17-03-2026, 09:39 AM
पुरुष कभी उस चीज़ की कदर नहीं करता जो उसके पास है।
सड़क पर... मॉल में... हाउस पार्टी में... 35 + की शादीशुदा औरत दिखती है।
हॉट माल।
कर्व्स वाला शरीर।
साड़ी का पल्लू सरकता है... जींस टाइट लगती है... ब्लाउज़ से स्तन उभरे हुए।
तुरंत दिमाग में फिल्म शुरू हो जाती है।
कितने नरम होंगे वो स्तन?
निप्पल्स कितने बड़े होंगे... कितने गुलाबी?
जब चोदूँगा... कैसे चीखेगी?
कैसे कराहेगी?
क्या अच्छी ब्लोजॉब देगी?
क्या गले तक लेगी... या सिर्फ़ हेड चूसेगी?
सोचते ही लुंड खड़ा हो जाता है।
और हकीकत ये है... कि उसके साथ ये सब... कोई न कोई पहले से कर चुका है।
उसका पति...
और वो पति... अब बोर हो चुका है।
उस हॉट माल को चोद-चोद कर अब उसकी कदर नहीं करता।
ये "पति" अब मेरी ज़िंदगी।
और ये हकीकत है—कड़वी, सच्ची, और मेरे लिए अब नॉर्मल हो चुकी।
हमारा बेडरूम।
सुबह की रोशनी खिड़की से आ रही है।
नेहा तैयार हो रही है—ऑफिस जाने के लिए।
वो अपनी साड़ी का ब्लाउज़ उतारती है।
ब्रा बाहर आती है—काली, लेस वाली।
फिर ब्रा भी उतारती है।
उसके स्तन बाहर—गोरे, भरे हुए, निप्पल्स हल्के गुलाबी।
वो मुड़ती है—मेरी तरफ देखती है।
"सैम... तुम्हें देखना है?"
वो हल्के से हँसती है—मासूम, प्यारी हँसी।
मैं बिस्तर पर बैठा हूँ।
उसकी तरफ देख रहा हूँ।
उसके स्तन... जो कभी मेरे लुंड को एक सेकंड में खड़ा कर देते थे।
अब... कुछ नहीं।
बिल्कुल कुछ नहीं।
कोई हलचल नहीं।
कोई उत्तेजना नहीं।
मेरा लुंड... शांत।
सोया हुआ।
जैसे कोई पुरानी याद हो... जो अब महसूस ही न हो।
वो आगे बढ़ती है—नंगी कमर, सिर्फ़ पेटीकोट।
उसकी चूत... हल्की-सी झाँक रही है पेटीकोट के नीचे से।
वो मेरे सामने खड़ी हो जाती है।
वो मेरे लुंड पर हाथ रखती है—हल्के से।
मैं मुस्कुराता हूँ।
वो हँसती है।
फिर तैयार हो जाती है।
साड़ी पहनती है।
ब्लाउज़।
पल्लू सेट करती है।
और बाहर चली जाती है।
मैं अकेला रह जाता हूँ।
और सोचता हूँ...
सोसाइटी की फंक्शन में... जब वो स्लीवलेस, बैकलेस ब्लाउज़ पहनकर आती है।
उसकी पीठ नंगी—गोरी, चिकनी।
उसके स्तन ब्लाउज़ से बाहर झाँकते हुए।
और वो लोग... सब देखते हैं।
राही—18-19 साल का लड़का।
उसकी आँखें नेहा की गांड पर।
गुप्ता जी—राही के पिता।
50+ उम्र, लेकिन नज़रें नेहा के स्तनों पर।
गेटकीपर—जो रोज़ सलाम करता है।
उसकी आँखें नीचे—नेहा की कमर पर।
ऑर्गनाइज़र—जो फंक्शन चलाता है।
उसकी नज़रें नेहा की जांघों पर।
उसका लेबर—मज़दूर... जो सामान ढोता है।
उसकी आँखें... नेहा की छाती पर।
और वो सब... अपनी क्रॉच एडजस्ट करते हैं।
कभी-कभी... पैंट के ऊपर से दबाते हैं।
कभी... जेब में हाथ डालकर।
टीनएजर से 60-70 साल तक।
ऑटो ड्राइवर से ऑडी ड्राइवर तक।
सब क्लास... सब उम्र।
और मैं... वो सब देखता हूँ।
और मेरा लुंड... सख्त हो जाता है।
उनकी भूख देखकर।
उनकी नज़रें देखकर।
उनके हाथ देखकर।
लेकिन... जब हम अकेले होते हैं...
जब नेहा मेरे सामने बदलती है...
उसके स्तन बाहर... चूत झाँकती हुई...
मेरा लुंड... सोया रहता है।
कोई हलचल नहीं।
कोई उत्तेजना नहीं।
हम दोनों जानते हैं कि अब हमारा इंटीमेसी कम हो रहा है।
नेहा को लगता है—काम का बोझ, थकान, मीटिंग्स, डेडलाइन्स।
मुझे भी लगता है... शायद यही वजह है।
लेकिन... असल वजह मेरे अंदर है।
मैं अब उसके साथ वो नहीं महसूस करता जो पहले महसूस करता था।
उसकी चूत... उसके स्तन... उसकी आहें... सब कुछ... पहले से कम उत्तेजक लगता है।
क्योंकि... मेरे दिमाग में... वो सब पहले से ही हो चुका है।
मेरे हाथ से... मेरी कल्पना में... नेहा को हजार बार चोदा है।
अलोक जी के साथ... डेविड के साथ... विशाल के साथ... वेटर के साथ।
उसकी चूत फैली हुई... रस बहता हुआ... वो चीखती हुई—"और जोर से..."
और मैं... बस... देखता हुआ।
झड़ता हुआ।
तो अब... असल में जब वो मेरे सामने नंगी होती है...
जब वो मेरे ऊपर चढ़ती है...
जब मैं उसके अंदर जाता हूँ...
तो कुछ नया नहीं लगता।
जैसे... कोई पुरानी फिल्म दोबारा देख रहा हूँ।
वही सीन... वही डायलॉग... वही एंडिंग।
तो अब... रेगुलर सेक्स मुझे भाता नहीं।
मुझे... कुछ और चाहिए।
कुछ गहरा... कुछ गंदा... कुछ अपमानजनक।
कुछ... जो मेरे हाथ से नहीं मिलता।
और मैं खुद से नाराज़ भी हूँ।
क्योंकि... मेरी बीवी मेरे सामने है।
गोरी... सुंदर... कर्व्स वाली... मेरी नेहा।
और मैं... उसे पूरी तरह महसूस नहीं कर पा रहा।
हम अक्सर बात करते हैं।
कल रात... हम बिस्तर पर थे।
सेक्स के बाद... वो मेरी छाती पर सिर रखे लेटी थी।
उसने धीरे से कहा—
"सैम... अब हमारा सेक्स... पहले जैसा नहीं रहा।
मुझे लगता है... हम दोनों थक जाते हैं।
काम... जिम्मेदारियाँ... सब कुछ।
क्या... हमें किसी काउंसलर से मिलना चाहिए?
कोई थेरेपिस्ट... जो हमें समझा सके?"
मैंने हँसने की कोशिश की।
"अरे... ये सब अमीरों के चोंचले हैं।
हम जैसे लोग... ऐसे में क्या करते हैं?
हमारे ऑफिस का अनपढ़ चपरासी... वो बेहतर सलाह देगा।
'भेनचोद... तेरे पास सेक्सी बीवी है... डॉगी स्टाइल में कर ले... क्या प्रॉब्लम है?'
'और तुझसे नहीं चुदती तो रात को मेरे पास बेज दे। .. में भोसड़ा बना दूंगा चूत का '
उसके लिए तो बस इतना ही है—चूत है... सेक्सी है... चोद दो।
शायद इसलिए गरीबों का सेक्स लाइफ हमसे बेहतर होता है।
वो ज़्यादा नहीं सोचते।
बस... करते हैं।"
XXXXXXXXXXXXXXX
रविवार था, छुट्टी का दिन।
सुबह-सुबह दोनों कॉफी पी रहे थे, मैं न्यूज़पेपर पढ़ रहा था, नेहा अपने फोन में स्क्रॉल कर रही थी।
अचानक वो बोली,
"हनी, ये देखो ना..."
उसने न्यूज़पेपर मेरी तरफ सरका दिया। टाइम्स ऑफ इंडिया का आर्टिकल था—फोन और स्क्रीन टाइम जोड़ों की अंतरंगता को बर्बाद कर रहे हैं वाला।
नेहा ने जोर से पढ़ना शुरू किया, जैसे कोई कॉलेज की लड़की हो रही हो—
"डॉक्टर कह रहे हैं कि आजकल कपल्स कम बात करते हैं, कम टच करते हैं, कम सेक्स करते हैं... फोन बीच में आ जाता है। सुझाव दे रहे हैं कि कुछ नया ट्राई करें—रोल प्ले, अपनी फीलिंग्स ओपनली शेयर करना, पास्ट के बारे में खुलकर बताना, सेक्स टॉयज़ यूज़
करना वगैरह।"
उसकी उँगली "रोल प्ले" पर रुक गई।
वो मेरी तरफ मुड़ी, आँखों में एक छोटी-सी चमक।
"क्या हम ये ट्राई करें?"
मेरा दिल एकदम धड़क गया।
लुंड तुरंत खड़ा हो गया—पैंट में दर्द करने लगा।
मैंने तो पहले भी सोचा था... कई बार।
सोचता था—अगर नेहा से कहूँ... रोल प्ले... वो किसी और आदमी की तरह बने, मैं देखूँ... तो क्या होगा?
पर हिम्मत नहीं हुई।
डर लगता था—क्या पता वो गुस्सा हो जाए, मुझे गंदा समझ ले, या सोचे कि मैं बीमार हूँ?
और अब... वो खुद कह रही है।
मैंने कॉफी का घूँट लिया—गले में अटक गया।
फिर धीरे से बोला,
"हाँ... ट्राई कर सकते हैं।
तुम्हें क्या ट्राई करना है?"
नेहा ने मुस्कुराया—थोड़ा शरमाकर, थोड़ा शरारती अंदाज़ में।
"पता नहीं... कुछ स्पाइसी।
सड़क पर... मॉल में... हाउस पार्टी में... 35 + की शादीशुदा औरत दिखती है।
हॉट माल।
कर्व्स वाला शरीर।
साड़ी का पल्लू सरकता है... जींस टाइट लगती है... ब्लाउज़ से स्तन उभरे हुए।
तुरंत दिमाग में फिल्म शुरू हो जाती है।
कितने नरम होंगे वो स्तन?
निप्पल्स कितने बड़े होंगे... कितने गुलाबी?
जब चोदूँगा... कैसे चीखेगी?
कैसे कराहेगी?
क्या अच्छी ब्लोजॉब देगी?
क्या गले तक लेगी... या सिर्फ़ हेड चूसेगी?
सोचते ही लुंड खड़ा हो जाता है।
और हकीकत ये है... कि उसके साथ ये सब... कोई न कोई पहले से कर चुका है।
उसका पति...
और वो पति... अब बोर हो चुका है।
उस हॉट माल को चोद-चोद कर अब उसकी कदर नहीं करता।
ये "पति" अब मेरी ज़िंदगी।
और ये हकीकत है—कड़वी, सच्ची, और मेरे लिए अब नॉर्मल हो चुकी।
हमारा बेडरूम।
सुबह की रोशनी खिड़की से आ रही है।
नेहा तैयार हो रही है—ऑफिस जाने के लिए।
वो अपनी साड़ी का ब्लाउज़ उतारती है।
ब्रा बाहर आती है—काली, लेस वाली।
फिर ब्रा भी उतारती है।
उसके स्तन बाहर—गोरे, भरे हुए, निप्पल्स हल्के गुलाबी।
वो मुड़ती है—मेरी तरफ देखती है।
"सैम... तुम्हें देखना है?"
वो हल्के से हँसती है—मासूम, प्यारी हँसी।
मैं बिस्तर पर बैठा हूँ।
उसकी तरफ देख रहा हूँ।
उसके स्तन... जो कभी मेरे लुंड को एक सेकंड में खड़ा कर देते थे।
अब... कुछ नहीं।
बिल्कुल कुछ नहीं।
कोई हलचल नहीं।
कोई उत्तेजना नहीं।
मेरा लुंड... शांत।
सोया हुआ।
जैसे कोई पुरानी याद हो... जो अब महसूस ही न हो।
वो आगे बढ़ती है—नंगी कमर, सिर्फ़ पेटीकोट।
उसकी चूत... हल्की-सी झाँक रही है पेटीकोट के नीचे से।
वो मेरे सामने खड़ी हो जाती है।
वो मेरे लुंड पर हाथ रखती है—हल्के से।
मैं मुस्कुराता हूँ।
वो हँसती है।
फिर तैयार हो जाती है।
साड़ी पहनती है।
ब्लाउज़।
पल्लू सेट करती है।
और बाहर चली जाती है।
मैं अकेला रह जाता हूँ।
और सोचता हूँ...
सोसाइटी की फंक्शन में... जब वो स्लीवलेस, बैकलेस ब्लाउज़ पहनकर आती है।
उसकी पीठ नंगी—गोरी, चिकनी।
उसके स्तन ब्लाउज़ से बाहर झाँकते हुए।
और वो लोग... सब देखते हैं।
राही—18-19 साल का लड़का।
उसकी आँखें नेहा की गांड पर।
गुप्ता जी—राही के पिता।
50+ उम्र, लेकिन नज़रें नेहा के स्तनों पर।
गेटकीपर—जो रोज़ सलाम करता है।
उसकी आँखें नीचे—नेहा की कमर पर।
ऑर्गनाइज़र—जो फंक्शन चलाता है।
उसकी नज़रें नेहा की जांघों पर।
उसका लेबर—मज़दूर... जो सामान ढोता है।
उसकी आँखें... नेहा की छाती पर।
और वो सब... अपनी क्रॉच एडजस्ट करते हैं।
कभी-कभी... पैंट के ऊपर से दबाते हैं।
कभी... जेब में हाथ डालकर।
टीनएजर से 60-70 साल तक।
ऑटो ड्राइवर से ऑडी ड्राइवर तक।
सब क्लास... सब उम्र।
और मैं... वो सब देखता हूँ।
और मेरा लुंड... सख्त हो जाता है।
उनकी भूख देखकर।
उनकी नज़रें देखकर।
उनके हाथ देखकर।
लेकिन... जब हम अकेले होते हैं...
जब नेहा मेरे सामने बदलती है...
उसके स्तन बाहर... चूत झाँकती हुई...
मेरा लुंड... सोया रहता है।
कोई हलचल नहीं।
कोई उत्तेजना नहीं।
हम दोनों जानते हैं कि अब हमारा इंटीमेसी कम हो रहा है।
नेहा को लगता है—काम का बोझ, थकान, मीटिंग्स, डेडलाइन्स।
मुझे भी लगता है... शायद यही वजह है।
लेकिन... असल वजह मेरे अंदर है।
मैं अब उसके साथ वो नहीं महसूस करता जो पहले महसूस करता था।
उसकी चूत... उसके स्तन... उसकी आहें... सब कुछ... पहले से कम उत्तेजक लगता है।
क्योंकि... मेरे दिमाग में... वो सब पहले से ही हो चुका है।
मेरे हाथ से... मेरी कल्पना में... नेहा को हजार बार चोदा है।
अलोक जी के साथ... डेविड के साथ... विशाल के साथ... वेटर के साथ।
उसकी चूत फैली हुई... रस बहता हुआ... वो चीखती हुई—"और जोर से..."
और मैं... बस... देखता हुआ।
झड़ता हुआ।
तो अब... असल में जब वो मेरे सामने नंगी होती है...
जब वो मेरे ऊपर चढ़ती है...
जब मैं उसके अंदर जाता हूँ...
तो कुछ नया नहीं लगता।
जैसे... कोई पुरानी फिल्म दोबारा देख रहा हूँ।
वही सीन... वही डायलॉग... वही एंडिंग।
तो अब... रेगुलर सेक्स मुझे भाता नहीं।
मुझे... कुछ और चाहिए।
कुछ गहरा... कुछ गंदा... कुछ अपमानजनक।
कुछ... जो मेरे हाथ से नहीं मिलता।
और मैं खुद से नाराज़ भी हूँ।
क्योंकि... मेरी बीवी मेरे सामने है।
गोरी... सुंदर... कर्व्स वाली... मेरी नेहा।
और मैं... उसे पूरी तरह महसूस नहीं कर पा रहा।
हम अक्सर बात करते हैं।
कल रात... हम बिस्तर पर थे।
सेक्स के बाद... वो मेरी छाती पर सिर रखे लेटी थी।
उसने धीरे से कहा—
"सैम... अब हमारा सेक्स... पहले जैसा नहीं रहा।
मुझे लगता है... हम दोनों थक जाते हैं।
काम... जिम्मेदारियाँ... सब कुछ।
क्या... हमें किसी काउंसलर से मिलना चाहिए?
कोई थेरेपिस्ट... जो हमें समझा सके?"
मैंने हँसने की कोशिश की।
"अरे... ये सब अमीरों के चोंचले हैं।
हम जैसे लोग... ऐसे में क्या करते हैं?
हमारे ऑफिस का अनपढ़ चपरासी... वो बेहतर सलाह देगा।
'भेनचोद... तेरे पास सेक्सी बीवी है... डॉगी स्टाइल में कर ले... क्या प्रॉब्लम है?'
'और तुझसे नहीं चुदती तो रात को मेरे पास बेज दे। .. में भोसड़ा बना दूंगा चूत का '
उसके लिए तो बस इतना ही है—चूत है... सेक्सी है... चोद दो।
शायद इसलिए गरीबों का सेक्स लाइफ हमसे बेहतर होता है।
वो ज़्यादा नहीं सोचते।
बस... करते हैं।"
XXXXXXXXXXXXXXX
रविवार था, छुट्टी का दिन।
सुबह-सुबह दोनों कॉफी पी रहे थे, मैं न्यूज़पेपर पढ़ रहा था, नेहा अपने फोन में स्क्रॉल कर रही थी।
अचानक वो बोली,
"हनी, ये देखो ना..."
उसने न्यूज़पेपर मेरी तरफ सरका दिया। टाइम्स ऑफ इंडिया का आर्टिकल था—फोन और स्क्रीन टाइम जोड़ों की अंतरंगता को बर्बाद कर रहे हैं वाला।
नेहा ने जोर से पढ़ना शुरू किया, जैसे कोई कॉलेज की लड़की हो रही हो—
"डॉक्टर कह रहे हैं कि आजकल कपल्स कम बात करते हैं, कम टच करते हैं, कम सेक्स करते हैं... फोन बीच में आ जाता है। सुझाव दे रहे हैं कि कुछ नया ट्राई करें—रोल प्ले, अपनी फीलिंग्स ओपनली शेयर करना, पास्ट के बारे में खुलकर बताना, सेक्स टॉयज़ यूज़
करना वगैरह।"
उसकी उँगली "रोल प्ले" पर रुक गई।
वो मेरी तरफ मुड़ी, आँखों में एक छोटी-सी चमक।
"क्या हम ये ट्राई करें?"
मेरा दिल एकदम धड़क गया।
लुंड तुरंत खड़ा हो गया—पैंट में दर्द करने लगा।
मैंने तो पहले भी सोचा था... कई बार।
सोचता था—अगर नेहा से कहूँ... रोल प्ले... वो किसी और आदमी की तरह बने, मैं देखूँ... तो क्या होगा?
पर हिम्मत नहीं हुई।
डर लगता था—क्या पता वो गुस्सा हो जाए, मुझे गंदा समझ ले, या सोचे कि मैं बीमार हूँ?
और अब... वो खुद कह रही है।
मैंने कॉफी का घूँट लिया—गले में अटक गया।
फिर धीरे से बोला,
"हाँ... ट्राई कर सकते हैं।
तुम्हें क्या ट्राई करना है?"
नेहा ने मुस्कुराया—थोड़ा शरमाकर, थोड़ा शरारती अंदाज़ में।
"पता नहीं... कुछ स्पाइसी।


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