20-03-2026, 03:40 PM
पहला काम.... 'अलग काम'
इधर आशा भी धीरे - धीरे आश्चर्य के सागर में गोते लगाने लगी --- क्योंकि आशा के हाथ के नर्म छूअन के बाद से ही रणधीर बाबू का लंड पल-प्रतिपल फूलता ही जा रहा है और मोटाई और चौड़ाई भी ऐसी बना रखी है जैसा की आज तक आशा ने केवल पोर्न मूवी क्लिप्स में ही देखी है. रोज़ रातों को मम्मी, पापा और नीर के सो जाने के बाद आशा अकेली तन्हा हो कर बिस्तर पर पड़े - पड़े ही मोबाइल पर पोर्न मूवी देखते हुए साड़ी को जाँघों तक उठा कर अपनी बीच वाली लंबी ऊँगली से चूत खुजाती और कलाकार ऊँगली की कलाकारी की मदद से ही पानी छोड़ते हुए सो जाती --- कुछेक बार ऐसा भी हुआ है की पानी छोड़ने के बाद मन में भारी पश्चाताप का बोध की है आशा ने पर एक मशहूर अभिनेता का डायलॉग --- ‘अपने को क्या है; अपने को तो बस पानी निकालना है!’ याद आते ही शर्म से लाल हो जाती और दोगुनी उत्तेजना से भर वो फिर से पानी निकालने के काम में लग जाती…
पर यहाँ बात यह है कि आजतक आशा ने जिस तरह के आकार वाले लंड देखी थी ; सब के सब मोबाइल के पोर्न मूवीज़ में --- उसने कभी यह कल्पना नहीं की होगी की वास्तविक जीवन में भी ऐसा औज़ार का होना सम्भव है !!
निःसंदेह नीर के पापा का भी हथियार का दर्शन की है वह पर इतने सालों में तो वह उसका चेहरा भी लगभग भूल चुकी है --- हथियार को याद रखना बाद की बात है और अगर हथियार याद नहीं है, तो इसका मतलब हथियार कुछ खास रहा भी नहीं होगा! (ऐसा वो कभी - कभी सोचती थी!!)
इधर लंड फुंफकार रहा था और उधर रणधीर बाबू दिल ही में ज़ोरों से आहें भर रहे थे. खड़े रणधीर बाबू ने जब नज़रें नीची कर कुर्सी पर बैठी आशा को उनका लंड हिलाते हुए देखने की कोशिश की तो पहली ही कोशिश में उनकी आँखें चौड़ी होती चली गई…. ऊपर से देखने पर आशा की पल्लू विहीन दूधिया चूचियों के बीच की घाटी अधिक लंबी और गहरी लग रही है और इतना आकर्षक लग रहा है कि एक बार के लिए तो रणधीर बाबू का दिल ही धड़कना बंद हो गया !! और तो और, उसकी ब्लाउज भी पीछे से, जोकि पीठ पर डीप ‘U’ कट लिए है, आधे से अधिक गोरी, चिकनी, बेदाग़ पीठ सामने दृश्यमान हो रही है. ब्लाउज भी कुछ ऐसी टाइट पहनी है जिससे उसकी पीठ की भी करीब तीन इंच की क्लीवेज बन गई है!
बुढ़ऊ हाथ बढ़ा कर आशा की दाईं चूची को थाम लिया और प्रेम से दबा कर उसकी नरमी का आंकलन करने लगा,
‘आह!’
सचमुच जितना सोचा था उससे भी कहीं अधिक नर्म हैं इसकी चूचियाँ….
‘उफ्फ्फ, साली पूरा ध्यान रखती है अपना!’ मन ही मन तारीफ किया ठरकी ने.
इधर अचानक हुई इस क्रिया (रणधीर बाबू द्वारा उसकी चूची दबाया जाना) से आशा हड़बड़ा गई. पर जल्दी संभल भी गई --- पहले दिन के पहले ही प्रोजेक्ट में रणधीर बाबू को निराश या नाराज़ नहीं करना चाहती.
अतः चुपचाप मुठ मारने के कार्य में फोकस बनाए रखी.
इधर चूचियों की नरमी ने मन के लालच को बहुत बढ़ा दिया. ब्लाउज के ऊपर से करीब 5 मिनट तक दबाने के बाद रणधीर बाबू उन दोनों चूचियों को ब्लाउज और ब्रा के नापाक कैद से आज़ाद कर, उन्हें नंगा कर अपने हाथों में ले कर उनके स्पर्श का आनंद ले पूर्ण रूप से तृप्त होना चाहते थे पर पहले ही दिन एक साथ इतने सारे काण्ड करने का कोई इरादा नहीं है उनका....
आखिर इस खेल के पुराने खिलाड़ी जो ठहरे....!
जानते हैं नारी - हृदय की आकुलता को,
उनकी व्यग्रता और बदलते मनोभावों को,
उनके छटपटाहट के सही समय को....
इसलिए बिना किसी तरह की कोई जल्दबाज़ी किए वह उन गदराई चूचियों को अपनी सख्त मुट्ठी में भींचने में ही लगे रहे....
उनकी पारखी उँगलियाँ, जल्द ही आशा को बिना कोई खास तकलीफ़ दिए, यहाँ तक की उसे पता लगने दिए बिना ही --- उसके ब्लाउज के अगले दो हुक को खोल दिए! अभी भी दो और हुक शेष थे, पर उन्हें रहने दिया --- ब्लाउज के खुले दोनों सिरों/ पल्लों को थोड़ा और फैलाया. अब करीब सत्तर प्रतिशत चूची नंगी हो गई --- बाकी अभी अंदर मौजूद एक क्रीम कलर के ब्रा में कैद हैं.
कसे हुए ब्रा कप के कारण ऊपर उठकर पहले से फूली हुई चूचियाँ अभी और अधिक फूली हुई लग रही हैं.... ये देख कर रणधीर बाबू का होश मैराथन के लिए भाग गया. दूधिया चूचियों को क्रीम कलर के ब्रा में देख मन ही मन हद से अधिक खुश होते रणधीर बाबू ये सपने देखने लगे कि गोरी आशा की गोरी चूचियाँ काले, लाल और गुलाबी ब्रा में कैसे लगेंगे??!
ब्लाउज के ऊपर से ही एक - एक कर दोनों चूचियों के नीचे हाथ रख कर बारी - बारी से तीन - चार बार इस तरह उठा कर देखा मानो दोनों चूचियों का वज़न माप माप रहे हों.
पहले तो आशा बहुत बुरी तरह से शरमाई; पर जब रणधीर बाबू को उसके चूचियों के वज़न देखते हुए एक कामाग्नि भरी ‘ऊफ्फ्फ़...ओह्ह्ह..... लवली ...’ कहते सुनी तो गर्व से वह दुगुनी हो गई.
और वाकई रणधीर बाबू उसके दोनों चूची के भार को देख जितना आश्चर्यचकित हुए, उससे कहीं ज़्यादा ख़ुशी से बल्लियों उछलने लगे अंदर ही अंदर --- ये सोच - सोच कर कि आने वाले दिनों में इन्हीं नर्म अंगों पर आरामदायक; सुकून भरे पल बीतने वाले हैं!
इधर आशा,
पता नहीं क्यूँ, अपने से पच्चीस - तीस साल बड़े --- एक बुज़ुर्ग आदमी के लंड को हिलाने तो क्या; छूने तक घृणा कर रही थी --- वही अब उसी आदमी के द्वारा उसके बूब्स मसले जाने पर उसे एक अलग ही ख़ुशी, आनंद मिलने लगी --- एक एडवेंचर सा फ़ील होने लगा उसे.
जारी है....
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इधर आशा भी धीरे - धीरे आश्चर्य के सागर में गोते लगाने लगी --- क्योंकि आशा के हाथ के नर्म छूअन के बाद से ही रणधीर बाबू का लंड पल-प्रतिपल फूलता ही जा रहा है और मोटाई और चौड़ाई भी ऐसी बना रखी है जैसा की आज तक आशा ने केवल पोर्न मूवी क्लिप्स में ही देखी है. रोज़ रातों को मम्मी, पापा और नीर के सो जाने के बाद आशा अकेली तन्हा हो कर बिस्तर पर पड़े - पड़े ही मोबाइल पर पोर्न मूवी देखते हुए साड़ी को जाँघों तक उठा कर अपनी बीच वाली लंबी ऊँगली से चूत खुजाती और कलाकार ऊँगली की कलाकारी की मदद से ही पानी छोड़ते हुए सो जाती --- कुछेक बार ऐसा भी हुआ है की पानी छोड़ने के बाद मन में भारी पश्चाताप का बोध की है आशा ने पर एक मशहूर अभिनेता का डायलॉग --- ‘अपने को क्या है; अपने को तो बस पानी निकालना है!’ याद आते ही शर्म से लाल हो जाती और दोगुनी उत्तेजना से भर वो फिर से पानी निकालने के काम में लग जाती…
पर यहाँ बात यह है कि आजतक आशा ने जिस तरह के आकार वाले लंड देखी थी ; सब के सब मोबाइल के पोर्न मूवीज़ में --- उसने कभी यह कल्पना नहीं की होगी की वास्तविक जीवन में भी ऐसा औज़ार का होना सम्भव है !!
निःसंदेह नीर के पापा का भी हथियार का दर्शन की है वह पर इतने सालों में तो वह उसका चेहरा भी लगभग भूल चुकी है --- हथियार को याद रखना बाद की बात है और अगर हथियार याद नहीं है, तो इसका मतलब हथियार कुछ खास रहा भी नहीं होगा! (ऐसा वो कभी - कभी सोचती थी!!)
इधर लंड फुंफकार रहा था और उधर रणधीर बाबू दिल ही में ज़ोरों से आहें भर रहे थे. खड़े रणधीर बाबू ने जब नज़रें नीची कर कुर्सी पर बैठी आशा को उनका लंड हिलाते हुए देखने की कोशिश की तो पहली ही कोशिश में उनकी आँखें चौड़ी होती चली गई…. ऊपर से देखने पर आशा की पल्लू विहीन दूधिया चूचियों के बीच की घाटी अधिक लंबी और गहरी लग रही है और इतना आकर्षक लग रहा है कि एक बार के लिए तो रणधीर बाबू का दिल ही धड़कना बंद हो गया !! और तो और, उसकी ब्लाउज भी पीछे से, जोकि पीठ पर डीप ‘U’ कट लिए है, आधे से अधिक गोरी, चिकनी, बेदाग़ पीठ सामने दृश्यमान हो रही है. ब्लाउज भी कुछ ऐसी टाइट पहनी है जिससे उसकी पीठ की भी करीब तीन इंच की क्लीवेज बन गई है!
बुढ़ऊ हाथ बढ़ा कर आशा की दाईं चूची को थाम लिया और प्रेम से दबा कर उसकी नरमी का आंकलन करने लगा,
‘आह!’
सचमुच जितना सोचा था उससे भी कहीं अधिक नर्म हैं इसकी चूचियाँ….
‘उफ्फ्फ, साली पूरा ध्यान रखती है अपना!’ मन ही मन तारीफ किया ठरकी ने.
इधर अचानक हुई इस क्रिया (रणधीर बाबू द्वारा उसकी चूची दबाया जाना) से आशा हड़बड़ा गई. पर जल्दी संभल भी गई --- पहले दिन के पहले ही प्रोजेक्ट में रणधीर बाबू को निराश या नाराज़ नहीं करना चाहती.
अतः चुपचाप मुठ मारने के कार्य में फोकस बनाए रखी.
इधर चूचियों की नरमी ने मन के लालच को बहुत बढ़ा दिया. ब्लाउज के ऊपर से करीब 5 मिनट तक दबाने के बाद रणधीर बाबू उन दोनों चूचियों को ब्लाउज और ब्रा के नापाक कैद से आज़ाद कर, उन्हें नंगा कर अपने हाथों में ले कर उनके स्पर्श का आनंद ले पूर्ण रूप से तृप्त होना चाहते थे पर पहले ही दिन एक साथ इतने सारे काण्ड करने का कोई इरादा नहीं है उनका....
आखिर इस खेल के पुराने खिलाड़ी जो ठहरे....!
जानते हैं नारी - हृदय की आकुलता को,
उनकी व्यग्रता और बदलते मनोभावों को,
उनके छटपटाहट के सही समय को....
इसलिए बिना किसी तरह की कोई जल्दबाज़ी किए वह उन गदराई चूचियों को अपनी सख्त मुट्ठी में भींचने में ही लगे रहे....
उनकी पारखी उँगलियाँ, जल्द ही आशा को बिना कोई खास तकलीफ़ दिए, यहाँ तक की उसे पता लगने दिए बिना ही --- उसके ब्लाउज के अगले दो हुक को खोल दिए! अभी भी दो और हुक शेष थे, पर उन्हें रहने दिया --- ब्लाउज के खुले दोनों सिरों/ पल्लों को थोड़ा और फैलाया. अब करीब सत्तर प्रतिशत चूची नंगी हो गई --- बाकी अभी अंदर मौजूद एक क्रीम कलर के ब्रा में कैद हैं.
कसे हुए ब्रा कप के कारण ऊपर उठकर पहले से फूली हुई चूचियाँ अभी और अधिक फूली हुई लग रही हैं.... ये देख कर रणधीर बाबू का होश मैराथन के लिए भाग गया. दूधिया चूचियों को क्रीम कलर के ब्रा में देख मन ही मन हद से अधिक खुश होते रणधीर बाबू ये सपने देखने लगे कि गोरी आशा की गोरी चूचियाँ काले, लाल और गुलाबी ब्रा में कैसे लगेंगे??!
ब्लाउज के ऊपर से ही एक - एक कर दोनों चूचियों के नीचे हाथ रख कर बारी - बारी से तीन - चार बार इस तरह उठा कर देखा मानो दोनों चूचियों का वज़न माप माप रहे हों.
पहले तो आशा बहुत बुरी तरह से शरमाई; पर जब रणधीर बाबू को उसके चूचियों के वज़न देखते हुए एक कामाग्नि भरी ‘ऊफ्फ्फ़...ओह्ह्ह..... लवली ...’ कहते सुनी तो गर्व से वह दुगुनी हो गई.
और वाकई रणधीर बाबू उसके दोनों चूची के भार को देख जितना आश्चर्यचकित हुए, उससे कहीं ज़्यादा ख़ुशी से बल्लियों उछलने लगे अंदर ही अंदर --- ये सोच - सोच कर कि आने वाले दिनों में इन्हीं नर्म अंगों पर आरामदायक; सुकून भरे पल बीतने वाले हैं!
इधर आशा,
पता नहीं क्यूँ, अपने से पच्चीस - तीस साल बड़े --- एक बुज़ुर्ग आदमी के लंड को हिलाने तो क्या; छूने तक घृणा कर रही थी --- वही अब उसी आदमी के द्वारा उसके बूब्स मसले जाने पर उसे एक अलग ही ख़ुशी, आनंद मिलने लगी --- एक एडवेंचर सा फ़ील होने लगा उसे.
जारी है....
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