19-03-2026, 11:41 AM
(This post was last modified: 19-03-2026, 02:33 PM by The_Writer. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
भाग ४:-
बाँध का टूटना
साक्षात्कार....
कमरे में कुछ पलों तक सन्नाटा छाया रहा.
आशा नज़रें झुकाए चुपचाप बैठी रही…
और,
रणधीर बाबू पैंट की ज़िप खोल कर,
अंडरवियर से लंड निकाले उसे मसले जा रहे हैं...
आशा के लिए प्यार है ---- पर उससे भी कहीं.... कहीं ज़्यादा वासना भी है--- रणधीर बाबू के ठरकी बूढ़े दिल में.
सामने बैठी आशा के, मेज़ तक नज़र आने वाली शरीर के ऊपरी हिस्से को काफ़ी समय से देखे जा रहे थे रणधीर बाबू --- कल्पना कर रहे थे कि आशा का जिस्म मीठे पानी का कोई दरिया हो और ख़ुद को उस पानी से तर-बतर कर हों, बार-बार, हर बार.
आशा ने फ्लोरल प्रिंट हल्की नीली साड़ी पहन रखी है आज.
मैचिंग ब्लाउज --- आधी बाँह वाली --- बड़ा व खुले गले वाला ब्लाउज, जिससे की कंधे का काफ़ी हिस्सा सामने दिख रहा है --- ऊपर से डीप नेकलाइन ---- अंग्रेजी अक्षर ‘V’ वाली डीप कट है सामने से --- गले में एक नेकलेस भी है --- पतली सी, सोने की. गोरी-चिट्टी गले में सोने की चेन काम एवं सुंदरता; दोनों में अद्भुत रूप से वृद्धि कर रही है. सोने की वह चेन थोड़ी बड़ी है और इसी बात ने रणधीर बाबू को सोच में डाला,
‘काश यह चेन आशा की क्लीवेज तक जाए... आह!! मज़ा आ जाएगा!’
इतनी सी कल्पना मात्र से ही उनका लंड और अधिक सख्त हो गया! लंड की यह हालत देख कर ख़ुद रणधीर बाबू भी हैरान रह गए. इसे इतना सख्त और फनफनाता हुआ कभी नहीं पाया था उन्होंने --- ख़ुद की बीवी तो छोड़ ही दें, शहर की टॉप एक नंबर की हाई क्लास कॉल गर्ल/वाइफ/एस्कॉर्ट भी उनके हथियार की बढ़ती उम्र में ऐसी हालत आज से पहले नहीं कर पाई थीं!
इतना काफ़ी था रणधीर बाबू को यह भरोसा देने के लिए कि ‘आशा इज़ स्पेशल !’ और स्पेशल चीज़ों से डील करने में काफी, काफी माहिर हैं रणधीर बाबू.
नज़र फ़िर केन्द्रित किया आशा पर. पल्लू को बहुत सुंदर, बहुत सलीके से प्लेट्स बनाकर बाएँ कंधे से पिन की हुई है. दोनों भौहों के मध्य एक छोटी प्यारी हल्की नीली बिंदी है. माँग में सिंदूर नहीं दिख रहा!
रणधीर बाबू चौंके,
‘आश्चर्य! सिंदूर क्यूँ नहीं है?’
‘तो, क्या हस्बैंड नहीं रहे? नहीं, नहीं... ऐसा होता तो गले में नेकलेस नहीं होता. और तो और; शायद इतने अच्छे से बन ठन कर नहीं रहती और ना आती --- हम्म, शायद ये लोग अलग हो गये हैं --- या शायद ऐसा भी हो सकता है कि आजकल की दूसरी औरतों या टीवी-फिल्मों की हीरोइनों को देख कर बिन सिंदूर पतिव्रता नारी हो --- खैर, मुझे क्या, बस मुझे सुख दे दे --- बाद बाकी जो करना है, करे.’
बालों को पीछे गर्दन के पास से एक बड़ी क्लिप से सेट कर के लगाईं है और फिर उसके नीचे से बालों को खुला छोड़ दी है --- जो की टेबल फैन से आती हवा के कारण पूरे पीठ पर उड़-उड़ कर फ़ैल रहे हैं.
“आशा…” थोड़े सख्त लहजे में नाम लिया रणधीर बाबू ने.
“ज...जी.. सर…” आशा के होंठ कँपकँपाए.
“इंटरव्यू शुरू करने से पहले तुम्हें एक ज़रूरी बात बताना चाहता हूँ.” बातों का मोर्चा सँभाला ठरकेश्वर ने.
“ज.. जी सर... कहिए.” नर्वस आशा बस इतना ही बोल पाई.
“पता नहीं ऐसा हुआ है या नहीं पर मुझे तुम एक स्मार्ट, समझदार और बेहद रेस्पोंसिबल लेडी लगती हो और अभी तक, आई होप कि तुम समझ चुकी हो शायद की, अब जो इंटरव्यू होने वाला है --- वह बाकि के इंटरव्यूज़ से बिल्कुल अलग, बिल्कुल जुदा होने वाला है --- राईट??”
बिल्कुल सपाट शब्दों में चेहरे पर बिना कोई शिकन लिए रणधीर बाबू ने अपनी बात सामने रख दी और बोलते समय बिल्कुल एक ऐसे प्रोफेशनल की तरह बिहेव किए मानो ये उनका रोज़ का काम है.
इसमें कोई दो राय नहीं की आशा को अब तक ये नहीं समझ में आया है की इंटरव्यू कैसा होने वाला है --- क्या पूछा या करने को कहा जा सकता है --- क्या आज ही के दिन से उसके कोम्प्रोमाईज़ का काम शुरू होने वाला है? --- क्या जॉब अप्लाई/जॉइनिंग के दिन ही बिन ब्याही किसी की औरत बनने वाली है?
इन सभी सवालों को दिमाग से एक झटके में निकालते हुए बोली,
“जी सर... मैं समझ रही हूँ.” इस बार आवाज़ में थोड़ी बोल्डनेस लाने का प्रयास करते हुए बोली.
“ह्म्म्म... आई गिव माई वर्ड दैट, की जो कुछ भी होगा इस बंद कमरे में --- एवरीथिंग विल बी अ सीक्रेट बिटवीन यू एंड मी --- एक अक्षर तक बाहर नहीं जाएगी--- यू गेटिंग द पॉइंट; व्हाट आई मीन??”
“यस सर....” अपनी नियति स्वीकार कर चुकी आशा ने सिर्फ़ इतना कहना ही उचित समझा.
“गुड... वैरी गुड. (सब कुछ योजनानुसार होता देख रणधीर बाबू मन ही मन बल्लियों उछलने लगे) मेरा तो कुछ नहीं --- आई जस्ट वांट तो सी यू गेटिंग इनटू एनी काइंड ऑफ़ ट्रबल.”
“ज... जी.. जी सर... आई स्वेअर, कोई भी बात बाहर नहीं जाएगी.”
“ऑलराईट देन.” बड़ी, रेवोल्विंग चेयर पर पीठ टिका कर आराम से बैठ गये रणधीर बाबू, आशा की ओर एकटक देखते हुए --- और इधर आशा भी मन ही मन ख़ुद को समझाती, सँभालती, तैयार होने लगी.
“रणधीर बाबू के इंटरव्यू के लिए !”
कमरे में फ़िर कुछ पलों के लिए सन्नाटा छा गया...
“आशा…” रणधीर बाबू के धीर, स्थिर आवाज़ ने उस सन्नाटे को भंग किया.
“यस सर...?” आशा ने रणधीर बाबू की ओर देखकर जवाब दिया --- और उस आवाज़ में चरम उत्सुकता का पुट है.
“नर्वस हो?”
“न --- नो सर…” उत्सुकता थोड़ी और बढ़ी.
“यू आर अ यंग लेडी --- कम्पेयर्ड टू मी --- राईट?”
“य... यस सर.”
“ह्म्म्म... फ़िर भी मुझे कुछ फ़ील क्यूँ नहीं हो रहा?” धीरे ही सही, पर अब पॉइंट में आना शुरू हुए रणधीर बाबू.
“प-- प --- पता --- न-- नहीं सर.’ घबराने लगी बेचारी. जवाब देती भी तो क्या जवाब देती इस बात का कि 'कुछ फील क्यों नहीं हो रहा है?”
“मुझे पता है क्यों और ये भी कि क्या करने से कुछ अच्छा फ़ील हो सकता है!” होंठों पे एक घिनौनी मुस्कान लिए बोला वो शैतान.
“क... कहिए सर, क्या करने से अच्छा फ़ील होगा… आई विल ट्राई टू डू दैट.”
“ट्राई नहीं आशा, तुम्हें ट्राई नहीं करना है क्योंकि सिर्फ़ तुम्हीं कर सकती हो और तुम्हें करना ही होगा.” अपने पासे एक-एक कर फेंक रहा था वह हवसी.
“ओ... ओके सर.”
“अगर देखा जाए तो मैं ऑलरेडी तुम्हारा बॉस हूँ... राईट??”
“यस सर!”
“एंड बॉस इज़ ऑलवेज़ राईट.... राईट??”
“यस सर!”
“और हर एम्प्लोईज़ को बॉस की हर बात बिना रोक-टोक और ना-नुकुर के सुनना चाहिए; राईट ?!”
“बिल्कुल सर.”
“तुम भी मेरी हर बात को बिना कोई रोक-टोक और ना-नुकुर के सुनोगी और मानोगी. इसलिए नहीं की तुम मेरी एम्प्लोई हो वरन इसलिए की तुमने एक सादे कागज़ में लिख कर दिया है जोकि एक तरह का बांड है.”
“यस सर, बिल्कुल.”
“ह्म्म्म.”
एक शैतानी मुस्कान मुस्कराया वह ठरकी बुड्ढा. साफ़ था... जनाब अब कुछ ‘आउट ऑफ़ लीग’ बोलने वाले हैं.
जारी है....
…………………………………..


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