-सामना
 
करीम रसोई में दाखिल हुआ। उसके चेहरे पर वही चिर-परिचित, ढीठ मुस्कान थी।
 
अनीता (सख्त और काँपती आवाज़ में): "करीम, जो कुछ भी आज हुआ... उसे भूल जाओ। हमारा वह समझौता अब खत्म होता है। तुमने मुझसे वादा किया था कि तुम क्वार्टर में कुछ भी गलत नहीं करोगे, बस साथ लेटोगे। तुमने अपनी जुबान तोड़ी है।"

 
करीम (अपनी लुंगी ठीक करते हुए, बेबाक अंदाज़ में): "अरे मालकिन, हमने कहाँ जुबान तोड़ी?हमने तो 30 मिनट पूरे होते ही पीछे हटने की कोशिश की थी।"

 
अनीता (गुस्से में): "तुमने मेरा फायदा उठाया करीम! तुम जानते थे कि मैं उस वक्त होश में नहीं थी।"

 
करीम (एक कुटिल हंसी के साथ अनीता के कान के पास झुककर): "सही कहिए मालकिन... आप होश में नहीं, जोश में थीं। याद कीजिए, जब मेरा १० इंच का फौलाद आपकी गहराइयों को चीर रहा था, तब आप राज साहब को याद कर रही थीं या मेरे बालों को अपनी मुट्ठियों में भींच रही थीं? हमने तो रुकने को कहा था, पर आप ही हमारे गले लगकर रोने लगी थीं... 'करीम... आह्ह... मत जाओ... मुझे पूरा कर दो... मुझे निचोड़ दो'।"

 
करीम अपनी नज़रों को अनीता के भारी स्तनों पर टिका दिया जो सूट के अंदर तेजी से धड़क रहे थे।

 
करीम (फुसफुसाते हुए): "बेटी, ई जो मोटा प्रहार आज आपकी उस वर्जिन जैसी चूत को मिला है ना, उसका नशा इतनी जल्दी नहीं उतरेगा। अभी तो आपकी जांघें भी साथ नहीं दे रही होंगी... लंगड़ाकर चल रही हैं आप। राज भैया आएँगे तो उन्हें क्या बताएंगी कि मेमसाहब की चाल काहे बदल गई है?"

 
अनीता का चेहरा शर्म और गुस्से से लाल हो गया। वह कुछ पलटकर कह पाती, तभी बाहर राज की गाड़ी के हॉर्न की तेज आवाज़ सुनाई दी।

 
जैसे ही राज की गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ रसोई की दीवारों से टकराई, अनीता घबराहट में खिड़की की ओर मुड़ी। लेकिन इससे पहले कि वह एक कदम भी हिल पाती, करीम ने झपट्टे मारकर उसे किनारे की दीवार से सटा दिया।

 
करीम के दोनों भारी और खुरदरे हाथों ने अनीता के सुडौल स्तनों को पूरी ताकत से दबोच लिया। अनीता के मुँह से एक दबी हुई चीख निकलने ही वाली थी कि करीम ने अपने काले और मोटे होंठ उसके नाजुक होंठों पर टिका दिए।

 
करीम ने अपनी पकड़ इतनी सख्त थी कि अनीता की पीठ दीवार में धँस गई।

 
उसने अपने हाथों के दबाव से अनीता के स्तनों को बेरहमी से भींचना शुरू किया। अनीता ने अपने हाथों से करीम के मजबूत कंधों को पीछे धकेलने की पूरी कोशिश की, लेकिन करीम एक चट्टान की तरह अड़ा रहा।

 
अनीता ने अपना सिर हिलाकर बचने की कोशिश की, लेकिन करीम ने अपने हाथों का दबाव उन स्तनों पर और बढ़ा दिया। दर्द और अचानक उठी उत्तेजना के मारे अनीता का मुँह खुल गया ।

 
करीम की गीली और गरम ज़ुबान बिजली की तरह अनीता के मुँह के भीतर समा गई।

 
करीम की ज़ुबान अब अनीता के मुँह के हर कोने को खंगाल रही थी, जबकि उसके हाथ उन पुष्ट उभारों को किसी खिलौने की तरह मरोड़ रहे थे।

 
करीम (मुँह हटाए बिना, दबी और भारी आवाज़ में): "उफ़... बेटी! ई रईसी वाली खुशबू... राज भैया बाहर इंतज़ार कर रहे हैं और हम यहाँ आपकी इस मिठास को चख रहे हैं। अब जाइए... और ई स्वाद अपने होंठों पर लेकर उनसे मिलिए।"

 
करीम ने एक आखिरी बार उसके स्तनों को बुरी तरह भींचा और उसे झटके से छोड़ दिया। अनीता का दम फूल रहा था, उसके होंठ सूज चुके थे और उसके स्तनों पर करीम की उंगलियों की जलन अभी भी महसूस हो रही थी। बाहर से राज के कदमों की आवाज़ अब सुनाई दे रही थी।

 
अनीता ने काँपते हाथों से अपना सूट और बिखरे हुए बाल ठीक किए, जबकि करीम पीछे वाले दरवाज़े से अंधेरे में गायब हो गया।

 


 
अनीता का रोम-रोम गुस्से और अपमान से सुलग रहा था। करीम ने जिस बेशर्मी से उसे दीवार से सटाकर उसके सुडौल स्तनों को भींचा था, उसकी टीस अभी भी उसके सीने के उभारों में उठ रही थी। उसे महसूस हो रहा था कि उसके हाई-नेक सूट के नीचे उसकी गुलाबी चोटियां अभी भी करीम की उस दरिंदगी के कारण सख्त और दर्दभरी थीं।

 
लेकिन जैसे ही राज अंदर दाखिल हुए, अनीता ने एक पल के भीतर अपने चेहरे पर छाई उस बदहवासी को एक फीकी मुस्कान के पीछे छिपा लिया। वह अपनी भावनाओं को दबाने में माहिर थी, भले ही उसका दिल अभी भी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

 
राज (मुस्कुराते हुए और हाथ में अपना बैग लिए): "अनीता! तुम यहाँ रसोई में क्या कर रही हो? मैं बाहर इंतज़ार कर रहा था।"

 
राज आगे बढ़ा और उसने अनीता को बहुत ही शालीनता से गले लगाया। अनीता के लिए यह स्पर्श करीम के उस खुरदरे और भारी स्पर्श से बिल्कुल अलग था।

 
जहाँ करीम उसे निचोड़ देना चाहता था, वहीं राज का आलिंगन बहुत ही कोमल और सम्मानजनक था। जैसे ही राज का सीना अनीता के दुखते हुए स्तनों से टकराया, अनीता के मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकलने को हुई, जिसे उसने बड़ी मुश्किल से एक हल्की खाँसी में बदल दिया।

 
अनीता (अपनी आवाज़ को स्थिर करते हुए): "अरे राज, आप आ गए? मैं बस आपके लिए कॉफी की तैयारी देख रही थी। दफ्तर कैसा रहा?"

 
राज (उसकी कमर पर हाथ रखते हुए): "दफ्तर तो अच्छा था, पर घर की बहुत याद आ रही थी। तुम आज थोड़ी थकी हुई लग रही हो? और तुम्हारे होंठ... कुछ सूजे हुए से लग रहे हैं, सब ठीक तो है?"

 
अनीता का दिल एक पल के लिए जैसे थम गया। उसने तुरंत अपने चेहरे को घुमाया और काउंटर पर रखी केतली को देखने लगी।

 
अनीता (गुमराह करते हुए): "वो... शायद डिहाइड्रेशन की वजह से होगा, या शायद मैंने अनजाने में उन्हें काट लिया। आप जाकर फ्रेश हो जाइए, मैं अभी डिनर लगवा देती हूँ।"

 
राज ने देखा कि अनीता रसोई में बहुत धीरे-धीरे और थोड़ा लंगड़ाकर चल रही थी। उसके चेहरे पर अजीब सी थकान थी और उसकी आँखें राज की नज़रों से बच रही थीं।

 
राज ने फौरन पास आकर उसके कंधे पर हाथ रखा और चिंता से पूछा, "अनीता, क्या हुआ? तुम ऐसे क्यों चल रही हो? तबीयत तो ठीक है तुम्हारी?"

 
अनीता के गले में शब्द अटक गए। वह डर और शर्म के मारे काँप उठी। उसे लगा कि उसके चेहरे पर आज दोपहर की सारी दास्तान लिखी हुई है। वह कुछ बोलती, उससे पहले ही रसोई के दरवाजे पर हाथ में पानी का गिलास लिए करीम प्रकट हुआ।

 
करीम ने सीधे अनीता की आँखों में झाँका—उसकी नज़रों में एक अजीब सा अधिकार और मज़ा था। उसने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ राज की तरफ देख कर कहा:

 
"साहब, ये सब मेरी गलती है।"

 
राज चौंक गया और करीम की तरफ मुड़कर पूछा, "तुम्हारी गलती? कैसे?"

 
अनीता का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसे लगा कि करीम कहीं सब कुछ सच न उगल दे। करीम ने एक पल का 'पॉज' लिया और फिर मासूमियत का नकाब ओढ़कर बोला:
 
"साहब, दरअसल अनीता बेटी स्लिप हो गई थीं।"

 
अनीता का चेहरा शर्म और डर से पूरी तरह लाल हो गया।

 
राज ने फौरन पूछा, "कहाँ? कैसे ?"

 
करीम ने बिना पलक झपकाए झूठ की एक और परत चढ़ाई, "किचन में साहब। वो फर्श पर थोड़ा तेल गिरा हुआ था जो मुझसे साफ़ नहीं हुआ था, वहीं इनका पैर फिसल गया।"

 
करीम ने फिर अनीता की तरफ मुड़कर एक टेढ़ी मुस्कान दी और बोला, "बेटी, आपको ज़्यादा चोट तो नहीं आई न?"

 
राज ने चैन की सांस ली और अनीता से बोला, "ओह! तुम ध्यान क्यों नहीं रखतीं?  मालकिन के लिए गरम पट्टी का इंतजाम करो।"

 
करीम ने सिर झुकाकर कहा, "जी साहब, बिल्कुल।"

 
जब राज ऊपर फ्रेश होने चला गया, तो करीम अनीता के करीब आया और उसके कान में बिल्कुल पास जाकर फुसफुसाया:

 
"देखा मालकिन? तेल तो गिरा था... पर फर्श पर नहीं, मेरी चौखट पर। और स्लिप भी आप बहुत गहरी हुई हैं।"

 
करीम (बहुत ही दबी हुई आवाज़ में): "का हुआ मालकिन? राज भैया की कोमलता रास नहीं आई का? हम देख रहे थे, कइसे आप उनके गले लगकर काँप रही थीं। पर सच तो ई है कि आपके ई सुडौल अंग अभी भी इस काले करीम  के लिए तड़प रहे हैं।"

 
अनीता झटके से मुड़ी, उसकी आँखों में गुस्सा और खौफ का मिला-जुला भाव था।

 
अनीता (फुसफुसाते हुए): "तुम... तुम फिर यहाँ क्या कर रहे हो करीम? राज ऊपर हैं, अगर वो नीचे आ गए तो तुम्हारी जान ले लेंगे! चले जाओ यहाँ से!"

 
करीम ने जाने के बजाय अपनी दरिंदगी की हद पार कर दी।

 
उसने राज के ऊपर होने की परवाह किए बिना, एक झटके में अनीता के सूट को ऊपर की ओर खींच दिया। अनीता का वह दूधिया सफेद बदन रसोई की मद्धम रोशनी में चमक उठा। उसके सुडौल और पुष्ट स्तन अब पूरी तरह से नग्न होकर करीम की आँखों के सामने थे, जिन पर करीम के पिछले प्रहारों के लाल निशान अभी भी ताज़ा थे।

 
करीम ने अपनी आँखें मूँद लीं और अपनी पूरी ताक़त से अनीता के उन मखमली उभारों को अपनी हथेलियों में भींच लिया। इससे पहले कि अनीता विरोध कर पाती, करीम ने अपना मुँह खोलकर उन गुलाबी चोटियों  पर अपना कब्ज़ा जमा लिया।

 
करीम (मुँह में उन सुडौल स्तनों को भरते हुए, दबी हुई जंगली आवाज़ में): "उफ़... बेटी! ई रईसी का स्वाद... कसम खुदा की, ई तो अमृत है। जी चाहता है कि अपनी पूरी ज़िंदगी इसी जन्नत के कुएँ से दूध पीकर गुज़ार दूँ। ई जो आपकी चूचों की सुडौलता है ना, ई किसी को भी काफिर बना दे।"

 
अनीता का शरीर दीवार से सटा हुआ था, उसकी साँसें अटक गई थीं। ऊपर राज के चलने की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी, जो शायद अब नीचे आने ही वाला था। लेकिन करीम की ज़ुबान का वह गीला और खुरदरा जादू अनीता के बदन में ऐसी बिजली दौड़ा रहा था कि वह चाहकर भी उसे धकेल नहीं पा रही थी।

 
करीम (एक चोटी को दाँतों से हल्का दबाते हुए): "राज भैया को क्या पता कि उनकी मालकिन का असली खजाना इस काले नौकर के मुँह में है। देखो तो, कइसे ई नंगी और भारी छाती हमारे चेहरे को ढँक ले रही है। हम तो इसे दिन-रात पीना चाहते हैं मालकिन... हर पल, हर घड़ी!"

 
अनीता ने बदहवासी में करीम के सिर को अपनी छाती पर और भी ज़ोर से भींच लिया। उसे डर था कि अगर राज ने देख लिया तो सब खत्म हो जाएगा, पर उस डर के साथ-साथ उसे करीम की उस पाशविक प्यास में एक अजीब सा सुख मिल रहा था। करीम की गर्म और भारी साँसें उसके गोरे पेट को भिगो रही थीं।

 
तभी ऊपर से राज की आवाज़ आई: "अनीता! तुम कहाँ हो? क्या डिनर तैयार है?"

 
करीम ने एक आखिरी बार उन गुलाबी कलियों को अपनी ज़ुबान से चाटा और झटके से अनीता का सूट नीचे कर दिया। उसने अनीता की आँखों में झाँका, जिनमें अब हवस और खौफ का सैलाब था।

 
करीम (जाते-जाते फुसफुसाते हुए): "जाइए मालकिन... मालिक बुला रहे हैं। पर याद रखिएगा, आपके इन सुडौल अंगों पर अब इस काले करीम की लार का निशान छप चुका है। रात भर ई प्यास आपको सोने नहीं देगी।"

 
जैसे ही अनीता ने खुद को संभाला और सीढ़ियों की ओर कदम बढ़ाए, करीम की भूखी नज़रें उसके उन भारी और सुडौल गाँड  पर जा टिकीं, जो चलने के साथ मदहोश कर देने वाली लय में हिल रहे थे। करीम के भीतर का शैतान अभी शांत नहीं हुआ था। उसने जानबूझकर ऊँची आवाज़ में आवाज़ लगाई ताकि ऊपर मौजूद राज तक उसकी बात पहुँच जाए।

 
करीम (ज़ोर से): "अनीता बेटी! ज़रा इधर तो आना... जाने से पहले बता के तो जाइये कि रात के खाने में का-का बना है? राज भैया भूखे होंगे।"

 
यह सुनते ही अनीता के कदम ठिठक गए। राज ने ऊपर से जवाब दिया, "हाँ अनीता, देख लो करीम क्या पूछ रहा है, मैं बस दो मिनट में नीचे आ रहा हूँ।"

 
राज की इसी बेफ़िक्री का फायदा उठाते हुए करीम ने अनीता का हाथ पकड़ा और उसे झटके से रसोई के काउंटर के पीछे खींच लिया, जहाँ से ऊपर खड़ा इंसान उन्हें नहीं देख सकता था।

 


 
करीम ने अनीता को काउंटर से सटाकर उल्टा खड़ा कर दिया। अनीता के विरोध करने से पहले ही करीम के मजबूत हाथों ने उसकी सफेद सलवार को एक झटके में नीचे खींच दिया। अनीता की जांघें अब नंगी थीं। करीम यहीं नहीं रुका, उसने अपनी खुरदरी उंगलियाँ अनीता की रेशमी पैंटी के किनारों में फँसाईं और उसे भी घुटनों तक सरका दिया।

 
अब अनीता के वे विशाल, सुडौल और गोरे कूल्हे करीम की आँखों के ठीक सामने पूरी तरह बेपर्दा थे। करीम ने देखा कि उन मक्खन जैसे कूल्हों पर उसके थप्पड़ों के लाल निशान अभी भी ताज़ा थे।

 
करीम (हवस भरी भारी आवाज़ में): "उफ़... ई जन्नत! ई भारी और मांसल गाँड को देख के तो कलेजा फटने लगता है। राज भैया ऊपर इंतज़ार कर रहे हैं और यहाँ उनकी मालकिन का ई गोरा खजाना हमारे सामने खुला पड़ा है।"

 
करीम ने और इंतज़ार नहीं किया। उसने अपना चेहरा उन दो गोरे नितंबों के बीच धँसा दिया। उसकी गीली और गरम ज़ुबान अब अनीता की उस गाँड  को चाट रही थी। वह कभी उन सुडौल उभारों को अपने होंठों से चूसता, तो कभी अपनी ज़ुबान को उस गहरी दरार में ऊपर-नीचे फिराता।

 
अनीता ने काउंटर को अपनी मुट्टियों में जकड़ लिया। उसकी योनि से रस का एक और फव्वारा फूट पड़ा। उसे महसूस हो रहा था कि करीम की दाढ़ी और मूँछें उसकी कोमल खाल को कुरेद रही थीं।

 
करीम (गाँड को चूमते और चाटते हुए): "बेटी... ई जो आपकी गाँड की सुडौलता है ना, ई किसी को भी पागल कर दे। आज रात जब आप राज भैया के साथ होंगी, तो आपको ई गीलापन और ई चाटना याद आएगा। ई गोरा मांस अब सिर्फ इस काले करीम की भूख मिटाएगा।"

 
अनीता को ऊपर से राज के जूतों की आवाज़ सुनाई दी। वह सीढ़ियाँ उतर रहा था। अनीता की साँसें गले में अटक गई थीं, लेकिन करीम की ज़ुबान का वह नशा उसे हिलाने भी नहीं दे रहा था।
Deepak Kapoor
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RE: अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play) - by Deepak.kapoor - 23-03-2026, 06:49 AM



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