16-03-2026, 01:21 PM
सवेरे थोड़ी देर से मेनका की आँख खुली। कल राजासाहब ने उसे कुछ ज़्यादा ही जम कर चोदा था। उसे मज़ा तो बहुत आया था पर उतनी ही थकान भी हो गयी थी। उसकी चूत आज कुछ ज्यादा ही दर्द कर रही थी। वह थोड़ी मुस्कुराई और अपने आप से कहने लगी की यह तो होना ही था जब तुम्हे चुदने का इतना शौक है और वो भी मुसल लंड से।
उसने सोचा कि आज ऑफीस ना जाए पर फिर लगा कि कल ही तो उसे वी-पी बनाया गया है और आज पहले दिन ही ग़ैरहाज़िर रहे, ये अच्छा नही लगेगा। फिर आज सॅटर्डे था, तो ऑफीस आधे दिन मे ही ख़तम हो जाना था।
मेनका रेडी होकर नीचे आई तो पता चला कि राजासाहब पहले ही ऑफीस जा चुके हैं तो वो भी फटाफट नाश्ता कर ऑफीस पहुँच गयी। आज राजासाहब ने ऑफीस मे कल वाली हरकत नही दोहराई तो उसने राहत की साँस ली पर साथ ही साथ थोड़ा निराश भी हुई। पर फिर आने वाली रात का ख़याल आते ही उसके होठों पर मुस्कान और चूत मे गीलापन आ गया।
शाम 4 बजे राजासाहब ने उस से ऑफीस से चलने को कहा। दोनो कार मे बैठ गये और राजासाहब ने ड्राइविंग शुरू कर दी। मैत्री की पेशकश
"अरे,ये किधर जा रहे हो? ये रास्ता तो घर नही जाता।"
"हा, हम घर जा भी नही रहे।"
"तो फिर कहा जा रहे हैं?" मेनका खिसक कर अपने ससुर से सॅट कर बैठ गयी।
"वो तो पहुँच कर ही पता चलेगा।" उन्होने भी उसे अपनी बाँह मे समेट लिया।
"हम रात तक वापस तो आ जाएँगे ना?"
"अब तो हम कल शाम को ही लौटेंगे।"
"ओह। पर हमे कपड़े तो ले लेने लेते घर से।"
"जहा हम जा रहें है वाहा कपड़ों की कोई ज़रूरत नही है मेरी जान।" राजासाहब ने उसके गाल पर चूम लिया।
"हटो। मैं बिना कपड़ों के नही रहूंगी।" मेनका बनावटी गुस्से से बोली।
"वो तो हम पहुँच कर देखेंगे।" उन्होने इस बार उसके होठ चूम लिए।
करीब 3 घंटे के बाद वो शहर को पार करते हुए अपनी मंज़िल पर पहुँच गये। वो एक बड़ा-सा फार्महाउस था जिसके अगल-बगल और कोई बिल्डिंग नही थी। सबसे पास वाला फार्म हाउस भी एक/2 किलोमीटर दूर था। राजासाहब ने कार से उतर कर गेट पे लटक रहा ताला खोला, कार अंदर की और गेट वापस लॉक कर दिया।
मेनका उतर कर अपने ससुर का हाथ थामे फार्महाउस को घूम कर देखने लगी। पीछे एक बड़ा स्विमिंग पूल था और चारो तरफ हरी घास बिछि थी। फार्म हाउस की बिल्डिंग बहुत आलीशान थी। किचन मे खाने का सारा समान मौजूद था।
"ये सारा इंतेज़ाम,यहा की देख-रेख कौन करता है?"
"केअरटेकर है। पर हमने उसे 2 दिन की छुट्टी दे दी है। अभी यहा हम दोनो के अलावा कोई भी नही है।" राजासाहब उसे बाहों मे पकड़ने के लिए आगे बढ़े तो मेनका छितक कर दूर हो गयी। "पहले कुछ खा लें।"
मेनका ने खाना निकाला तो राजासाहब ने उसे खींच कर अपनी गोद मे बिठा लिया और दोनो वैसे ही खाने लगे। मेनका की बड़ी गांड का दबाव पड़ते ही राजासाहब का लंड खड़ा हो गया और मेनका उसकी चुभन अपनी गांड पे महसूस करने लगी। खाना ख़तम होते-होते दोनो गरम हो चुके थे।
बने रहिये...........
उसने सोचा कि आज ऑफीस ना जाए पर फिर लगा कि कल ही तो उसे वी-पी बनाया गया है और आज पहले दिन ही ग़ैरहाज़िर रहे, ये अच्छा नही लगेगा। फिर आज सॅटर्डे था, तो ऑफीस आधे दिन मे ही ख़तम हो जाना था।
मेनका रेडी होकर नीचे आई तो पता चला कि राजासाहब पहले ही ऑफीस जा चुके हैं तो वो भी फटाफट नाश्ता कर ऑफीस पहुँच गयी। आज राजासाहब ने ऑफीस मे कल वाली हरकत नही दोहराई तो उसने राहत की साँस ली पर साथ ही साथ थोड़ा निराश भी हुई। पर फिर आने वाली रात का ख़याल आते ही उसके होठों पर मुस्कान और चूत मे गीलापन आ गया।
शाम 4 बजे राजासाहब ने उस से ऑफीस से चलने को कहा। दोनो कार मे बैठ गये और राजासाहब ने ड्राइविंग शुरू कर दी। मैत्री की पेशकश
"अरे,ये किधर जा रहे हो? ये रास्ता तो घर नही जाता।"
"हा, हम घर जा भी नही रहे।"
"तो फिर कहा जा रहे हैं?" मेनका खिसक कर अपने ससुर से सॅट कर बैठ गयी।
"वो तो पहुँच कर ही पता चलेगा।" उन्होने भी उसे अपनी बाँह मे समेट लिया।
"हम रात तक वापस तो आ जाएँगे ना?"
"अब तो हम कल शाम को ही लौटेंगे।"
"ओह। पर हमे कपड़े तो ले लेने लेते घर से।"
"जहा हम जा रहें है वाहा कपड़ों की कोई ज़रूरत नही है मेरी जान।" राजासाहब ने उसके गाल पर चूम लिया।
"हटो। मैं बिना कपड़ों के नही रहूंगी।" मेनका बनावटी गुस्से से बोली।
"वो तो हम पहुँच कर देखेंगे।" उन्होने इस बार उसके होठ चूम लिए।
करीब 3 घंटे के बाद वो शहर को पार करते हुए अपनी मंज़िल पर पहुँच गये। वो एक बड़ा-सा फार्महाउस था जिसके अगल-बगल और कोई बिल्डिंग नही थी। सबसे पास वाला फार्म हाउस भी एक/2 किलोमीटर दूर था। राजासाहब ने कार से उतर कर गेट पे लटक रहा ताला खोला, कार अंदर की और गेट वापस लॉक कर दिया।
मेनका उतर कर अपने ससुर का हाथ थामे फार्महाउस को घूम कर देखने लगी। पीछे एक बड़ा स्विमिंग पूल था और चारो तरफ हरी घास बिछि थी। फार्म हाउस की बिल्डिंग बहुत आलीशान थी। किचन मे खाने का सारा समान मौजूद था।
"ये सारा इंतेज़ाम,यहा की देख-रेख कौन करता है?"
"केअरटेकर है। पर हमने उसे 2 दिन की छुट्टी दे दी है। अभी यहा हम दोनो के अलावा कोई भी नही है।" राजासाहब उसे बाहों मे पकड़ने के लिए आगे बढ़े तो मेनका छितक कर दूर हो गयी। "पहले कुछ खा लें।"
मेनका ने खाना निकाला तो राजासाहब ने उसे खींच कर अपनी गोद मे बिठा लिया और दोनो वैसे ही खाने लगे। मेनका की बड़ी गांड का दबाव पड़ते ही राजासाहब का लंड खड़ा हो गया और मेनका उसकी चुभन अपनी गांड पे महसूस करने लगी। खाना ख़तम होते-होते दोनो गरम हो चुके थे।
बने रहिये...........


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